स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
Page 152 of 519
Read in contextप्रथमः निष्यन्दः ५१
शक्ति से अभिन्न एवं
शक्ति के कुक्षि में
स्थित विश्व
शिव
शक्ति
(शक्तिधाराओं का विस्फोट)
पारमेश्वरी शक्ति
की सिसृक्षा
अन्तर्गर्भित
विश्व (अव्यक्त
जगत्)
मातृका (शब्दराशि) की
अधिष्ठात्री शक्तियाँ
विश्व का बाह्यावभासन
(अष्टवर्ग की अधिष्ठात्री शक्तियाँ)
(व्यक्त जगत्)
माहेश्वरी ब्राह्मणी कौमारी वैष्णवी ऐन्द्री याम्या चामुण्डा योगिशी
(अन्तःकरण एवं बहिष्करणों से सम्बद्ध शक्तियाँ)
खेचरी, भूचरी, दिक्धरी, गोचरी,
प्राण, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ पञ्चतन्मात्रायें महाभूत विश्व
(ब्रह्मा से लेकर पृथ्वी एवं पृथ्वी के पदार्थों से लेकर तृणपर्यन्त समस्त प्रमेय समूह)
शिव की शक्तियाँ
चित् आनन्द इच्छा ज्ञान क्रिया
शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति
क्रिया प्रधान जो 'विमर्श' 'सामान्य स्पन्द' है उसके द्वारा अंतर्मुखी 'अहं' में—
'इदं' के रूप में अवभासित विश्व की अंतर्मुख अहंवरूपता में—अभिन्नतयावस्थित, विश्व
कल्पना का बहिर्मुख 'इदं', रूप में अवभासन—विश्रान्ति की अवस्था में पड़ा रहता है।
'विमर्श' में जिस भाव (सत्ता) का प्रकाश हो उसी का बाह्यावभासनबहिर्मुखी
प्रकाशन—संभव है अन्य का नहीं। विमर्शात्मक स्पन्दशक्ति की 'स्वातन्त्र्यशक्ति'