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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पद्यभाग ११: ईक्षितृत्वप्रकरणम्

ईक्षितृत्वप्रकरणम्
ईक्षितृत्वं स्वतःसिद्धं जन्तूनां च ततोऽन्यता ।
अज्ञानादित्यतोऽन्यत्वं सदसीति निवर्त्यते ॥१॥
ईक्षितृत्वमिति—समस्त जीवों का ईक्षितृत्व ( चित्स्वरूपत्व ) स्वभाव से ही सिद्ध है, और उनकी भिन्नता
अज्ञानजनित ( उपाधि के कारण ) है । अतः 'तू सत् ( ब्रह्म ) है' इस वाक्य से उनके भेद का निरसन किया गया है ॥ १ ॥
हृदयस्पर्शिनी
ब्रह्मात्मैक्यज्ञान से मुक्ति होती है अर्थात् एकमात्र ब्रह्मात्मैक्यज्ञाननिष्ठ व्यक्ति मुक्त होता है, यह जो
कहा गया है, वह संगत नहीं हो सकता। क्योंकि ब्रह्म और आत्मा परस्परविरुद्ध स्वभाव के हैं, अतः उन दोनों की
एकता होना संभव ही नहीं। मुक्ति तो कर्म से या कर्मसहित ज्ञान से ही हो सकती है। उसी तरह वेदान्त वाक्यों से
ही सुनिश्चित (यथार्थ-सम्यक्) ज्ञान हो सकता है—यह कथन भी सन्दिग्ध है, वह ज्ञान तो अनुमानादि प्रमाण से भी
हो सकेगा—यदि कोई ऐसी आशंका करे तो उस आशंका के परिहारार्थ इस प्रकरण का आरंभ किया जा
रहा है, और इसके द्वारा 'ज्ञानादेव मुक्तिः' ज्ञान से ही मुक्ति होती है, यह बताया जायगा, और वह ज्ञान,
वेदान्त-महावाक्य से ही हो सकेगा, अनुमानादि प्रमाणों से नहीं—यह भी बताया जायेगा । 'त्वं सत् असि' तुम सच्छब्द-
लक्षित ब्रह्म ही हो, संसारी नहीं हो—इस वाक्योपदेश से ही सच्छब्दार्थ ब्रह्म और जीव का भेद निवृत्त हो जाता है ।
तथापि संसारी अशुद्ध जीव में उससे नितान्त विपरीत ब्रह्मत्व की संभावना कैसे कर सकते हैं ? यह आशंका हो सकती
है। उस आशंका का निवारण इस प्रकार कर सकते हैं कि समस्त प्राणियों का चिद्रूपत्व ही ईक्षितृत्व है, और वह स्वतः-
सिद्ध (स्वाभाविक) है। चिद्रूपत्व की तरह कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि को भी स्वाभाविक नहीं माना जा सकता। अन्यथा
स्वरूप में व्यभिचार होगा। क्योंकि कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि चिद्रूप से अन्य ( भिन्न ) है, जो अज्ञानजनित है। एवंच
अन्यत्व ( अन्यता ) अज्ञाननिबन्धन ( अज्ञानकारणक ) है, वास्तविक ( पारमार्थिक ) नहीं है; कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि में
अज्ञानकल्पितत्व तथा ब्रह्मविपरीतत्व है, और मोक्ष स्वतश्चिन्मात्रस्वभाव ( स्वरूप ) तथा अज्ञान-निवृत्तिलक्षण
( स्वरूप ) है। मोक्ष में केवल तत्त्वज्ञान मात्र की अपेक्षा रहती है, अर्थात् तत्त्वज्ञान की आवश्यकता होती है। अतः
'तत्त्वमसि' महावाक्य के अर्थज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति होने से कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि की भी निवृत्ति हो जाती है। एवञ्च
ज्ञान से ही अन्यत्वनिवृत्तिरूप मुक्ति होती है। उसके लिये अन्य साधन खोजने की आवश्यकता नहीं है ॥ १ ॥
एतावद्धचमृतत्वं न किंचिदन्यत्सहायकम् ।
ज्ञानस्येति ब्रुवच्छास्त्रं सलिङ्गं कर्म बाधते ॥२॥
एतावदिति—यह आत्मज्ञान ही अमृतत्व ( मोक्षप्राप्ति का साधन ) है । इस आत्मज्ञान का कोई और सहायक
नहीं है। इस प्रकार कहता हुआ शास्त्र¹ आश्रमोचित यज्ञोपवीतादि लिङ्गों के सहित कर्म का बाध करता है ॥ २ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व कथन के अनुसार यद्यपि ज्ञान से मोक्ष होता है, तथापि वह ज्ञान, कर्मसापेक्ष होकर ही मोक्ष का
साधन हो सकता है, कर्मनिरपेक्ष होकर नहीं—ऐसा कुछ लोगों का कहना है, किन्तु वह श्रुति तथा युक्ति के विरुद्ध
होने के कारण उचित नहीं है। अतः कर्म को ज्ञान का सहायक मानकर उसे मोक्ष का साधन नहीं माना जा सकता।
अद्वैत आत्मज्ञान के होनेपर कर्म के हेतुभूत जात्यादि के अभिमान के अभाव में कर्म की स्थिति ही कहाँ, जो मोक्षफल
की प्राप्ति कराने में ज्ञान का सहायक बन सके ? एवंच ज्ञान-कर्मसमुच्चय मोक्षप्राप्ति में कारण नहीं है ॥ २ ॥
१. 'एतावदरे खल्वमृतत्वम्'—( बृ. उ. ४।५।१५ ) अमृतत्व का साधन आत्मज्ञान ही है—इन शब्दों से निश्चयपूर्वक कहनेवाली
श्रुति को शास्त्र कहते हैं ।
७

५० उपदेशसाहस्री
सर्वैषां मनसो वृत्तमविशेषेण पश्यतः ।
तस्य मे निर्विकारस्य विशेषः स्यात्कथंचन ॥३॥
सर्वेषामिति—सबके अन्तःकरणों की वृत्तियों को सामान्यभाव से देखने वाले उस मुझ निर्विकार आत्मा
का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? ॥ ३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस प्रकरण के प्रथम श्लोक के द्वारा प्रतिपादित स्वाभाविक चिद्रूपत्व को बताते हुए ज्ञानी के लिये कर्म
का होना संगत नहीं हो सकता, यह प्रस्तुत श्लोक के द्वारा बताया जा रहा है। क्योंकि समस्त प्राणियों की मनोवृत्तियों
के साक्षी उस आत्मा को जाति आदि का कोई अभिमान नहीं होता है। श्लोक में आये 'विशेष' शब्द का अर्थ कर्तृत्व,
भोक्तृत्व आदि तथा शास्त्रविहित कर्म के साधनभूत जात्याद्यभिमान है। 'कथञ्चन' का अर्थ आक्षेप है। अर्थात् किसी
प्रकार भी मुझमें विकार नहीं हो सकता, क्योंकि अभिमानशून्य होकर केवल साक्षी बनकर मैं देखता रहता हूँ ॥ ३ ॥
मनोवृत्तं मनश्चैव स्वप्नवज्जाग्रतीक्षितुः ।
संप्रसादे द्वयासत्त्वाच्चिन्मात्रः सर्वगोऽव्ययः ॥४॥
मन इति—स्वप्न के समान जाग्रत् अवस्था में भी मन और मन की वृत्तियों के साक्षी (ईक्षिता) आत्मा
का कोई विशेषभाव कैसे हो सकता है ? किन्तु सुषुप्ति अवस्था में इन दोनों का अभाव होने से सर्वगत, अविनाशी आत्मा
चेतनमात्र रह जाता है ॥ ४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह आत्मा सबकी मनोवृत्तियों को समान भाव से (अविशेषेण) किस प्रकार देखता है, यह जिज्ञासा
होनेपर दृष्टान्त के साथ उसका उपपादन करते हुए आत्मा की चिदेकरसता को बता रहे हैं। स्वप्नावस्था में बाह्य
विषय (पदार्थ) न होने से आत्मा जैसे सवृत्तिक (वृत्तिसहित) मन को ही देखता रहता है, ठीक उसी तरह जाग्रत्
अवस्था में भी मनोवृत्ति (मनःप्रचार—मनोवृत्त) और उस वृत्ति के आश्रयभूत मन को आत्मा देखता है, तब उसमें
कौनसी विशेषता (विकार) उपलब्ध हो रही है ? अर्थात् कोई नहीं। क्योंकि स्वप्न में जैसे वृत्तिसहित मन के अतिरिक्त
आत्मा को कुछ उपलब्ध नहीं होता, वैसे ही जाग्रत् अवस्था में भी उसे विषयाकारवृत्तिविशिष्ट मन के अतिरिक्त
कुछ भी उपलब्ध नहीं होता है। यदि कहें कि इस प्रकार का मनोदर्शन ही उस (आत्मा) में स्वाभाविक विशेष
(विकार) है, तो यह कथन भी ठीक न होगा, क्योंकि सुषुप्तिदशा में (सम्प्रसाद में) वृत्ति और मन दोनों ही नहीं
रहते१, अतः उनका दर्शन भी स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। एवंच आत्मा चिन्मात्र है, सर्वत्र व्याप्त है, अव्यय
और अद्वितीय सिद्ध होता है ॥ ४ ॥
स्वप्नः सत्यो यथाऽऽबोधाद्देहात्मत्वं तथैव च ।
प्रत्यक्षादेः प्रमाणत्वं जाग्रत्स्यादाऽऽत्मवेदनात् ॥५॥
स्वप्न इति—जिस प्रकार जागने तक स्वप्न की सत्यता प्रतीत होती है, उसी प्रकार आत्मज्ञान होने तक
ही जाग्रत् अवस्था में देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य समझा जाता है ॥ ५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका—पूर्वप्रतिपादन यदि अकाट्य हो तो बाह्याभ्यन्तर द्वैत का अभाव स्वीकार करना ही होगा,
किन्तु प्रत्यक्षादि प्रमाणों के साथ विरोध होने से तथा लौकिक-वैदिक समस्त व्यवहारों का लोपप्रसंग प्राप्त होने से
पूर्वप्रतिपादन उचित नहीं प्रतीत होता।
समा०—जैसे जागने तक स्वप्न सत्य अर्थात् लौकिक-वैदिक व्यवहार के योग्य प्रतीत होता है, उसी तरह
जाग्रत् अवस्था में भी देहात्मबुद्धि और प्रत्यक्षादि प्रमाणों का प्रामाण्य सम्पूर्ण व्यवहारों का अंग (साधन-उपाय) माना
१. 'न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ।'—(बृ. उ. ४।३।२३)

ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५१
जाता है। परन्तु उसकी भी एक अवधि है, जो “आत्मवेदनात्” शब्द से बताई गई है, अर्थात् 'आ-आत्मवेदनात्' तक
ही उसकी अवधि है। आत्मतत्त्वसाक्षात्कार के पूर्व तक ही समस्त व्यवहार की सत्ता है, आत्मतत्त्वसाक्षात्कार होनेपर
सब व्यवहार समाप्त (अभाव) हो जाते हैं। अर्थात् जाग्रदवस्था में देहादि में मिथ्या आत्माभिमान रहता है, उस
समय प्रत्यक्षादिकों को प्रमाण माना जाता है, इसलिये इस अविद्यावस्था में व्यवहार चलते रहते हैं, व्यवहारलोप
का प्रसंग नहीं आता। एवंच यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आत्मज्ञान के पूर्व तक ही लौकिक-वैदिक समस्त व्यवहार
और उनके लिये प्रमाणों की आवश्यकता होती है, आत्मज्ञान होनेपर 'एक चिन्मात्र आत्मा' के सिवाय कुछ नहीं ॥५॥
व्योमवत्सर्वभूतस्थो भूतदोषैर्विवर्जितः ।
साक्षी चेताऽगुणः शुद्धो ब्रह्मैवास्मि* स केवलः ॥६॥
व्योमवदिति—मैं आकाश के समान सम्पूर्ण प्राणिवर्गों में स्थित हूँ, तथापि उनके दोषों से रहित हूँ, सबका
साक्षी१, चिद्रूप, निर्गुण, शुद्ध और अद्वितीय ब्रह्म ही हूँ ॥ ६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस श्लोक के द्वारा उसके अव्यवहार्य स्वरूप को बता रहे हैं—विद्यावस्था (आत्मज्ञान की अवस्था)
में व्यवहार का अभाव तो अभीष्ट ही है। आत्मा 'चेता' है अर्थात् अपने प्रकाश के द्वारा (आत्मा स्वप्रकाश यानी
प्रकाशरूप है) अज्ञान और उसके कार्यों का प्रकाशक (अवभासक) है, इस कारण उसे चेता (चिद्रूप) कहा जाता है।
प्राणियों में स्थित रहनेपर भी उनके दोषों से वह संस्पृष्ट नहीं होता, क्योंकि वह केवल साक्षी होकर स्थित रहता है।
'व्योमवत् सर्वभूतस्थः' आकाश के समान समस्त प्राणियों में स्थित है, यह कहने से उसका 'असंगत्व' ज्ञात होता है।
आकाश सर्वत्र रहते हुए भी जैसे असंग, उसी तरह आत्मा भी असंग है। आत्मा को सर्वभूतस्थ कहने का तात्पर्य यह है
कि सम्पूर्ण प्राणियों (भूतों) में 'अहम्' इत्याकारक वृत्ति की अभिव्यक्ति, उसके बिना रहे नहीं हो सकती२। अज्ञानरहित
होने से उसे 'शुद्ध' कहते हैं। 'केवल' कहने से वह तीनों अवस्थाओं से रहित है। एवंच मैं ब्रह्म (पूर्ण) ही हूँ ॥ ६ ॥
नामरूपक्रियाभ्योऽन्यो नित्यमुक्तस्वरूपवान् ।
अहमात्मा परं ब्रह्म चिन्मात्रोऽहं सदाऽद्वयः ॥७॥
नामेति—मैं नाम, रूप और क्रिया से अन्य (भिन्न) और नित्यमुक्तस्वरूप हूँ, तथा मैं आत्मा ही नित्य
[ सदा ] अद्वितीय [ अद्वय ] चिन्मात्र परब्रह्म हूँ ॥ ७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
इस श्लोक के द्वारा आत्मा के 'केवलत्व' को बताया गया है। अर्थात् वाच्य-वाचक और तद्व्यापारात्मक
प्रपञ्च से शून्य (रहित) आत्मा है ॥ ७ ॥
अहं ब्रह्मास्मि कर्ता च भोक्ता चास्मीति ये विदुः ।
ते नष्टा ज्ञानकर्मभ्यां नास्तिकाः स्युर्न संशयः ॥८॥
अहमिति—'मैं ब्रह्म हूँ तथा कर्ता भोक्ता भी हूँ' ऐसा जो लोग मानते हैं, वे ज्ञान और कर्म दोनों से ही
भ्रष्ट [ पतित ] हैं, और वे नास्तिक ही हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ ८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका—ज्ञान-कर्मसमुच्चयवादी के भेदाभेदमत के अनुसार यह शंका हो रही है कि आत्मा की अद्वयता
(अद्वयत्व) कैसे संगत हो सकती है ? क्योंकि 'अहं ब्रह्मास्मि' के समान 'अहं कर्ताऽस्मि' यह अनुभव भी प्रामाणिक रूप
से होता है।
१. श्वे. उ. ६।११
२. 'अहं मनुरभवं सूर्यश्च'—(बृ. उ. १।४।१०) इसका तात्पर्य सर्वात्मत्वाभिनय में है।

  • स्मीति के०—पाठान्तरम् ।

५२ उपदेशसाहस्री
समा०—शास्त्र कभी विरुद्धार्थ का प्रतिपादन नहीं करता । शास्त्र के अर्थ को जो विरुद्ध समझते हैं, वे
वस्तुतः कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्ड से बहिर्मुख ही हैं, इसलिए उन्हें नास्तिक ही समझना चाहिए । वे सभी पुरुषार्थों
के अयोग्य हैं ॥ ८ ॥
धर्माधर्मफलैर्योग इष्टोऽदृष्टो यथाऽऽत्मनः ।
शास्त्राद्ब्रह्मत्वमप्यस्य मोक्षो ज्ञानात्तथेष्यताम् ॥९॥
धर्मेति—किसी अन्य प्रमाण से सिद्ध न होनेपर भी मीमांसा शास्त्र के आधार पर ही आत्मा का धर्माधर्म-
रूप फलों [ पुण्य-पाप रूप फलों ] से सम्बन्ध स्वीकार किया जाता है, वैसे ही शास्त्र-प्रमाण [ वेदान्त शास्त्र के आधार
पर ] से आत्मा का ब्रह्मत्व और ज्ञान से उसका मोक्ष भी स्वीकार करना चाहिये ॥ ९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका—दूसरों को नास्तिक कह देने मात्र से अद्वैत का सिद्धांत स्थिर नहीं किया जा सकता । अद्वैत की
सिद्धि में कोई प्रमाण नहीं है, अतः ‘ब्रह्मैवास्मि’ यह ज्ञान नहीं हो सकता । अद्वैत को सिद्ध करने के लिए जो तादात्म्य-
श्रुतियाँ उपस्थित की जाती हैं, वे सब अन्यपरक होने से उपपन्न हो जाती हैं ।
समा०—शास्त्र के तत्त्वार्थ को जाननेवाले विद्वान् किन्हीं अन्यान्य प्रमाणों (प्रत्यक्षानुमानादि प्रमाणों) से
सिद्ध (प्रमित) न होते हुए भी जैसे केवल एकमात्र शास्त्रप्रमाण¹ के आधार पर ही आत्मा का सुख-दुःखादिरूप धर्मा-
धर्मफलों के साथ सम्बन्ध मान लेते हैं, उसी तरह वे विद्वान् वेदान्तशास्त्र² के आधार पर आत्मा में ब्रह्मत्व (आत्मा को
ब्रह्म) और उसका ज्ञान से ही मोक्ष स्वीकार कर लें । क्योंकि शास्त्रत्वेन दोनों समान रूप से प्रमाण हैं । एवं च भेद और
कर्म दोनों निन्दित होने से उन दोनों में शास्त्र का तात्पर्य नहीं है । अतः शास्त्र का अनुसरण करनेवाले विद्वान्
यथाशास्त्र ही अर्थ समझने का प्रयास करें । अतः ‘तत्त्वमसि’ वाक्य से आत्मा को ब्रह्म, अर्थात् आत्मा में ब्रह्मत्व के
ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति, उससे ब्रह्मरूप में ही उसकी स्थिति और मोक्ष (कैवल्य) समझना चाहिये ॥ ९ ॥
या माहार्जनाद्यास्ता वासनाः स्वप्नदर्शिभिः ।
अनुभूयन्त एवेह ततोऽन्यः केवलो दृशिः ॥१०॥
या इति—हरिद्रा [ हल्दी ] से रंगे हुए वस्त्रादि के समान जाग्रत् दशा की वासनाएँ होती हैं, उन्हीं का
स्वप्न देखने वाले पुरुष उनका अनुभव करते रहते हैं, वास्तव में उनकी सत्ता नहीं रहती । उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में
भी शुद्ध साक्षीमात्र आत्मा उस विषयदर्शी जीव से सर्वदा भिन्न रहता है ॥ १० ॥
हृदयस्पर्शिनी
समुच्चयवादी कह सकता है कि हमारे शास्त्र ने आत्मा के साथ जो धर्माधर्म का सम्बन्ध माना है, वह
किसी प्रमाणान्तर से विरुद्ध न होने के कारण उचित ही है, किन्तु आत्मा का अकर्तृत्व, अभोक्तृत्व आदि उसके प्रत्यक्ष
प्रतीत होनेवाले कर्तृत्व-भोक्तृत्व से विरुद्ध हैं, इस कारण वेदान्तियों का कहना ठीक नहीं है । अतः शास्त्र और अनुभव
का समन्वय (अविरोध) करने के लिये हमें भेदाभेदवाद का स्वीकार कर लेना चाहिये । किन्तु उसका यह कथन ठीक
नहीं है, क्योंकि आत्मा में कर्तृत्व आदि का जो प्रतिभास होता है, वह वास्तविक न होकर केवल अध्यास मात्र है ।
अतः श्रुत्युक्त अद्वैत का प्रतिपक्षी कोई न होने से निर्विरोध अद्वैत सिद्ध हो जाता है । स्वप्नावस्था में लिङ्ग के
आश्रित रहनेवाली³ श्रुतिसिद्ध वासनाएँ ही स्वप्नदर्शियों के द्वारा देखी जाती हैं । महारजन (हरिद्रा) से
रञ्जित वस्त्रादि को ‘माहारजन’ कहते हैं । स्वप्नावस्था में वात-पित्त-श्लेष्म से दूषित हुए रस से परिपूर्ण
हुईं नाड़ियों में अनुगत (प्रविष्ट) हुए जाग्रद्वासनावासित मन की अनेक वासनाएँ अदृष्टादि के द्वारा उद्बुद्ध
(जागरित) होती हैं, उस कारण जाग्रत् अवस्था में दृष्ट अर्थ (पदार्थ) के आकार में परिणत हुआ वह
१. ‘पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन’— (बृ. उ. ३।२।१३)
२. ‘ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’—( मुं. उ. ३।२।९ ), ‘तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’—( श्वे. उ. ३।८, ६।१५)
३. ‘तस्यहैतस्य पुरुषस्य रूपं । यथा माहारजनं वासः’ इत्यारभ्य ‘यथाऽसकृद्विद्युत्तम्’ इत्यन्तेन श्रुत्युक्ता वासनाः । (बृ. उ. २।३।६)

ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५३
मन हरिद्रारञ्जित पटादि के रूप के समान भासित होने लगता है और स्वप्नद्रष्टा के द्वारा उसकी उपलब्धि द्रष्टा,
दृश्य, दर्शन एवं तत्करणादि के रूप में नित्य हुआ करती है। अतः स्वप्न में दिखाई पड़नेवाली माहारजन (पीतवस्त्र)
आदि के समान लिङ्गात्मा (मन-बुद्धि) के सहित वासनाओं की अपेक्षा दृशिस्वरूप द्रष्टा आत्मा विलक्षण ही प्रतीत
होता है। उसी तरह जाग्रत् अवस्था में कर्तृत्ववादि भी दृश्य होने के कारण अनात्मधर्म ही हैं, यह निश्चित होता है। अतः
कर्तृत्वादि धर्मवाले लिङ्ग (मन-बुद्धि) से दृशिस्वरूप केवल शुद्ध आत्मा कोई अन्य ही है ॥ १० ॥
कोशादिव विनिष्कृष्टः कार्यकारणवर्जितः ।
यथाऽसिर्दृश्यते स्वप्ने तद्वद्बोद्धा स्वयंप्रभः ॥११॥
कोशादिति—जिस प्रकार कोश से निकाला खड्ग् उस कोश से पृथक् [ भिन्न ] दिखलाई देता है, उसी प्रकार
स्वप्नावस्था में स्वयंप्रकाश बोद्धा भी कार्य-कारणाकार मन से पृथक् ही रहता है ॥ ११ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा की स्वप्नावस्था में दृश्य की अपेक्षा विलक्षण (पृथक्) प्रतीति होती है। जैसे खड्ग (असि) कोश
(म्यान) से अलग करने पर (निकालनेपर) अपने स्वरूप में दिखाई देता है, उसी तरह कार्य-कारणवर्जित अर्थात् कार्य-
कारणाकार लिङ्गात्मक मन से पृथक् बोद्धा आत्मा स्वप्न में यथावत् दिखाई देता है। 'दृश्यते' दिखाई देता है—कहने
से उसे (आत्मा को) दृश्य विषयों के समान मिथ्या नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह स्वयंप्रभ है। वह अपनी महिमा
से ही प्रकाशित रहता है, विषय की तरह प्रकाशित किया नहीं जाता। अथवा¹ श्रुति के द्वारा निर्णीत होने से कार्य-
कारणवर्जित आत्मा का स्वप्न में ज्ञान होता है। एवं च कोशनिष्कृष्ट असि की तरह आत्मा भी स्वप्नसंस्काराश्रय सूक्ष्म
देह से विलक्षण दिखाई देता है। उपाधि से पृथक् अपने स्वरूप में ही उसका अवभास होता है, इसी अभिप्राय को
प्रदर्शित करने में 'असि' का दृष्टान्त दिया गया है ॥ ११ ॥
आपेषात्प्रतिबुद्धस्य ज्ञस्य स्वाभाविकं पदम् ।
उक्तं नेत्यादिवाक्येन कल्पितस्यापनेतृणा ॥१२॥
आपेषादिति—कल्पित प्रपञ्च का बाध करने वाले 'नेति नेति' आदि वाक्य ने हाथ दबाने से जगे हुए चेतन
आत्मा का स्वाभाविक रूप बताया है ॥ १२ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका— आत्मा को जो स्वयंप्रकाश कहा गया है, वह कैसे संभव हो सकता है, क्योंकि वह तो ब्रह्म से
विलक्षण (भिन्न) है।
समा०— श्रुतिविरोध होने के कारण ऐसी शंका करना ठीक नहीं है। आत्मा में कर्तृत्वादि की जो प्रतीति
होती है, वह स्वप्नप्रतीति की तरह मिथ्या होने से आत्मा शुद्ध ही है अर्थात् ब्रह्म ही है, यह शास्त्र बता रहा है, अतः
निर्विरोध यह जाना जा सकता है। एवं च भेदाऽभेद की कल्पना कर अपने मन को कलुषित करना उचित नहीं है।
²श्रुति कहती है कि प्राण के अनेक नाम पुकारने पर भी वह आत्मा प्रबुद्ध नहीं हो पाया किन्तु हाथ से दबाते ही वह
जाग उठा, इससे स्पष्ट होता है कि प्राण-इन्द्रियस्वरूप लिङ्गसमुदाय से विलक्षण (भिन्न) और स्थूल संघात (समुदाय)
से भी विलक्षण (भिन्न) ही आत्मा है। अतएव अर्थात् समस्त जड़ पदार्थों से विलक्षण होने के कारण ही वह (आत्मा)
ज्ञानस्वभाव (स्वरूप) है। पाणि (कर—हाथ) स्पर्श से प्रतिबुद्ध हुए त्वंपदार्थ 'ज्ञ' का परब्रह्मरूप स्वाभाविक पद, कल्पित
(अध्यस्त) मूर्त-अमूर्त-तद्वासनाश्रयरूप के निषेधक 'नेति' वाक्य से³ कहा गया है। 'नेति नेति' ऐसी वीप्सा (द्विरुक्ति) के
द्वारा यह बताया गया है कि समस्त कारण-कार्यात्मक उपाधि का प्रतिषेध कर 'अखण्ड ब्रह्म' में 'नेति' वाक्य का तात्पर्य
है। एवं च श्रुतिविरोध होने से आत्मा को ब्रह्म से विलक्षण समझना ठीक नहीं है ॥ १२ ॥
१. 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः'—( बृ. उ. ४।३।९ )
२. 'तं पाणिनाऽऽपेषं बोधयाञ्चकार स होत्तस्थौ' इत्यारभ्य 'स होत्तस्थौ' 'बृहत्पाण्डरवासः सोम राजन्'……( बृ. उ. २।१।१५ )
३. 'अथात आदेशो नेति नेति' इत्यारभ्य 'सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्'—इत्यन्तेन वाक्येन ।—(बृ. उ. २।३।६)

५४ उपदेशसाहस्री
महाराजादयो लोका मयि यद्वत्प्रकल्पिताः ।
स्वप्ने, तद्वद्द्वयं विद्याद्रूपं वासनया सह ॥१३॥
महाराजेति—जिस प्रकार स्वप्नकाल में राजा-महाराजा आदि लोक मुझमें ही कल्पित होते हैं अर्थात् मैं
राजा हूँ, महाराजा हूँ ऐसी कल्पना निद्रादोष के कारण मेरे ही चित्त में होती है, उसी प्रकार वासनाओं के सहित इस
द्वैत दृश्य को भी मुझमें ही कल्पित जानो ॥ १३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
हाथ से दबाने पर१ प्रतिबुद्ध हुआ 'ज्ञ' आत्मा, प्राण आदि से विलक्षण है। इस प्रकार कल्पित संसार के
निषेधक वचन से कल्पित संसार, 'आत्मा' पर आरोपित है, यह बताया गया है। अर्थात् 'नेति नेति' इत्यादि शास्त्रवचन
से निषिध्यमान संसार कल्पित है, यह श्रुति ने ही बता दिया है। स्वप्नावस्था में महाराजा आदि लोगों की कल्पना मुझ
दृगात्मा में जैसे की जाती है, उसी तरह लिङ्ग शरीर के आश्रय से रहनेवाली वासना के साथ मूर्त और अमूर्त दो रूपों
की मुझमें कल्पना की गई है२। श्रुति ने भी स्वप्नदृश्य (महाराजत्वादि की आभासता) का निर्देश कर उपसंहार में
शरीर के भीतर ही महाराजा आदि के रूप में प्राणशब्दवाच्य लिङ्गरूप उपाधिका ग्रहण कर यह स्वप्नद्रष्टा, व्यवहार
करता है—यह प्रदर्शित किया है। अर्थात् स्वप्न में महाराजा आदि निर्दिष्ट लोग भोग्यविशेष होते हुए भी स्वप्नद्रष्टा
में कल्पित हैं। अतः स्वप्न में उपलब्ध हुई कोई भी वस्तु वास्तविक नहीं है। एवञ्च वासना के आश्रयभूत लिङ्ग-
शरीर के सहित मूर्तामूर्तरूप स्थूल पदार्थ भी दृगात्मा में कल्पित ही हैं, क्योंकि दृगात्मा के द्वारा वह दृश्य हैं ॥ १३ ॥
देहलिङ्गात्मना कार्या वासनारूपिणा क्रियाः ।
नेति नेत्यात्मरूपत्वान्न मे कार्या क्रिया क्वचित् ॥१४॥
देहेति—वासनाओं [ संस्कारों ] का संचय करनेवाले तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर का अभिमान रखनेवाले
आत्मा को ही कर्मानुष्ठान कर्तव्य रहता है। यह स्थूल देह आत्मा नहीं है, यह सूक्ष्म देह आत्मा नहीं है इत्यादि वाक्यों द्वारा
लक्षित 'मैं' तो आत्मस्वरूप हूँ। अतः मेरे लिये कभी कोई कर्म कर्तव्य नहीं है ॥ १४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
स्वप्नप्रपञ्च के समान जाग्रत्प्रपञ्च भी प्रत्यगात्मा में कल्पित है यह सिद्ध ( ज्ञात ) हो जानेपर प्रत्यक्तत्त्व
को जाननेवाले ( आत्मज्ञानसम्पन्न ) के लिये कर्म करने की संभावना ही नहीं रहती, क्योंकि कर्म ( क्रिया ) तो उसे
करने होते हैं, जो स्थूल-सूक्ष्म देह का अभिमान करता हो, किन्तु जिसे अपने स्थूल-सूक्ष्म शरीर का कोई अभिमान न हो,
उसके लिये कर्मानुष्ठान कैसे संभव हो सकता है ? यह स्थूल-सूक्ष्मदेहाभिमानी आत्मा वासनारूपी है अर्थात् संस्कारों
( वासनाओं ) का संचय करते रहने का इसका स्वभाव है। ये संस्कार कर्मप्रवृत्ति कराने में निमित्त ( कारण-हेतु )
होते हैं। अर्थात् कर्म से संस्कार, और संस्कार से पुनः कर्म, पुनः उससे संस्कार, पुनः उससे कर्म इस प्रकार अविच्छिन्न
परम्परा चलती रहती है। किन्तु जब 'नेति नेति' श्रुति के द्वारा अपने स्वरूप ( आत्मस्वरूप ) का साक्षात्कार ( ज्ञान )
हो जाता है, तब दोनों देहों का अभिमान न रहने से स्वप्न में या जाग्रत् अवस्था में स्वाभाविक रूप से और विधि
के बलपर ही कोई कर्म ( क्रिया ) उसके लिये कर्तव्य नहीं रह जाती है ॥ १४ ॥
न ततोऽमृतताऽऽशास्ति कर्मणोऽज्ञानहेतुतः ।
मोक्षस्य ज्ञानहेतुत्वान्न तदन्यदपेक्षते ॥१५॥
नेति—कर्म की उत्पत्ति अज्ञान से है, इस कारण उससे अमृतत्व की आशा नहीं की जा सकती। मोक्ष का
कारण तो एकमात्र ज्ञान ही है, इसलिये वह किसी अन्य कर्म आदि की अपेक्षा नहीं रखता ॥ १५ ॥
१. “तं पाणिनाऽऽपेषं बोधयाञ्चकार” इत्यारभ्य “स होत्तस्थौ” –( बृ. उ. २।१ )
२. “यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः” इत्युपक्रम्य “स यत्रैतत्स्वप्नया चरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव
महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं निगच्छति” इति इवशब्देन स्वप्नदृश्यस्य आभासतां मध्ये निर्दिश्य “एवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा
स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते” इत्युपसंहारः । ( बृ. उ. २।१।१८ )

ईक्षितृत्वप्रकरणम् ५५
हृदयस्पर्शिनी
अज्ञानविलसित देहाभिमान से ही कर्म होता है, अतः कर्म अज्ञानमूलक है, इस कारण उससे (कर्म से)
मोक्ष की आशा रखना व्यर्थ है। ज्ञान और अज्ञान का विवेक न होनेपर ही कर्म करने की ओर प्रवृत्ति होती है।
अज्ञान और कर्म दोनों जड़ पदार्थ हैं, अतः उनमें परस्पर कोई विरोध नहीं है। एवं च 'अज्ञाननिवृत्तिरूप मोक्ष' की
निष्पत्ति में कर्म की सहायता की आशा करना व्यर्थ है। यदि मोक्ष को 'ब्रह्मात्मना अवस्थान' (ब्रह्मरूप होकर रहना)
अर्थात् परमानन्दाविर्भाव रूप मानें तब भी उत्पाद्य, आप्य, विकार्य, संस्कार्य इन चतुर्विध क्रियाफलों से उक्त मोक्ष,
विलक्षण होनेसे उसमें भी कर्म की कोई अपेक्षा नहीं है।
शंका--कर्म, स्वयं मोक्ष में कारण (हेतु) न होनेपर भी मोक्ष में हेतुभूत जो ज्ञान, उसके सहायक के
रूप में कर्म को भी कारण क्यों न माना जाय ?
समा०--अज्ञान की निवृत्ति में ज्ञान ही एकमात्र पर्याप्त है, उसे कर्म आदि अन्य किसी की सहायता की
अपेक्षा नहीं होती। अन्यत्र भी नहीं, क्योंकि अज्ञान के निवृत्त होनेपर ब्रह्मात्मना अवस्थान अर्थात् परमानन्दाविर्भाव
का होना तो स्वयं (स्वतः) सिद्ध है ॥ १५ ॥
अमृतं चाभयं नातं नेतीत्यात्मा प्रियो मम ।
विपरीतमतोऽन्यद्यत् त्यजेत्तत्सक्रियं ततः ॥१६॥
अमृतमिति- 'नेति नेति' इत्यादि वाक्य से निषेधमुखेन प्रतिपादित आत्मा, अमृत और अभयरूप है। वह
नाशवान् नहीं है तथा मेरा प्रिय है। उससे भिन्न जो अनात्मा है, वह इससे विपरीत स्वभाववाला है। अतः उस सक्रिय
अनात्मा का त्याग ही करना चाहिये ॥ १६ ॥
हृदयस्पर्शिनी
शंका-यदि अमृतत्व (मोक्ष) को कर्मसाध्य माना जाय तो स्वर्गादि फल की तरह तथा कृषि आदि के
फल की तरह वह अनित्य और सभय कहलायेगा।
समा०-किन्तु अभयरूपत्व श्रुति१ के साथ तथा मोक्ष से भिन्न यच्चयावत् पदार्थों में आर्तत्व कहकर
मोक्ष में अनार्तत्व२ बतानेवाली श्रुति के साथ विरोध उपस्थित होने के भय से वैसा नहीं मान सकते।
शंका-ब्रह्म यद्यपि अभय, अनार्त है, और कर्मसाध्य नहीं है तथापि भोक्ता जीवके के लिये अमृतत्व तो
कर्म से ही साध्य होगा।
समा०-जो मेरा प्रिय है, जिसे हम भोक्ता समझ रहे हैं, अर्थात् जाया आदि जो प्रिय (प्रीत्यास्पद)
ज्ञात हो रहे हैं, वह सब मेरा ही स्वरूप है३। उसे 'नेति' श्रुति ने अशेष-विशेषरहित बताया है। इसलिये वह सब मद्रूप
ही है अर्थात् निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न (अतिरिक्त) नहीं है। अतः उसे भी अमृतत्व, कर्म से प्राप्य नहीं
है। अतः उक्त आत्मस्वरूप से भिन्न, जिसे हम भेदबुद्धि से ग्रहण करते हैं (अपने से भिन्न समझते हैं), उस अनात्मभूत
(विपरीत) दृश्य का क्रिया सहित त्याग करे अर्थात् उसका अभिमान न करे। क्योंकि हमने अज्ञानवशात् आत्मापर
संसार को अध्यस्त कर लिया है। अतः ब्रह्मात्मा से भिन्न जो भी विरुद्धस्वरूप हो, और जो क्रियासहित हो, उस सब
का अभिमान छोड़ दे, क्योंकि ब्रह्मात्मज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है। 'क्रियासहित उस अनात्मभूत दृश्य का
त्याग करे'-यह आत्मज्ञ के लिये विधान (विधि) नहीं किया गया है, क्योंकि वह आत्मज्ञ तो अविनियोज्य है, किन्तु
उसके प्रति यह केवल अनुवादमात्र है। तथापि साधक के लिये विधि का उपयोग हो सकता है, अतः 'त्यजेत्' यह
विधिप्रत्यय (नियोग) निर्देश, साधक को दृष्टि में रखकर किया गया है। तस्मात् ब्रह्मात्मा के अज्ञान के कारण होने-
वाला यह संसार, केवल ब्रह्मात्मज्ञान से ही निवृत्त हो जाता है, यह ठीक ही कहा गया है ॥ १६ ॥
॥ इति एकादशमीक्षितृत्वप्रकरणं समाप्तम् ॥
१. (तै. उ. २।७)
२. (बृ. उ. ३।४।२)
३. 'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य'-(छां. उ. ६।३।२)