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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 143

४२ स्पन्दकारिका
सम्यगुपनत दीक्षादिसंस्कारवान् (५) गुरुवचन चोदनमात्रावशेष (६) स्वात्मैश्वर्योपलब्धि के
लक्ष्य वाला—व्यक्ति ही इस शास्त्र का अधिकारी ('विषय') है ।१ 'तन्त्रालोक' में कहा
गया है कि 'स्पन्द' का विलास ही जगत् है । अनन्त स्पन्दों की तरंगों से ही विश्व
निर्मित है ।
'काल प्राण में, प्राण स्पन्द में एवं स्पन्द शून्य में एवं शून्य चिति में प्रतिष्ठित
है—समस्त षडध्वचक्रचिन्मात्र में प्रतिष्ठित है ।२ 'शून्य' 'स्पन्द' एवं 'प्राण' में निखिल
विस्तार स्थित है—
'स स्पन्दे खे स तच्चित्यां तेनास्यां विश्वनिष्ठितः ॥'३
यथा— वातग्निसंपर्कादयः पिण्डोऽग्निवद्भवेत् ।
दाहपाकप्रकाशादौ शक्तस्तद्वयं गणः ॥'४
भला यह सोचिए कि जो दूसरों को चैतन्य बनाने में समर्थ है वह निःस्वभाव कैसे
हो सकता है ? इसका अभिप्राय यह है कि सभी चेष्टायें ज्ञानपूर्वक हैं । ज्ञानहीन शरीर
मृत्तिका का खण्ड मात्र रह जाता है । निश्चय ही चैतन्य जड़वर्ग का अधिष्ठाता एवं धारक
है । अन्यथा पत्थर का टुकड़ा आकाश में स्थिर क्यों नहीं हो जाता ? अतः उद्योग एवं
श्रद्धा दोनों के द्वारा इस तत्त्व का परीक्षण एवं समीक्षण करना आवश्यक है—
'स्वदेहसाक्षिकं चैतत् सर्वस्य ज्ञानचेष्टितम् ।
ज्ञानानधिष्ठितः कायो लुठत्येव यतो धृतः ॥
अतएव जडानामप्यधिष्ठातृकृता धृतिः ।
गम्यते गमने ग्रावा न धायेताऽन्यथा कथम् ॥'५
इस सिद्ध पुरुष की वाणी पर भी विचार कीजिए—'ब्रह्म नेत्र के समान ही अदृश्य
है और नेत्र के समान ही द्रष्टा है अपने आप में ही इसकी उपलब्धि है यह घटादिक के
समान दृश्य नहीं है—
'अदृश्यं नेत्रवद् ब्रह्म द्रष्टृत्वं चास्ति नेत्रवत् ।
स्वात्मन्येवोपलम्भोऽस्य दर्शनं घटवन्न तु ॥'६
इसकी स्थिति अकृत्रिम एवं स्वतन्त्र है । जैसे यह देहस्थ करणवर्ग को चैतन्य
बनाने में स्वतन्त्र है वैसे ही संपूर्ण लोक-लोकोत्तर और दृश्य वर्ग को भी चेतन बनाने में
समर्थ है ।७
'स्पन्दतत्त्व'—क्षेमराज 'स्पन्दनिर्णय' में कहते हैं कि—वह संवित् तत्त्व स्पन्द-
शक्तिगर्भिकृत, अनन्त सर्गसंहारैकघन एवं अहन्ताचमत्कारानन्दरूपा है—
'सा चैष स्पन्दशक्तिगर्भकृतानन्तसर्गसंहारैकघनाहन्ताचमत्कारानन्दरूपा ॥'
स्पन्दशास्त्र में परमशिव की स्वभावभूत 'स्वातन्त्र्य शक्ति' का अभिधान ही
'स्पन्द' है ।
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' । २. तन्त्रालोक : विवेक ।
३. अभिनवसुखपाद—'श्रीतन्त्रालोक' । ४-७. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।