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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 142 of 519

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Page 142

प्रथमः निष्यन्दः ४१
इस प्रकरण में ये ही दो अर्थ उपबृंहित किए गए हैं—'इदमेव अर्थद्वयम् अत्र
प्रकरणे विस्तार्यते ॥'
(१) माया के वशीभूत होकर स्वरूपप्रत्यवमर्श के अनुल्लास के कारण, वेद्य
पदार्थ (देहादि) के साथ अव्यतिरेक (एकात्मता) के साथ प्रतिभासमान आत्मा का
व्यतिरेक प्रदर्शित किया गया है ।
(२) 'वेद्य' (जगत्) की 'वेदक' के साथ तात्विक स्वभाव के कारण शक्तिभाव की
दृष्टि से अपृथकता (अव्यतिरिक्तत्व) सिद्ध होती है ।
—इन्हीं दोनों अर्थों को प्रथम श्लोक में विस्तारित किया गया है—इसके द्वारा
चतुर्निष्यन्द स्पन्दसिद्धान्त इस श्लोक द्वारा आसूत्रित हुआ है ।
उपाय एवं उपेय—इस दर्शन में उपाय-उपेय क्या है?
(१) उपाय 'श्रेयःशास्त्ररूपं' (२) उपेय—'आत्मैश्वर्यप्रत्यभिज्ञारूपं'—इन 'उपाय'
एवं 'उपेय' क द्योतक 'शं' (शम्) है और इसी 'श' के कर्ता ही हैं—'शङ्कर' (तस्य कर्ता
शङ्करः ... इयं संज्ञा परमेश्वरस्य) 'शङ्कर'—परमेश्वर ॥ अतः इस स्पन्दशास्त्र के श्रेय के
साक्षात् कर्ता परमेश्वर ही हैं—। इस प्रकार ईश्वर एवं शास्त्र में कर्ता एवं कार्य का
सम्बन्ध है—यही 'स्तुमः' शब्द द्योतित करता है । 'स्तुमः' कहकर जो स्तुति की गई है
उसका प्रयोजन या अर्थ क्या है? 'उपादेय-वस्तु स्वरूप प्रतिपादनमेव स्तुत्यर्थः ।'—
उपादेय-वस्तुस्वरूप की प्रतिपादन ॥ अतः शास्त्राभिधेय प्रतिपाद्य एवं प्रतिपादक भाव ही
सम्बन्ध है । प्रयोजन क्या है ? आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मक शङ्कर पदः 'प्रयोजनं च
आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मकं शङ्करपदादेव अवसीयते ॥' दूसरे के श्रेय के संपादक भी ईश्वर
ही हैं—अतः इसमें अभिधेय-प्रयोजन दोनों में उपायोपेयभावलक्षण सम्बन्ध है । इस
प्रकार तीन प्रकार के सम्बन्ध हैं ।
इस शास्त्र का नाम है 'स्पन्द' 'अभिधानमस्य शास्त्रस्य स्पन्द' इति (१ नि० २१
का० २ पा०) ॥
स्पन्दतत्त्व—'स्पन्द' शब्द स्वस्वभाव परमर्शमात्र, नित्य, शून्यताव्यतिरेचनकारण-
भूत, उतनी ही मात्रा में संरभात्मा एवं 'शक्ति' नामक अन्य नाम वाले पारमेश्वर धर्म के
किंचित् स्पन्दनात्मक होने के कारण उसे 'स्पन्द' कहा गया है (किंचिच्चलनात् स्पन्द
इति') । इस प्रतिपाद्य 'स्पन्दतत्त्व' का प्रतिपादन करने के करण इस शास्त्र को भी
'स्पन्द' शब्द से पुकारा गया ('तत्प्रतिपादनहेतुत्वात् शास्त्रमपि इदं स्पन्दशब्देन
अभिधीयते ।')
इस शास्त्र का 'अधिकारी' कौन है?—'विषय' (अधिकारी) ॥ अन्य शास्त्रों में
तो विवक्षित या प्रतिपाद्य तत्त्व को विषय कहते हैं किन्तु यहाँ पर 'विषय' का अर्थ है
'अधिकारी' ॥
(१) विशुद्ध श्रद्धा-भक्ति-प्रकर्ष (२) परमेश्वर पर शक्तिपात प्रोन्मील्यमान-
स्वभावालोक वाला (३) तिरस्कृतसकल संदेहांधकार वाला होने के कारण प्रबुद्ध (४)