स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
About this granth
This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.
Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.
Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.
प्रथमः निष्यन्दः ४१
इस प्रकरण में ये ही दो अर्थ उपबृंहित किए गए हैं—'इदमेव अर्थद्वयम् अत्र
प्रकरणे विस्तार्यते ॥'
(१) माया के वशीभूत होकर स्वरूपप्रत्यवमर्श के अनुल्लास के कारण, वेद्य
पदार्थ (देहादि) के साथ अव्यतिरेक (एकात्मता) के साथ प्रतिभासमान आत्मा का
व्यतिरेक प्रदर्शित किया गया है ।
(२) 'वेद्य' (जगत्) की 'वेदक' के साथ तात्विक स्वभाव के कारण शक्तिभाव की
दृष्टि से अपृथकता (अव्यतिरिक्तत्व) सिद्ध होती है ।
—इन्हीं दोनों अर्थों को प्रथम श्लोक में विस्तारित किया गया है—इसके द्वारा
चतुर्निष्यन्द स्पन्दसिद्धान्त इस श्लोक द्वारा आसूत्रित हुआ है ।
उपाय एवं उपेय—इस दर्शन में उपाय-उपेय क्या है?
(१) उपाय 'श्रेयःशास्त्ररूपं' (२) उपेय—'आत्मैश्वर्यप्रत्यभिज्ञारूपं'—इन 'उपाय'
एवं 'उपेय' क द्योतक 'शं' (शम्) है और इसी 'श' के कर्ता ही हैं—'शङ्कर' (तस्य कर्ता
शङ्करः ... इयं संज्ञा परमेश्वरस्य) 'शङ्कर'—परमेश्वर ॥ अतः इस स्पन्दशास्त्र के श्रेय के
साक्षात् कर्ता परमेश्वर ही हैं—। इस प्रकार ईश्वर एवं शास्त्र में कर्ता एवं कार्य का
सम्बन्ध है—यही 'स्तुमः' शब्द द्योतित करता है । 'स्तुमः' कहकर जो स्तुति की गई है
उसका प्रयोजन या अर्थ क्या है? 'उपादेय-वस्तु स्वरूप प्रतिपादनमेव स्तुत्यर्थः ।'—
उपादेय-वस्तुस्वरूप की प्रतिपादन ॥ अतः शास्त्राभिधेय प्रतिपाद्य एवं प्रतिपादक भाव ही
सम्बन्ध है । प्रयोजन क्या है ? आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मक शङ्कर पदः 'प्रयोजनं च
आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मकं शङ्करपदादेव अवसीयते ॥' दूसरे के श्रेय के संपादक भी ईश्वर
ही हैं—अतः इसमें अभिधेय-प्रयोजन दोनों में उपायोपेयभावलक्षण सम्बन्ध है । इस
प्रकार तीन प्रकार के सम्बन्ध हैं ।
इस शास्त्र का नाम है 'स्पन्द' 'अभिधानमस्य शास्त्रस्य स्पन्द' इति (१ नि० २१
का० २ पा०) ॥
स्पन्दतत्त्व—'स्पन्द' शब्द स्वस्वभाव परमर्शमात्र, नित्य, शून्यताव्यतिरेचनकारण-
भूत, उतनी ही मात्रा में संरभात्मा एवं 'शक्ति' नामक अन्य नाम वाले पारमेश्वर धर्म के
किंचित् स्पन्दनात्मक होने के कारण उसे 'स्पन्द' कहा गया है (किंचिच्चलनात् स्पन्द
इति') । इस प्रतिपाद्य 'स्पन्दतत्त्व' का प्रतिपादन करने के करण इस शास्त्र को भी
'स्पन्द' शब्द से पुकारा गया ('तत्प्रतिपादनहेतुत्वात् शास्त्रमपि इदं स्पन्दशब्देन
अभिधीयते ।')
इस शास्त्र का 'अधिकारी' कौन है?—'विषय' (अधिकारी) ॥ अन्य शास्त्रों में
तो विवक्षित या प्रतिपाद्य तत्त्व को विषय कहते हैं किन्तु यहाँ पर 'विषय' का अर्थ है
'अधिकारी' ॥
(१) विशुद्ध श्रद्धा-भक्ति-प्रकर्ष (२) परमेश्वर पर शक्तिपात प्रोन्मील्यमान-
स्वभावालोक वाला (३) तिरस्कृतसकल संदेहांधकार वाला होने के कारण प्रबुद्ध (४)
४२ स्पन्दकारिका
सम्यगुपनत दीक्षादिसंस्कारवान् (५) गुरुवचन चोदनमात्रावशेष (६) स्वात्मैश्वर्योपलब्धि के
लक्ष्य वाला—व्यक्ति ही इस शास्त्र का अधिकारी ('विषय') है ।१ 'तन्त्रालोक' में कहा
गया है कि 'स्पन्द' का विलास ही जगत् है । अनन्त स्पन्दों की तरंगों से ही विश्व
निर्मित है ।
'काल प्राण में, प्राण स्पन्द में एवं स्पन्द शून्य में एवं शून्य चिति में प्रतिष्ठित
है—समस्त षडध्वचक्रचिन्मात्र में प्रतिष्ठित है ।२ 'शून्य' 'स्पन्द' एवं 'प्राण' में निखिल
विस्तार स्थित है—
'स स्पन्दे खे स तच्चित्यां तेनास्यां विश्वनिष्ठितः ॥'३
यथा— वातग्निसंपर्कादयः पिण्डोऽग्निवद्भवेत् ।
दाहपाकप्रकाशादौ शक्तस्तद्वयं गणः ॥'४
भला यह सोचिए कि जो दूसरों को चैतन्य बनाने में समर्थ है वह निःस्वभाव कैसे
हो सकता है ? इसका अभिप्राय यह है कि सभी चेष्टायें ज्ञानपूर्वक हैं । ज्ञानहीन शरीर
मृत्तिका का खण्ड मात्र रह जाता है । निश्चय ही चैतन्य जड़वर्ग का अधिष्ठाता एवं धारक
है । अन्यथा पत्थर का टुकड़ा आकाश में स्थिर क्यों नहीं हो जाता ? अतः उद्योग एवं
श्रद्धा दोनों के द्वारा इस तत्त्व का परीक्षण एवं समीक्षण करना आवश्यक है—
'स्वदेहसाक्षिकं चैतत् सर्वस्य ज्ञानचेष्टितम् ।
ज्ञानानधिष्ठितः कायो लुठत्येव यतो धृतः ॥
अतएव जडानामप्यधिष्ठातृकृता धृतिः ।
गम्यते गमने ग्रावा न धायेताऽन्यथा कथम् ॥'५
इस सिद्ध पुरुष की वाणी पर भी विचार कीजिए—'ब्रह्म नेत्र के समान ही अदृश्य
है और नेत्र के समान ही द्रष्टा है अपने आप में ही इसकी उपलब्धि है यह घटादिक के
समान दृश्य नहीं है—
'अदृश्यं नेत्रवद् ब्रह्म द्रष्टृत्वं चास्ति नेत्रवत् ।
स्वात्मन्येवोपलम्भोऽस्य दर्शनं घटवन्न तु ॥'६
इसकी स्थिति अकृत्रिम एवं स्वतन्त्र है । जैसे यह देहस्थ करणवर्ग को चैतन्य
बनाने में स्वतन्त्र है वैसे ही संपूर्ण लोक-लोकोत्तर और दृश्य वर्ग को भी चेतन बनाने में
समर्थ है ।७
'स्पन्दतत्त्व'—क्षेमराज 'स्पन्दनिर्णय' में कहते हैं कि—वह संवित् तत्त्व स्पन्द-
शक्तिगर्भिकृत, अनन्त सर्गसंहारैकघन एवं अहन्ताचमत्कारानन्दरूपा है—
'सा चैष स्पन्दशक्तिगर्भकृतानन्तसर्गसंहारैकघनाहन्ताचमत्कारानन्दरूपा ॥'
स्पन्दशास्त्र में परमशिव की स्वभावभूत 'स्वातन्त्र्य शक्ति' का अभिधान ही
'स्पन्द' है ।
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' । २. तन्त्रालोक : विवेक ।
३. अभिनवसुखपाद—'श्रीतन्त्रालोक' । ४-७. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
प्रथमः निष्यन्दः ४३
(१) अभिनवगुप्तपादाचार्य ‘परात्रिंशिका विवृति’ में कहते हैं-
संवित्सत्तत्त्वं ‘स्पन्द’ इत्युपदिशन्ति । स्पन्दनं च किञ्चिच्चलनं स्वरूपाच्च यदि
वस्त्वन्तराक्रमणं तच्चलनमेव न किञ्चित्त्वं, नो चेत् चलनमेव न किञ्चित्, तस्मात् स्वरूप
एवं क्रमादिपरिहारेण चमत्कारात्मिका-उच्छलता ऊर्मिरिति मत्स्योदरीति प्रभृतिशब्दै-
रागमेषु निदर्शितः ‘स्पन्द’ इत्युच्यते-किञ्चिच्चलनात्मकत्वात् स च शिवशक्तिरूपः
सामान्यविशेषात्मा ।। (पृ० २०८ : परात्रिं० वि०)।
(२) अभिनवगुप्तपादाचार्य- 'तन्त्रालोक' (द्वि० भाग प्र० आ०) में कहते हैं-
जो इदमात्मक विमर्श है यही 'विशेष' नामक 'स्पन्द' है और इसे ही 'औन्मुख्य' भी
कहते हैं-
ततः स्वातन्त्र्यनिर्मेये विचित्रार्थक्रियाकृति ।
विमर्शनं विशेषाख्यः स्पन्द औन्मुख्यसंज्ञितः ।। (८१)
यह इदमात्मक विशेष विमर्श जिसे 'स्पन्द' और 'औन्मुख्य' संज्ञाओं से
विभूषित किया गया है वस्तुतः यह विच्छिन्न विमर्श है । इदमात्मक विश्रान्ति की इस
भूमि पर उल्लसित अहमात्मक परामर्श में अन्तर्लक्ष्य योगी ही विश्राम करता है-
‘ततः समनन्तरोक्ताद्वैतोः स्वातन्त्र्योत्थापिते तत्तदर्थक्रियाकारिणि भावजाते यदिद-
मिति विमर्शनं स विशेषाख्य स्पन्द... औन्मुख्यसंज्ञितः' । १
इस पुरुष के स्वरूप (स्वभाव) को आच्छादित करने के लिए ये शब्दरूप शक्तियाँ
सर्वदा उद्यत रहती हैं अर्थात् क्रियाशक्ति के द्वारा ये पुरुषरूप को सदैव आच्छादित करना
चाहती रहती है क्योंकि बिना शब्दानुवेध के (अर्थात् बना वर्णानुगम के) किसी ज्ञान
संवेदनरूप प्रत्यय का उदय नहीं हो सकता । वस्तुतः ये शब्द ही एक ही तत्त्व को
वाच्य-वाचक विभाग से दो रूपों में बाँटकर प्रकट करते हैं ।
'वाक्यपदीय' में ठीक ही कहा गया है-'ऐसा कोई प्रत्यय नहीं होता जिसमें
शब्द का अनुगम न हो । सभी ज्ञान शब्दानुविद्ध देखे जाते हैं ।'
'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वशब्देन दृश्यते ॥'
इस विश्व-व्यवहार का कारण 'वाक्' ही है । अन्यत्र भी कहा गया है—हे देव!
चित् की उन्मुखता में सर्वदा बोध ही वाग् रूप होता है । वस्तुतः वही प्रत्यवमर्शिनी
शक्ति है उसके बिना प्रकाश भी प्रकाशित नहीं हो सकता । २
विशेष ध्यातव्य-यद्यपि प्राथमिक सूत्रों में 'स्पन्द' शब्द का प्रयोग तो नहीं किया
गया है तथापि 'स्पन्दकारिका' 'स्पन्दशास्त्र' एवं 'स्पन्दसूत्र' में 'स्पन्द' शब्द व्यवहृत हुआ
है—अतः उस पर भी यत्किंचित विचार कर लेना आवश्यक है । 'रामकण्ठाचार्य' ने
१. तन्त्रालोक (अभिनवगुप्त) 'विवेक'।
२. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका ।
'स्पन्दकारिकावृत्ति' 'ओं नमः स्वस्पन्दात्मसंविन्मूर्तये शंभवे' तथा— 'परंशाक्तं तत्त्वं
जगति जयति स्पन्द इति तत्' इन मांगलिक स्तुतियों के द्वारा, भट्टकल्लट ने 'स्पन्द-
कारिकावृत्ति' (स्पन्दसर्वस्व) का 'श्रीस्पन्दवपुषे नमः' द्वारा तथा 'स्पन्दप्रदीपिका' में
उत्पलवैष्णव ने—
'यत् परापरभूस्पर्शि यत्संकल्पाल्लयोदयौ ।
स्पन्दसंज्ञं ज्ञरूपं तच्छक्तीशं स्वफलं नुमः ॥'
द्वारा 'स्पन्दतत्त्व' की स्तुति की है । अतः 'स्पन्दतत्त्व' विवेच्य है— स्पन्दतत्त्व—
'पराप्रावेशिका' में 'स्पन्द' को 'चित्' 'चैतन्य' 'स्वरसोदिता परावाक्' 'स्वातन्त्र्य'
'कर्तृत्व' 'स्फुरत्ता' का पर्याय माना है—
(१) पराप्रावेशिका— 'एष एव च विमर्शः चैतन्यं, स्वरसोदिता परावाक्,
स्वातन्त्र्यं, कर्तृत्वं 'स्फुरत्ता' स्पन्दः इत्यादि शब्दैरागमेशूद्घोष्यते ॥'—
इसे 'विमर्श' का भी वाचक कहा गया है ।
(२) 'स्पन्दनिर्णय'— क्षेमराज श्री भगवान् की 'स्वातन्त्र्यशक्ति' को ही इसलिए
'स्पन्द' कह रहे हैं क्योंकि यह स्वातन्त्र्य शक्ति—
'किञ्चिच्चलतात्मक' है— 'श्री भगवतः स्वातन्त्र्यशक्तिः किञ्चिच्चलतात्मक धात्वर्था-
नुगमात्स्पन्द इत्यभिहिता ।'
'स्पन्द' अचल एवं प्रशान्त परमेश्वर के भीतर शाश्वत एवं अभिन्न समरसभाव से
रहने वाली एक चंचलता जैसी कोई उमंग है । इसे परमेश्वर के प्रकाशरूप की विमर्श-
रूपता भी कहा गया है— 'स्पन्द' कोई 'क्षोभ' नहीं है । परमेश्वर की स्पन्दरूपात्मिका जो
उमंग है वह उसकी अपनी ही परमेश्वरता के विलास का बोध (प्रत्यवमर्श) है—
'तन्त्रालोक' में कहा गया है—
किञ्चिच्चलनमेतावदनन्य स्फुरणं हि यत् ।
ऊर्मिरिषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥
(३) तन्त्रालोक (विवेक) में कहा गया है कि—
किञ्चित् चलन ही स्पन्द है । अपनी ही परमेश्वरता के विलास का जो प्रत्यवमर्श
(बोध) है वह प्रत्यवमर्श (अहन्ता-परामर्श) ही उसका आनन्द भी है । परमशिव
स्वात्मानन्द में विभोर रहकर आनन्दातिशय से स्पन्दमान (छलकता हुआ) रहता है और
उसका आनन्दस्पन्दन ही 'विश्व' बन जाता है । विवेक में कहा गया है—
'किञ्चिच्चलनं हि नामैतदुच्यते । यदबोधस्यानन्यापेक्षं स्फुरणं प्रकाशनम् । परतो-
ऽस्य न प्रकाशः अपितु स्वप्रकाश एवेत्यर्थः ॥
'उन्मेषनिमेष'— अनुत्तर तत्त्व की सिसृक्षोन्मुख वह गतिमयता है जो कि अहं
प्रत्यवमर्श रूप संकल्प से आकारित है । शक्ति तो सदा गतिमय एवं स्पन्दात्मिका है
अतः उसका उदय या अस्तमन, संकोच या विकास कभी होता ही नहीं । क्रिया द्विमुखी
प्रथमः निष्यन्दः ४५
है—(१) अन्तरोन्मुखी (२) बाह्योन्मुखी। समस्त क्रिया संकल्पमूलक है। 'शङ्कर' अनु-
त्तर तत्त्व है शक्ति उसका सार या हृदय है—'सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥'१
'स्पन्दशक्ति' उछलनात्मक है—'स्वात्मन्युच्छलनात्मकः'२ स्पन्द एक साथ ही
स्वरूप का विकास एवं संकोच दोनों कर सकती है।
यहाँ 'उन्मेषनिमेष' संकल्पात्मक गतिमयता मात्र का बोधक है। यह संकल्पात्मक
गतिमयता ही शैव दर्शन में 'इच्छाशक्ति' है। 'इच्छा शक्ति' शिव (शङ्कर) का स्वभाव
है—नित्य धर्म है। संकल्प या इच्छाशक्ति को ही यहाँ 'उन्मेष-निमेष कहा गया है।
'उन्मेष' या 'निमेष' दोनों संकल्प मात्र के ही द्योतक हैं।
'उन्मेष' = यह वह अवस्था है जब कि पारमात्मिक संकल्प में विश्वोत्तीर्ण रूप
(विशुद्ध चिन्मात्र स्वरूप) में अवस्थान की ओर उन्मुखता होती है। इस अवस्था में—
विशुद्ध चिन्मयी रूप में रहने की ओर उन्मुखता होती है। इस समय समस्त 'इदं मम'
(या प्रमेय मात्र) अहं रूप (विशुद्ध चिन्मात्र प्रमाता) में लीन रहता है। यही है
पारमेश्वरानुग्रह या 'शक्तिपात' है।
'निमेष' उस अवस्था का द्योतक है जब कि परमात्मा के संकल्प में (स्वरूप को
अनन्त भेद संकलित वैचित्र्यों में प्रसारित करने हेतु सिसृक्षा की उन्मुखता होती है। इस
अवस्था में चिन्मात्र प्रमाता, अभिन्न प्रमेयता, माया शक्ति के कारण पृथक् विकास पा
लेती है यही है 'तिरोधान'।
पारमात्मिकी संकल्प इन्हीं दो रूपों में व्यक्त होता है। वे हैं—
(१) अन्तर्मुखस्पन्द एवं (२) बहिर्मुखस्पन्द।
'उन्मेषनिमेष शब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकं शङ्करसम्बंधिप्रति-
पाद्यते। स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः तस्य उन्मेषनिमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च
उपचारात् ॥'३
पारमेश्वर संकल्प—(१) 'अंतर्मुखस्पन्द' (२) 'बहिर्मुखस्पन्द'।
'स्पंदशक्ति' की यह उभयोन्मुख गति युगपद चलती रहती है शिव एवं शक्ति की
स्वतन्त्र इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया या स्वतन्त्र ज्ञातृत्व, स्वतन्त्र कर्तृत्व में (उन्मेष-निमेष दोनों
स्थितियों में) कोई अन्तर, परिवर्तन नहीं आता। जगत् का आविर्भाव (सृष्टि) एवं प्रलय
केवल जगत् का होता है न कि संवित् का। उन्मेषावस्था में स्वरूपातिरिक्त अन्य किसी
भी प्रकार के प्रमेयजाल का अस्तित्व नहीं रहता। यह जगत् की प्रलयावस्था है यह
स्वस्वरूप में लय की अवस्था है। निमेषावस्था में प्रमेयता का स्वरूप से पृथक्
अस्तित्व न होने के कारण जगत् का आविर्भाव होता है। दोनों रूपों में परिवर्तन,
परिणमन केवल जगत् का होता है। 'संवित्' का नहीं। संवित् सदा अक्षुण्ण रहती है।
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४) २. तन्त्रालोक।
३. स्पन्द वि०, पृ० ४।
४६ स्पन्दकारिका
परमात्मा की वास्तविक शक्ति एक ही है और उसका नाम है—'स्वातन्त्र्य
शक्ति'। स्वातन्त्र्यशक्ति शाश्वत रूप में स्पन्दशीला है अतः उसका अन्तर्मुखी विकास
(क्रिया) एवं बाह्यमुखी विकास (क्रिया) एक साथ चलता है । स्प० वि० (पृष्ठ ४) में
कहा गया है—
(१) 'उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकशङ्करसम्बन्धि प्रति-
पाद्यते ॥ ('उन्मेष निमेष' = 'शांकरी इच्छा') ॥
(२) 'स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः'
(३) तस्य उन्मेष-निमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात् ॥'
'शक्तिचक्रविभवप्रभवं'—शक्तिसमूह के ऐश्वर्यों को जन्म देने वाला ॥ इस
पदावली की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है—
(क) (तत्पुरुष समासगत व्याख्या) = 'शक्तिचक्रविभवस्य प्रभवम्' । (त०
समास) ॥
'शक्तिचक्र' = अनन्त शक्ति धाराओं की समष्टि । अनन्त प्रवहमान स्पन्द
धाराओं का समूह ।
'विभव' = अन्तर्मुखी एवं बहिर्मुखी शक्ति-प्रवाह ।
'प्रभव' = मूलोद्गम । अर्थात् शङ्कर ।
(ख) (बहुव्रीहिसमासगत व्याख्या)—(बहुव्रीहि समास)
'शक्तिचक्र' = प्राण, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि विशेष रूपों में प्रवाहित शक्तिपुञ्ज ।
'विभवात्' = यथार्थ अनुभूति प्राप्त करने के परिणामस्वरूप ।
'प्रभवः' = जिस शङ्कर की अभिव्यक्ति होती है ।
'माहेश्वरी', 'ब्राह्मणी', 'कौमारी', 'ऐन्द्री', 'याम्या', 'चामुण्डा', 'योगेशी'
'खेचरी', 'भूचरी', 'दिक्धरी', 'गोचरी' आदि शक्तियों का समूह ही 'शक्तिचक्र' है ।
'शक्ति' क्या है? 'शक्तनं शक्तिः'—'सामर्थ्यं विश्वनिर्माणादिकारि भैरवस्वरूप-
मेव' ॥१
अपनी ही शक्ति के यथार्थस्वरूप की अनुभूति व्यक्ति को जीव से शिव बना देता
है । शक्तिभूमिका पर आरोहण शिवभाव में प्रवेश का पर्याय है । 'शक्ति' शिवमुख है—
'शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्भागेन भावना ।
तदासौ शिवरूपी स्यात् शैवीमुखमिहोच्यते ॥'२
एकत्व एवं अनेकत्व में सामञ्जस्य कैसे संभव है?—परमात्मा शिव प्रत्येक
प्राणी के कलेवर में प्रवेश करके, ऐन्द्रिय शक्तियों के उन्मेष-निमेष द्वारा, पंचमहाविषयों
को ग्रहण करने या ग्रहण न करने के द्वारा, प्राणियों के अदृष्टानुसार निश्चित देश, काल
एवं रूप की परिधि में सृष्टि-संहार का निष्पादन करता है ।
१-२. विज्ञानभैरव ।
प्रथमः निष्यन्दः ४७
जो संविद्रूपा सामान्य स्पन्द है वह समस्त प्रमेयों की समष्टि रूप विश्व के पदार्थ
में प्रवहमान है । संसार अनेकत्व एवं शिव के एकत्व परस्पर विरोधी तत्त्व हैं फिर
अनेकत्व (विश्व) का एकत्व (शिव) के साथ सामञ्जस्य या अद्वैत अभेद कैसा?
(१) शिव का स्वभाव = एकत्व । = ‘प्रमाता’
(२) प्रमेय रूप जगत् का स्वभाव—अनेकत्व = ‘प्रमेय’
यह प्रमेयगत अनेकाकारता, अहं विमर्श की एकाकारता में अनादिकाल से अभि-
न्नतया अन्तर्निहित है । चूँकि विमर्शगत वस्तु का ही बाह्यावभासन संभव हो पाता है—
अतः अनेकाकारता का बाह्यावभासन तो हो जाता है किन्तु किसी नव्य वस्तु का प्रादुर्भाव
नहीं होता ॥
भासमान अनेकता में भी एकत्व रूप परमात्मा तो एक ही है—
‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ॥’१
वह आत्मा एवं महेश्वर विश्व को अनेकात्मक नहीं अपने अहं से अभिन्न मानकर
एक मानता है अतः अनेकता कहाँ है?—
‘विश्वरूपोऽहमदमित्यखण्डामर्शबृंहितः ॥’
(स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ॥)२
अनेकता तो स्वस्वरूप के अपरिज्ञान के कारण है—
‘स्वस्वरूपापरिज्ञानमयोनिकः पुमान्मतः ॥’३
प्रकाशविमर्शमय, उन्मेष-निमेषमयी स्पन्द शक्ति से समवेत शिव ही परम चैतन्य
है—चैतन्य का समुद्र है । चेतन वह है जो अपने को एवं पराये दोनों को जानता हो,
और विभिन्न संवेदनाओं से युक्त हो । ‘शङ्कर’ प्रकाशविमर्शमय होने के कारण अपने
स्वस्वरूप को और ‘विश्वोऽहं' 'विश्वरूपोऽहं' ‘इदमहं’ ‘अहमिदं’ के रूप में अपनी शक्ति
के स्फार को (अर्थात् विश्व को अपनी अभिव्यक्ति के रूप में) विश्वात्मक रूप में देखता
हो—वही शङ्कर है ।
(शिव का स्वस्वरूप = शक्ति का प्रसार = विश्व ।)
‘चैतन्य’, ‘आत्मा’ और ‘शङ्कर’—शिव अपनी शक्ति विराट् प्रसार रूप विश्व
को अहं के रूप में विमर्शित करता है । यह विश्व का अहमात्मक विमर्शन—विश्व की
अहं-रूप में अनुभूति—(विमर्श की क्रिया) शिव की स्वातन्त्र्य शक्ति ही है । शिव की
यह ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’ ही ‘चैतन्य’, ‘विमर्श’, ‘हृदय’, ‘संवित्’ ‘ऊर्मि’, ‘चितिशक्ति’
आदि कहलाती है ।
यह स्वतन्त्र चैतन्य सत्ता ही विश्व की आत्मा है, विश्व का हृदय है, अस्तित्वों का
प्राण है । शङ्कर का स्वभाव यह है कि वह स्वतन्त्र ज्ञाता एवं स्वतन्त्र कर्ता है ।
स्वातन्त्र्य ही उसकी मुख्य शक्ति है । जो चेतन है वह आत्मा है, जो आत्मा है वह चेतन
१-३. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेव ।
४८ स्पन्दकारिका
है—यह कथन अनुपयुक्त है। उपयुक्त कथन यह है कि—'चैतन्य ही आत्मा है।'
चेतन-अचेतन—घट को स्वविषयक एवं परविषयक चेतना नहीं है—न वह
अपने को जानता है और न तो दूसरों को। इसीलिए वह अचेतन कहा जाता है—
'घटेन स्वात्मनि न चमत्क्रियते, स्वात्मा न परामृश्यते, न स्वात्मनि तेन प्रकाश्यते,
न अपरिच्छिन्नतया भास्यते ततो न चेत्यत् इत्युच्यते ॥'१ चैत्र (नामक चेतन व्यक्ति)
चेतन होने के कारण चैतन्य-विभूति से समवेत होने के कारण 'अहं' रूप वाली चेतना
द्वारा स्वात्मरूप में एवं अपने से पृथक् नील, पीत, सुख, दुःख (या इनके अभावात्मक
शून्य) को भी अवभासित (अनुभूत) करने में स्वतन्त्र है अतः चेतने वाला होने के
कारण 'चेतन' रूप में अभिहित किया जाता है—
'चैत्रेण तु स्वात्मनि अहमिति संरम्भोद्योगोल्लासविभूतियोगात् चमत्क्रियते... नील-
पीतसुखदुःखतच्छून्यताद्यसंख्यावभासयोगेन अवभास्यते, ततः चैत्रेण चेत्यत इत्युच्यते ॥'२
'चैतन्य', शक्ति के प्रसाररूपात्मक विश्व का अहमात्मक विमर्शन है—'चितिः
प्रत्यवमर्शात्मा'३ चैतन्य की विशेषता यह है कि उसमें स्वप्रकाशयता होती है किन्तु जड़
पदार्थों में नहीं—
'चैतन्यमजडा सैवं, जाड्ये नार्थप्रकाशता ॥'४ 'अथापि जडमेतस्य कथमर्थ प्रका-
शता।'५ आत्मा चैतन्य प्रधान होने के कारण ही 'चिदात्मा' कहलाती है—'चिदात्मैव हि
देवोऽन्तः'६ । उत्पलदेवाचार्य कहते हैं—'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा, परावाक् स्वरसोदिता ।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥' (प्र० कारिका १।४४) 'स्वातन्त्र्य' ही इसका
(आत्मा का = चैतन्य का) मुख्य लक्षण है—'स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यम्' (ई० प्र० १.५.१३)
आत्मा का चैतन्य-प्राधान्य ही स्पन्द में आत्मा का विशेष लक्षण है।
आत्मा का चैतन्य प्राधान्य—
आत्मात् एव चैतन्यं, चित्क्रियाचितिकर्तृता ।
तात्पर्येणोदितस्तेन, जडात्सहि विलक्षणः ॥ (प्र०का०)
एकात्मिका शक्ति एवं शक्तित्रय—परमात्मा से अभिन्न उसकी जो 'स्वातन्त्र्य
शक्ति है वह जब विश्व के रूप में प्रकट होने की ओर उन्मुख होती है तो वह सर्वप्रथम
जिस शक्ति का रूप धारण करती है उसका नाम है 'इच्छाशक्ति'। यही इच्छा शक्ति
अपने विकास के अग्रिम चरणों में 'ज्ञानशक्ति' एवं 'क्रियाशक्ति' के रूप में प्रकट होती
है। ज्ञान एवं क्रिया का युग्म विभूति सागर है क्योंकि प्रमेयों की आवश्यकता के
अनुसार उनमें अनन्त शक्ति-प्रवाहों के अनन्त निर्झर फूट पड़ते हैं और शिवतत्त्व से
पृथ्वी तत्त्व तक समस्त विश्व-वैचित्य आकार ग्रहण कर लेता है । (१) 'ज्ञानशक्ति'—
(१) वर्ण (२) पद (३) मन्त्र के रूपों में एवं (२) 'क्रियाशक्ति'—(१) कला (२) तत्त्व
एवं (३) भुवन के रूपों में—प्रसृत होकर विश्वाकारित हो उठती है । इस प्रकार समस्त
१-३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१३) । ४-६. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेव ।
प्रथमः निष्यन्दः ४९
वाचक विश्व (वर्ण, पद, मन्त्र) एवं वाच्य विश्व (कला, तत्त्व, भुवन) विश्वाकार में प्रसृत
हो जाता है ।
(१) या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।
इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥१
(२) एवं सैषा द्विरूपापि पुनर्भेदैरनेकताम् ।
अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ॥२
(३) तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते ।
द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ।
वर्गाष्टकमिह ज्ञेयमघोरायमनुक्रमात् ॥३
'स्पन्द' और उसकी अनन्तता— 'स्पन्द' उच्छलनात्मक है, पूर्ण अहं विमर्श-
स्वरूप है; (एकोऽहं बहुस्याम' की इच्छा को रूपायित करने वाली मौलिक स्फुरण रूप
अहं विमर्श है)—शाश्वत स्फुरणशील है, शक्तिप्रसारोन्मुख संकल्प है, विश्वात्मक प्रसरण
की इच्छा है, सिसृक्षा के प्रति क्रियात्मक संकल्प है या अहं प्रत्यवमर्श है जो कि—
'उन्मेष-निमेष' के मार्ग पर यात्रा करता है और किंचिच्चलनात्मक है ।
'यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया जगदिदं स्रष्टुम् ।
पस्पन्दे स स्पन्दः ..........(ष०त०सं०१) ॥ (क्षेमराजाचार्य)
यही 'स्पन्द' 'सार' है, एवं परमेष्ठी का 'हृदय' है—'सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं
परमेष्ठिनः ॥' (ई०प्र० १.५.१४) यह 'किंचिच्चलन'—अर्थात् स्वतन्त्र रूप में स्फुरित
होने की क्षमता—से युक्त है । जो चिद्रूप है वह स्फुरणशील है अतः संवित् तत्त्व बिना
स्फुरणा के रह ही नहीं सकता क्योंकि अन्यथा वह चिद्रूप रह ही नहीं सकता ।
'शङ्कर' नामक अनुत्तर तत्त्व की सारभूता शक्ति, या उसका हृदय ही विमर्शरूपा
पराशक्ति 'स्पन्दशक्ति' है । इस स्पन्द शक्ति में (अनन्त शक्तिमयता होने के कारण)
विश्वमयता एवं विश्वोत्तीर्णता दोनों निहित है ।
(१) विशुद्ध ज्ञान स्वरूप प्रकाशमयता एव = 'विश्वातीत' ।
(२) क्रिया प्रधानविमर्शरूपता = 'विश्वमय'—दोनों उसके स्वरूप है । 'अभेद'
अहं ही 'भेदात्मक' विश्व बन जाता है ।
प्रकाशपक्ष एवं विमर्श पक्ष में से क्रियाप्रधान विमर्श पक्ष ही 'सामान्यस्पन्द' है—
'हृदये स्वविमर्शोऽसौ द्राविताशेषविश्वकः ।
भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ॥
स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे ...... (तं० ४.१८२-८३)
इस क्रिया प्रधान विमर्श पक्ष ('सामान्य स्पन्द') के द्वारा अन्तर्मुखी समस्त
अवभासों में एक स्पन्द शक्ति ही उद्भासित होती है?—
१. मालिनीविजय (३.५)। २. मालिनीविजय (३.८) ।
३. मालिनीविजय (३.२९) ।
स्पं० ४
५० स्पन्दकारिका
अतएव स्थिता संविदन्तर्बाह्योभयात्मना।
स्वयं निर्भास्य तत्रान्य आस्यन्तीव भासते ॥ (तं०४।१४४)
'शक्ति' ही जगत् है—'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥
(१) 'पशुपति भूमिका' (सामान्यभूमिका) में वह शक्ति 'चित्' 'आनन्द' 'इच्छा'
'ज्ञान' एवं 'क्रिया' के रूप में स्थित है।
(२) पशुभूमिका (विशेष भूमिका)—(जीवभाव में) वही एकात्मिका शक्ति प्राण,
अन्तःकरण, बाह्य इन्द्रियाँ आदि अनन्त प्रमेय के रूप में स्थित हैं।
(३) उसकी आनन्दशक्ति = 'स्वातन्त्र्य' है। ┐
(४) आनन्द का चमत्कार = इच्छाशक्ति है। │
(५) प्रकाशरूपता ही = चित् शक्ति है। │
(६) विमर्शमयता ही = ज्ञानशक्ति है। ┘
(७) प्रत्येक आकार को अवभासित करने की सामर्थ्य = क्रियाशक्ति है।
तस्य च (१) स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्तिः (२) तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः (३) प्रकाश-
रूपता चिच्छक्तिः (४) आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः (५) सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ॥'
(तं०सा० ६५)।
अविरत रूप में प्रवहमान स्वातन्त्र्यशक्ति या 'स्पन्द' के अन्तर्मुख एवं बहिर्मुख
दोनों प्रसार एक साथ प्रवृत्त रहते हैं।
शिव की शक्तियाँ—'स्वातन्त्र्यशक्ति' परमात्मा से अभिन्न है और वह विश्व के
रूप में प्रसृत होने के लिए उन्मुख है। यह शक्ति विश्वोन्मुखता की स्थिति में सर्वप्रथम
'इच्छा' के रूप में प्रकट होती है—'इच्छाशक्ति' का रूप धारण करती है। यही इच्छा
शक्ति उत्तरोत्तर अपना प्रसार करती हुई 'ज्ञानशक्ति' एवं 'क्रियाशक्ति' का रूप धारण
करती है। 'शक्तिचक्र'—
[चित्र: शक्तिचक्र — (परमशिव [स्वातन्त्र्य शक्ति]) — (इच्छा शक्ति) — (ज्ञान शक्ति → वर्ण, पद, मन्त्र) — (क्रिया शक्ति → कला, तत्त्व, भुवन)]
(१) या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी।
इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षो प्रतिपद्यते ॥१
(२) एवं सैषा द्विरूपापि पुनर्भेदैरनेकताम्।
अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ॥२ (शक्तिधाराओं का विस्फोट)
१. मालिनीविजय (३.५)। २. मालिनीविजय (३.८)।
प्रथमः निष्यन्दः ५१
शक्ति से अभिन्न एवं
शक्ति के कुक्षि में
स्थित विश्व
शिव
शक्ति
(शक्तिधाराओं का विस्फोट)
पारमेश्वरी शक्ति
की सिसृक्षा
अन्तर्गर्भित
विश्व (अव्यक्त
जगत्)
मातृका (शब्दराशि) की
अधिष्ठात्री शक्तियाँ
विश्व का बाह्यावभासन
(अष्टवर्ग की अधिष्ठात्री शक्तियाँ)
(व्यक्त जगत्)
माहेश्वरी ब्राह्मणी कौमारी वैष्णवी ऐन्द्री याम्या चामुण्डा योगिशी
(अन्तःकरण एवं बहिष्करणों से सम्बद्ध शक्तियाँ)
खेचरी, भूचरी, दिक्धरी, गोचरी,
प्राण, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ पञ्चतन्मात्रायें महाभूत विश्व
(ब्रह्मा से लेकर पृथ्वी एवं पृथ्वी के पदार्थों से लेकर तृणपर्यन्त समस्त प्रमेय समूह)
शिव की शक्तियाँ
चित् आनन्द इच्छा ज्ञान क्रिया
शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति
क्रिया प्रधान जो 'विमर्श' 'सामान्य स्पन्द' है उसके द्वारा अंतर्मुखी 'अहं' में—
'इदं' के रूप में अवभासित विश्व की अंतर्मुख अहंवरूपता में—अभिन्नतयावस्थित, विश्व
कल्पना का बहिर्मुख 'इदं', रूप में अवभासन—विश्रान्ति की अवस्था में पड़ा रहता है।
'विमर्श' में जिस भाव (सत्ता) का प्रकाश हो उसी का बाह्यावभासनबहिर्मुखी
प्रकाशन—संभव है अन्य का नहीं। विमर्शात्मक स्पन्दशक्ति की 'स्वातन्त्र्यशक्ति'
५२ स्पन्दकारिका
अवभासित पदार्थ का अपने में लय भी कर सकती है और अपने एकत्व को अनेकत्व
में अवभासित भी कर सकती है। दोनों को धारण भी कर सकती है और दोनों से पृथक्
भी रह सकती है। ‘स्पन्दशक्ति’ रूपिणी विमर्शात्मक स्फुरण। के बिना ‘प्रकाश’
की कल्पना व्यर्थ है। विमर्शहीन प्रकाश बिम्ब को ग्रहण करने की क्षमता रखने पर भी
जड़ है। ‘विमर्श’ क्या है—इसका स्वभाव क्या है। ‘विमर्शो हि सर्वसहः परमपि
आत्मीकरोति' आत्मानं परोकरोति उभयं एकीकरोति, एकीकृतं द्वयमपि न्याभावयति
इत्येवं स्वभावः ॥’१
विमर्शात्मक स्फुरण से रहित ‘प्रकाश’ (शिव) की कल्पना व्यर्थ है क्योंकि
विमर्शशून्य प्रकाश जड़ होता है—
‘स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा।
प्रकाशोऽर्थो परक्तोऽपि स्फटिकादि जडोपमः ॥२
‘स्पन्द’ के ‘किंचिच्चलन’ का अर्थ—‘किंचिच्चलन’ ही स्पन्द का स्वभाव
बताया गया है किन्तु यह किंचिच्चलन है क्या? स्वतन्त्र रूप में स्फुरित होने की
सामर्थ्य ही किंचिच्चलन का स्वभाव है। निरपेक्ष स्वातन्त्र्य ही स्पन्द की विशेषता है।
‘किंचिच्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत्।
उमिरिषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥’ (तं० ४.१८४)
संवित् समस्त कालों में प्रमेय एवं प्रमाता दोनों रूपों में सतत स्फुरण युक्त है।
स्पन्द या स्फुरण संवित् पयोधि की तरंग है। स्पन्द एवं संवित् एक ही अभिन्न ज्ञान-
क्रियामयी सत्ता है। यही है संवित् तत्व का संवित्, जो कि विमर्शमय एवं सतत्
स्पन्दमय है, इसी कारण संवित् प्रत्येक पदार्थ का (विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय भावों में)
स्वतन्त्र ‘अहं’ रूप में विमर्श कर सकता है। रत्नाकर की विशेषता यही है कि वह कभी
तरंगों से तरंगित है एवं कभी अतरंगित है : ‘निस्तरंगतरंगादिवृत्तिरेव ही सिन्धुता ॥’३
संवित् का संवित्त्व यही है कि वह विश्व का अहंवरूप में विमर्श करे ‘इदमेवं
संविदः संवित्त्वं यत्—‘सर्वम् आमृशतीति’ (लं० वि०४।२१४)।
आनन्दात्मक स्वातन्त्र्य शक्ति की चमत्क्रिया यही है कि—संविद्रूप विश्वात्मा अपनी
स्पन्दात्मिका स्वतन्त्रता की सामर्थ्य द्वारा अपना स्वरूपाच्छादन करके अक्रम में क्रम एवं
क्रम में अक्रम का अवभासन नामक क्रीड़ा करता है। ‘स्पन्दशक्ति’ प्रत्येक क्रिया के
निष्पादन में स्वतन्त्र है—
(१) ‘सत्ता च भवनकर्तृत्ता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् ॥’४
(२) एष प्रकाशरूप आत्मा स्वच्छन्दो ढौकयति निजरूपम्।
पुनः प्रकटयति झटिति अथ क्रमवशादेष परमार्थेन शिव रसम् ।५
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१३)। २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.११)।
३. तं० ४.१८४। ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)।
५. तं०सा० पृ० ७।
प्रथमः निष्यन्दः ५३
यह शक्ति ही स्फुरत्ता एवं महासत्ता है—'सा स्फुरत्ता महासत्ता' १ यह समस्त
सत्ताओं को सत्ता प्रदान करती है। यह आकाश कुसुम को भी व्याप्त करती है 'सा च
खपुष्पादिकमपि व्याप्नोति।' २ यही देशकाल और आकार को रूप प्रदान करती है।
प्रमाता, प्रमेय प्रमाण, प्रमा सभी कल्पनायें मात्र हैं। यह प्रत्येक-प्रत्येक पदार्थ में अपने
को अवभासित करती है और उनसे पृथक् रूप में भी सत्तासीन है।
'स्पन्द' अनन्त रूपात्मिका है। यह अद्वैत, एकात्म, अभेद एवं एक स्पन्दशक्ति
प्रसार की भूमिका पर अनन्त रूप धारण करती है विश्व के प्रत्येक पदार्थ शक्ति के ही
रूप हैं।
चैतन्य या आत्मा विश्व की आत्मा है। चैतन्य ही आत्मा है। जिस प्रकार राहु का
सिर कहना मात्र एक औपचारिकता है वस्तुत राहु एवं सिर दोनों एक ही वस्तु हैं उसी
प्रकार चैतन्य एवं आत्मा दोनों अभिन्नतया एक ही है—
'चैतन्यं चितिः, चेतन आत्मा इति राहोः शिर इतिवत् काल्पनिकम्, वस्तुत
एकमेव सर्वम् । चितिक्रिया प्रकाशविमर्शः तस्य भावः चैतन्यम् स्वातन्त्र्यम् ॥' ३
शिव की एक निजी अभिन्न शक्ति है उसी का नाम है—'स्वातन्त्र्य शक्ति'।
शिव एवं शक्ति की अभिन्नता—चैतन्यरूप शक्ति चिद्घन शिव की चिति शक्ति
है और शिव से अभिन्न है। दोनों परस्पर उसी प्रकार अभिन्न हैं यथा वह्नि एवं उसकी
दाहकता— 'न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिः शिववर्जिता ।
उभयोरस्ति तादात्म्यं वह्निदाहकयोरिव ॥'
शिव भी एक है और उसकी महाशक्ति भी एक ही है किन्तु यह शक्ति अनन्त
रूपों में विभक्त होकर नाना वैचित्र्यमय एवं अनन्तरूपात्मक विश्व बन जाती है—
शिवस्यैका महाशक्तिः शिवश्चैको ह्यनादिमान् ।
सा शक्तिर्भिद्यते देवि! भेदैरानन्त्यसंभवैः ॥' ४
'चैतन्य', 'विमर्श' एवं 'स्पन्द'—विश्व की शाश्वत, अखण्ड एवं सर्वव्यापी मूल
चेतना (चैतन्य) तो आत्मा है—'चैतन्यमात्मा' ५ किन्तु शक्ति एवं शक्तिमान अभिन्न होने
के कारण चैतन्य की यह महासत्ता शिव भी है और जीव भी। 'विमर्श' प्रकाश (शिव)
की अहमात्मक विमर्शन वाली शक्ति है जो कि 'अहमिदं' 'इदमहं' का विमर्शन करता
है। पति भूमिका में सगुण शिव का विमर्शन विश्व के संबन्ध में यही होता है कि—
'अहमिदं' (मैं ही विश्व हूँ) बाद का विमर्श होता है 'इदमहं' ॥
'स्पन्द' शक्ति—स्पन्द का स्वरूप है—पूर्णतम अहंविमर्श, 'पूर्णतम' इसलिए
कि अहमाकार अनुभूति तो प्रत्येक जीव की होती है किन्तु यह अनुभूति भेदोन्मुख,
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)। २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)।
३. शिवसूत्रविमर्शिनी (१.१.२१)। ४. स्व०तं० (११.२७१)।
५. शिवसूत्र ।
५४ स्पन्दकारिका
द्वैतपरक एवं भेदजन्य है किन्तु स्पन्द एवं 'स्वप्रतिष्ठ, स्पन्दवान्' (शिव) का अहंविमर्श
समष्टि-परक ('विश्वरूपोऽहं' 'अहमिदं') होता है। स्पन्द शक्ति की अभिज्ञा, प्रत्यभिज्ञा
एवं पहचान है—पूर्णतम अहं विमर्श—विश्वाकार अहं की अनुभूति। अहं विमर्श (मूल
स्फुरण)—एक शक्ति का अनन्त रूपों में स्फुरण = 'शक्ति' का विश्व के अनन्त रूपों में
अवभासन। अखण्ड रूप में स्फुरणशील होने के कारण इस शांभवी शक्ति को 'स्पन्द'
कहते हैं।
'स्पन्द' का स्वरूप लक्षण—(१) 'स्पदि' (किंचित् चलन = स्वल्प = स्फुरण
= थोड़ी सी गति, = कम्पन, हिलना,) धातु से निष्पन्न 'स्पन्द' शब्द शिव की
सिसृक्षोन्मुख (अहं विमर्शात्मक) सूक्ष्म अहंविमर्शात्मक स्फुरण है—
चिद्घन का विश्वात्मक शक्ति-प्रसारण है—सृष्ट्योन्मुख संकल्पोन्मुखता है—चिद्रूप
शिव की विश्वात्मक अभिव्यक्ति का स्फुरण है—भगवन् की बाह्य विश्व के रूप में स्वतन्त्र
शक्ति के आत्मप्रसार की ओर संकल्पात्मक औन्मुख्य है।
इसी संकल्पात्मक औन्मुख्य को कारिकाकार ने। 'उन्मेष निमेष' कहा है। 'उन्मेष
निमेष' आँखों का उन्मीलननिमीलन नहीं है [सृष्टि प्राक् अवस्था]
और स्पन्द का वात्याचक्र द्वारा वृक्षादि का (परमशिव)
हिलाये जाने की भाँति भी नहीं है—प्रत्युत् यह
वह गतिशीलता है जो अहंप्रत्यवमर्श-स्वरूप [सृष्टि प्राक् अवस्था]
है—अनुत्तर तत्त्व की वह संकल्पात्मक शिव का विमर्श → (अहमस्मि)
गतिमयता है।
स्वातन्त्र्य → शिव से पृथ्वीपर्यन्त ३६
तत्त्व 'स्वातन्त्र्यशक्ति' → सृष्टि → अहमस्मि
→ अहमिदम् → इदमहम् → अहं च इदञ्च सदाशिव का विमर्श → (अहमिदम्)
पृथक्-पृथक् (विज्ञानाकल, प्रलयाकल सकल
आदि प्रमाताओं की सृष्टि) समस्त विमर्शों का
आदि स्रोत एवं जगदाभास का कारण स्वातन्त्र्य
शक्ति है और 'स्वातन्त्र्यवाद' ही स्पन्द एवं ईश्वर का विमर्श → (इदमहम्)
प्रत्यभिज्ञा दोनों का मुख्य सिद्धान्त हैं—
उत्पलदेवाचार्य 'अजडप्रमातृसिद्धि' की वृत्ति में
कहते हैं—
'संवित्प्रकाश एव स्वात्मोच्छलत्तया स्व-
मायाशक्त्युल्लासिते विश्ववैचित्र्ये जडाजडभाव-
राशिद्वयेन वेद्यवेदकात्मकेन स्वरूपानतिरिक्ते-
नातिरिक्तमेव प्रस्फुरेत् इति स्वातन्त्र्यवादस्य
प्रोन्मीलितं सूचितवान् आचार्यः॥
(श्लोक १३)
प्रथमः निष्यन्दः ५५
स्पन्द तत्त्व का स्वरूप
यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् ।
तस्यानावृतरूपत्वान्न निरोधोऽस्ति कुत्रचित् ॥ २ ॥
जिस स्पन्द तत्त्व में यह सम्पूर्ण कार्य जगत् (ज्ञानरूप से शक्त्यात्मक होकर)
अवस्थित है, उसके (निमेष दशा में भी ज्ञानरूप होने के फलस्वरूप) अनाच्छादित रहने
के कारण, (उसका कभी, किसी भी प्रकार) कहीं भी निरोध नहीं है ॥ २ ॥
"To him in whom this whole objective would take, the stand
and from whom it comes out, an obstruction is nowhere possible
because of his unenshrouded nature."
- सरोजिनी *
प्रश्न यह है कि जिस शक्ति-चक्र-विभव-प्रभव शङ्कर के उन्मेष से जगत् का उदय
एवं निमेष से जगत् का प्रलय हो जाता है उस शङ्कर स्वरूप विराट् एवं सर्वशक्तिमान
आत्म संवित् का वैभव सांसारिक अवस्था में आच्छादित क्यों हो जाता है? 'ननु
संसारावस्थायां कथं तस्करताऽऽत्मनि?'१
इसी शंका का निवारण करने के लिए कारिकाकार ने द्वितीय कारिका कही है:
'इत्याशंकोत्यदुर्दोषपरिहाराय तूच्यते ॥'२
'यत्र' = जहाँ । जिस स्पन्दतत्त्व में ।३
जिस चिद्रूप स्वात्मा में ।४ 'स्थितं' = अवस्थित ।
'इदं सर्वं' = मातृमेयमानात्मक समस्त इस (जगत्) को ॥५ इस समस्त जगत्
को ।६ 'कार्यं'—(कारण रूप परमात्मा से समुत्पन्न) कार्यरूप जगत् को ॥ 'स्थितं' =
निमेषावस्था में ज्ञान रूप से एवं शक्त्यात्मक स्वरूप में अवस्थित ॥७
'यस्माच्चनिर्गतम्' = जिसके अन्तर्गर्भ से यह समस्त अंतर्लीन विश्व प्रकट होता
है । निर्गतम् = अन्दर से बाहर निकलता है । (उद्भूत होता है ।) 'अनावृत' =
अनाच्छादित (Unconcealed, unveiled) अनावृत क्यों हैं? क्योंकि शिव आनन्दघन
एवं प्रकाशस्वरूप है इसीलिए उनका नाम ही है 'प्रकाश' ।
'तस्य' = उन प्रकाशघन, आनन्दकन्द, महाप्रकाश का (जिसके प्रकाश से समस्त
विश्व प्रकाशित होता है और स्थिति-लाभ करता है—'यत्प्रकाशेन प्रकाशमानं सत्स्थितिं
लभते'८—वही है महाप्रकाशस्वरूप शिव ।) 'अनावृतरूपत्वात्' = (उसका) स्वरूप अना-
च्छादित होने के कारण । बोधरूप होने से अनाच्छादित स्वस्वरूप होने के फलस्वरूप ।
'न निरोधोऽस्ति' = निरोध (Obstruction) व्यवधान, विघ्नव्युत्सर्ग' (निः-
शेषेण रोधः निरोधः = अवरोधः) ॥
१-३. स्पन्दप्रदीपिका—उत्पलाचार्य । ४-५. स्पन्दनिर्णय ।
६-७. स्पन्दप्रदीपिका । ८. स्पन्दनिर्णय ।
५६ स्पन्दकारिका
बात यह है कि बोध की स्वयं की स्वतन्त्र सत्ता तो होती नहीं । अवबोधस्वरूप
आत्मा दोनों अवस्थाओं में अनावृत है । प्राचीन आचार्य का वचन है—'स्वर्णाभूषणों में
विचित्रता स्वर्ण से पृथक् नहीं हुआ करती । नित्यस्वरूप की विश्वरूपता भी ऐसी ही है ।
आभूषण-रहित स्वर्ण पिण्डात्मक है । वेद्यरहित आत्मा चिदात्मक है ॥—
'यथा हेम्नो रूपकेषु वैचित्र्यं स्वान्न रिच्यते ।
अथ नित्यस्वरूपस्य तथा ते विश्वरूपता ॥
यथा गलितरूपस्य हेम्नः पिण्डात्मना स्थितिः ।
तथा गलितवेद्यस्य तव शुद्धचिदात्मता ॥'
'ज्ञान सम्बोध' नामक ग्रन्थ में कहा गया है— १ कि—विश्व का आश्रय आकाश
है, आकाश का आश्रय विश्व नहीं है । ज्ञान आकाश के समान अनन्त है और 'ज्ञेय'
विश्व के समान अल्प है—यह किंचित् न्यूनसत्ताक है । यथा आकाश में किसी के द्वारा
परिच्छेद या प्रतिबन्ध नहीं है क्योंकि वह व्यापक है उसी प्रकार यह ज्ञानस्वरूप भी
प्रतिबन्ध-शून्य है— विश्वस्याश्रय आकाशं न विश्वं नभसो भवेत् ।
ज्ञानं नभ इवानन्तं ज्ञेयं विश्ववदल्पकम् ॥
आकाशस्येव वाऽन्येन प्रतिबन्धो न केनचित् ।
व्यापित्वात् तद्वदस्यापि ज्ञानस्याऽप्रतिबन्धता ॥२
'यस्माच्च निर्गतम्' = जिसके भीतर से बाहर निकला है । यदि प्रथम कला
(पूर्णा-हन्ता) में उसके सामरस्य में विश्व अवस्थित न होता तो किस प्रकार अविद्यमान
जगत् की सृष्टि हो पाती ? अतः सृष्टिप्राक् स्वरूपाभिन्न विश्व की सत्ता अभ्युपेया है—
'यदा प्रथमायाः शिवात्मनः सामरस्यभूमेः पूर्णाहन्तात्मसामरस्यावस्थितं विश्वं यदि न भवति
अविद्यमानं कथं सृजेत् ?'३ जिस प्रकार न्यग्रोध के बीज में विशाल न्यग्रोध वृक्ष
शक्त्यात्मना अवस्थित रहता है किन्तु बाहर से उसमें अवस्थित नहीं दिखाई देता ठीक
उसी प्रकार शक्ति के गर्भ में यह विश्व बीजात्मना स्थित रहता है भले ही प्रलयकाल में
वह कहीं भी बाहर स्थित दिखाई न दे—
'यथा न्यग्रोधबीजस्य शक्तिरूपो महाद्रुमः ।
तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥४
यह निःशेष षट्त्रिंशादात्मक जगत् मुकुरनगरवत् शक्ति की स्वात्मभित्ति में स्वात्म-
स्वरूपवत् अवस्थित है—
सर्वं स्वात्मस्वरूपं मुकुरनगरवत्स्वस्वरूपात्स्वतन्त्र
स्वच्छस्वात्मस्वभित्तौ फलयति धरणीतः शिवान्तं सदा या ।
दृग्देवी मन्त्रवीर्यं सतत समुदिता शब्दराश्यात्मपूर्णा,
हन्तानन्तस्फुरत्ता जयति जगति सा शांकरी स्पन्दशक्ति ॥५
१. ज्ञान सम्बोध । २. स्पन्दप्रदीपिका में उद्धृत ।
३. स्पन्दसन्दोह । ४. प० त्री० २४ ।
५. आचार्य क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय ।
प्रथमः निष्यन्दः ५७
इसीलिए कहा गया है कि यह समस्त जगत् मात्र विश्वगर्भा एवं जगज्जननी
'शक्ति' है— 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ।।' चिदात्मा देव ही अन्तःस्थित
एवं बहिःस्थित है—
चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः ।
योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।।१.
महाचिति अपने ऐश्वर्य से स्वरूपात्मक आत्मभित्ति में विश्वाकार को प्रतिबिम्बित
करती है—
अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह,
यद्वद्विचित्ररचना मुकुरान्तराले ।
बोधः पुनर्निजविमर्शनसारवृत्त्या,
विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा तु ।।
'तस्य'—इस वक्ष्यमाण तत्त्व का² 'न क्वचित्' = किसी भी देश, काल,
आकार या अवस्था विशेष में ।³ 'निरोधः' = अवच्छेद । इदन्ता-इयत्ता व्यपदेश हेतु
वेद्यवस्तुधर्म ।।
'अस्ति' = विद्यमान है । किस कारण से? 'अनावृतरूपत्वात्' = जात्याद्यभि-
मानरूप मल द्वारा 'अनावृत' अनाच्छादित रूप होने के कारण ।⁴ उसके अनावृतत्त्वो-
पपत्ति प्रतिपादन के लिए निम्न विशेषणों को प्रस्तुत करते हुए कारिकाकार कहते हैं— 'यत्र
स्थितमिदं सर्वं कार्यं, यस्माच्च निर्गतम् ।'⁵ 'इदम्' = वेद्यतयावस्थित । 'सर्वम्' = 'यत्र
यत्र दर्शने यथा-यथा परिकल्पितं'—ऐसे समस्त परिकल्पित कर्तृधीन कार्य ।⁶ 'यत्र' =
जिसमें । वेदकत्व एवं कर्तृत्व के रूप में अवस्थित आधेय समस्त पदार्थ सार्थ सामान्या-
धारभूत एक तत्त्व में । 'स्थितं' = उन-उन पृथिव्यादिघटपटगवादि रूप से लब्धप्रतिष्ठ ।
जिसके भीतर समस्त वस्तुओं का प्रकाशमान होने के कारण स्वरूपसत्तासादन ।⁷
सूर्यादि प्रकाशान्तर्गत जो घट परादिद्रव्य स्थित हैं वे अपने उन-उन रूपों में
प्रकाशमान होने के कारण ही अपनी सत्ता में आसीन हैं । इसी प्रकार समस्त 'कार्य' भी
स्थित है ।⁸ 'यस्माच्च' = प्रधानाविकारणान्तर परिहार के⁹ कारण; एककर्तृभूत एक
कारण से ।। 'निर्गतम्' = उद्भूत ।।१०
शङ्कर के यथार्थ स्वरूप के लिए कोई भी व्यवधान नहीं है—अर्थात् किसी भी
देशकाल या आकार में उसके लिए कोई निरोध नहीं है—प्रसर-व्याघात नहीं है क्योंकि
वह अनावृतरूप है और अस्थगितस्वभाव है ।११
चेतना के प्रकाश के निरोधक कौन हैं? इसके निरोधक निम्न हैं—(१) प्राण,
(२) पुर्यष्टक, (३) सुख, नीलादिक । जो कुछ भी प्रकाशित है—वह प्रकाशाभिन्न शङ्कर
के स्वरूप का है ।१२ आचार्य क्षेमराज शंका उपस्थित करते हैं कि यदि 'उत्पन्नस्य
१. ई०प्र० (१।५।७) । २. अभिनवगुप्तपादाचार्य : (तं०सा०) ।
३-१०. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति । ११-१२. स्पन्दनिर्णय ।
५८ स्पन्दकारिका
स्थित्या आत्मा प्रकाशो भवति'—यह प्रमाणसिद्ध है तो इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई ?
इसी के उत्तरस्वरूप क्षेमराज कहते हैं कि 'यस्माच्च'—पदावली इसी का उत्तर है ।
योगियों की स्मृति, स्वप्न, विचारणा-शक्ति (Ideation) रहस्यात्मक सृष्टि की
शक्ति को ध्यान में रखते हुए संसार एवं चेतना में आकस्मिक सम्बन्ध का प्रत्याख्यान
अनुचित है क्योंकि यह सम्बन्ध तो स्वात्मानुभूतिजन्य है । शिव या शक्ति को छोड़कर
संसार, पदार्थ या परमाणु आदि को सृष्टि-विधायक मानना अनुचित है 'चितः स्वानुभव-
सिद्धं जगत्कारणत्वं उज्झित्वा अप्रमाणकं अनुपपन्नं च प्रधान परमाणुवादीनां (कारणत्वं) न
तत्कल्पयितुं युज्यते ॥' १ अतः (१) जगत् कर्तृत्व आत्मा का कार्य है । (२) जगत्कर्तृत्व
परमाणु एवं प्रधान का कार्य नहीं है 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में कहा गया है—'अवस्था युगलं २
चात्र कार्यकार्तृत्वशब्दितम् ॥' (१।१।४)
'सर्व' = 'सर्व' शब्द यहाँ पर उपादानादि निरपेक्ष्य समन्वित कर्तृत्व को संकेतित
करता है । ३
क्षेमराज प्रश्न उठाते हैं कि 'निर्गत' शब्द की सार्थकता क्या है? इसकी सार्थकता
तभी सिद्ध होगी जब कि सृष्टि के पूर्व जगत् कहीं स्थित हो और वह अन्दर से बाहर
निकले । क्या सृष्टि के पूर्व जगत् कहीं स्थित था ? इसका उत्तर देते हुए क्षेमराज कहते
हैं कि—जगत् सृष्टि के पूर्व कहीं अन्यत्र स्थित नहीं था अपितु चिदात्मा में ही स्थित था
क्योंकि यदि जगत् चिदात्मा में अहं प्रकाश से अभिन्न न होता तो उपादान निरपेक्षता
संभव नहीं थी । किन्तु शक्ति उपादाननिरपेक्ष रहकर जगत् को प्रकट करती है—
यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः ।
तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥ (प०त्री० २४)
'स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य' (ई०प्र० १।५।१०)
यदि यह जगत् अहन्ता से अभिन्न चेतना के रूप में स्थित नहीं था तो यह उस
चेतना से कैसे निर्गत हुआ ? यह बिना किसी उपादान की अपेक्षा के कैसे उत्पन्न हुआ?
इसी का उत्तर—'यथा न्यग्रोध... चराचरम्' श्लोक द्वारा दिया गया है । यथा विशाल वट
वृक्ष शक्त्यात्मना अपने बीज में स्थित पाया जाता है उसी प्रकार यह समस्त संसार शक्ति
में बीजात्मना स्थित है और उससे अभिन्न है । यह चिदात्मा अपनी शक्ति के भौतिक
रूपान्तर (Materialisation) के द्वारा जगत् को विकसित करता है । ४
यदि जगत् सृष्टि के पूर्व कहीं किसी में स्थित था तो किसमें स्थित था और किससे
आविर्भूत, हुआ? ५ यदि यह स्वीकार कर लिया जाय कि यह 'चिदात्मा' एवं 'प्रकाशवपु'
से, हिमालय से निर्गत गंगा की भाँति, बाहर निकलता है—स्वात्मा से निकलकर उससे
पृथक् हो गया है—तो यह कथन भी ठीक नहीं है । झोले से निकले अखरोट की भाँति
यह जगत् चिदात्मा से नहीं निकला है । यह (जगत्) शक्ति के स्वात्मभित्ति से एवं उससे
अभिन्नरूप में बाहर निकलता है । यह दर्पणनगरवत् स्थित है— 'स एव भगवान् स्व
१-५. स्पन्दनिर्णय ।
प्रथमः निष्यन्दः ५९
स्वातन्त्र्याद् अनतिरिक्ताम् अपि अतिरिक्तां इव जगद्रूपां स्वभित्तौ दर्पणनगरवत् प्रकाशयन्
स्थितः ।' प्रमाता चिति प्रमेय जगत् से पृथक् नहीं हैं । उत्पन्न विश्व प्रलयावस्था में
भी परमात्मा से अभिन्न रहता है । तात्पर्य यह है कि—
स्थान, समय, आकार आदि के स्वरूप को कोई भी वस्तु परमात्मा का अवरोधक
नहीं है । यह विश्व उसका कार्य है और उसके प्रकाश के द्वारा यह विश्व प्रकाशित होता
है, स्थित रहता है और उससे अभिन्न रहता है । यहाँ तक कि प्रलय की दशा में भी
परमात्मा का प्रकाश ही सभी पर प्रभावशील है । यह व्यापक तत्त्व है । यह विश्व
परमात्मा में स्थित है और उससे अभिन्न है 'एतद् विश्व अभेदेन स्फुरत्स्थितं ततोऽयं
चिदात्मा भगवान्निज रसाश्यानता रूपं जगदुन्मज्जयतीति युज्यते ।।' यह विश्व प्रकाशात्म
शिव के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है ।
यह जगत् 'प्रकाश' से निर्गत है, यह प्रकाशस्वरूप है और 'प्रकाश' में ही स्थित
है । इस अद्वैत तत्त्व का 'निरोध' संभव नहीं है क्योंकि यह आत्मानुभव-सिद्ध है । अतः
जो तत्त्व सृष्टि, पालन एवं संहार तथा एकत्व को अभिव्यक्ति प्रदान करता है उसका कोई
निरोधक नहीं है । वह अघटन घटनापटीयसी शक्ति है ।१
आचार्य क्षेमराज कारिका के मूल उद्देश्य पर पुनः ध्यानाकर्षण करते हुए कहते
हैं कि योगी को सदैव अपने यथार्थ स्वरूप में समावेश-प्राप्त्यर्थ प्रयत्नशील रहना चाहिए
चाहे यह कार्य—'यत्र स्थितं' (At the stage of ingoing) के स्तर पर हो और चाहे
'यस्माच्च निर्गतम्' (At the stage of outgoing) के स्तर पर हो क्योंकि उसका
स्वरूप निरोधातीत (निरोध का अवरोध से अप्रभावित) है । संक्षोभ का ध्वंस होते ही
परम पद की प्राप्ति हो ही जायेगी । परमात्मा अपने यथार्थ स्वरूप में निरोध या निषेध
का विषय नहीं है क्योंकि अनात्मवादी सौगत भी यह मानता है कि 'वह तत्त्व' महा-
प्रकाशस्वरूप एवं नित्य है ।२ जो अनात्मवादी निषेधदृष्टि रखते हैं और परमात्मा की
सत्ता का प्रतिषेध करते हैं उनकी या तो सत्ता (Existence) होगी या असत्ता (Non-
existence) । यदि उसकी असत्ता हुई तो यह निषेध की तस्वीर निषेधकर्ता के बिना तो
आधारहीन हो जायेगी । यदि अन्यथा हुआ तो उसकी या इसकी सत्ता परमात्मा की सत्ता
को सिद्ध ही कर देगा जो कि उससे अपृथक् है ।३ कारिकाकार कहते हैं कि शङ्कर तत्त्व
यथार्थ स्वरूप से अपृथक् है और वह जगत् से अतीत है, विश्वरूप है एवं विश्व का
सृजन, पालन एवं लय कर रहा है । उनके अनुसार समस्त ईश्वरवादी संप्रदायों में ध्यान
का अंतिम विषय स्पन्द तत्त्व से भिन्न नहीं है । ध्यान में भिन्नता का आना स्पन्द तत्त्व के
निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य४ मात्र के कारण है । यह समस्त विश्व इस 'स्पन्द तत्त्व' की
क्रियाशक्ति का सार (Essance) है । यह बात भी 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबल-
शालिनः' के द्वारा समर्थित है । अर्थ यह है कि—उस यथार्थ तत्त्व पर विश्वास करने पर
मन्त्र सर्वज्ञत्वादि शक्ति से उपहित हो जाते हैं ।' अतः पूर्वोक्त आक्षेपों के लिए कोई
स्थान ही नहीं हैं ।५
१-५. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय ।
२. द्वितीय निःष्यन्द: सहज-विद्या समुदय (नाड़ी-संहार एवं बिन्दु-नाद रहस्य)
६० स्पन्दकारिका
आचार्य क्षेमराज अन्त में कहते हैं कि मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि बुद्धिमान एवं
पक्षपातहीन पाठक स्वयं स्पन्द सूत्रों पर लिखी गई अन्य टीकाकारों की टीकाओं में से
मेरी टीका एवं उनकी टीकाओं का, जो कि अभ्यर्थित रत्न के समान मूल्यवान् हैं—
अन्तर समझें एवं विभिन्नताओं की प्रशंसा करें। मैं शब्द प्रतिशब्द उन विभिन्नताओं को
इसलिए सुस्पष्ट नहीं करना चाहता क्योंकि अन्यथा ग्रन्थ का कलेवर अधिक बढ़
जाएगा। १
भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार करते
हैं—'कथं पुनः स्वस्वभावस्यैव संसारिणः शिवत्वेन निर्देशः ? इति यद्युच्यते, तत् तत्र
स्थितम् इदं जगत्, यस्मात् च उत्पन्नं तस्य संसार्यावस्थायामपि अनाच्छादितस्वभावत्वात्
न क्वचित् निरोधः अतः शिवत्वमुच्यते।' २
अभेदस्तर पर यह समस्त विश्व अहgroup/अहंरूप से एकात्मक होकर ही स्थित है। ३
आचार्य क्षेमराज की दृष्टि—आचार्य क्षेमराज 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहते हैं कि
भगवती महाचिति या भगवती 'स्वतन्त्रा' बाह्योपादान की अपेक्षा किये बिना ही सृष्टि-
काल में स्वस्वरूपाभिन्न अन्तस्थ जगत् को प्रकट करने एवं प्रलयकाल में उसे आत्म-
संहृत कर लेने के व्यापारद्वय द्वारा वस्तुतः अपने को ही अपने से पृथक् रूप में
प्रस्तुत: करते हुए समस्त विश्वसत्ता का मूल कारण हैं—
(१) 'चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः ॥' ४ (१)
(२) 'प्रकाशने स्थित्यात्मनि, परप्रमातृविश्रान्त्यात्मनि च संहारे पराशक्तिरूपा
'चितिः' एव भगवती 'स्वतन्त्रा' अनुत्तर विमर्शमयी शिवभट्टारिकाभिन्ना हेतुः कारणम् ॥' ५
क्योंकि—
(३) ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किञ्चित् । चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा
तत्तदनन्तजगदात्मना स्फुरति । यतश्च इयमेव प्रमातृप्रमाणप्रमेयमयस्य विश्वस्य सिद्धौ
प्रकाशने हेतुः । ६
(४) स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥ २ ॥
स्वेच्छया न तु ब्रह्मादिवदन्येच्छया, तयैव च, न तु उपादानाद्यपेक्षया—'स्वभित्तौ'
न तु अन्यत्र क्वापि, प्राक् निर्णीतं 'विश्वं' दर्पणे नगरवत् अभिन्नमपि भिन्नमिव 'उन्मील-
यति' । ७
यह 'उन्मीलन' है क्या ?
(५) उन्मीलनं च अवस्थितस्यैव प्रकटीकरम् ।
(६) इत्यनेन जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् उक्तम् । ८
इसीलिए कहा गया है कि भगवान् 'विश्वशरीर' है—
१. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय । २-३. भट्टकल्लट : स्पन्दकारिकावृत्ति ।
४-८. क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।