तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
iv
अध्याय पृष्ठ
३. सन्यास-धर्म .... .... 73
२५. दयालुता ... ... 73
२६. मांसाहार-निषेध ... ... 75
२७. तपस्या ... ... 77
२८. दुराचरण ... ... 79
२९. चोरी न करना ... ... 81
३०. सत्य बोलना ... ... 83
३१. क्रोधित न होना ... ... 85
३२. बुरा न करना ... ... 87
३३. अहिंसा ... ... 89
३४. अस्थिरता ... ... 91
३५. सन्यास ... .... 93
३६. तत्त्व-ज्ञान ... ... 95
३७. तृष्णा-दमन ... ... 97
४. भाग्य .... .... 99
३८. भाग्य ... .... 99
२. अर्थ
१. शासन-विधान .... .... 103
३९. नरेश के गुण-कर्म ... ... 103
४०. शिक्षा ... ... 105
४१. अशिक्षा ... ... 107
४२. श्रवण ... ... 108
४३. बुद्धिमत्ता ... ... 111
४४. दोष-निरोध ... ... 113
४५. श्रेष्ठों का साहचर्य ... ... 115
४६. कुसंग का त्याग ... ... 117
४७. बोधयुक्त कर्म ... ... 119
४८. शक्ति का बोध ... ... 121
४९. समय का बोध ... ... 123
५०. स्थल का बोध ... ... 125
५१. विचारपूर्ण चुनाव ... ... 127
५२. समझकर कर्म कराना ... ... 129
v
அதிகாரம் பக்கம்
53. சுற்றம் தழால் .. 130
54. பொச்சாவாமை ... ... 132
55. செங்கோன்மை ... ... 134
56. கொடுங்கோன்மை ... ... 136
57. வெருவந்த செய்யாமை ... ... 138
58 கண்ணோட்டம் ... ... 140
59. ஒற்றாடல் ... ... 142
60. ஊக்கம் உடைமை ... ... 144
61. மடி இன்மை ... ... 146
62. ஆள்வினை உடைமை ... ... 148
63 இடுக்கண் அழியாமை ... ... 150
2. அமைச்சியல் ... ... 152
64. அமைச்சு ... ... 152
65. சொல்வன்மை . ... 154
66. வினைதூய்மை ... ... 156
67. வினைத்திட்பம் ... .. 158
68. வினைசெயல்வகை ... ... 160
69. தூது . ... 162
70 மன்னரைச் சேர்ந்து ஒழுகுதல் ... ... 164
71 குறிப்பு அறிதல் ... ... 166
72. அவை அறிதல் .. ... 168
73. அவை அஞ்சாமை ... ... 170
3. அரணியல் . ... 172
74 நாடு . .. 172
75. அரண் ... ... 174
4. கூழியல் ... ... 176
76 பொருள் செயல்வகை ... ... 176
5. படையியல் ... ... 178
77. படை மாட்சி ... ... 178
78 படைச் செருக்கு .. ... 180
vi
अध्याय पृष्ठ
५३. बन्धुओ की उपेक्षा न करना ... ... 131
५४. अविस्मरण ... ... 133
५५. सुशासन ... ... 135
५६. कुशासन ... ... 137
५७. भयकंपित न करना ... ... 139
५८. दयार्द्रता ... ... 141
५९. गुप्तचर ... ... 143
६०. उत्साह ... ... 145
६१. निरालस्य ... ... 147
६२. कार्य-कुशलता ... ... 149
६३. दुःख में अधीर न होना ... ... 151
२. सामन्त .... .... 153
६४. मन्त्रित्व ... ... 153
६५. वाक् शक्ति ... ... 155
६६. व्यवहार-विशुद्धि ... ... 157
६७. कर्म की दृढ़ता ... ... 159
६८. कर्म करने की रीति ... ... 161
६९. दूत ... ... 163
७०. सम्राट् से सहयोग ... ... 165
७१. भावज्ञता ... ... 167
७२. सभा को समझना ... ... 169
७३. सभा में निर्भीकता ... ... 171
३. दुर्ग 173
७४. राज्य ... ... 173
७५. दुर्ग ... ... 175
४. खाद्य .... .... 177
७६. धन-बल निरूपण ... ... 177
५. सैन्य .... .... 179
७७. सैन्य-सौष्ठव ... ... 179
७८. सैन्य-शौर्य ... ... 181
vii
அதிகாரம் பக்கம்
6. நட்பியல் ... ... 182
79. நட்பு ... ... 182
80 நட்பாராய்தல் ... ... 184
81. பழமை : : ... 186
82. தீ நட்பு ... ... 188
83 கூடா நட்பு ... ... 190
84 பேதைமை : : ... 192
85 புல்லறிவாண்மை .. ... 194
86 இகல் ... ... 196
87. பகைமாட்சி ... ... 198
88. பகைத்திறம தெரிதல் ... ... 200
89. உட்பகை ... ... 202
90. பெரியாரைப பிழையாமை ... ... 204
91. பெணவழிச சேறல் ... : 206
92 வரைவின்மகளிர ... ... 208
93. கள்ளுண்ணாமை ... ... 210
94. சூது ... ... 212
95 மருந்து ... ... 214
7. குடியியல் ... ... 216
96. குடிமை ... ... 216
97. மானம ... ... 218
98. பெருமை ... ... 220
99. சான்றாண்மை : : ... 222
100. பண்புடைமை ... ... 224
101. நன்றியில் செல்வம் ... ... 226
102. நாணுடைமை ... ... 228
103. குடிசெயல்வகை ... ... 230
104. உழவு ... :. 232
105. நல்குரவு ... ... 234
106. இரவு : : ... 236
107. இரவச்சம் ... ... 238
108. கயமை ... ... 240
viii
अध्याय पृष्ठ
६. मंत्री .... .... 183
७९. मित्रता ... ... 183
८०. मित्रता का विवेचन ... ... 185
८१. चिर-परिचय ... ... 187
८२. निकृष्ट मित्रता ... ... 189
८३. झूठी मित्रता ... ... 191
८४. मूढ़ता ... ... 193
८५. अहंकारयुक्त तुच्छ बुद्धि ... ... 195
८६. विरोध ... ... 197
८७. शत्रुता की उग्रता ... ... 199
८८. शत्रु-बल का बोध ... ... 201
८९. अन्तः वैर ... ... 203
९०. बड़ों का अपमान न करना ... ... 205
९१. स्त्री का अनुसरण करना ... ... 207
९२. विकाऊ स्त्री (वेश्या) ... ... 209
९३. मद्य-निषेध ... ... 211
९४. जुआ ... ... 213
९५. औषधि ... ... 215
७. वंश .... .... 217
९६. कुलीनता ... ... 217
९७. सम्मान ... ... 219
९८. महानता ... ... 221
९९. सर्वगुण-सम्पन्नता ... ... 223
१००. शिष्टाचार ... ... 225
१०१. प्रयोजनहीन सम्पत्ति ... ... 227
१०२. लज्जाशीलता ... ... 229
१०३. वंश चलाने की रीति ... ... 231
१०४. कृषि ... ... 233
१०५. दरिद्रता ... ... 235
१०६. याचना ... ... 237
१०७. याचना की भयंकरता ... ... 239
१०८. नीचता ... ... 241
*
ix
3. இன்பம்
அதிகாரம் பக்கம்
- களவியல் ... ... 244
- தகையணங்குறுத்தல் ... ... 244
- குறிப்பறிதல் ... ... 246
- புணர்ச்சி மகிழ்தல் ... ... 248
- நலம் புனைந்துரைத்தல் ... ... 250
- காதற் சிறப்புரைத்தல் ... ... 252
- நாணுத் துறவுரைத்தல் ... ... 254
- அலா அறிவுறுத்தல் ... ... 256
- கற்பியல் ... ... 258
- பிரிவு ஆற்றாமை ... ... 258
- படர் மெலிந்திரங்கல் ... ... 260
118 கண்விதுப்பழிதல் ... ... 262 - பசப்புறு பருவரல் ... ... 264
- தனிப்படர் மிகுதி ... ... 266
- நினைந்தவர் புலம்பல் ... ... 268
- கனவுநிலை உரைத்தல் ... ... 270
- பொழுது கண்டிரங்கல் ... ... 272
- உறுப்புநலன் அழிதல் ... ... 274
- நெஞ்சொடு கிளத்தல் ... ... 276
- நிறையழிதல் ... ... 278
- அவாவயின் விதும்பல் ... ... 280
- குறிப்பறிவுறுத்தல் ... ... 282
- புணர்ச்சி விதும்பல் ... ... 284
- நெஞ்சொடு புலத்தல் ... ... 286
- புலவி ... ... 288
- புலவி நுணுக்கம் ... ... 290
- ஊடலுவகை ... ... 292
பாட்டு முதற் குறிப்பு ... ... 294
x
अध्याय पृष्ठ
३. काम
१. गुप्त - प्रेम (पूर्वराग) .... .... 245
१०९. सौन्दर्य की चोट ... ... 245
११०. संकेत - परिचय ... ... 247
१११. मिलन का सुख ... ... 249
११२. सौन्दर्य की सुप्रशंसा ... ... 251
११३. प्रेम की महिमा ... ... 253
११४. लज्जा का त्याग ... ... 255
११५. प्रवाद का परिज्ञान ... ... 257
२. पातिव्रत्य .... .... 259
६. असह्य वियोग ... ... 259
११७. विरहिणी का विलाप ... ... 261
११८. वेदनापूर्ण नेत्र ... ... 263
११९. पीलेपन की व्यथा ... ... 265
१२०. वियोग में विरहाधिक्य ... ... 267
१२१. एकाकी में स्मरण ... ... 269
१२२. स्वप्नावस्था का वर्णन ... ... 271
१२३. सान्ध्य-वेदना ... ... 273
१२४. अंग-सौन्दर्य की क्षति ... ... 275
१२५. स्वगत-संलाप ... ... 277
१२६. मान-भंग ... ... 279
१२७. संयोग की उत्कट अभिलाषा ... ... 281
१२८. संकेताभिव्यक्ति ... ... 283
१२९. सम्भोगाभिलाषा ... ... 285
१३०. हृदय पर क्रोध ... ... 287
१३१. प्रणय-कलह ... ... 289
१३२. प्रणय कलह की सूक्ष्मता ... ... 291
१३३. प्रणय कलह का आनन्द ... ... 293
तमिऴ् लिपि ... ... 311
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॥ भूमिका ॥
पॉल ब्रण्टन ने ‘ गुप्त भारत की खोज¹ , का वर्णन करते हुए आधुनिक
भारत में जो उसे अनभिव्यक्त प्रतीत हुए, और जिन्हें वह संसार के सम्मुख उपस्थित
करना चाहता था उन्हें अपने मनोनुकूल ढंग से लिपि-बद्ध किया है । परन्तु अभी
तक प्राचीन भारत की खोज करके उस काल की स्थिति एवंमानव-जीवन का
विश्लेषणात्मक वर्णन किसी ने नहीं किया है । यह कार्य है भी अत्यन्त दुष्कर ।
माना जाता है कि इसके लिए साधन या तो हड़प्पा व मोहें-जो-दड़ो आदि की
खुदाई है, या प्राचीन शिलालेख व खण्डहर आदि हैं, या प्राचीन काल से
आती हुई किंवदन्तियाँ व लोक - कथाएँ व गीत हैं, या वेद, पुराण, महाभारत,
रामायण, तोल्काप्पियम, संघम-साहित्य आदि । प्राप्त वस्तु से ही अप्राप्त की
कल्पना व गणना होती आयी है । यही वैज्ञानिक माने जाने पर भी वस्तुतः यह
प्रणाली यथेष्ट नहीं है । यह कहना उपयुक्त ही है कि प्रकाश के कारण ही हमें
अन्धकार का अनुभव होता है ; यह कहना ठीक ही है कि अज्ञान के कारण ही
ज्ञान का भान होता है ; यह कहना उचित ही कि सद्गुण के कारण ही
दुर्गुण से हम दूर जाने की इच्छा करते हैं ; यह कहना माननीय ही है कि
सुख का अनुभव करने के पश्चात् ही कोई दुख से मुँह मोड़ता है ; यह कहना
युक्तियुक्त ही है कि मृत्यु को देखकर ही मानव जीवन की ओर अधिकाधिक
आकर्षित होता है, परन्तु यह भी सम्भव है कि कोई प्रकाश में इतना तन्मय
हो जाय कि उसे अन्धकार का विचार ही न उत्पन्न हो, अज्ञान में इतना ग्रस्त हो
जाय कि ज्ञान का उसे भान ही न हो, सद्गुणसम्पन्न इतना हो कि दुर्गुण उसे
कहीं न दिखायी पड़े, सुख में इतना डूबा हो कि उसे दुख का पता ही न चले,
और मृत्यु को देखकर इतना विचलित हो जाय कि उसे जीवन ही मिथ्या प्रतीत
- ‘ Search in Secret India ’—Paul Brunton
2 भूमिका
होने लगे । तात्पर्य यह कि व्यक्त के आधार पर किया गया अव्यक्त का अन्वेष
आंशिक होता है, अपूर्ण होता है और कभी-कभी अनुचित व अप्राकृतिक भी ।
यह विश्लेषण प्राचीन भारत के सम्बन्ध में प्राप्त साधनों पर पूर्णतः घटता है ।
अभी तक प्राचीन भारत का या तो आंशिक ज्ञान प्राप्त हुआ है या अनुचित रूप
देकर उसे अभिव्यक्त कर दिया गया है । कारण यही प्रतीत होता है कि प्राप्त
विषयों में मानव का मन इतना बँध गया कि वह उसके पीछे की बात
देखने का परिस्थितिवश साहस ही नहीं कर पाता । प्राप्त विषय को प्रस्तुत रूप में
किसने, क्यों और कैसे रक्खा, इसका विचार स्पष्टतः कोई कर नहीं पाता ।
कोई कहता है कि अपने स्वार्थ के लिए रक्खा, कोई कहता है कलाकार अदृष्ट
रूप से आ मिले, कोई कहता है प्राकृतिक शक्तियों ने तोड़-फोड़कर वह रूप दे
दिया, तो कोई कहता है ईश्वर ने लोक-हितार्थ वैसा कर दिया । परन्तु
बात यह है कि मानव ने जान-बूझकर प्रस्तुत रूप प्रदान किया है, मनोनुकूल
ढंग से सब का निश्चय किया है, परिस्थितिवश प्राप्त वस्तुओं को भिन्न-भिन्न रूपों में
देखने का प्रयत्न किया है, विभिन्न वर्णों के चश्मों को पहनकर विभिन्न वस्तुओं को
विभिन्न दृष्टिकोणों से देखकर अपने-अपने निष्कर्षों को अभिव्यक्त किया है।
अन्यथा एक ही विषय पर विभिन्न विद्वानों के विभिन्न मत कैसे होते, एक ही
विषय को लेकर विभिन्न विचारों पर पहुँचकर वाक्-युद्ध क्यों करते ?
मानव-जीवन की यथार्थता को सूचित करते हुए विभिन्न भाषाओं में
विभिन्न रूपों में विचारकों ने अपने-अपने भाव अभिव्यक्त किये हैं । ये साधारणतः
तात्कालिक परिस्थितियों के फलस्वरूप उद्भवित जन-कल्याण के लिए निर्मित
भाव-विशेष हैं जो जनता के विकास में यथेष्ट रूप से साधक सिद्ध हुए हैं ;
परन्तु वे ही भाव-विशेष विभिन्न युद्धों के लिए तथा वैमनस्य उत्पन्नकरने में भी
साधक सिद्ध हुए हैं जिनके कारण जन-कल्याण व लोक-विकास में यथेष्ट बाधा
उपस्थित हो चुकी है । संसार के साहित्य में ऐसे ग्रन्थ विरले ही हैं जिनके
भूमिका ३
रचयिताओं ने प्राप्त से अप्राप्त की ओर जाने के अतिरिक्त अपने विचार-क्षेत्र को
इतना विशाल बनाया हो कि देश-काल के बन्धनों से हटकर सभी देशों तथा
कालों के लिए समानतः उचित व युक्तियुक्त सिद्ध हुआ हो । भारत में
ऐसे कतिपय विचारक हो चुके हैं जिन्होंने इस ढंग से अपने विचारों को व्यक्त
किया है । वे मानवमात्र के लिए सदा माननीय महत्तम आदर्श स्थापित
कर गये हैं । इन्हीं विरले व्यक्तियों में से एक थे तिरुवळ्ळुवर जिन्होंने वस्तुतः
वास्तविक भारत को अभिव्यक्त किया है । प्राचीन भारत की खोज करने पर यही
विचार-विशेष गुप्त रूप से सर्वत्र व्याप्त प्रतीत होगा । वस्तुतः इसे मानवमात्र की
सभ्यता की शाश्वत ग्रन्थिका कह सकते हैं । यदि कहा जाय कि संसार की
मानव-संस्कृति का मूल-सूत्र तिरुवळ्ळुवर के 'तिरुक्कुरळ्' में निहित है तो
युक्तियुक्त ही होगा ।
'तिरुक्कुरळ्' तमिळ साहित्य का गौरव है और भारतीय साहित्य का
भव्य भूषण है । विश्व साहित्य में इसका एक विशेष स्थान है । संस्कृत
साहित्य में जो स्थान वेद व भगवद्गीता को प्राप्त है वही स्थान तमिळ साहित्य में
तिरुक्कुरळ् को प्राप्त है ।¹ इसे 'तमिळ वेद'² भी कहते हैं । यह एक
अत्यन्त समादृत ग्रन्थ है । इसमें उल्लिखित तत्त्वों को हृदयंगम करने के पश्चात्
कोई भी व्यक्ति इसकी महानता पर विश्वास किये बिना नहीं रह सकता ।
- "The Tirukkural of Tiruvalluvar is the pride of South
India. What the Bhagvatgita is to the Sanskritist, the
Tirukkural is to the Lover of Tamil". Sri V. R. Rama-
chandra Dikshitar’s ‘Tirukkural’ with English Translation
(p. IX) Preface. - 'தமிழ் மறை'—மறை के शाब्दिक अर्थ हैं—रहस्य, वेद, उपनिषद्,
आगम्, आश्रय आदि । Tamil Lexicon, p. 3124, 3125).
4 भूमिका
तिरुक्कुरळ् के शब्द सौन्दर्य एवं अर्थ गाम्भीर्य का सुन्दर सामंजस्य सहृदय
पाठक को स्वभावतः भावमय एवं रसमय कर देता है ।
तिरुक्कुरळ् के अनेक नाम प्रचलित हैं जिनमें से एक 'तिरुवळ्ळुवर'
भी है जो इसके लेखक का भी नाम है । वस्तुतः यह उचित ही है क्योंकि
दोनों में इतना अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है, इतनी अभिन्नता है कि वे एक दूसरे से
पृथक् नहीं किये जा सकते । तिरुक्कुरळ् तिरुवळ्ळुवर की एकमात्र कृति है ।
तिरुवळ्ळुवर के जीवन में तिरुक्कुरळ् पूर्णतः ठीक उतरता है । तिरुवळ्ळुवर को
ही तिरुक्कुरळ् के लिए आदर्श रूप में ले सकते हैं । तिरुवळ्ळुवर का
जीवन ही 'तिरुक्कुरळ्' था । तिरुवळ्ळुवर ही तिरुक्कुरळ् थे और वे आज हमारे
सम्मुख एक ग्रन्थ के रूप में उपस्थित हैं और सदा रहेंगे । तिरुक्कुरळ् ही
तिरुवळ्ळुवर है ।
तिरुवळ्ळुवर का वास्तविक नाम अज्ञात है । कबीर, सूर, तुलसी आदि के
समान अपने काव्य में इन्होंने अपने नाम को 'जड़ा' नहीं है । 'तिरु'
एक आदरसूचक उपसर्ग मात्र है, और 'वळ्ळुवर'¹ उनकी जन्मगत एक अत्यन्त
निम्न-कोटि की जाति का नाम है । विद्वानों का विचार है कि इन दो शब्दों के
संयोग से ही कवि का प्रस्तुत नाम प्रचलित हुआ । सन्त कवि कबीर के समान
ही इनके जन्म के सम्बन्ध में भी अनेक प्रकार की किंवदन्तियां प्रचलित हैं ।²
- வள்ளுவன் (वळ्ळुवन) 1. A paraiya caste, the members of
which are royal drummers, and priests for paraiyas. - One who foretells events by Omens. 3. An officer
who proclaims the king’s commands. 4 The author of
‘Kural’ (Tamil Lexicon, P 3552). - “A wild and utterly incredible tradition assigns him a
Brahmin father and a low caste mother..” G. U. Pope,
‘The Sacred Kural’, P. ii. Introduction.
भूमिका 5
तिरुक्कुरळ् के प्रारम्भिक छन्द के आधार पर इनके माता - पिता का नाम
'आदि-भगवन्' माना जाता है। छन्द यह है :-
“ अकर मुदल वॆष़ुत्तेल्ला मादि
भगवन् मुदट्त्रे युलहु । ”
वस्तुतः निश्चित् रूप से कुछ कहा नही जा सकता । इतना अवश्य ज्ञात है कि
वे कबीर के ही समान जुलाहे का कार्य करते थे और उन्होंने मद्रास नगर के
पर्यन्तभाग मयिलापुर (मयिल=मोर, पुर=नगर) की एक कुटि में सपत्नीक सानन्द
जीवन व्यतीत किया । यह स्थान समुद्र तट के अति निकट होने के कारण इनका
अनेक विदेशियों से मिलना-जुलना रहता था । साथ-साथ दक्षिण भारत का यह एक
प्रधान स्थान होने के कारण सभी प्रकार के लोगों का यहाँ आना - जाना सदैव
रहा जिससे इनका सम्पर्क तात्कालिक सभी विचार-धाराओं के विभिन्न व्यक्तियों
से बना रहा । हिन्दू, जैन, बौद्ध आदि मत के विभिन्न सिद्धान्त इनको ज्ञात थे
और उनके दैनिक-जीवन से ये पूर्ण परिचित थे । इसी कारण से इनकी
विचार-धारा अत्यन्त व्यापक हो सकी ।
इस प्रकार जीवन व्यतीत करते हुए तिरुवळ्ळुवर ने अपने एक मात्र ग्रन्थ
'तिरुक्कुरळ्' की रचना की, कदाचित् पड़ोसियों की प्रार्थना पर, जैसाकि कुछ
लोग मानते हैं । 'कुरळ्'¹ का मूल अर्थ है 'छोटा' । यह एक छोटे छन्द का
भी नाम है जिसमें दो चरण होते हैं । प्रथम में चार Cīr ' पद ' व ' गण '
होते हैं तथा द्वितीय में केवल तीन । इसकी रचना का नियम अत्यन्त क्लिष्ट है ।
एक कुरळ् में एक भाव-विशेष पूर्णतः निहित रहता है । 'तिरु' एक आदर-सूचक
- குறள் ' Kural '—1. Shortness, dwarfishness; 2. Dwarf,
about 2 ft. high; 3. Imp, goblin; 4. Smallness, 5. A
line consisting of two ' Cīr '; 6. Distich of a 'Venba'
metre, the first line consisting of four and the second of
three feet; 7. Tirukkural--(Tamil Lexicon PP. 1046-47)
6 भूमिका
प्रत्यय, एवं 'कुरळ्' एक छन्द का नाम होने के कारण इस ग्रंथ का नाम
तिरुक्कुरळ् पड़ा । ग्रन्थ का क्या नाम रक्खा कवि ने, यह अज्ञात है। यह
एक नीति ग्रन्थ है जिसमें कुल १३३० कुरळ् हैं । आश्चर्य की बात यह है कि
एक का भी पाठ-भेद प्रचलित नहीं है और ग्रन्थ जिस रूप में आज उपस्थित
है वही उसका मूल रूप था, यद्यपि ग्रन्थकर्ता एवं ग्रन्थ के मूल नाम अप्राप्य
हैं । ग्रन्थ के तीन खण्ड हैं — धर्म, अर्थ, एवं काम (अरम्, पोरुळ्, इन्बम्) ;
और इनमें क्रमशः ३८, ७० एवं २५ अध्याय हैं तथा प्रत्येक अध्याय में
१० कुरळ् हैं । 'धर्म' में प्रस्तावना के रूप में सर्वेश-स्तुति से प्रारम्भ करके
'मोक्ष' (वीडु) की भी अप्रत्यक्ष रूप से सूचना देते हुए गार्हस्थ्य-धर्म एवं
सन्यास-धर्म के स्पष्टीकरण के पश्चात् एक अध्याय में कर्म सिद्धान्त को भी व्यक्त
कर दिया गया है। 'अर्थ' में सम्राट् व शासन, अमात्य व राजनीति के विभिन्न
अंग तथा शासक व शासित के शेष कार्यों का विशद् वर्णन किया गया है।
'काम' में प्रेमी-प्रेमिका के पूर्वराग व गुप्त प्रेम तथा सतीत्व का, अर्थात् सम्भोग
तथा वियोग शृंगार का पुंखानुपुंख रूप से चित्रण किया गया है । इस प्रकार
कवि ने अपनी कृति में मानव के व्यक्तिगत, गार्हस्थ्य एवं सामूहिक जीवन के
आदर्श को प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया है । इससे स्वतः सिद्ध हो जाता
है कि तिरुवळ्ळुवर एक आदर्शवादी दार्शनिक, राजनीति-विदग्ध तथा उत्तम कोटि
के रसिक भी थे ।
तिरुवळ्ळुवर ने अपने जीवन में इस कृति में कथित सब आदर्शों को
कार्य रूप में परिणत कर दिखाया है। इनके गार्हस्थ्य-जीवन के सम्बन्ध में
अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं । वासुकी इनकी पत्नी का नाम था । विवाह के पूर्व
वासुकी के पिता ने तिरुवळ्ळुवर के आदर्श-जीवन से प्रभावित होकर अपनी पुत्री
को तिरुवळ्ळुवर से अर्धांगिनी के रूप में ग्रहण कर लेने की अभ्यर्थना की।
तिरुवळ्ळुवर ने एक बालू के पुलिन्दे की ओर सूचित करते हुए अपनी स्वीकृति
इस शर्त पर दी कि यदि वह इसे पकाकर उसे भात बना दे तो मैं पाणिग्रहण
भूमिका 7
के लिए प्रस्तुत हूँ। वासुकी ने आत्म-विश्वास के बल पर वैसा ही करके मानो
यह सिद्ध कर दिया कि तिरुक्कुरळ् में जो कहा गया है—
'ईश न, नित उठ पूजै पति को,
बरसो कह दे तो बरसे।'¹ (१-६-५)
सत्य है।
विवाह के उपरान्त एक दिन कोई एकव्यक्ति जिसे यह सन्देह था कि एक
साधारण जुलाहा इतना श्रेष्ठ कैसे हो सकता है, इनके पास आया और उसने प्रश्न
किया—“गार्हस्थ्य-जीवन श्रेष्ठ है या सन्यास?” इसका शब्दों में उसे कोई उत्तर
प्राप्त नहीं हुआ। तिरुवळ्ळुवर के गार्हस्थ्य-जीवन के निरीक्षण से ही उत्तर प्राप्त
करने के लिए उसे छोड़ दिया। कुछ समय पश्चात् जब वासुकी कुएँ से पानी
खींच रही थी, इन्होंने उसे बुलाया। वासुकी जल से पूर्ण पात्र को कुएँ में ही
आधी खिंची छोड़कर तुरन्त अपने पति के सम्मुख आ उपस्थित हुई। वह पात्र
उसी अवस्था में वासुकी के लौटने पर मिला! और एक बार जब प्रातःकाल के
समय ठण्डा भात² खाते-खाते इन्होंने कहा कि भात बहुत गरम होने के कारण मुँह
तक जलने लगा, वासुकी बिना किसी हिचकिचाहट के तुरन्त पंखा झलने लगी।
दिन प्रकाशपूर्ण मध्याह्न के समय कपड़ा बुनने का काम करते हुए अपनी ढरकी को
गिराकर उसे खोजने के लिए इन्होंने दीपक मांगा तो वासुकी ने बिना कुछ
पूछे-ताछे दीपक ला दिया। इस प्रकार की अनेक अन्य घटनाओं को देखकर प्रश्न
का उत्तर आपसे आप प्रश्नकर्ता को प्राप्त हो गया कि ऐसी पत्नी हो तो गार्हस्थ्य
श्रेष्ठ है, अन्यथा सन्यास³।
- தெய்வந் தொழாஅள் கொழுநற் றொழுதெழுவாள்
பெய்யெனப் பெய்யு மழை.”-(குறள 1-6-5). - देखिये—पृ० ४४१—'विश्ववाणी', दिसम्बर १९४६.
- சற்றேனும்--ஏறுமாறாக விருப்பாளே யாமாயின்
கூறாமற் சன்னியாசங் கொள்.” ( தனிப்பா. 1-95-14)
तनिक भी—हो विषम पत्नी तो बिन कह ग्रहण कर सन्यास।
8 भूमिका
कविवर की अर्द्धांगिनी के अवसान के समय की एक अद्भुत घटना अति
प्रसिद्ध है । मृत्यु-शय्या पर लेटी हुई वासुकी को अपनी ओर असाधारण रूप से
चिन्तामग्न नेत्रों के साथ अवलोकन करते हुए देखकर तिरुवल्लुवर ने उसका
कारण पूछा । वासुकी ने सविनय उत्तर देते हुए अत्यन्त मृदुल स्वर में कहा—
' विवाह के उपरान्त प्रथम भोज के समय ही आपने मुझे एक आज्ञा दी थी कि
भोजन के समय एक सूई और एक छोटे पात्र में स्वच्छ जल रख दिया करो—
और मैं वैसा करती आयी । पर मैं उसका मर्म अभी तक न समझ सकी
क्योंकि आपने कभी उनका प्रयोग नहीं किया ।' तिरुवल्लुवर ने उत्तर दिया—
" वे इसलिए कि यदि कोई चावल का कण पृथ्वी पर गिर पड़े तो सूई से
उठाकर स्वच्छ जल में शुद्ध कर लिया करूँ ।" उत्तर से सन्तुष्ट हो वासुकी
स्वर्ग सिधारी । इनसे इतना अवश्य सिद्ध होता है कि तिरुवल्लुवर के आदर्श
महान् थे और प्राचीन तमिऴ संस्कृति का स्तर अत्यन्त श्रेष्ठ था ।²
विद्वानों का विचार है कि तिरुवल्लुवर ईसा की द्वितीय शताब्दी में
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भूमिका 9
साधारण मानव-जीवन के ही सिद्धान्त हैं—यत्रतत्र देखकर उनके आधार पर
कल्पना करते हैं कि इसके रचयिता का काल आठ और दस सौ ईस्वी के बीच
कहीं रहा होगा$^1$ और अपने अभिप्राय को सिद्ध करने के लिए कोई विशिष्ट
कारण देना उन्होंने अनिवार्य नहीं समझा । श्री वी. आर. रामचन्द्र दीक्षितर का
दृढ़ विचार है कि ग्रन्थ-रचना व ग्रन्थकार का काल ईसा पूर्व द्वितीय अथवा
प्रथम शताब्दी ही है ।$^2$ तिरुवळ्ळुवर का काल कुछ भी क्यों न हो, वे कवि
शिरोमणि ‘तिरुक्कुरळ्’ जैसे ग्रन्थ की रचना करके काल की परिधि को लाँघकर
अमर हो गये हैं ।
साधारणतः संसार में मानव के अस्थायी भौतिक शरीर के अवसान के
पश्चात् ही स्थाई यश-शरीर दृष्टिगोचर होता है । भवभूति ने जो उत्तर-राम-
चरित को देखते हुए महाकवि कालिदास से भी श्रेष्ठ ठहराये जाते हैं$^3$, इसी
कारण कहा था—
‘‘ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां,
जानन्तु ते किमपि, तान् प्रति नैष यत्नः ।
उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानधर्मा
कालोह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ॥’’
मालती माधव १—६
- "I think between A. D. 800 and 1000 is its probable
date "-P. iv Introduction to 'The Sacred Kural' by
G. U. Pope. - "It is now nearly twenty years since I published my
'Studies in Tamil Literature and History', where I have
assigned the first or Second Century B. C. as the date of
its (Tirukkural's) composition. I find no reason to change
that view." P. ix, Preface to 'Tirukkural with English
Translation' by Sri V. R. Ramachandra Dikshitar, M. A.,
Professor of Indian History and Archaeology, University
of Madras. - ‘‘उत्तरे राम चरिते भवभूतिर्विशिष्यते ।”
2
10 भूमिका
परन्तु तिरुवल्लुवर के यश-शरीर का प्रकाश उनके जीवन-काल में ही
प्रज्ज्वलित हो उठा था। उनके समकालीन नक्कीरर, चात्तनार, कपिलर, परणर
आदि अनेक तमिऴ महाकवियों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। भगवान
शिव की कविता के दोष को, उनके ज्वलन्त तृतीय नेत्र को प्रत्यक्ष करने पर भी
निडर होकर, "तृतीय नेत्र को दिखाने पर भी दोष दोष ही है"¹ ऐसा शिव के
ही सम्मुख कहने का सामर्थ्य जिस कवि-शिरोमणि नक्कीरर में था, उन्होंने भी
तिरुवल्लुवर की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। इनके अतिरिक्त केरळ-सम्राट्
चॆङ्गुट्टुवन के अनुज तथा चिलप्पदिकारम् महाकाव्य के रचयिता श्री इळंगोवडिहळ्
तथा अन्यान्य अनेक श्रेष्ठ कवियों ने हृदय से इनकी प्रशंसा के गीत
गाये हैं। तमिऴ के प्रसिद्ध आलोचक एवं लेखक श्री चेल्वकेशवराय मुदलियार
ने तिरुवल्लुवर को तमिऴ की 'गति-द्वै'² में से एक माना है। ' अनेक भारतीय
एवं पाश्चात्य भाषाओं व साहित्यों के अध्ययन के पश्चात् आधुनिक तमिऴ
साहित्य के कवि-सम्राट् स्वर्गीय श्री सुब्रह्मण्य भारती ने कहा है कि तिरुवल्लुवर
जैसे श्रेष्ठ कवि को और कहीं नहीं देखा।³ तिरुवल्लुवर का स्थाई यश इसीसे
- “ நெற்றிக கண்ணைக காட்டினும் குற்றம் குற்றமே ”—நக்கீரர்.
- “ தமிழககுக கதியாவா இருவா எனச சில புலவர் புகழ்
வதுண்டு. கதி எனபதில் கஃகாணைக கம்பநாட்டாழ்வாருக்கும்,
திஃகாணேத திருவள்ளுவருககும ஞாபக சூத்திரமாகக கொள்ளல்
வேண்டும்.”-P. 7. 'Tiruvalluvar' by Sri Chelvakesavaroya
Mudaliar M. A. - “ யாமறிந்த புலவரிலே கம்பனைப்போல்
வள்ளுவர்போல் இளங்கோவைப் போல்,
பூமிதனில யாங்கணுமே பிறந்ததிலை,
உண்மை வெறும் புகழ்ச்சி இல்லை. ”
जो ज्ञात हैं कविगण मुझे, उनमे न कम्बर के समान,
तिरुवल्लुवर के सम न, अथवा कवि इळङ्गो के समान ।
जन्मे न इस भू पर कहीं भी आज तक इनके समान,
नहि डींग कोरी, सत्य है यह सन्तवाणी के समान ॥
भूमिका 11
सिद्ध हो जाता है कि उनके समय में तथा तदनन्तर प्रकट सभी श्रेष्ठ रचनाओं
में तिरुक्कुरळ् की सुगन्धि व सौष्ठव स्पष्टतः सम्पृक्त हुआ है। कहने का तात्पर्य
यह है कि तमिऴ के तुलसी कविवर कम्बर जैसे श्रेष्ठ प्राचीन महाकवियों से
लेकर आधुनिक काल के 'भूषण' श्री सुब्रह्मण्य भारती तक सभी ने तिरुक्कुरळ्
के छन्दों को उसी रूप में एक पुष्प के समान, अथवा उसके एक खण्ड को
पंखड़ी के समान स्वरचित काव्य कृति रूपी सुन्दर सरस-माला में पिरोया है
जिससे वह कृति तिरुक्कुरळ् के उत्तम सौरभ से सुरभित हो उठी है।
कवियों द्वारा तिरुक्कुरळ् के प्रथम-स्वीकरण (अरंगेट्रम्) के सम्बन्ध में
एक अपूर्व कथा प्रचलित है। तिरुवळ्ळुवर के समय में पाण्ड्य प्रदेश की
राजधानी मदुरा में तमिऴ के कवियों का एक 'संगम्'¹ था जो प्रागैतिहासिक काल
से कार्य करता आ रहा था। इसमें यह प्रथा थी कि कवि के काव्य-सौष्ठव को
मापने के लिए अलौकिक शक्ति से युक्त, पानी पर तैरते हुए एक शिव-प्रदत्त तख्ते
(संगप्पलहै)² पर उसकी कृति को रखकर उसका मूल्यांकन किया जाता था। ऐसा
- तमिऴ का प्रथम संगम् प्रागैतिहासिक काल में ४४४० वर्ष तक रहा जिसमे
कुल ५४९ कविगण सम्मिलित थे। ८९ सम्राटों का आश्रय इस संगम् को
प्राप्त हुआ था। द्वितीय संगम् ने ३७०० वर्षों तक कार्य किया। इसमे
कुल ३७०० कवियों ने भाग लिया, और ५९ सम्राटों का आश्रय इसे प्राप्त
हुआ। प्रस्तुत सङ्घम् तृतीय था जिसमे कुल ४९ सदस्य थे। ४४९
कवियो ने अपनी रचनाएँ स्वीकरणार्थ समर्पित कीं। इस संगम् के अन्त
का कारण कुछ लोग तिरुवळ्ळुवर-कृत तिरुक्कुरल की अवहेलना ही मानते
हैं, जब कि प्रथम दो संगम् की समाप्ति का कारण जल-प्रलय माना
जाता है। - சங்கப்பலகை (संगप्पलहै)—Miraculous seat capable of
accommodating only deserving scholars, believed to
have been granted by Siva at Madura, to the Sangam
Poets.
12 भूमिका
कहा जाता है कि जब तिरुक्कुरळ् अन्य ग्रन्थों के साथ उस "संगप्पलहै" पर
रखा गया तो अन्य सभी ग्रन्थ जल में निमज्जित हो गये, और केवल तिरुक्कुरळ्
ही जल के ऊपर तैरता रहा। इस कथा में सत्य का अंश चाहे कितना ही क्यों
न हो, पर यह अवश्य माननीय है कि इसकी तुलना में तात्कालिक अन्य कोई
कृति नहीं ठहरती। यह अपने ढंग की एक ही कृति है। कविवर परणर ने
तिरुक्कुरळ् की तुलना वामनावतार से की है। भगवान ने वामनावतार लेकर दो
ही पग में सम्पूर्ण विश्व को नाप डाला था। इसी प्रकार 'पौने दो चरणों' का
प्रत्येक कुरळ् एक भाव-लोक को अपने में अन्तर्लीन किये हुए है। दूसरे एक
सत्कवि ने तिरुक्कुरळ् में विभिन्न विषयों की विशदता को अलौकिक काव्यगत
सौन्दर्य से पूर्ण¹ व्यक्त किया हुआ पाकर कहा है :—
सभी अर्थ इस में समाप्त,
जो इस में है न, नहीं अन्यत्र ॥²
यहाँ "अर्थ" से वही भाव है जो "वागर्थाविव सम्पृक्तौ, वागर्थ
प्रतिपत्तये" के "अर्थ" से है।
तिरुक्कुरळ् पर "क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति । तदेव रूपं रमणीयतायाः ॥"
वाला सिद्धान्त पूर्णतः घटित होता है। जितना ही इसमें पैठकर अर्थ गाम्भीर्य का
अन्वेषण करते हैं उतना ही नवीन अर्थ का प्रकाश निस्सृत होता हुआ प्रकट होता
है। यह प्रकाश पाठक में उसके ज्ञान, अनुभव एवं व्यक्तिगत विचार-धारा की
- "Musaco Contingens Cuncta lopre" i. e., "touching all
things with poetic Grace"—G. U. Pope. - " எல்லாப் பொருளும் இதன்பாலுள ; இதன்பால்
இல்லாத எப்பொருளும் இல்லையால்."
(மதுரைத் தமிழ்நாயனார்.)