सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग ४: तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम्

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम्
अहंप्रत्ययबीजं यदहंप्रत्ययवत्स्थितम् ।
नाहंप्रत्ययवह्ल्युष्टं कथं कर्म प्ररोहति ॥१॥
अह्मिति—अहंकार का जो बीजरूप कर्म अहं-प्रत्यय से युक्त अन्तःकरण में स्थित है, वह 'मैं अहंकार नहीं
हूँ' इस ज्ञानाग्नि से दग्ध हो जाने पर पुनः कैसे पैदा हो सकता है? ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
'अहं ब्रह्मास्मि' इस ब्रह्मात्मज्ञान ( ईश्वर से अभिन्न आत्मा का ज्ञान ) को मोक्ष का साधन बताया गया है,
किन्तु वह कैसे संभव है ? क्योंकि अनेक जन्मों के अनेक सञ्चित कर्म रहते हैं, अतः उनका फल अवश्य ही प्राप्त होना है ।
एवञ्च उन सञ्चित कर्मों के प्रतिबन्धक रहते ब्रह्मात्मैक्यज्ञान, मोक्ष का साधन नहीं हो सकेगा । 'अहम्' इस प्रत्यय को
'अहंकार' ( अनात्मा में आत्माभिमान ) कहते हैं । उस अहंकार के कारण ही मनुष्य कर्म करता है, अर्थात् कर्म और
अहंकार का कार्य-कारणभाव सम्बन्ध है । तात्पर्य यह है कि अहम्प्रत्यय ( अहंकार ) ही कर्म का कारण ( बीज ) है ।
जिस साभास अन्तःकरण में 'अहम्' अर्थात् 'मैं' इस प्रकार की प्रतीति होती है, उस अन्तःकरण को 'अहम्प्रत्ययवत्'
कहते हैं । अथवा 'अहम्' इस प्रकार की प्रतीति जिस अहंकार में होती है, वह साभास अहंप्रत्यय जिस कर्म का उपादान
कारण (बीज) है, उस कर्म को 'अहम्प्रत्ययबीज' शब्द से कहा गया है । मूलाज्ञान (मूलाविद्या) के कार्यरूप अहम्प्रत्यय-
विशिष्ट-अहंकार में 'कर्म' की स्थिति रहती है, इसलिये 'कर्म' को 'अहम्प्रत्ययवत्स्थित' शब्द से कहा गया है । क्योंकि
कार्य का अपने उपादान में रहने का ही नियम है, अन्यत्र नहीं । एवं च अहंप्रत्ययवत् (अहंकारविशिष्ट) साभास
अहंकार में अथवा अन्तःकरण में सञ्चित कर्म जब 'नाहं कर्ता भोक्ता किन्तु ब्रह्मैवास्मि' 'मैं कर्ता, भोक्ता नहीं हूँ,
मैं तो ब्रह्म ही हूँ' इस प्रकार वेदान्त वाक्य से उत्पन्न हुए ज्ञानाग्नि के द्वारा दग्ध हो जाता है ( जला दिया जाता है ),
तब वह ( संचित कर्म ) पुनः फलोन्मुख नहीं होता । जैसे अग्नि; जलाने योग्य वस्तुओं को जलाता है, वैसे ही वेदान्त-
वाक्योत्पन्न 'नाहं कर्ता ब्रह्म वाह्मस्मि' यह ज्ञान सञ्चित कर्मों को जला देता है, इसलिये वेदान्तवाक्योत्पन्न ज्ञान 'नाहं
कर्ता, ब्रह्मैवाह्मस्मि' को अग्नि शब्द से कहा गया है । जैसे दग्ध हुए ( जले हुए ) बीज से अंकुर पैदा नहीं हो
पाता वैसे ही ज्ञानाग्नि से दग्ध हुए सञ्चित कर्म से फलोत्पत्ति नहीं होती । वेदान्तवाक्य से आत्मतत्त्वज्ञान होनेपर
मूलाज्ञान ( मूलाविद्या ) की निवृत्ति होना सुनिश्चित है, क्योंकि अज्ञान और ज्ञान दोनों परस्परविरुद्ध हैं । मूलाज्ञान
की निवृत्ति होने से उसके कार्यभूत अन्तःकरण की भी निवृत्ति हो जाती है । जब अन्तःकरणरूप आश्रय ही नहीं रहा,
तब 'कर्म' कहां स्थित रहेंगे ? निराश्रय तो रह नहीं सकते । अतः पूर्वोक्त शंका ( सञ्चित कर्मरूप प्रतिबन्धक के रहते
आत्मज्ञान विफल होगा ) उचित नहीं है । निष्कर्ष यह हुआ कि वेदान्तवाक्योत्पन्न ब्रह्मात्मज्ञान ही मोक्षप्राप्ति का
एकमात्र उपाय ( साधन ) है ॥ १ ॥
दृष्टवच्चेत्प्ररोहः स्यान्नान्यकर्मा स इष्यते ।
तन्निरोधे कथं तत्स्यात्पृच्छामो वस्तुच्यताम् ॥२॥
दृष्टवदिति—यदि यह कहा जाय कि दृष्टफलोत्पादक भिक्षाटनादि कर्मों के समान तत्त्वज्ञानी के संचित कर्म
भी फल देंगे । किन्तु यह कहना इसलिये ठीक नहीं है कि ज्ञानी का भिक्षाटनादि व्यापार तो प्रारब्धकर्म के कारण हो रहा
है । तथापि पुनः प्रश्न उत्पन्न होता है कि तत्त्वज्ञानाग्नि से मूलाविद्यारूप अज्ञान की निवृत्ति जब हो जाती है, तब उसका
(अज्ञान का) कार्यभूत प्रारब्ध कर्म भी कैसे रहेगा ? इसका समाधान कीजिये ॥२॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका करनेवाले का अभिप्राय यह है कि ज्ञानी के भिक्षाटनादि कर्मों का फल उसे जैसे उपलब्ध होता है,
वैसे ही विधिविहित अग्निहोत्रादि कर्मों का अदृष्ट फल भी उसे क्यों नहीं मिलेगा ? किन्तु यह शंका ठीक नहीं है,

३२ उपदेशसाहस्री
क्योंकि ज्ञानी का भिक्षाटनादि व्यापार अन्यकर्मा है। उसके भिक्षाटनादि व्यापार में ज्ञानी का वह प्रारब्धकर्म कारण है,
जिसका फल अन्यत्र प्रवृत्त है। इसलिये उसका भिक्षाटनादि व्यापार 'अन्यकर्मा' है। भिक्षाटनादि कर्म तो तत्त्वज्ञान के
अविरुद्ध प्रारब्धफलकर्मनिबन्धन है। किन्तु विधिविहित कर्म, तत्त्वज्ञान के विरोधी होने के कारण उस प्रकार के नहीं
हैं। तथापि एक शंका अभी अवशिष्ट है कि ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति अपने मूल अहंकार के सहित होती है; अतः
आश्रयभूत अहंकार की निवृत्ति हो जाने से तदाश्रित संचित कर्म की भी निवृत्ति जब हो रही है तो प्रारब्धकर्म की भी
निवृत्ति हो जानी चाहिये। जिस प्रारब्धकर्म के कारण ज्ञानी की भिक्षाटनादि कर्म में प्रवृत्ति होती है, उस प्रारब्ध
कर्म की निवृत्ति तत्त्वज्ञान से क्यों नहीं होती ? इस शंका का उत्तर दीजिये ॥ २ ॥
देहाद्यारम्भसामर्थ्याज्ज्ञानं सद्विषयं त्वयि ।
अभिभूय फलं कुर्यात्कर्मान्ते ज्ञानमुद्भवेत् ॥३॥
देहादीति—प्रारब्धकर्म में देहोत्पादन (देहारंभ) सामर्थ्य है। अतः वह ज्ञानी के सद्वस्तु (ब्रह्म) विषयक
ज्ञान को अभिभूत करके अपना फल देता है। उस प्रारब्ध कर्म की फलभोग के द्वारा समाप्ति होने पर ही प्रतिबन्ध-
शून्य ज्ञान का आविर्भाव होता है ॥ ३ ॥
पूर्वोक्त अवशिष्ट आशंका का उत्तर दे रहे हैं—ब्रह्मात्मविषयक ( सद्द्विषयक ) ज्ञान, वेदान्तवाक्यरूप
प्रमाण से उत्पन्न होने के कारण यद्यपि प्रबल है, तथापि उसे यह प्रारब्धकर्म, विदेहकैवल्यरूप फल नहीं देने देता,
क्योंकि इस प्रारब्धकर्म में देहारंभ (देहोत्पादन) का सामर्थ्य प्रबलतर है। अतः यह प्रारब्धकर्म देहाभास, जगदाभासरूप
अपना फल तुम जैसे ज्ञानी को भी अवश्य देगा। प्रारब्धकर्मजन्य फलभोग की समाप्ति होने पर ही प्रतिबन्धरहित
ज्ञान उद्भूत होता है। और वह वर्तमानकार्यसंपादक अविद्यालेश ( अविद्यासंस्कार ) की भी निवृत्ति कर देता है तथा
उस ज्ञानी को स्वाराज्य पर स्थापित कर देता है ॥ ३ ॥
आरब्धस्य फले ह्येते भोग ज्ञानं च कर्मणः ।
अविरोधस्तयोर्युक्तो वैधर्म्यं चेतरस्य तु ॥४॥
आरब्धस्येति—भोग और ज्ञान दोनों ही प्रारब्ध कर्म के फल हैं। अतः उनमें अविरोध अर्थात् विरोध न
रहना ठीक हो है। किन्तु प्रारब्धातिरिक्त अन्य कर्मों का ज्ञान से विरोध है। अतः उन्हीं का ज्ञानाग्नि से दाह हो पाता है,
प्रारब्धकर्म का नहीं। उन प्रारब्ध कर्मों का क्षय (नाश) फलभोग से ही होता है ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पुनः शंका होती है कि आरब्ध कर्म हो या अनारब्ध कर्म हो, दोनों ही समानरूप से अज्ञानकार्य हैं।
अज्ञान की निवृत्ति होने पर दोनों का ही आश्रय समान रूप से निवृत्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि
प्रारब्धकर्मवशात् ज्ञानी को भी भोग भोगना पड़ता है और अनारब्ध कर्म तथा उसके फल की स्थिति ज्ञानी में नहीं
होती, यह कैसे संभव हो सकता है ? इस शंका का समाधान इस श्लोक के द्वारा दिया जा रहा है—भोग और ज्ञान
दोनों ही आरब्धकर्म के फल हैं। अतः दोनों ( भोग और ज्ञान ) में अविरोध रहना उचित ही है, किन्तु अनारब्ध-
फलवाले संचित तथा क्रियमाण कर्मों का तो ज्ञान के साथ विरोध है ही, क्योंकि दोनों में वैपरीत्य है, वैधर्म्य है। ज्ञान
को शरीरादि की अपेक्षा करनी ही पड़ती है, जो शरीरादि अपने कारणभूत अज्ञान से पैदा होते हैं। जिसने शरीर
धारण न किया हो ऐसे अशरीरी में आगन्तुक ( अकस्मात् ) ज्ञान का होना संभव नहीं। ज्ञान का कारण और शरीर
आदि का कारण एक नहीं हो सकता। क्योंकि अन्य का कारण किसी अन्य की उत्पत्ति में हेतु नहीं हो सकता, सभी
कार्यों के अपने अपने कारण नियत होते हैं। अतः कुछ कर्मविशेषों के द्वारा ज्ञानोत्पत्तियोग्य शरीरविशेषों में अपना
फल देना आरंभ कर दिये जाने पर उस शरीरविशेष का आश्रय करके ज्ञान के हेतुभूत कर्म, 'ज्ञान' का आरंभ करते हैं
यह स्वीकार करना होगा। देह के होने पर उससे भोग होना अवश्यंभावी है। अतः भोगप्रद कर्म के द्वारा उत्पन्न हुए
शरीर (देह) का आश्रय कर अपने हेतुभूत प्रारब्धकर्म से आसादित (प्राप्त) ज्ञान, अज्ञाननिवृत्तिरूप अपने फल को
उत्पन्न करता है, तथापि एकमात्र भोग के ही द्वारा नष्ट होने वाले देहारंभक प्रारब्धकर्म से आक्षिप्त जो अविद्या-

तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणम् २३
लेश (अविद्यासंस्कार) है, उसकी निवृत्ति नहीं कर पाता है, क्योंकि उसका (प्रारब्धकर्म से उत्पन्न ज्ञान का) उपजीव्य
के साथ कोई विरोध नहीं है। एवंच आरब्धफलकर्म और ज्ञान दोनों में कोई विरोध नहीं है। किन्तु अनारब्धफलवाले
कर्मों का (संचित-क्रियमाणकर्मों का) तथा उनके फलों का अकर्तृभूत आत्मतत्त्व के ज्ञानोदय (ज्ञानोत्पत्ति) के साथ
विरोध है, अतः कर्तृत्वभाव (अहंकार या अन्तःकरण) की निवृत्ति होने पर आश्रय के न रहने से अनारब्धफलवाले
कर्मों का न रह पाना संगत ही है। ज्ञान के साथ उन कर्मों का सहावस्थान हो ही नहीं सकता। प्रारब्धकर्म प्रवृत्त-
फलवाला है और अनारब्धकर्म अप्रवृत्तफलवाला है, यही दोनों में भेद है ॥ ४ ॥
देहात्मज्ञानवज्ज्ञानं देहात्मज्ञानबाधकम् ।
आत्मन्येव भवेद्यस्य स नेच्छन्नपि मुच्यते ।
ततः सर्वमिदं सिद्धं प्रयोगोऽस्माभिरोरितः ॥५॥
देहात्मेति-आत्मज्ञानी को भी यदि प्रारब्ध कर्म का भोग भोगना ही पड़ता है तो बहुत संभव है कि भोगते-
भोगते उसे पुनः देहाभिमान हो जाय, और उससे ज्ञान प्रतिबद्व होकर उसका मोक्ष न हो पाय । इस आशंका का समा-
धान इस प्रकार दिया जा रहा है कि जिस प्रकार संसारी (अज्ञानी) पुरुषों को देहात्मबुद्धि हो रही है, उसी प्रकार
जिसे आत्मा में ही देहात्मबुद्धि को निवृत्त करनेवाला 'ज्ञान' हो गया हो, वह पुरुष इच्छा न करने पर भी मुक्त हो
जाता है। अतः प्रारब्ध से आत्मज्ञान का अविरोध आदि सब बातें सिद्ध हो चुकीं। तत्संबंधी युक्तियों को हम पहले बता
चुके हैं ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
देहारम्भक कर्मनिबन्धन भोग यदि ज्ञानी को होता है, तो कदाचित् देहात्माभिमान से उत्पन्न दुरित, 'ज्ञान'
का प्रतिबन्धक भी हो सकता है, तब मोक्षप्राप्ति कैसे संभव हो सकेगी ? इसका समाधान यह है कि जैसे अविवेकी
लौकिक पुरुष को अपने देह में ही 'मनुष्योऽहम्' मैं मनुष्य हूँ, इस प्रकार निःसन्दिग्ध आत्मज्ञान होता है, वैसे देह से
लेकर अहंकार तक के साक्षी आत्मा (मुख्यात्मा) में ही जिसको देहात्मज्ञान का बाधक 'अहमस्मि परं ब्रह्म' मैं ब्रह्म हूँ,
यह निःसन्दिग्ध ज्ञान हो जाता है, उस पुरुष की इस ब्रह्मज्ञान के बलपर समस्त अनर्थराशि (मूलाज्ञान, उसका कार्य,
उसके संस्कार आदि सभी कुछ) निवृत्त हो जाती है, उस स्थिति में मुक्ति की इच्छा न रहनेपर भी उस ज्ञानबल पर
वह मुक्त ही है। एवंच आत्मतत्त्वज्ञान के आविर्भूत होनेपर पुनः देहाभिमान होने का कोई कारण ही नहीं है, अतः
मोक्ष में कोई प्रतिबन्धक नहीं है। श्रुति-स्मृतियाँ भी इसका समर्थन करती हैं ॥ ५ ॥
॥ इति चतुर्थन्तत्त्वज्ञानस्वभावप्रकरणं समाप्तम् ॥