स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
प्रारंभिक भूमिका एवं जिन-स्तुति मंगलाचरण
श्रीमद् राजचन्द्र जैन शास्त्रमाला
(१२)
स्याद्वादमंजरी
परमश्रुत प्रभावक मण्डल
श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम
अगास
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श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमाला
ॐ
नमः सर्वज्ञाय
कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचिताअन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकास्तवनटीका
श्रीमल्लिषेणसूरिप्रणीता
स्याद्वादमञ्जरी
•
'एम्. ए., पी-एच. डी' इत्युपपदधारिणा शास्त्रिणा
डॉ० जगदीशचन्द्र जैनेन
हिन्दीभाषायां अनुवादिता
उपोद्घात-परिशिष्टानुक्रमणादिभिः संयोज्य च
सम्पादिता
सा च
अगासस्थ-श्रीपरमश्रुतप्रभावकमण्डल-श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमाला
श्रीमद्राजचन्द्राश्रम-अगास-स्वत्वाधिकारिभिः
श्रीरावजीभाई देसाई इत्येतैः
प्रकाशिता
श्रीवीरनिर्वाण सं० २४९६ विक्रम सं० २०२६ ईस्वी सन् १९७०
मूल्य १०.००
प्रकाशक
रावजीभाई छगनभाई देसाई, ऑनरेरी व्यवस्थापक
परमश्रुतप्रभावकमण्डल (श्रीमद् राजचन्द्र जैनशास्त्रमाला )
श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम
स्टेशन-आगास, पोस्ट-बोरिया
वाया : आणंद ( गुजरात )
प्रथमावृत्ति १०००
वीरनिर्वाण सं. २४३६-विक्रम सं. १९६६-ई० सन् १९१०
द्वितीयावृत्ति १०००
वीरनिर्वाण सं. २४६०-विक्रम सं. १९९१-ई० सन् १९३५
तृतीयावृत्ति
नवीन संशोधित-संस्करण
प्रतियाँ १०००
मुद्रक
बाबूलाल जैन फागुल्ल
महावीर प्रेस
भेलूपुर, वाराणसी-१
प्रकाशकीय
आचार्य श्रीहेमचन्द्रने वर्द्धमान महावीरकी स्तुतिरूप बत्तीस-बत्तीस श्लोकप्रमाण दो स्तवनोंकी भाव-
पूर्ण विशिष्ट रचना की—प्रथम 'अयोगव्यवच्छेदस्तवन' और द्वितीय 'अन्ययोगव्यवच्छेदस्तवन'। स्याद्वादकी
उपयोगिता सिद्ध करनेका अभीष्ट-साधन दूसरे स्तवनको जानकर श्रीमल्लिषेणसूरिने उसपर महत्त्वपूर्ण विस्तृत
टीका 'स्याद्वादमंजरी' लिखी है। श्रीहेमचन्द्राचार्यकी 'अयोगव्यवच्छेदिकास्तुति' नामक रचना भी
इस ग्रन्थके साथ जोड़ दी गई है। ग्रन्थकी उपयोगिताका विशेष अनुभव तो विद्वज्जन स्वयं ही करेंगे।
परमश्रुतप्रभावकमण्डल (श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमाला) की ओरसे अनेक सत्श्रुतरूप ग्रन्थोंका
प्रकाशन समय-समयपर होता रहा है, जिनमें 'स्याद्वादमंजरी' का प्रथम प्रकाशन इस संस्था द्वारा वीरनिर्वाण
सं० २४३६ (ई० सन् १९१०) में श्री पं० जवाहरलालजी शास्त्री तथा पं० वंशीधरजी शास्त्रीके सम्पाद-
कत्वमें हुआ था। उसके बाद वीर सं० २४६० (ई० सन् १९३५) में श्री जगदीशचन्द्र जैनने बहुत सुन्दर
ढंगसे नवीन सम्पादन प्रस्तुत किया। अब पुनः दूसरे संस्करणका यह नवीन संशोधित-संस्करण तीसरी आवृत्ति
के रूपमें इस संस्थाकी ओरसे प्रकाशित करते हुए हमें प्रसन्नता होती है। अबकी बार डॉ० जगदीशचन्द्र जैन
एम्० ए०, पी-एच० डी० ने और भी अधिक परिश्रमपूर्वक इस ग्रन्थको सर्वाङ्गसुन्दर बनानेका प्रयास किया
है। अतः हम उनका हृदयसे आभार मानते हैं।
इस ग्रन्थका मुद्रणकार्य प्रथम सन्मति मुद्रणालय, वाराणसीमें आरम्भ हुआ था, परन्तु कुछ पृष्ठ
छपते ही कार्याधिक्यके कारण काम मंद हो गया; अतः इसका मुद्रणकार्य श्री बाबूलाल जैन फागुल्ल, महावीर
प्रेस, वाराणसीको सौंपना पड़ा। हमें हर्ष है कि उन्होंने रुचिपूर्वक इस कार्यको यथासम्भव शीघ्र पूर्ण कर
दिया है। संस्थाके प्रति उनका यह प्रेम हमें कृतज्ञता-ज्ञापन करनेको बाध्य करता है।
परमश्रुतप्रभावकमण्डलद्वारा जिन ग्रन्थोंका आजतक प्रकाशन हुआ है उनकी सूची इस ग्रन्थके साथ
अन्यत्र संलग्न है। ग्रन्थोंका पुनर्मुद्रण व अन्य नवीन ग्रन्थोंका सम्पादन-प्रकाशन भी यथासमय होता रहेगा।
विद्वान पाठकों और विद्यार्थियोंको अधिकाधिक लाभ मिले इसीमें हमारे प्रकाशनका श्रम सफल है।
श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम, निवेदक
स्टेशन; अगास, पोस्ट-बोरिया रावजीभाई देसाई
वाया : आणंद (गुजरात)
ता० १-६-१९७०
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अभिनिवेदनम्
[अस्पष्ट पाठ] ... न्यायशास्त्रे ... [अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ] ... 'तत्त्वचिन्तामणि' ... [अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ] ... नव्यन्याय ... [अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ] ... प्रस्तुत ... [अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
[अस्पष्ट पाठ]
दिनाङ्क : [अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
निवेदक :
[अस्पष्ट नाम]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
विषयानुक्रमणिका
विषय पृष्ठ
प्राक्कथन—लेखक—डाक्टर भिखनलाल आत्रेय एम. ए., डी. लिट्,
( भूतपूर्व ) दर्शनाध्यापक, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
प्रथम आवृत्ति की भूमिका 11
प्रस्तुत संस्करणका संक्षिप्त परिचय 12
द्वितीय आवृत्ति की भूमिका 14
ग्रन्थ और ग्रंथकार 15
हेमचन्द्र 15
मल्लिषेण 15
जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान 24
स्याद्वादका मौलिक रूप और उसका रहस्य 24
स्याद्वादपर एक ऐतिहासिक दृष्टि 26
स्याद्वादका जैनेतर साहित्यमें स्थान 28
स्याद्वाद और समन्वयदृष्टि 31
स्याद्वादमंजरीका अनुवाद १-२७०
टीकाकारका मंगलाचरण १
श्लोक १ अवतरणिका २
अनन्तविज्ञान आदि भगवानके चार विशेषण ३
चार मूल अतिशय ३
उक्त विशेषणोंकी सार्थकता ३
श्रीवर्धमान आदि विशेषणोंकी सार्थकता ६
श्लोकका दूसरा अर्थ ७
श्लोक २ भगवानके यथार्थवादका प्ररूपण ९
श्लोक ३ भगवानके नयमार्गकी महत्ता ११
श्लोक ४-१० न्यायवैशेषिकदर्शनपर विचार १३-८६
श्लोक ४ सामान्यविशेषवाद १३
श्लोक ५ नित्यानित्यवाद १५
दीपकका नित्यानित्यत्व १५
अंधकारका पौद्गलिकत्व १७
आकाशमें नित्यानित्यत्व १८
नित्यका लक्षण १९
पातंजलयोग और वैशेषिकके नित्यानित्यवादका समर्थन २१
एकान्त नित्यानित्यवादमें अर्थक्रियाका अभाव २२
श्लोक ६ ईश्वरके जगतकर्तृत्वपर विचार २८
ईश्वरको जगतकर्ता सिद्ध करनेमें पूर्वपक्ष २८
पूर्वपक्षका खंडन ३१
6
विषय पृष्ठ
किरणोंके गुणत्वकी सिद्धि ३६
ईश्वरवादियोंके आगममें पूर्वापरविरोध ३८
श्लोक ७ समवायका खण्डन ४३
श्लोक ८ ४७-६६
सत्ता भिन्न पदार्थ—पूर्वपक्ष ४७
वैशेषिकोंके छह पदार्थ ४८
ज्ञान आत्मासे भिन्न--पूर्वपक्ष ५२
मोक्ष ज्ञान और आनन्दरूप नहीं—पूर्वपक्ष ५२
सत्ता भिन्न पदार्थ नहीं—उत्तरपक्ष ५४
ज्ञान आत्मासे भिन्न नहीं--उत्तरपक्ष ५६
मोक्ष ज्ञान और आनन्दरूप-उत्तरपक्ष ६१
श्लोक ९ आत्माके सर्वव्यापकत्वका खंडन ६७
अवयव और प्रदेशमें भेद ७१
आत्माको शरीरपरिमाण माननेमें शंका और उसका समाधान ७३
आत्माके कथंचित् सर्वव्यापकत्वकी सिद्धि ७४
समुद्घातका लक्षण और उसके भेदोंका विस्तृत स्वरूप ७५
श्लोक १० नैयायिकोंद्वारा प्रतिपादित छल, जाति और निग्रहस्थान मोक्षके कारण ७७
नैयायिकोंके सोलह पदार्थ ७८
नैयायिकोंके प्रमाणोंके लक्षणका खंडन ७९
नैयायिकोंके बारह प्रकारके प्रमेयका खंडन ८०
छलके भेद ८१
चौबीस प्रकारकी जाति—उसका विस्तृत स्वरूप ८१
बाईस प्रकारका निग्रहस्थान—उसका विस्तृत स्वरूप ८५
श्लोक ११-१२ मीमांसकोंकी मान्यताओंपर विचार ८७-१०९
वेदनिर्दिष्ट हिंसा धर्मका कारण—पूर्वपक्षका खंडन ८७
जिनमंदिरके निर्माणमें पुण्यसंचय ९०
सांख्योंका वैदिक-हिंसाका विरोध ९२
व्यास और वेदान्तियोंका वेदविहित हिंसाका विरोध ९४
श्राद्धदोष ९७
आगमके अपौरुषेयत्वका खंडन ९८
श्लोक १२ परोक्षज्ञानवादी मीमांसक और एक ज्ञानको अन्य ज्ञानोंसे संवेद्य
माननेवाले न्याय-वैशेषिकोंका खंडन १०३
ज्ञानको स्वप्रकाशक नहीं माननेवाले भट्ट मीमांसकोंका पूर्वपक्ष और उसका खंडन १०४
न्याय-वैशेषिकोंकी मान्यताका खंडन १०७
श्लोक १३ ब्रह्माद्वैतवादियोंके मायावादपर विचार ११०
वेदान्तियोंका पूर्वपक्ष और उसका खंडन १११
असत्ख्याति आदि ख्यातियोंका विस्तृत स्वरूप ११२
अद्वैतवादियों द्वारा प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे ब्रह्मकी सिद्धि ११४
७
विषय पृष्ठ
अद्वैतवादका खंडन ११६
श्लोक १४ कथंचित् सामान्यविशेषरूप वाच्यवाचक भावका समर्थन १२०
एकान्त सामान्यवादी अद्वैतवादी, मीमांसक और सांख्योंका पूर्वपक्ष १२०
एकान्त विशेषवादी बौद्धोंका पूर्वपक्ष १२२
स्वतंत्र सामान्य-विशेषवादी न्याय-वैशेषिकोंका पूर्वपक्ष १२३
उक्त तीनों पक्षोंका खंडन १२४
शब्दका पौद्गलिकत्व १२६
आत्माका कथंचित् पौद्गलिकत्व १२८
शब्द और अर्थका कथंचित् तादात्म्य संबंध १२८
सम्पूर्ण पदार्थोंमें भावाभावत्वकी सिद्धि १२९
अपोह, जाति विधि आदि शब्दार्थका खंडन १३३
श्लोक १५ सांख्योंके सिद्धान्तोंपर विचार १३४
सांख्योंका पूर्वपक्ष १३५
पूर्वपक्षका खंडन १३८
सांख्योंकी अन्य विरुद्ध कल्पनायें १४२
श्लोक १६-१९ १४४-१९१
श्लोक १६ सौत्रांतिक, वैभाषिक और योगाचार बौद्धोंके सिद्धांतोंका खंडन
प्रमाण और प्रमिति अभिन्न हैं-पूर्वपक्षका खंडन १४४
क्षणिकवाद और उसका खंडन १४८
ज्ञान पदार्थसे उत्पन्न होकर पदार्थको जानता है-खंडन १५२
ज्ञानाद्वैत-पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष १५६-५९
श्लोक १७ शून्यवादियोंका खंडन १६८-१७८
प्रमाता, प्रमेय, प्रमाण और प्रमितिकी असिद्धि-पूर्वपक्ष १६९
उत्तरपक्ष १७१
आत्माकी सिद्धि १७२
सर्वज्ञकी सिद्धि १७६
प्रमेय, प्रमाण और प्रमितिकी सिद्धि १७७
श्लोक १८ क्षणिकवादमें कृतप्रणाश आदि दोष १७९
क्षणिकवादका परिवर्तित रूप १८५
श्लोक १९ वासना और क्षणसंतति भिन्न, अभिन्न, और अनुभय रूपसे असिद्ध १८६-१९१
बौद्धमतमें वासना ( आलयविज्ञान ) में दोष १८८
श्लोक २० चार्वाकमतपर विचार १९२-१९६
केवल प्रत्यक्षको प्रमाण माननेवाले चार्वाकोंका खंडन १९२
भौतिकवादका खंडन १९४
श्लोक २१-२८ स्याद्वादकी सिद्धि १९६-२५५
श्लोक २१ प्रत्येक वस्तुमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यकी सिद्धि १९६
श्लोक २२ प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्मात्मकता २००
श्लोक २३ सप्तभंगीका प्ररूपण २०४-२२१
मिथ्यादृष्टि द्वादशांगको पढ़कर भी उसे मिथ्याश्रुत समझता है २०६
8
विषय पृष्ठ
मांस, मद्य और मैथुनमें जीवोंकी उत्पत्ति २०८
स्याद्वादके सात भंग २०९
सकलादेश और विकलादेश रूप सप्तभंगो २१३
श्लोक २४ अनेकांतवादमें विरोध आदि दोषोंका निराकरण २२२-२३०
श्लोक २५ अनेकांतवादके चार भेद २३१
श्लोक २६ एकान्त नित्यवाद और एकान्त अनित्यवादका खंडन २३३
नित्य और अनित्यवादियोंका परस्पर खंडन २३३
श्लोक २७ एकान्तवादमें सुख-दुख आदिका अभाव २३६
श्लोक २८ दुर्नय, नय और प्रमाणका स्वरूप २४०-२५५
नयका स्वरूप और उसके नैगम आदि सात भेद २४२
प्रमाण और प्रमाणके भेद २५१
एकसे लेकर नयके असंख्यात भेद २५३
नय और प्रमाणमें अन्तर २५३
नैगम नयके भिन्न भिन्न लक्षण और उसके भेद २५४
द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नयोंके विभागमें मतभेद (टि.) २५५ (टि०)
श्लोक २९ जीवोंकी अनन्तता २५६
पतंजलि, अक्षपाद आदि ऋषियों द्वारा जीवोंको अनन्यताका समर्थन २५७
पृथिवी आदिमें जीवत्वकी सिद्धि २५८
निगोदका स्वरूप २५९
गोशाल, अश्वमित्र और स्वामी दयानन्दकी मोक्षके विषयमें मान्यता २६०
जीवोंके सदा मोक्ष प्राप्त करते रहते हुए भी संसार जीवोंसे खाली नहीं होता २६०
गोशाल, महीदास, मनुस्मृति और महाभारतकार द्वार वनस्पतिमें जीवत्वका समर्थन २६१
आधुनिक विज्ञानद्वारा पृथिवीमें जीवत्वका समर्थन २६१
श्लोक ३० स्याद्वाददर्शनमें जैनेतर दर्शनोंका समन्वय २६२
श्लोक ३१ भगवानके यथार्थवादित्वका समर्थन २६५
श्लोक ३२ जिन भगवानसे ही जगत के उद्धारकी शक्यता २६७
प्रशस्ति २६९
अयोगव्यवच्छेदिका २७१-२७७
परिशिष्ट २७९
जैन परिशिष्ट २८१
दुःषमार २८१
केवली २८३
अतिशय २८५
एवं व्योमापि.... २८६
अ पुनर्बन्ध २८७
प्रदेश २८८
केवलीसमुद्घात २८९
लोक २९०
७
विषय पृष्ठ
भवतामपि.... २९२
आधाकर्म २९२
द्रव्यषट्क २९३
द्वादशांग २९७
प्राण २९९
ज्ञानके भेद ३००
निगोद ३०१
बौद्ध परिशिष्ट
बौद्धदर्शन ३०३
बौद्धोंके मुख्य सम्प्रदाय ३०३
सौत्रान्तिक ३०४
वैभाषिक ३०५
सौत्रान्तिक-वैभाषिकोंके सिद्धान्त ३०६
शून्यवाद ३०८
विज्ञानवाद ३१२
बौद्धोंका अनात्मवाद ३१५
बौद्ध साहित्यमें आत्मा संबंधी मान्यताएँ ३१८
न्याय-वैशेषिक परिशिष्ट
न्याय-वैशेषिकदर्शन ३२२
न्याय-वैशेषिकोंके समानतंत्र ३२३
न्याय-वैशेषिकोंमें मतभेद ३२४
वैदिक साहित्यमें ईश्वरका विविध रूप ३२४
ईश्वरके अस्तित्त्वमें प्रमाण ३२६
ईश्वर विषयक शंकायें ३२८
ईश्वरके विषयमें पाश्चात्य विद्वानोंका मत ३२९
न्याय-वैशेषिक-साहित्य ३३०
सांख्य-योग परिशिष्ट
सांख्य, योग, जैन और बौद्ध दर्शनोंकी तुलना और उनकी प्राचीनता ३३२
सांख्य-योगदर्शन ३३३
सांख्यदर्शन ३३३
सांख्यदर्शनके प्ररूपक ३३५
योगदर्शन ३३७
जैन और बौद्धदर्शनमें योग ३३७
मीमांसक परिशिष्ट
मीमांसकोंके आचार-विचार ३३९
मीमांसकोंके सिद्धांत ३३९
मीमांसक और जैन ३४३
मीमांसादर्शनका साहित्य ३४५
10
विषय पृष्ठ
वेदान्त परिशिष्ट
वेदान्तदर्शन ३४६
वेदान्त साहित्य ३४६
वेदान्तदर्शनकी शाखायें ३४७
शंकरका मायावाद ३४८
चार्वाक परिशिष्ट
चार्वाकमत ३४९
चार्वाकों के सिद्धान्त ३५०
चार्वाक साहित्य ३५०
विविध परिशिष्ट
आजीविक ३५१
संवर-प्रतिसंवर ३५१
क्रियावादी-अक्रियावादी ३५२
अनुक्रमणिका
स्याद्वादमंजरीके अवतरण ( १ ) १
स्याद्वादमंजरीमें निर्दिष्ट ग्रन्थ और ग्रन्थकार ( २ ) १७
स्याद्वादमंजरी ( अन्ययोगव्यवच्छेदिका ) के श्लोकोंकी सूची ( ३ ) २२
स्याद्वादमंजरी ( अन्ययोगव्यवच्छेदिका ) के शब्दोंकी सूची ( ४ ) २४
स्याद्वादमंजरीके न्याय ( ५ ) २५
स्याद्वादमंजरीके विशेष शब्दोंकी सूची ( ६ ) २६
स्याद्वादमंजरीकी टिप्पणीमें उपयुक्त ग्रंथ ( ७ ) ३५
अयोगव्यवच्छेदिकाके श्लोकोंकी सूची ( ८ ) ३७
अयोगव्यवच्छेदिकाके शब्दोंकी सूची ( ९ ) ३८
अयोगव्यवच्छेदिकाकी टिप्पणीमें उपयुक्त ग्रंथ ( १० ) ३९
परिशिष्टोंके विशेष शब्दोंकी सूची ( ११ ) ४०
परिशिष्टोंमें उपयुक्त ग्रंथ ( १२ ) ४२
सम्पादनमें उपयुक्त ग्रंथ ( १३ ) ४५
शुद्धाशुद्धिपत्र ५०
प्राक्कथन
आज मेरे लिए बड़े हर्ष और सौभाग्यका अवसर है कि मैं अपने सुयोग्य शिष्य तथा प्रिय मित्र
जगदीशचन्द्र जैन एम. ए. द्वारा अनुवादित तथा संपादित स्याद्वादमञ्जरीके आदिमें कतिपय शब्द लिख रहा
हूँ। ग्रन्थ, ग्रन्थकार, ग्रन्थके सिद्धान्तों और उनसे सम्बद्ध अनेक विषयोंका परिचय तो जगदीशचन्द्रजीने पाठकों-
को सरल और निर्दोष राष्ट्रीय भाषामें भली भाँति दे ही दिया है। मुझे इस विषयमें यहाँपर अधिक कुछ
नहीं कहना है। मेरे लिये तो एक ही विषय रह गया है। वह है पाठकोंको सम्पादक महोदयका परिचय देना।
जगदीशचन्द्र जैन सुप्रसिद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालयके अग्रगण्य स्नातकोंमेंसे हैं। उन्होंने वहाँसे
सन् १९३२ में दर्शन ( Philosophy ) में एम. ए. की उपाधि प्राप्त की थी। विश्वविद्यालयके गर्भमें
भारतीयदर्शन—विशेषतः जैन और बौद्ध—के साथ साथ उन्होंने पाश्चात्य दर्शनका गहरा और विस्तृत अध्य-
यन किया, और दार्शनिक समस्याओंपर निष्पक्ष भावसे स्वतंत्र विचार किया। मुझे उनके आचार-विचार
और आदर्शोंसे खूब परिचिति है, क्योंकि वे कई वर्ष तक मेरी निरीक्षकता ( Wardenship ) में छात्रा-
वासमें रहे हैं, और उन्होंने मेरे साथ मनोविज्ञान ( Psychology ) और भारतीयदर्शनका अध्ययन किया
है। सायंकालके भ्रमणमें अक्सर उनके साथ दार्शनिक विषयोंपर बातचीत हुआ करती थी। अपनी इस परि-
चितिके आधारपर मैं निःसंकोच यह कह सकता हूँ कि जगदीशचन्द्रजी एक बहुत होनहार दार्शनिक विद्वान्
और लेखक हैं। दार्शनिकोंके दो सबसे बड़े गुण—निष्पक्ष और न्यायपूर्वक विचार और समन्वय बुद्धि—
उनमें कूट कूट कर भरे हैं। वे केवल दार्शनिक ही नहीं हैं, सहृदय भी हैं। यही कारण है कि अनेकान्तवाद,
स्याद्वाद और अहिंसावादमें उनकी श्रद्धा है। स्याद्वादमञ्जरीमें इन सिद्धान्तोंका प्रतिपादन है, इसीलिये उन्होंने
इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थका राष्ट्रभाषामें अनुवाद तथा सम्पादन किया है। अनुवाद और सम्पादन बहुत ही उत्तम
रीतिसे हुए हैं। प्रत्येक श्लोक और उसकी टीकाके अनुवादके अन्तमें जो भावार्थ दिया गया है, उसमें विषय-
का बहुत सरलतासे प्रतिपादन हुआ है। कहीं कहीं जो टिप्पणियाँ दी गई हैं, वे भी बहुत उपयोगी हैं। अन्तमें
सब दर्शनों सम्बन्धी—विशेषतः बौद्धदर्शन सम्बन्धी—परिशिष्टों और कई प्रकारकी अनुक्रमणिकाओंने पुस्तकको
बहुमूल्य बना दिया है। गुणज्ञ पाठक स्वयं ही समझ जायँगे कि सम्पादक महोदयने कितना परिश्रम किया है।
मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि इस पुस्तकका प्रचार खूब हो, और विशेषतः उन लोगोंमें हो जो
जैनधर्मावलम्बी नहीं हैं। सत्य और उच्च भाव और विचार किसी एक जाति या मज़हबवालोंकी वस्तु नहीं
हैं। इनपर मनुष्यमात्रका अधिकार है। मनुष्यमात्रको अनेकान्तवादी, स्याद्वादी और अहिंसावादी होनेकी
आवश्यकता है। केवल दार्शनिक क्षेत्रमें ही नहीं, धार्मिक और सामाजिक क्षेत्रमें, विशेषतः इस समय—जब
कि समस्त भूमण्डलकी सभ्यताका एकीकरण हो रहा है और सब देशों, जातियों और मतोंके लोगोंका संपर्क
दिन पर दिन अधिक होता जा रहा है—इन ही सिद्धान्तोंपर आरूढ़ होनेसे संसारका कल्याण हो सकता है।
मनुष्यजीवनमें कितना ही वाञ्छनीय परिवर्तन हो जाय, यदि सभी मनुष्योंको प्रारम्भसे शिक्षा मिले कि सब ही
मत सापेक्षिक हैं; कोई भी मत सर्वथा सत्य अथवा असत्य नहीं है; पूर्ण सत्यमें सब मतोंका समन्वय होना
चाहिये; और सबको दूसरोंके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिये जैसा कि वे दूसरोंसे अपने प्रति चाहते
हैं। मैं तो इस दृष्टिके प्राप्त कर लेनेको ही मनुष्यका सभ्य होना समझता हूँ। मैं आशा करता हूँ कि यह
पुस्तक पाठकोंको इस प्रकारकी दृष्टि प्राप्त करनेमें सहायक होगी।
भिक्खनलाल आत्रेय एम. ए., डी. लिट्.,
आषाढ़ पूर्णिमा १९९२ दर्शनाध्यापक,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
प्रथम आवृत्तिकी भूमिका
स्याद्वादमंजरीके निम्नलिखित संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं—
१ संपादित, दामोदरलाल गोस्वामी, चौखंवा संस्कृत सीरीज, बनारस, १९००
२ हीरालाल वी० हंसराज, मूल सहित गुजराती अनुवाद, जामनगर, १९०३
३ पंडित जवाहरलाल शास्त्री व पंडित वंशीधर शास्त्री, रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला, बंबई, वि०सं० १९६६
४ संपादित, पंडित बेचरदास व पंडित हरगोविन्ददास, काशी, वीर संवत् २४३८
५ संपादित, मोतीलाल लाघाजी, पूना, वी. सं. २४५२
६ अगरचन्द्रजी भैरोदानजी सेठिया, सेठिया जैन ग्रंथ माला, बीकानेर, १९२७
७ आनन्दशंकर बापूजी ध्रुव, मूल सहित अंग्रेजी अनुवाद, बम्बई संस्कृत एण्ड प्राकृत सीरीज, बंबई, १९३३
८ जगदीशचन्द्र जैन, मूल सहित हिन्दी अनुवाद, रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला, बंबई, १९३५
९ एफ डवल्यू. थॉमस, अंग्रेजी अनुवाद, बर्लिन अकादमी बर्लिन, १९६०
१० उपर्युक्त पुनर्मुद्रण, मोतीलाल, बनारसीदास, १९६८
११ साध्वी सुलोचनाश्री, मूलसहित गुजराती अनुवाद, आत्मानन्द जैन गुजराती ग्रन्थमाला, ९८,
भावनगर वि. सं. २०२४
प्रस्तुत संस्करणको अनेक दृष्टियोंसे परिपूर्ण बनानेका प्रयत्न किया गया है ।
प्रस्तुत संस्करणका संक्षिप्त परिचय
१ संशोधन—इस ग्रंथका संशोधन रायचन्द्रमालाकी एक प्राचीन और शुद्ध हस्तलिखित प्रतिके
आधारसे किया गया है। इस प्रतिके आदि अथवा अन्तमें किसी संवत् आदिका निर्देश न होनेसे इस प्रतिका
ठीक ठीक समय मालूम नहीं हो सका, परन्तु प्रति प्राचीन मालूम होती है ।
२ संस्कृतटिप्पणी—संस्कृतके अभ्यासियोंके लिये मूल पाठके कठिन स्थलोंको स्पष्ट करनेके लिये इस
ग्रंथमें संस्कृतकी टिप्पणियां लगाई गई हैं। इन टिप्पणियोंमें सेठ मोतीलाल लाधाजीद्वारा संपादित स्याद्वादमंजरी की
संस्कृत टिप्पणियोंका भो उपयोग किया गया है। एतदर्थ हम सम्पादक महोदयके आभारी हैं ।
३ अनुवाद—अनुवादको यथाशक्य सरल और सुबोध बनानेका प्रयत्न किया गया है । इसके लिये
अनुवाद करते समय बहुतसे शब्दोंको छूट भी लेनी पड़ी है । विषयका वर्गीकरण करनेके साथ विषयको सरल
और स्पष्ट बनानेके लिये न्यायके कठिन विषयोंको 'शंका-समाधान,' 'वादी-प्रतिवादी,' 'स्पष्टार्थ' रूपमें
उपस्थित किया गया है। प्रत्येक श्लोकके अंतमें श्लोकका संक्षिप्त भावार्थ दिया गया है। अनेक स्थलोंपर
भावार्थ लिखते समय ग्रंथके मूल विषयके बाह्य विषयोंकी भी विस्तृत चर्चा की गई है। कहीं-कहीं हिन्दी
अनुवाद करते समय और भावार्थ लिखते समय हिन्दीकी टिप्पणियां भी जोड़ी गई हैं ।
४ अयोगव्यवच्छेदिका—इस संस्करणमें हेमचन्द्रकी दूसरी कृति अयोगव्यवच्छेदिकाका अनुवाद भी
दे दिया गया है। इसके साथ तुलनाके लिये सिद्धसेन और समंतभद्रकी कृतियोंमेंसे टिप्पणीमें अनेक श्लोक
उद्धृत किये गये हैं ।
५ परिशिष्ट—इस संस्करणका महत्त्वपूर्ण भाग है। इसमें जैन, बौद्ध, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग,
पूर्वमीमांसा, वेदान्त, चार्वाक और विविध नामके .आठ परिशिष्ट हैं । जैन परिशिष्टमें तुलनात्मक दृष्टिसे
जैन पारिभाषिक शब्दों और विचारोंका स्पष्टीकरण है । बौद्ध परिशिष्टमें बौद्धोंके विज्ञानवाद, शून्यवाद,
अनात्मवाद आदि दार्शनिक सिद्धांतोंका पालि, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाके ग्रंथोंके आधारसे प्रामाणिक विवेचन
किया गया है। आशा है इसके पढ़नेसे पाठकोंकी बौद्धदर्शन संबंधी बहुतसी भ्रांतिपूर्ण धारणायें दूर होंगी ।
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तीसरे न्याय-वैशेषिक परिशिष्टमें ईश्वर संबंधी चर्चा विशेष रूपसे उल्लेखनीय है । चौथे सांख्य-योग परिशिष्टमें
सांख्य, योग, जैन और बौद्ध-दर्शनोंकी तुलना करते समय जो ब्राह्मण और श्रमण संस्कृति संबंधी भेद दिखाया
गया है, वह ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्त्वपूर्ण है । पांचवें परिशिष्टमें मीमांसक और जैनोंकी तुलना, छठेमें शंकरके
मायावादकी विज्ञानवाद और शून्यवादसे तुलना, सातवेंमें चार्वाकमत और आनन्दघनजीका उसे जिनभगवानकी
कूख बताना, और आठवें परिशिष्टमें आजीविक सम्प्रदाय—ध्यानपूर्वक पढ़ने योग्य हैं ।
६ अनुक्रमणिका—इस संस्करणमें नीचे लिखी तेरह अनुक्रमणिकायें दी गई हैं—
(१) स्याद्वादमंजरीके अवतरण—इन अवतरणोंमें कई अनुपलब्ध अवतरणोंकी खोज पहली बार की
गई है । अवतरण प्रायः सेठ मोतीलाल लाधाजी और प्रो. ध्रुवकी स्याद्वादमंजरीके आधारसे लिये गये हैं ।
(२) स्याद्वादमंजरीमें निर्दिष्ट ग्रंथ और ग्रंथकार
(३) स्याद्वादमंजरी (अन्ययोगव्यवच्छेदिका) के श्लोकोंकी सूची
(४) स्याद्वादमंजरी (अन्ययोगव्यवच्छेदिका) के शब्दोंकी सूची
(५) स्याद्वादमंजरीके न्याय
(६) स्याद्वादमंजरीके श्लोकोंकी सूची
(७) स्याद्वादमंजरीकी संस्कृत, तथा हिन्दी टिप्पणियोंके ग्रंथ और ग्रंथकार
(८) अयोगव्यवच्छेदिकाके श्लोकोंकी सूची
(९) अयोगव्यवच्छेदिकाके शब्दोंकी सूची
(१०) अयोगव्यवच्छेदिकाकी टिप्पणीमें उपयुक्त ग्रंथ
(११) परिशिष्टके शब्दोंकी सूची
(१२) परिशिष्टमें उपयुक्त ग्रंथ
(१३) सम्पादनमें उपयुक्त ग्रंथ
उपसंहार
जिस समय मैं बनारस हिन्दू युनिवर्सिटीमें एम. ए. में आदरणीय प्रो. फणिभूषण अधिकारीसे
स्याद्वादमंजरी पढ़ता था, उस समय मुझे उनके साथ दर्शनशास्त्रके अनेक विषयोंपर चर्चा करनेका अवसर
प्राप्त हुआ था । उसी समयसे मेरी इच्छा थी कि मैं स्याद्वादमंजरीपर कुछ लिखकर जैनदर्शन तथा राष्ट्रभाषा-
की सेवा करूँ । संयोगवश पिछले वर्ष मेरा बम्बईमें आना हुआ, और मैंने रायचन्द्र जैनशास्त्रमालाके व्यवस्था-
पक श्रीयुत मणीलाल रेवाशंकर जगजीवन झवेरीकी स्वीकृतिपूर्वक स्याद्वादमंजरीका काम आरंभ कर दिया ।
इस ग्रंथके आरंभसे इसकी समाप्तिंतक अनेक सज्जनोंने मुझे अनेक प्रकारसे सहयोग दिया है, उसके लिये मैं
उन सबका आभार मानता हूँ । स्नेही श्रीयुत दलसुख डाह्याभाई मालवणियाने स्याद्वादमंजरीके संस्कृत और
उसके अनुवादके बहुतसे प्रूफोंका संशोधन किया है । बंधु साहित्यरत्न पं. दरबारीलालजो न्यायतीर्थने इस
ग्रंथ संबंधी अनेक प्रश्नोंकी चर्चामें रस लेकर अपना बहुमूल्य समय खर्च किया है। स्थानीय बुद्धिस्ट सोसायटी-
के मंत्री के. ए. पाध्ये बी. ए., एलएल. बी., वकील बम्बई हाईकोर्टने स्थानीय एशियाटिक लायब्रेरीमें मुझे
हरेक प्रकारकी सुविधा दिलवाकर, तथा एन. आर. फाटक बी. ए. ने अपनी लायब्रेरीमेंसे बहुतसी पुस्तकें
देकर सहायता की है। रायचन्द्रशास्त्रमालाके मैनेजर श्रीयुत कुन्दनलालजीने आवश्यकीय पुस्तकों आदिका
प्रबन्ध किया है । पं. नाथूरामजी प्रेमी, मुनि हिमांशुविजयजी, मोहनलाल दलीचंद देसाई बी. ए., एलएल.
बी., तथा मोहनलाल भगवानदास झवेरी एम. ए. सोलिसीटर आदि सज्जनोंने भी सहानुभूतिका प्रदर्शन किया
हैं । मेरी पत्नी कमलश्रीने हिन्दीके प्रूफ पढ़वानेमें और अनुक्रमणिका बनानेमें सहायता की है । मैं इन सब
महानुभावोंका हृदयसे आभार मानता हूँ । मुनि मोहनलाल सेंट्रल जैन लायब्रेरी, हीराचन्द गुमानजी जैन
बोर्डिंग लायब्रेरी, ऐलक पन्नालाल सरस्वती भवन तथा न्यू भारत प्रिंटिंग प्रेसके अध्यक्षोंने अपना पूर्ण सहयोग
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दिया है । इस संस्करणके तैयार करनेमें प्रो. आनन्दशंकर बापूभाई ध्रुवकी स्याद्वादमंजरी तथा अन्य अनेक
ग्रन्थोंसे जो मुझे सहायता मिली है, उसका यथास्थान उल्लेख किया गया है । इन सबका आभारी हूँ ।
जुबेलीबाग,
तारदेव बम्बई \ } \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad जगदीशचन्द्र जैन
२०-६-३५ /
द्वितीय आवृत्ति की भूमिका
स्याद्वादमंजरी संस्कृत एवं अंग्रेजी की विविध परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में अनेक वर्षों से नियत है ।
तरुण जैन साधु-साध्वियां भी जैन दर्शन का सरल एवं बोधगम्य भाषा में ज्ञान प्राप्त करने के लिये इस ग्रंथ
का पारायण करते आये हैं ।
किन्तु इधर अनेक वर्षोंसे इस ग्रंथके उपलब्ध न होनेके कारण विद्यार्थियोंको बड़ी कठिनाईका सामना
करना पड़ रहा था । साहित्यप्रेमी डॉक्टर आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्येका ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ ।
रायचन्द्र शास्त्रमालाके अधिकारियोंसे उन्होंने पत्रव्यवहार किया । इसका परिणाम है यह प्रस्तुत संस्करण
जो पूर्व संस्करणके ३५ वर्ष बाद प्रकाशित हो रहा है ।
अनुवादके संशोधित और परिमार्जित करनेमें कोई कमी नहीं रखी गई है । फलटण (महाराष्ट्र)के वयो-
वृद्ध संस्कृत एवं जैन दर्शनके विद्वान् प्रोफेसर एम. जी. कोठारीका संशोधनमें हार्दिक सहयोग प्राप्त हुआ है ।
अस्वस्थ रहते हुए भी आपने इस कार्यमें रुचि दिखाई है ।
२८ शिवाजी पार्क
बंबई २८ \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad जगदीशचन्द्र जैन
१-६-७०
ग्रन्थ और ग्रन्थकार
——————
हेमचन्द्र
हेमचन्द्र आचार्य श्वेताम्बर परम्परामें महान प्रतिभाशाली असाधारण विद्वान हो गये हैं। हेमचन्द्रा-
चार्यका जन्म ई. स. १०७८ में गुजरातके धन्धुका ग्राममें मोढ़ वणिक् जातिमें हुआ था। हेमचन्द्रके जन्मका
नाम चंगदेव अथवा चांगोदेव था। इनके पिताका नाम चच्च, चाच अथवा चाचिग, और माताका पाहिनी
अथवा चाहिणी था। एक बार देवचन्द्र नामके एक जैन साधु धंधुकामं आये। चंगदेवको अवस्था केवल पांच
वर्षकी थी। पाहिनी अपने पुत्रको लेकर जिनमंदिरके दर्शन करने गई। देवचन्द्र भी इसी मंदिरमें ठहरे थे।
जिस समय पाहिनी जिन प्रतिबिम्बकी प्रदक्षिणा दे रही थी, चंगदेव देवचन्द्रमहाराजके पास आकर बैठ गये।
आचार्य चंगदेवके शरीरपर असाधारण चिह्न देखकर आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने चंगदेवके घर जाकर पाहि-
नीसे उसके पुत्रको जैन साधुसंघमें दीक्षित करनेकी अनुमति मांगी¹। पाहिनीने गुरुकी आज्ञा शिरोधार्य की और
चंगदेवको देवचन्द्र आचार्यके सुपुर्द कर दिया। जब चंगदेवके पिता बाहरसे लौटे, इस घटनाको सुनकर बहुत
क्रुद्ध हुए। अन्तमें सिद्धराजके तत्कालीन जैन मंत्री उदयनने चंगदेवके पिताको शान्त किया, तथा चंगदेवका
विधि विधानपूर्वक दीक्षा-संस्कार हो गया। दीक्षाके पश्चात् चंगदेवका नाम सोमचन्द्र रखा गया। प्रतिभा-
शाली सोमचन्द्रने शीघ्र ही तर्क, लक्षण, साहित्य और आगम इन चारों विद्याओंका पाण्डित्य प्राप्त कर लिया।
देवचन्द्रसूरिने अपने शिष्यका अगाध पांडित्य देख सोमचन्द्रको सूरिकी उपाधिसे विभूषित किया, और अब
सोमचन्द्र हेमचन्द्रसूरिके नामसे कहे जाने लगे।
एक बार हेमचन्द्र आचार्य विहार करते करते गुजरातकी राजधानी अणहिल्लपुर पाटणमें पधारे।
उस समय वहां महाराज सिद्धराज जयसिंह राज्य करते थे ! सिद्धराजने हेमचन्द्र आचार्यको राजसभामें आमं-
त्रित किया, और हेमचन्द्रके अगाध पाण्डित्यको देखकर वे बहुत मुग्ध हुए। हेमचन्द्र अणहिल्लपुरमें ही रहने
लगे। सिद्धराजने कोई अच्छा व्याकरण न देखकर हेमचन्द्रसे कोई व्याकरण लिखने का अनुरोध किया । तत्प-
श्चात् हेमचन्द्रने गुजरातके लिये सिद्धहैमशब्दानुशासन नामके व्याकरणकी रचना की। यह व्याकरण राजाके
हाथीपर रखकर राज दरबारमें लाया गया। सिद्धराज शैवधर्मी थे। एक बार हेमचन्द्र सिद्धराजके साथ सोम-
नाथके मंदिरमें गये। हेमचन्द्रने निम्न श्लोकोंसे शिवको नमस्कारकर अपने हृदयकी विशालताका परिचय दिया—
भवबीजांकुरजनना रागाद्या क्षयमुपागता यस्य।
ब्रह्मा वा विष्णुर्वा हरो जिनो वा नमस्तस्मै ॥
यत्र तत्र समये यथा तथा योऽसि सोऽस्यभिधया यया यया ।
वीतदोषकलुषः स चेद्भवानेक एव भगवन्नमोऽस्तु ते ॥
हेमचन्द्रके उपदेशसे सिद्धराजको जैनधर्मके प्रति प्रीति उत्पन्न हुई, और फलस्वरूप सिद्धराजने
पाटणमें ‘रायविहार’ और सिद्धपुरमें ‘सिद्धविहार’ नामक चौबीस जिन प्रतिमावाले मंदिर बनवाये। सिद्ध-
राजके समय हेमचन्द्र केवल अपने विद्या-वैभवके कारण सत्कारके पात्र हुए थे। परन्तु सिद्धराजके उत्तरा-
धिकारी कुमारपाल हेमचन्द्रको राजगुरुकी तरह मानने लगे। हेमचन्द्रके उपदेशसे कुमारपालने अपने राज्यमें
१. सोमप्रभसूरिके अनुसार चंगदेवने स्वयं ही देवचन्द्रसूरिके उपदेश सुनकर उनका शिष्य होनेकी इच्छा प्रगट
की, और वे देवचन्द्रसूरिके साथ-साथ भ्रमण करने लगे। देवचन्द्र भ्रमण करते-करते जब खंभात आये तो
वहां चंगदेवके मामा नेमिचन्द्रने चंगदेवके माता-पिताको समझाया और देवचन्द्रसूरिने चंगदेवको दीक्षा दी।
16 ग्रंथ और ग्रंथकार
देव-देवियोंके निमित्त से की जानेवाली प्राणियोंकी हिंसाको, और, मांस, मद्य, द्यूत, शिकार आदि दुर्व्यसनों-
को रोकनेकी घोषणा कराई, और जैनधर्मके सिद्धांतोंका अधिकाधिक प्रचार किया ।
हेमचन्द्र चारों विद्याओंके समुद्र थे, और अपने असामान्य विद्या-वैभवके कारण कलिकालसर्वज्ञके नाम-
से प्रख्यात थे । मल्लिषेण हेमचन्द्रका पूज्य दृष्टिसे स्मरण करते हैं, और उन्हें चार विद्याओं संबंधी साहित्यके
निर्माण करनेमें साक्षात् ब्रह्माकी उपमा देते हैं । सिद्धहैमशब्दानुशासनके अतिरिक्त हेमचन्द्रने तर्क, साहित्य,
छन्द, योग, नीति, आदि विविध विषयोंपर अनेक ग्रंथोंकी रचना करके जैन साहित्यको पल्लवित बनाया ।
कहा जाता है कि कुल मिलाकर हेमचन्द्रने साढ़े तीन करोड़ श्लोकोंकी रचना की है । हेमचन्द्रके मुख्य ग्रंथ
निम्न प्रकार हैं—
१ सिद्धहैमशब्दानुशासन : ( अ ) प्रथम सात अध्यायों में संस्कृत व्याकरण
( आ ) आठवें अध्यायमें प्राकृत एवं अपभ्रंश व्याकरण
२ द्व्याश्रयमहाकाव्य ( माघकृत भट्टिकाव्य के आदर्श पर )
( अ ) संस्कृत द्व्याश्रय; ( आ ) प्राकृत द्व्याश्रय
३ कोष : ( अ ) अभिधानचिंतामणि-सवृत्ति ( हैमनाममाला ); ( आ ) अनेकार्थसंग्रह; ( इ )
देशोनाममाला-सवृत्ति ( रयणावलि ); ( ई ) निघंटुशेष
४ अलंकार : काव्यानुशासन-सवृत्ति
५ छंद : छंदोनुशासन-सवृत्ति
६ न्याय : ( अ ) प्रमाणमीमांसा [ अपूर्ण ]; ( आ ) अन्ययोगव्यवच्छेदिका ( स्याद्वादमंजरी ); ( इ )
अयोगव्यवच्छेदिका
७ योग : योगशास्त्र-सवृत्ति ( अध्यात्मोपनिषद् )
८ स्तुति : वीतरागस्तोत्र
९ चरित : त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित
इन ग्रंथोंके अतिरिक्त हेमचन्द्रने और भी ग्रंथोंका निर्माण किया है । हेमचन्द्र भारतके एक दैदीप्यमान
रत्न थे; उनके बिना जैन साहित्य ही नहीं, गुजरातका साहित्य शून्य समझा जायेगा । ²
अन्ययोग और अयोगव्यवच्छेद द्वात्रिंशिकायें
दार्शनिक विचारोंको संस्कृत पद्योंमें प्रस्तुत करनेकी पद्धति भारतवर्षमें बहुत समयसे चली जाती है ।
उपलब्ध भारतीय साहित्यमें सर्वप्रथम विज्ञानवादी बौद्ध आचार्य वसुबंधुद्वारा, विज्ञानवादकी सिद्धिके लिये
बीस श्लोकप्रमाण विंशिका. और तीस श्लोकप्रमाण त्रिंशिकाकी रचना देखनेमें आती है । जैन साहित्यमें
सर्वप्रथम सुप्रसिद्ध जैन दार्शनिक सिद्धसेन दिवाकरने द्वात्रिंशद्द्वात्रिंशिकाओंकी रचना की । हरिभद्रने भी विंश-
तिविंशिकाओंको लिखा है । हेमचन्द्रने सिद्धसेनकी द्वात्रिंशिकाओंके अनुकरण पर सरल और मार्मिक भाषामें
अन्ययोगव्यवच्छेद और अयोगव्यवच्छेद नामकी दो द्वात्रिंशिकाओंकी रचना की है ।
१. एक विद्वान्ने इस व्याकरणकी प्रशंसा निम्न श्लोकसे की थी—
भ्रातः संवृणु पाणिनिप्रलपितं कातन्त्रकंथा वृथा
मा कार्षीः कटुशाकटायनवचः क्षुद्रेण चान्द्रेण किम् ।
किं कंठाभरणादिभिर्व्यथयत्यात्मानमन्यैरपि
श्रूयन्ते यदि तावदर्थमधुराः श्रीसिद्धहेमोक्तयः ।। जैन साहित्यनो इतिहास पृ. २९४ ।
२. विशेषके लिये देखिये प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित होनेवाली 'भारतके
सांस्कृतिक अग्रदूत' पुस्तकमें लेखक का 'आचार्य हेमचन्द्र' नामक निबंध ।