स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकाशकीय
आचार्य श्रीहेमचन्द्रने वर्द्धमान महावीरकी स्तुतिरूप बत्तीस-बत्तीस श्लोकप्रमाण दो स्तवनोंकी भाव-
पूर्ण विशिष्ट रचना की—प्रथम 'अयोगव्यवच्छेदस्तवन' और द्वितीय 'अन्ययोगव्यवच्छेदस्तवन'। स्याद्वादकी
उपयोगिता सिद्ध करनेका अभीष्ट-साधन दूसरे स्तवनको जानकर श्रीमल्लिषेणसूरिने उसपर महत्त्वपूर्ण विस्तृत
टीका 'स्याद्वादमंजरी' लिखी है। श्रीहेमचन्द्राचार्यकी 'अयोगव्यवच्छेदिकास्तुति' नामक रचना भी
इस ग्रन्थके साथ जोड़ दी गई है। ग्रन्थकी उपयोगिताका विशेष अनुभव तो विद्वज्जन स्वयं ही करेंगे।
परमश्रुतप्रभावकमण्डल (श्रीमद् राजचन्द्रजैनशास्त्रमाला) की ओरसे अनेक सत्श्रुतरूप ग्रन्थोंका
प्रकाशन समय-समयपर होता रहा है, जिनमें 'स्याद्वादमंजरी' का प्रथम प्रकाशन इस संस्था द्वारा वीरनिर्वाण
सं० २४३६ (ई० सन् १९१०) में श्री पं० जवाहरलालजी शास्त्री तथा पं० वंशीधरजी शास्त्रीके सम्पाद-
कत्वमें हुआ था। उसके बाद वीर सं० २४६० (ई० सन् १९३५) में श्री जगदीशचन्द्र जैनने बहुत सुन्दर
ढंगसे नवीन सम्पादन प्रस्तुत किया। अब पुनः दूसरे संस्करणका यह नवीन संशोधित-संस्करण तीसरी आवृत्ति
के रूपमें इस संस्थाकी ओरसे प्रकाशित करते हुए हमें प्रसन्नता होती है। अबकी बार डॉ० जगदीशचन्द्र जैन
एम्० ए०, पी-एच० डी० ने और भी अधिक परिश्रमपूर्वक इस ग्रन्थको सर्वाङ्गसुन्दर बनानेका प्रयास किया
है। अतः हम उनका हृदयसे आभार मानते हैं।
इस ग्रन्थका मुद्रणकार्य प्रथम सन्मति मुद्रणालय, वाराणसीमें आरम्भ हुआ था, परन्तु कुछ पृष्ठ
छपते ही कार्याधिक्यके कारण काम मंद हो गया; अतः इसका मुद्रणकार्य श्री बाबूलाल जैन फागुल्ल, महावीर
प्रेस, वाराणसीको सौंपना पड़ा। हमें हर्ष है कि उन्होंने रुचिपूर्वक इस कार्यको यथासम्भव शीघ्र पूर्ण कर
दिया है। संस्थाके प्रति उनका यह प्रेम हमें कृतज्ञता-ज्ञापन करनेको बाध्य करता है।
परमश्रुतप्रभावकमण्डलद्वारा जिन ग्रन्थोंका आजतक प्रकाशन हुआ है उनकी सूची इस ग्रन्थके साथ
अन्यत्र संलग्न है। ग्रन्थोंका पुनर्मुद्रण व अन्य नवीन ग्रन्थोंका सम्पादन-प्रकाशन भी यथासमय होता रहेगा।
विद्वान पाठकों और विद्यार्थियोंको अधिकाधिक लाभ मिले इसीमें हमारे प्रकाशनका श्रम सफल है।
श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम, निवेदक
स्टेशन; अगास, पोस्ट-बोरिया रावजीभाई देसाई
वाया : आणंद (गुजरात)
ता० १-६-१९७०