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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 151

५० स्पन्दकारिका
अतएव स्थिता संविदन्तर्बाह्योभयात्मना।
स्वयं निर्भास्य तत्रान्य आस्यन्तीव भासते ॥ (तं०४।१४४)
'शक्ति' ही जगत् है—'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥
(१) 'पशुपति भूमिका' (सामान्यभूमिका) में वह शक्ति 'चित्' 'आनन्द' 'इच्छा'
'ज्ञान' एवं 'क्रिया' के रूप में स्थित है।
(२) पशुभूमिका (विशेष भूमिका)—(जीवभाव में) वही एकात्मिका शक्ति प्राण,
अन्तःकरण, बाह्य इन्द्रियाँ आदि अनन्त प्रमेय के रूप में स्थित हैं।
(३) उसकी आनन्दशक्ति = 'स्वातन्त्र्य' है। ┐
(४) आनन्द का चमत्कार = इच्छाशक्ति है। │
(५) प्रकाशरूपता ही = चित् शक्ति है। │
(६) विमर्शमयता ही = ज्ञानशक्ति है। ┘
(७) प्रत्येक आकार को अवभासित करने की सामर्थ्य = क्रियाशक्ति है।
तस्य च (१) स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्तिः (२) तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः (३) प्रकाश-
रूपता चिच्छक्तिः (४) आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः (५) सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ॥'
(तं०सा० ६५)।
अविरत रूप में प्रवहमान स्वातन्त्र्यशक्ति या 'स्पन्द' के अन्तर्मुख एवं बहिर्मुख
दोनों प्रसार एक साथ प्रवृत्त रहते हैं।
शिव की शक्तियाँ—'स्वातन्त्र्यशक्ति' परमात्मा से अभिन्न है और वह विश्व के
रूप में प्रसृत होने के लिए उन्मुख है। यह शक्ति विश्वोन्मुखता की स्थिति में सर्वप्रथम
'इच्छा' के रूप में प्रकट होती है—'इच्छाशक्ति' का रूप धारण करती है। यही इच्छा
शक्ति उत्तरोत्तर अपना प्रसार करती हुई 'ज्ञानशक्ति' एवं 'क्रियाशक्ति' का रूप धारण
करती है। 'शक्तिचक्र'—
[चित्र: शक्तिचक्र — (परमशिव [स्वातन्त्र्य शक्ति]) — (इच्छा शक्ति) — (ज्ञान शक्ति → वर्ण, पद, मन्त्र) — (क्रिया शक्ति → कला, तत्त्व, भुवन)]
(१) या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी।
इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षो प्रतिपद्यते ॥१
(२) एवं सैषा द्विरूपापि पुनर्भेदैरनेकताम्।
अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ॥२ (शक्तिधाराओं का विस्फोट)

१. मालिनीविजय (३.५)। २. मालिनीविजय (३.८)।