Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 145 of 519

Read in context
Page 145

'स्पन्दकारिकावृत्ति' 'ओं नमः स्वस्पन्दात्मसंविन्मूर्तये शंभवे' तथा— 'परंशाक्तं तत्त्वं
जगति जयति स्पन्द इति तत्' इन मांगलिक स्तुतियों के द्वारा, भट्टकल्लट ने 'स्पन्द-
कारिकावृत्ति' (स्पन्दसर्वस्व) का 'श्रीस्पन्दवपुषे नमः' द्वारा तथा 'स्पन्दप्रदीपिका' में
उत्पलवैष्णव ने—
'यत् परापरभूस्पर्शि यत्संकल्पाल्लयोदयौ ।
स्पन्दसंज्ञं ज्ञरूपं तच्छक्तीशं स्वफलं नुमः ॥'
द्वारा 'स्पन्दतत्त्व' की स्तुति की है । अतः 'स्पन्दतत्त्व' विवेच्य है— स्पन्दतत्त्व—
'पराप्रावेशिका' में 'स्पन्द' को 'चित्' 'चैतन्य' 'स्वरसोदिता परावाक्' 'स्वातन्त्र्य'
'कर्तृत्व' 'स्फुरत्ता' का पर्याय माना है—
(१) पराप्रावेशिका— 'एष एव च विमर्शः चैतन्यं, स्वरसोदिता परावाक्,
स्वातन्त्र्यं, कर्तृत्वं 'स्फुरत्ता' स्पन्दः इत्यादि शब्दैरागमेशूद्घोष्यते ॥'—
इसे 'विमर्श' का भी वाचक कहा गया है ।
(२) 'स्पन्दनिर्णय'— क्षेमराज श्री भगवान् की 'स्वातन्त्र्यशक्ति' को ही इसलिए
'स्पन्द' कह रहे हैं क्योंकि यह स्वातन्त्र्य शक्ति—
'किञ्चिच्चलतात्मक' है— 'श्री भगवतः स्वातन्त्र्यशक्तिः किञ्चिच्चलतात्मक धात्वर्था-
नुगमात्स्पन्द इत्यभिहिता ।'
'स्पन्द' अचल एवं प्रशान्त परमेश्वर के भीतर शाश्वत एवं अभिन्न समरसभाव से
रहने वाली एक चंचलता जैसी कोई उमंग है । इसे परमेश्वर के प्रकाशरूप की विमर्श-
रूपता भी कहा गया है— 'स्पन्द' कोई 'क्षोभ' नहीं है । परमेश्वर की स्पन्दरूपात्मिका जो
उमंग है वह उसकी अपनी ही परमेश्वरता के विलास का बोध (प्रत्यवमर्श) है—
'तन्त्रालोक' में कहा गया है—
किञ्चिच्चलनमेतावदनन्य स्फुरणं हि यत् ।
ऊर्मिरिषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥
(३) तन्त्रालोक (विवेक) में कहा गया है कि—
किञ्चित् चलन ही स्पन्द है । अपनी ही परमेश्वरता के विलास का जो प्रत्यवमर्श
(बोध) है वह प्रत्यवमर्श (अहन्ता-परामर्श) ही उसका आनन्द भी है । परमशिव
स्वात्मानन्द में विभोर रहकर आनन्दातिशय से स्पन्दमान (छलकता हुआ) रहता है और
उसका आनन्दस्पन्दन ही 'विश्व' बन जाता है । विवेक में कहा गया है—
'किञ्चिच्चलनं हि नामैतदुच्यते । यदबोधस्यानन्यापेक्षं स्फुरणं प्रकाशनम् । परतो-
ऽस्य न प्रकाशः अपितु स्वप्रकाश एवेत्यर्थः ॥
'उन्मेषनिमेष'— अनुत्तर तत्त्व की सिसृक्षोन्मुख वह गतिमयता है जो कि अहं
प्रत्यवमर्श रूप संकल्प से आकारित है । शक्ति तो सदा गतिमय एवं स्पन्दात्मिका है
अतः उसका उदय या अस्तमन, संकोच या विकास कभी होता ही नहीं । क्रिया द्विमुखी