स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context५४ स्पन्दकारिका
द्वैतपरक एवं भेदजन्य है किन्तु स्पन्द एवं 'स्वप्रतिष्ठ, स्पन्दवान्' (शिव) का अहंविमर्श
समष्टि-परक ('विश्वरूपोऽहं' 'अहमिदं') होता है। स्पन्द शक्ति की अभिज्ञा, प्रत्यभिज्ञा
एवं पहचान है—पूर्णतम अहं विमर्श—विश्वाकार अहं की अनुभूति। अहं विमर्श (मूल
स्फुरण)—एक शक्ति का अनन्त रूपों में स्फुरण = 'शक्ति' का विश्व के अनन्त रूपों में
अवभासन। अखण्ड रूप में स्फुरणशील होने के कारण इस शांभवी शक्ति को 'स्पन्द'
कहते हैं।
'स्पन्द' का स्वरूप लक्षण—(१) 'स्पदि' (किंचित् चलन = स्वल्प = स्फुरण
= थोड़ी सी गति, = कम्पन, हिलना,) धातु से निष्पन्न 'स्पन्द' शब्द शिव की
सिसृक्षोन्मुख (अहं विमर्शात्मक) सूक्ष्म अहंविमर्शात्मक स्फुरण है—
चिद्घन का विश्वात्मक शक्ति-प्रसारण है—सृष्ट्योन्मुख संकल्पोन्मुखता है—चिद्रूप
शिव की विश्वात्मक अभिव्यक्ति का स्फुरण है—भगवन् की बाह्य विश्व के रूप में स्वतन्त्र
शक्ति के आत्मप्रसार की ओर संकल्पात्मक औन्मुख्य है।
इसी संकल्पात्मक औन्मुख्य को कारिकाकार ने। 'उन्मेष निमेष' कहा है। 'उन्मेष
निमेष' आँखों का उन्मीलननिमीलन नहीं है [सृष्टि प्राक् अवस्था]
और स्पन्द का वात्याचक्र द्वारा वृक्षादि का (परमशिव)
हिलाये जाने की भाँति भी नहीं है—प्रत्युत् यह
वह गतिशीलता है जो अहंप्रत्यवमर्श-स्वरूप [सृष्टि प्राक् अवस्था]
है—अनुत्तर तत्त्व की वह संकल्पात्मक शिव का विमर्श → (अहमस्मि)
गतिमयता है।
स्वातन्त्र्य → शिव से पृथ्वीपर्यन्त ३६
तत्त्व 'स्वातन्त्र्यशक्ति' → सृष्टि → अहमस्मि
→ अहमिदम् → इदमहम् → अहं च इदञ्च सदाशिव का विमर्श → (अहमिदम्)
पृथक्-पृथक् (विज्ञानाकल, प्रलयाकल सकल
आदि प्रमाताओं की सृष्टि) समस्त विमर्शों का
आदि स्रोत एवं जगदाभास का कारण स्वातन्त्र्य
शक्ति है और 'स्वातन्त्र्यवाद' ही स्पन्द एवं ईश्वर का विमर्श → (इदमहम्)
प्रत्यभिज्ञा दोनों का मुख्य सिद्धान्त हैं—
उत्पलदेवाचार्य 'अजडप्रमातृसिद्धि' की वृत्ति में
कहते हैं—
'संवित्प्रकाश एव स्वात्मोच्छलत्तया स्व-
मायाशक्त्युल्लासिते विश्ववैचित्र्ये जडाजडभाव-
राशिद्वयेन वेद्यवेदकात्मकेन स्वरूपानतिरिक्ते-
नातिरिक्तमेव प्रस्फुरेत् इति स्वातन्त्र्यवादस्य
प्रोन्मीलितं सूचितवान् आचार्यः॥
(श्लोक १३)