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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

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विषय पृष्ठ
मांस, मद्य और मैथुनमें जीवोंकी उत्पत्ति २०८
स्याद्वादके सात भंग २०९
सकलादेश और विकलादेश रूप सप्तभंगो २१३
श्लोक २४ अनेकांतवादमें विरोध आदि दोषोंका निराकरण २२२-२३०
श्लोक २५ अनेकांतवादके चार भेद २३१
श्लोक २६ एकान्त नित्यवाद और एकान्त अनित्यवादका खंडन २३३
नित्य और अनित्यवादियोंका परस्पर खंडन २३३
श्लोक २७ एकान्तवादमें सुख-दुख आदिका अभाव २३६
श्लोक २८ दुर्नय, नय और प्रमाणका स्वरूप २४०-२५५
नयका स्वरूप और उसके नैगम आदि सात भेद २४२
प्रमाण और प्रमाणके भेद २५१
एकसे लेकर नयके असंख्यात भेद २५३
नय और प्रमाणमें अन्तर २५३
नैगम नयके भिन्न भिन्न लक्षण और उसके भेद २५४
द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नयोंके विभागमें मतभेद (टि.) २५५ (टि०)
श्लोक २९ जीवोंकी अनन्तता २५६
पतंजलि, अक्षपाद आदि ऋषियों द्वारा जीवोंको अनन्यताका समर्थन २५७
पृथिवी आदिमें जीवत्वकी सिद्धि २५८
निगोदका स्वरूप २५९
गोशाल, अश्वमित्र और स्वामी दयानन्दकी मोक्षके विषयमें मान्यता २६०
जीवोंके सदा मोक्ष प्राप्त करते रहते हुए भी संसार जीवोंसे खाली नहीं होता २६०
गोशाल, महीदास, मनुस्मृति और महाभारतकार द्वार वनस्पतिमें जीवत्वका समर्थन २६१
आधुनिक विज्ञानद्वारा पृथिवीमें जीवत्वका समर्थन २६१
श्लोक ३० स्याद्वाददर्शनमें जैनेतर दर्शनोंका समन्वय २६२
श्लोक ३१ भगवानके यथार्थवादित्वका समर्थन २६५
श्लोक ३२ जिन भगवानसे ही जगत के उद्धारकी शक्यता २६७
प्रशस्ति २६९
अयोगव्यवच्छेदिका २७१-२७७
परिशिष्ट २७९
जैन परिशिष्ट २८१
दुःषमार २८१
केवली २८३
अतिशय २८५
एवं व्योमापि.... २८६
अ पुनर्बन्ध २८७
प्रदेश २८८
केवलीसमुद्घात २८९
लोक २९०