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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 147

४६ स्पन्दकारिका
परमात्मा की वास्तविक शक्ति एक ही है और उसका नाम है—'स्वातन्त्र्य
शक्ति'। स्वातन्त्र्यशक्ति शाश्वत रूप में स्पन्दशीला है अतः उसका अन्तर्मुखी विकास
(क्रिया) एवं बाह्यमुखी विकास (क्रिया) एक साथ चलता है । स्प० वि० (पृष्ठ ४) में
कहा गया है—
(१) 'उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकशङ्करसम्बन्धि प्रति-
पाद्यते ॥ ('उन्मेष निमेष' = 'शांकरी इच्छा') ॥
(२) 'स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः'
(३) तस्य उन्मेष-निमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात् ॥'
'शक्तिचक्रविभवप्रभवं'—शक्तिसमूह के ऐश्वर्यों को जन्म देने वाला ॥ इस
पदावली की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है—
(क) (तत्पुरुष समासगत व्याख्या) = 'शक्तिचक्रविभवस्य प्रभवम्' । (त०
समास) ॥
'शक्तिचक्र' = अनन्त शक्ति धाराओं की समष्टि । अनन्त प्रवहमान स्पन्द
धाराओं का समूह ।
'विभव' = अन्तर्मुखी एवं बहिर्मुखी शक्ति-प्रवाह ।
'प्रभव' = मूलोद्गम । अर्थात् शङ्कर ।
(ख) (बहुव्रीहिसमासगत व्याख्या)—(बहुव्रीहि समास)
'शक्तिचक्र' = प्राण, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि विशेष रूपों में प्रवाहित शक्तिपुञ्ज ।
'विभवात्' = यथार्थ अनुभूति प्राप्त करने के परिणामस्वरूप ।
'प्रभवः' = जिस शङ्कर की अभिव्यक्ति होती है ।
'माहेश्वरी', 'ब्राह्मणी', 'कौमारी', 'ऐन्द्री', 'याम्या', 'चामुण्डा', 'योगेशी'
'खेचरी', 'भूचरी', 'दिक्धरी', 'गोचरी' आदि शक्तियों का समूह ही 'शक्तिचक्र' है ।
'शक्ति' क्या है? 'शक्तनं शक्तिः'—'सामर्थ्यं विश्वनिर्माणादिकारि भैरवस्वरूप-
मेव' ॥१
अपनी ही शक्ति के यथार्थस्वरूप की अनुभूति व्यक्ति को जीव से शिव बना देता
है । शक्तिभूमिका पर आरोहण शिवभाव में प्रवेश का पर्याय है । 'शक्ति' शिवमुख है—
'शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्भागेन भावना ।
तदासौ शिवरूपी स्यात् शैवीमुखमिहोच्यते ॥'२
एकत्व एवं अनेकत्व में सामञ्जस्य कैसे संभव है?—परमात्मा शिव प्रत्येक
प्राणी के कलेवर में प्रवेश करके, ऐन्द्रिय शक्तियों के उन्मेष-निमेष द्वारा, पंचमहाविषयों
को ग्रहण करने या ग्रहण न करने के द्वारा, प्राणियों के अदृष्टानुसार निश्चित देश, काल
एवं रूप की परिधि में सृष्टि-संहार का निष्पादन करता है ।
१-२. विज्ञानभैरव ।