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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

About this granth

The Siddhantaleshasangraha (सिद्धान्तलेशसंग्रह) is a work on Advaita Vedanta by the sixteenth-century polymath Appayya Dikshita. After Shankara, Advaita teachers differed on many questions: where ignorance resides and what it veils, the nature of the individual soul and of God, whether souls are one or many, and how knowledge of Brahman arises. Appayya gathers these views concisely without taking sides, and the work remains a key guide to the schools of post-Shankara Vedanta.

It has four chapters following the order of the four books of the Brahma Sutras. This edition gives the text with a Hindi translation and notes by Vedantacharya Pandit Mulshankar Vyas, edited by Pandit Chandiprasad Shukla Shastri, principal of the J. G. Goenka Sanskrit College, and Pandit Shrikrishna Pant Shastri, head of the Achyut Granthamala.

It is the sixth volume of section B of the Achyut Granthamala, first published at Kashi by Gaurishankar Goenka in Samvat 1993 (1936) and printed by N. R. Soman at the Lakshminarayan Press, Benares. It runs to 590 pages.

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२३६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

स्वरूपतोऽध्यस्यमानस्यैव तिक्तरसस्यैन्द्रियकत्वस्फुटीकरणाच्च । अन्यथा तत्र रसनाव्यापारापेक्षाऽनुपपत्तेः ।

तस्मादुदाहृतनैल्यध्यासस्थलेष्वधिष्ठानसम्प्रयोगादेव तद्गोचरचाक्षुषवृत्तिसमकालोदयोऽध्यासः तस्या वृत्तेर्विषय इति तस्य चाक्षुषत्वमभ्युपगन्तव्यम् । रूपं विना केवलाधिष्ठानगोचरवृत्त्यभावे च विषयचैतन्याभिव्यक्त्यभावेन जलतदध्यस्तनैल्य्यादीनां तद्भास्यत्वायोगात् । तिक्तरसाध्यासस्थले त्वधिष्ठानाध्यासयोरेकेन्द्रियग्राह्यत्वाभावात् त्वगिन्द्रियजन्याधिष्ठानगोचरवृत्त्या तदवच्छिन्नचैतन्याभिव्यक्तौ पित्तोपहतरसनसम्प्रयोगादेव तत्र

वाले पञ्चपादिकाग्रन्थसे स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्तरसमें ही इन्द्रियजन्यज्ञान-विषयत्वका स्पष्टीकरण किया गया है, अन्यथा अर्थात् आरोप्य तिक्तरस यदि इन्द्रियका विषय न माना जाय, तो बालकको तिक्तत्वके अवभासमें रसनाके व्यापारकी अपेक्षा ही नहीं † होगी ।

इससे * जिन नैल्य आदिके अध्यासोंका कथन किया गया है, उन अध्यास स्थलोंमें अधिष्ठानके सम्प्रयोगसे ही अधिष्ठानविषयक चाक्षुषवृत्तिके समकालमें उत्पन्न होनेवाले नीलरूप आदि अध्यास—अध्यस्त पदार्थ—उस वृत्तिके विषय होते हैं, इससे उस अध्यासको चक्षुसे जन्य मानना चाहिए। रूपके विना केवल अधिष्ठान-विषयक वृत्तिके न होनेपर अर्थात् आरोपित पीतरूप आदिसे विशिष्ट शङ्ख आदि अधिष्ठानविषयक वृत्तिका स्वीकार न होनेपर विषयावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेसे जल आदि तथा उससे अवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्त नीलरूप आदिका चैतन्यसे अवभास ही नहीं होगा । तीतेपनका [ जिस स्थलमें बालकको दुग्धमें ] अध्यास होता है, उस स्थलमें, तो अधिष्ठान और अध्यासका एक इन्द्रियसे ग्रहण न होनेके कारण त्वक् इन्द्रियसे उत्पन्न अधिष्ठानको विषय करनेवाली वृत्तिसे मधुर आदि द्रव्यरूप अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर पित्तदोषसे दूषित रसनाके सम्प्रयोगसे ही अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यमें


† अधिष्ठानभूत मधुर द्रव्यका रसनासे प्रत्यक्ष होनेके कारण परिशेषात् स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्त रसमें ही रसनेन्द्रियजन्यवृत्तिविषयत्व है, ऐसा स्पष्ट किया गया, अतः यह ग्रन्थ आरोप्यके ऐन्द्रियकत्व होनेमें प्रमाण है, यह भाव है।

* अर्थात् अध्यस्यमान पदार्थको जो साक्षिभास्य मानते हैं, उनके मतमें पीतशङ्ख आदि अध्यासोंमें चक्षुकी अनुपयोगिताके परिहारका असम्भव होनेसे, यह अर्थ है ।

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २३७

तिक्तरसाध्यासः तन्मात्रविषयरासनवृत्तिश्च समकालमुदेतीति तिक्तरसस्य रासनत्वमप्यभ्युपगन्तव्यम् । त्वगिन्द्रियजन्याधिष्ठानगोचरवृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यभास्ये तिक्तरसे परम्परयाऽपि रसनोपयोगाभावेन तत्र कथमपि प्रकारान्तरेण रासनत्वानुभवसमर्थनासम्भवात् । तथैव रजतस्याऽपि चाक्षुषत्वोपपत्तेः ‘पश्यामि’ इत्यनुभवो न बाधनीयः । न चाऽसम्पयुक्तस्य रजतस्य चाक्षुषत्वे ‘प्रत्यक्षमात्रे विषयेन्द्रियसन्निकर्षः कारणम्,’ ‘द्रव्यप्रत्यक्षे

अध्यस्त तिक्तरसका और तिक्तमात्रको विषय करनेवाली रासनवृत्तिका एक कालमें * उदय होता है, अतः तिक्त रसका रसनासे प्रत्यक्ष होता है, यह मानना चाहिए, क्योंकि त्वगिन्द्रियसे उत्पन्न होनेवाली अधिष्ठानविषयकवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यसे भास्य तिक्तरसमें रसनाका परम्परा भी उपयोग नहीं होता है, इसलिए अन्य किसी प्रकारसे भी तिक्तरसका रसनासे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । वैसे ही अर्थात् जैसे रसना (जिह्वा) इन्द्रियकी वृत्तिको लेकर तिक्तरसमें रासनत्वका अनुभव माना गया, वैसे ही चक्षुकी वृत्तिके आधारपर रजत आदिमें चाक्षुषत्वानुभवका समर्थन हो सकता है, अतः ‘रजतं पश्यामि’ (रजतको देखता हूँ) इस प्रकार चाक्षुषानुभवका † बाध मानना युक्तियुक्त नहीं है। यदि शङ्का हो कि इन्द्रियसे असम्प्रयुक्त रजतका प्रत्यक्ष माननेपर ‘प्रत्यक्षमात्रमें विषय और इन्द्रियका संसर्ग कारण है, ‘द्रव्यके प्रत्यक्षमें


* तात्पर्य यह है कि पित्तरूप दोषसे तिरस्कृत जो रसनेन्द्रिय है, उसके साथ मधुर द्रव्य-रूप अधिष्ठानका सम्बन्ध होनेसे मधुरद्रव्यावच्छिन्न चैतन्यमें तिक्तरसाध्यास उत्पन्न होता है, इसीके साथ-साथ अध्यस्यमान तिक्तरसको ही विषय करनेवाली रासनवृत्ति भी उत्पन्न होती है, इसलिए तिक्तरसका रसनासे अनुभव होता है, चाक्षुष स्थलमें जैसे अधिष्ठान और आरोप्यके एकवृत्तित्वयोग्यत्व होनेसे इन्द्रियजन्यज्ञान विषयता है, वैसे प्रकृत में नहीं है ।
† अर्थात् जैसे रजत आदिके अध्यासस्थलमें धर्मिविषयक वृत्तिके उत्पादनद्वारा चाक्षुषत्वका समर्थन किया जाता है, वैसे प्रकृतमें मधुरद्रव्यरूप धर्मिविषयक वृत्तिके उत्पादनद्वारा रासनत्वका समर्थन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि मधुरद्रव्यरूप धर्मी सर्वथा रसनाके अयोग्य है—द्रव्यके ग्रहणमें रसनाकी सामर्थ्य नहीं है । इसलिए परम्परासे भी तिक्त रसका रसनासे ग्रहण नहीं हो सकता है, अतः रासनवृत्तिकी समकालमें उत्पत्ति माननी पड़ती है । यद्यपि साक्षीसे भासित स्वाप्निक पदार्थोंमें रासनत्व, चाक्षुषत्व आदिके आरोपका जैसे आगे प्रतिपादन किया जायगा, वैसे ही प्रकृतस्थलमें रासनत्व आदिकी उपपत्ति कर सकते हैं, तथापि उस विषयके ऊपर दृष्टि न देकर ही यह कहा गया है ।

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२३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद

तत्संयोगः कारणम्,' 'रजतप्रत्यक्षे रजतसंयोगः कारणम्' इति गृहीतानेक-
कार्यकारणभावनियमभङ्गः स्यादिति वाच्यम्, सन्निकर्षत्वस्य संयोगाद्यनु-
गतस्यैकस्याऽभावेन आद्यनियमासिद्धेः । द्वितीयनियमस्य नैयायिकरीत्या
तमसीव संयोगायोग्ये क्वचिदद्रव्येऽपि द्रव्यत्वाध्याससम्भवाद् व्यवहारदृष्ट्या

द्रव्यके साथ इन्द्रियसयोग कारण है और 'रजतके प्रत्यक्षमें रजतका संयोग
कारण है, इस प्रकार निश्चित किये गये अनेक कार्यकारणभावोंका भंग-त्याग
होगा, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि संयोग आदिमें अनुगत एक सन्निकर्ष-
त्वके न होनेसे प्रत्यक्षमात्रमें * विषयेन्द्रियसन्निकर्ष कारण है, इस प्रकार प्रथम
कार्यकारणभाव ही असिद्ध है । जैसे नैयायिकोंके मतमें † संयोगके सर्वथा
अयोग्य तममें ( अन्धकारमें ) द्रव्यत्वका अध्यास होता है, वैसे ही संयोगके
सर्वथा अयोग्य कहीं अद्रव्य ( गुण ) आदिमें भी ‡ द्रव्यत्वका अध्यास


* इस नियमका ठीक-ठीक आकार यह है—शाब्दभिन्न जन्यप्रत्यक्षमात्रमें विषय-इन्द्रियका सन्निकर्ष कारण है, शब्दजन्य ज्ञानको जो अपरोक्ष मानते हैं, उनके मतसे शब्दज्ञानमें व्यभिचारवारण करनेके लिए शाब्दभिन्न विशेषण है और साक्षिरूप प्रत्यक्षमें अतिव्याप्ति वारण करनेके लिए जन्यत्व विशेषण दिया गया है । यहाँपर यह ज्ञातव्य है कि सन्निकर्षत्वका संयोगाद्यन्यतमत्वरूपसे अनुगम हो सकता है, अथवा नैयायिकोंके मतमें अभावत्वको जैसे अखण्डोपाधि मानते हैं, वैसे ही सन्निकर्षत्वको अखण्डोपाधि मान करके अनुगम कर सकते हैं, अतः प्रथम नियमके साथ विरोध ही है ।

† तात्पर्य यह है कि 'द्रव्यप्रत्यक्षमें विषय और इन्द्रियसंयोग कारण है' इस नियमका अर्थ आपको करना होगा व्यवहारमें जो द्रव्यत्वका अधिकरण है उस विषय और इन्द्रियका संयोग कारण है, क्योंकि 'एकत्वम् एकम्' ( एकत्व एक है ) इस प्रकार गुणमें भी एकत्वका भ्रम होनेसे द्रव्यत्वका भ्रम हो सकता है, पर वहाँ द्रव्यके साथ संयोग न होनेके कारण उक्त नियमका व्यभिचार होगा, इसलिए व्यावहारिक दृष्टिसे द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोगको कारण मानना होगा । यदि इसे स्वीकार न किया जाय, तो तममें द्रव्यत्वका भ्रम होनेके अनन्तर उसका प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि वहाँ द्रव्यसंयोग नहीं है, कारण कि तमके नैयायिकरीतिसे अभावरूप होनेके कारण उसके साथ इन्द्रियसंयोग ही नहीं हो सकता है, अतः नैयायिकोंको भी अगत्या व्यावहारिक द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसयोग कारण है, यह मानना होगा और माननेपर विरोध नहीं है, कारण कि शुक्तिरजतके प्रत्यक्षमें उस नियमकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि शुक्तिरजत व्यावहारिक द्रव्यत्वका अधिकरण नहीं है, यह भाव है ।

‡ इस विषयमें कोई लोग शङ्का करते हैं कि घटादिके समान शुक्तिरजतमें भी स्वतः द्रव्यत्व रहता है, अन्यथा उस रजतमें रजतत्व भी नहीं रहेगा, इष्टापत्ति नहीं हो सकती, कारण कि प्रातिभासिक रजतमें रजतत्वका साधन किया गया है, इसलिए शुक्तिरजत भी

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २३९


यद् द्रव्यत्वाधिकरणं तद्विषयत्वेन प्रातिभासिकरजते द्रव्यत्वस्याऽधिष्ठानगतस्यैवेद्ंत्ववदध्यासात् प्रतीत्यभ्युपगमेन च द्वितीयनियमाविरोधात् । द्वितीयनियमरूपसामान्यकार्यकारणभावातिरेकेण विशिष्याऽपि कार्यकारणभावकल्पनाया गौरवपराहतत्वेन तृतीयनियमासिद्धेः । यत्सामान्ये यत्सामान्यं हेतुः, तद्विशेषे तद्विशेषो हेतुः' इति न्यायस्यापि यत्र बीजाङ्कुरादौ


हो सकता है, अतः द्वितीय नियमका यह अर्थ करना होगा कि व्यवहारकी दृष्टिसे जो द्रव्यत्वका अधिकरण हो, उसके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसयोग कारण है, अतः प्रातिभासिक रजतमें इदंत्वके समान अधिष्ठानमें रहनेवाले द्रव्यत्वका भी अध्यास होनेसे प्रतीति होती है, इसलिए द्वितीय नियमके साथ विरोध नहीं है। और 'रजतके प्रत्यक्षमें रजतका संयोग कारण है' इस प्रकारका जो तृतीय नियम है, वह भी असिद्ध है, क्योंकि सामान्य कार्यकारणभावात्मक द्वितीय नियमसे (द्रव्यप्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है, इससे) अतिरिक्त विशेष तृतीय कार्यकारणभावकी कल्पना करनेमें केवल गौरव ही है। जिस सामान्यमें * जो सामान्य कारण होता है उसके विशेषमें उसका विशेष कारण होता है इस न्यायसे तृतीय कार्यकारणभावकी कल्पना करेंगे ? इस प्रकार यदि शङ्का हो, तो वह


व्यावहारिक द्रव्यत्वका अधिकरण है, ऐसा मानना होगा, क्योंकि व्यवहारदशामें जैसे रजतका बाध देखा जाता है, वैसे शुक्तिरजतमें रजतत्वका या द्रव्यत्वका बाध नहीं देखा जाता । इस परिस्थितिमें इन्द्रियासंयुक्त रजतमें इन्द्रियवृत्ति म नी जायगी, तो द्वितीय नियमका विरोध निवृत्त कदापि नहीं होगा, इस पूर्वपक्षके उत्तरमें यह कहा जाता है कि शुक्तिरजत आदिमें शुक्तित्व, द्रव्यत्व आदि धर्म नहीं हैं, ऐसा स्वीकार करनेवालोंके मतसे यह कहा गया है अर्थात् व्यावहारिक दशाका द्रव्यत्व या शुक्तित्व नहीं है परन्तु प्रातीतिक है, अतः इसी अभिप्रायसे मूलमें 'प्रातिभासिकरजते' इत्यादि कहा है ।

* तात्पर्य यह है कि 'द्रव्यप्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है' इस सामान्य नियमके' माननेसे 'रजतप्रत्यक्षमें रजतेन्द्रियसंयोग कारण है' इस विशेष नियमका लाभ होता है, क्योंकि जिस सामान्यमें जो सामान्य कारण होता है उसके विशेषमें उसका विशेष कारण होता है, प्रकृतमें सामान्य द्रव्य प्रत्यक्षमें सामान्य-विषयसंयोग कारण है, अतः रजतरूप विशेषद्रव्यके प्रत्यक्षमें विशेष रजतसंयोग कारण होगा, अतः इन्द्रियसंयोगके बिना यदि रजतकी वृत्ति मानी जायगी, तो तृतीय नियमके साथ विरोध होगा, यह प्रश्न है, इसका उत्तर है कि उस विशेष नियमका तभी स्वीकार किया जाय, जब कि सामान्यमें बाध हो, परन्तु बाध है नहीं, अतः उसको नहीं मानते हैं ।

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२४०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सामान्यकार्यकारणभावाभ्युपगमे बीजान्तरादङ्कुरान्तरोत्पत्त्यादिप्रसङ्गः, तद्विषयत्वेन ततोऽजागलस्तनायमानविशेषकार्यकारणभावासिद्धेः ।

न चाऽत्राऽपि 'द्रव्यप्रत्यक्षे द्रव्यसंयोगः कारणम्' इति सामान्यनियममात्रोपगमे अन्यसंयोगादन्यद्रव्यप्रत्यक्षापत्तिरिति अतिप्रसङ्गोऽस्तीति वाच्यम् ; 'तत्तद्द्रव्यप्रत्यक्षे तत्तद्द्रव्यसंयोगः कारणम्' इति नियमाभ्युपगमात् ; अन्यथा तृतीय नियमेऽप्यतिप्रसङ्गस्य दुर्वारत्वात् ; तस्मान्नास्ति क्लृप्तनियमभङ्गप्रसङ्गः ।

युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त जो 'यत्सामान्ये' यह न्याय है, वह भी वहींपर प्रवृत्त होता है, जहां बीज आदि स्थलमें केवल सामान्य कार्यकारणभाव माननेमें बीजान्तरसे अङ्कुरान्तरकी उत्पत्ति प्रसक्त होती है अर्थात् सामान्य कार्यकारणभावका जहाँ अतिप्रसङ्ग होता है, वहाँ यह न्याय प्रवृत्त होता है, अन्यत्र नहीं, इसलिए उक्त न्यायसे अजागलस्तनके † समान निरर्थक उक्त विशेष कार्यकारणभावकी सिद्धि नहीं होती है ।

यदि शङ्का हो कि 'द्रव्य प्रत्यक्षमें द्रव्यसंयोग कारण है' इस प्रकारके केवल सामान्य नियमके माननेपर अन्य संयोगसे अन्य द्रव्यके प्रत्यक्षकी आपत्ति आ सकती है, इसलिए अतिप्रसङ्ग है [ अतः उक्त तृतीय नियम मानना अत्यन्त आवश्यक है ] तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तत्-तत् द्रव्यके प्रत्यक्षमें तत्-तत् द्रव्यसंयोग कारण है, इस प्रकारका नियम माननेसे भी * अतिप्रसङ्गका परिहार हो सकता है । यदि उक्तन्यायसे तृतीय नियमकी कल्पना की जायगी, तो उसमें भी अतिप्रसङ्गका परिहार नहीं हो सकता है, इससे उक्त नियमके भङ्गकी प्रसक्ति नहीं है ।


† बकरीके गलेमें लटकनेवाले लम्बे स्तनको अजागलस्तन कहते हैं, जैसे वे बकरीके स्तन किसी काममें नहीं आते हैं, निरर्थक हैं, वैसे ही प्रकृतमें विशेषनियमकी कोई आवश्यकता न होनेसे वह निरर्थक है, यह भाव है ।

* अङ्कुरसामान्यके प्रति बीजसामान्यको कारण माननेसे अन्य बीजसे अन्य अङ्कुरकी उत्पत्तिकी प्रसङ्ग आ सकता है, इसलिए सामान्यनियममें बाधक होने से जैसे तत्-तत् अङ्कुरकी उत्पत्तिके प्रति तत्-तत् बीज ही कारण माना जाता है, वैसे ही तत्-तत् द्रव्यके प्रत्यक्षके प्रति तत्-तत् द्रव्यसंयोगव्यक्तिको कारण मानना चाहिए, इससे अन्य द्रव्यके संयोगसे अन्य द्रव्यके प्रत्यक्षकी आपत्ति नहीं है, इसपर भी यदि तृतीय नियमका अङ्गीकार किया

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २४१

किं चाऽत्र क्लृप्तनियमभङ्गेऽपि न दोषः, 'इदं रजतं पश्यामि, नीलं जलं पश्यामि', इत्यादेरनन्यथासिद्धस्याऽनुभवस्य प्रथमगृहीतानामपि 'प्रत्यक्षमात्रे विषयसन्निकर्षः कारणम्' इत्यादिनियमानां व्यावहारिकविषये सङ्कोचकल्पनमन्तरेणोपपादनासम्भवात् ।

न चैवं सति 'प्रमायां सन्निकर्षः कारणम्, न भ्रमे' इत्यपि सङ्कोचकल्पनासम्भवाद् असन्निकृष्टस्यैव देशान्तरस्थस्य रजतस्य इहाऽऽरोपापत्तिरिति अन्यथाख्यातिवादप्रसारिका; अभिव्यक्तचैतन्यावगुण्ठनशून्यस्य देशान्तर-

किञ्च, शुक्तिरजत आदि स्थलमें नियमका भङ्ग होनेपर भी दोष नहीं है, क्योंकि 'इस रजतको देखता हूँ' 'नील जलको देखता हूँ' इत्यादि अनन्यथासिद्ध अनुभवकी—'प्रत्यक्षमात्रमें विषयका संनिकर्ष कारण है' इत्यादि प्रथमतः गृहीत नियमोंका व्यावहारिक विषयमें संकोच किये बिना—उपपत्ति हो ही नहीं सकती है † ।

यदि शङ्का हो कि 'प्रमामें सन्निकर्ष कारण है, भ्रममें नहीं' इस प्रकारसे भी नियमके संकोचकी कल्पना हो सकनेसे शुक्तिमें असन्निकृष्ट अन्यदेशस्थ रजतके ही आरोपकी आपत्ति होगी, इसलिए अन्यथाख्यातिवाद भी प्रसक्त होता है; नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अभिव्यक्त चैतन्यके तादात्म्यसे शून्य अन्यदेशस्थ रजतकी अपरोक्षता ही नहीं हो सकती ✱। और ख्याति (अपरोक्ष-


जायगा, तो अन्य रजतके संयोगसे अन्य रजतके प्रत्यक्षकी आपत्ति रहेगी ही। इससे अर्थात् प्रथम और तृतीय नियमके असिद्ध होनेसे और द्वितीय नियमके साथ विरोध न होनेसे उक्त नियमोंके साथ असंयुक्त (प्रातिभासिक) पदार्थकी चाक्षुष वृत्ति मानी जाय, तो भी विरोध नहीं है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि जैसे स्वप्नप्रपञ्चके केवल साक्षिभास्य होनेपर भी उसमें चाक्षुषत्वक अनुभव होता है, परन्तु उस दशामें चक्षु आदिका उपराम होनेसे उनके साथ उन विषयोंका सम्बन्ध नहीं है, इसी प्रकार शुक्तिरजत आदिमें 'रजत देखता हूँ' इत्यादि अनुभव होनेसे उनका चाक्षुषत्व स्वीकार किया जाता है, इसलिए उक्त नियमोंके सङ्कुचित होनेपर भी कोई आपत्ति नहीं है।

✱ शङ्का और समाधानका तात्पर्य यह है—पूर्वमें इसका प्रतिपादन हुआ है कि 'प्रत्यक्षमात्रमें विषयसन्निकर्ष कारण है' इस सामान्य नियमका अनुभवके अनुसार व्यावहारिक विषयमें संकोच करना चाहिए, इसलिए प्रातीतिक पदार्थोंके अनुभवमें उक्त नियम बाधक नहीं है, इसपर 'न चैवं सति' इत्यादिसे पुनः शङ्का करते हैं कि जब उक्त नियमका संकोच करना अभीष्ट है, तो

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२४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

स्थस्य रजतस्याऽऽपरोक्ष्यानुपपत्तेः। ख्यातिबाधानुपपत्त्यादिभिर्भ्रमविषयस्याऽनिर्वचनीयत्वसिद्धेश्च।
न चाऽधिष्ठानसम्प्रयोगमात्रात् प्रातिभासिकस्यैन्द्रियकत्वोपगमे शुक्तिरजताध्याससमये तत्रैव कालान्तरे अध्यसनीयस्य रङ्गस्याऽपि चाक्षुषत्वं

रूपसे रजतकी प्रतीति ) एवं बाधकी अनुपपत्ति आदिसे भ्रमज्ञानके विषय अनिर्वचनीयत्व ही सिद्ध होता है ।

शङ्का होती है कि यदि केवल अधिष्ठानके सम्प्रयोगसे ही प्रातिभासिक रजतादिमें इन्द्रियजन्य ज्ञानकी विषयताका स्वीकार करते हो, तो शुक्तिमें ही कालान्तरमें अध्यस्त होनेवाले रङ्गका भी शुक्तिरजताध्यासके समयमें चक्षुसे ग्रहण


तुल्ययुक्तिसे उस नियमका यही संकोच क्यों न किया जाय कि प्रमामें संन्निकर्ष कारण है, और भ्रममें कारण नहीं है, क्योंकि नैयायिकोंका मत है कि भ्रमका विषय है देशान्तरस्थ रजत, इस विषयमें अन्य वादियोंने शङ्का की है कि असन्निकृष्ट रजतका प्रत्यक्ष कैसे होगा ? तब नैयायिकोंने उत्तर दिया है कि 'प्रत्यक्षमें सन्निकर्ष कारण है' इस नियमका जैसे आप व्यावहारिक पदार्थप्रत्यक्षविषयत्वरूपसे संकोच करते हैं, वैसे हमारे मतमें 'प्रमा-प्रत्यक्षमें सन्निकर्ष कारण है' इस प्रकार संकोच कर सकते हैं, अतः नैयायिकोंके मतमें कोई दोष नहीं है । इसलिए नैयायिकाभिमत उक्त नियमका संकोच भी प्राप्त हो सकता है और शुक्तिरजतस्थलमें देशान्तरस्थ रजतकी प्राप्ति होनेसे अन्यथाख्यातिवाद प्रसक्त हो सकता है, अनिर्वचनीयवाद नहीं, इसपर उत्तर दिया जाता है—विषयप्रत्यक्षत्वमें इन्द्रियसन्निकृष्टत्व प्रयोजक नहीं है, किन्तु अभिव्यक्त चैतन्याभिन्नत्व ही प्रयोजक है, इसका विचार भी आगे किया जायगा । इसलिए यदि शुक्ति-रजतको देशान्तरस्थ ही माना जायगा, तो अभिव्यक्त चैतन्याभेदका असम्भव होनेसे उस रजतका प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा, अतः अभिव्यक्त चैतन्यके अभेदके लिए अवश्य शुक्तिदेशोत्पन्न रजत ही मानना चाहिए । तथा ख्याति और बाधकी अनुपपत्तिसे भी अनिर्वचनीय रजत ही सिद्ध होगा, क्योंकि ख्याति शब्दका अर्थ है—अपरोक्ष प्रतीति, शुक्ति रजतके देशान्तरस्थ होनेपर उसकी अपरोक्षप्रतीति नहीं हो सकती है, और उसे असत् माननेपर भी नहीं हो सकती है, अतः यही प्रतीति शुक्ति-रजतमें असत्त्व और देशान्तरस्थत्वका निरास करती है, और बाधक प्रतीति है—तीनों कालमें भी यह रजत नहीं है, इस बाधक प्रतीतिसे रजतसमयमें भी शुक्तिमें रजतका अभाव सिद्ध होता है, अब देखिये कि यदि शुक्तिमें रजत नहीं है, तो उसकी ख्याति अपरोक्षप्रतीति नहीं होगी, यदि शुक्तिमें रजत सत्य होगा, तो उसका बाध नहीं होगा, क्योंकि सत्य शुक्तित्वका उसमें बाध नहीं होता है, अतः इस प्रकारके ख्याति और बाधकी अनुपपत्तिसे रजतमें अनिर्वचनीयत्वकी भी सिद्धि होती है, अतः पूर्वोक्त रीतिसे किया हुआ नियमका संकोच ही युक्त है ।

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[सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २४३


कुतो न स्यादिति वाच्यम्; रजताध्याससमये रङ्गरजतसाधारणचाकचक्यदर्शनाविशेषेऽपि यतो रागादिरूपपुरुषदोषाभावादितस्तत्र तदा न रङ्गाध्यासः, तत एव मया तद्विषयवृत्त्यनुदयस्याऽभ्युपगमात् । तस्मादिदंमंशसंभिन्नरजतगोचरैकैव वृत्तिरिन्द्रियजन्या । न ततः प्रागिदमाकारा वृत्तिरिति नाऽत्रेयमज्ञाननिवर्तकत्वसदसद्भावचिन्ता कार्येति ।


क्यों नहीं होता है †? यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि रजतके अध्यासके समयमें रङ्ग और रजतके साधारण चाकचक्य दर्शनके समान होनेपर भी जिस रागादि पुरुषदोषके अभावसे शुक्तिमें रजताध्यास कालमें रङ्गका अध्यास तुम नहीं मानते हो, उसी कारणसे हम रङ्गविषयक वृत्तिकी उत्पत्ति नहीं मानते हैं, इसलिए रङ्गका अध्यास रजताध्यासकालमें नहीं होता है । इससे अर्थात् धर्मिज्ञानको कारण न माननेसे 'इदं रजतम्' इसमें इदमंशसे सम्मिलित रजतविषयक एक ही वृत्ति इन्द्रियसे उत्पन्न होती है । उससे पूर्व इदमाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं होती है, इसलिए प्रकृतमें अज्ञाननिवर्तकत्वके सद्भाव और असद्भावकी चिन्ता करना व्यर्थ है ।


† शङ्काका तात्पर्य यह है कि यदि अधिष्ठानके सम्प्रयोगमात्रसे ही प्रातिभासिक पदार्थोंका इन्द्रियज्ञान होता है, तो शुक्तिमें अन्य कालमें अध्यस्त होनेवाला रङ्ग रजतके अध्यासकालमें चाक्षुष वृत्तिका विषय क्यों न हो ? कारण कि वह चाक्षुषवृत्ति जैसे रजततादात्म्याश्रय इदमर्थसम्प्रयोगजन्य है, वैसे ही कालान्तरीय रङ्गतादात्म्याश्रय इदमर्थसम्प्रयोगजन्य भी है, इसलिए सम्प्रयोग वृत्तिका हेतु नहीं है, किन्तु सादृश्यविशिष्ट धर्मिज्ञानका हेतु है, और वही सादृश्यज्ञान दोषरूपसे और धर्मिज्ञानरूपसे रजताध्यासमें कारण है, इसी प्रकार रजत साक्षिभास्य है, वही मानना चाहिए। इसपर उत्तर देते हैं कि तुम्हारे मतमें भी रजताध्यासके समयमें रङ्ग आदिका अध्यास क्यों नहीं होता है, इसका उत्तर देना होगा, यदि कहोगे कि चाकचक्य आदि ज्ञानके समान होनेपर भी रजतके अध्याससमयमें रंगविषयक राग आदि, जो पुरुषदोष हैं, उनके न रहनेसे रजताध्यासकालमें रङ्गाध्यास नहीं होता है, तो इसी प्रकार हम (कविताार्किकमतानुयायी) भी कहते हैं कि रागादि पुरुषदोषोंके न होनेसे रजताध्यासकालमें रङ्गवृत्तिका उदय नहीं होता है, यह कविताार्किकमत ही युक्त है, ऐसा 'तस्मात्' इत्यादिसे उपसंहार किया है।

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५४४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अन्ये त्वेकैव सामान्यवृत्तिर्वा भ्रान्तिकारणम् ।
तत्साक्षिभास्यमध्यस्तमलं वृत्त्येति मेनिरे ॥११२॥

कुछ लोग कहते हैं कि ( भ्रमस्थलमें ) इदमाकार सामान्य वृत्ति एक ही है, और वही अध्यासके प्रति कारण है अध्यस्तका उस वृत्तिसे अभिव्यक्त साक्षिचैतन्यसे भान होता है, अतः रजताकार द्वितीय वृत्ति निरर्थक है ॥११२॥

अन्ये तु—‘अधिष्ठानज्ञानमध्यासकारणम्’ इति इदमाकारां वृत्तिमुपेत्य तदभिव्यक्तेनैव साक्षिणा तदध्यस्तस्य रजतस्याऽवभाससम्भवात् तद्भासक-साक्ष्यभिव्यञ्जिकया तयैवेदंवृत्त्या रजतविषयसंस्काराधानोपपत्तेश्च रजताकार-वृत्तिर्व्यर्थेति मन्यन्ते ।

वृत्तिरेकैदमाकारा सामान्यज्ञानरूपिणी ।
इदंरजततादात्म्यगोचराऽन्येति केचन ॥११३॥

कोई लोग कहते हैं कि ( 'इदं रजतम्' इत्यादि स्थलमें ) सामान्य ज्ञानात्मक एक इदमाकार वृत्ति होती है, और दूसरी इदं और रजतके तादात्म्यका अवगाहन करनेवाली वृत्ति होती है ॥११३॥

ज्ञानद्वयपक्षे 'इदम्' इत्येका वृत्तिरध्यासकारणभूता । 'इदं रजतम्' इति


* कुछ लोग तो—अधिष्ठानज्ञान अध्यासके प्रति कारण है, इसलिए इदमाकार वृत्तिका अङ्गीकार करके, इदमाकार वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यरूप साक्षीसे ही उसमें (इदमवच्छिन्न चैतन्यमें) अध्यस्त रजतका अवभास होनेसे और अध्यस्त रजत आदिके अवभासक साक्षीरूप चैतन्यकी अभिव्यञ्जक इदमाकार वृत्तिसे ही रजत-विषयक संस्कारोंका आधान हो सकनेसे रजताकार वृत्ति व्यर्थ ही है—ऐसा मानते हैं।

† दो ज्ञान माननेवालोंके पक्षमें अर्थात् 'इदं रजतम्' इसमें


* पूर्व टिप्पणीमें कहा गया है कि धर्मिज्ञानमें अध्यासकी कारणताका जो खण्डन किया गया है, वह ऊपरी दृष्टिसे किया गया है, वस्तुतः नहीं, इसलिए धर्मिज्ञानवादीका मत कहते हैं—'अन्ये तु' इत्यादिसे ।

† जिस वृत्तिसे युक्त चैतन्यमें जितने पदार्थ भासते हों, उतने पदार्थोंमें उस वृत्तिसे संस्कारोंका आधान होता है, इस पूर्वोक्त नियमसे इदमाकार वृत्तिसे ही रजतका संस्कार हो सकता है, इसलिए रजताकार वृत्ति व्यर्थ है, यह 'अन्ये तु' मतका तात्पर्य है, और इस मतमें उक्त नियम न मानकर स्वगोचरवृत्तिसे ही स्वमें संस्कारोंका आधान होता है, यही नियम माना गया है, इसलिए इस मतमें अध्यस्त रजतविषयक भी वृत्ति मानी गई है, इसीका 'केचित्' और 'अन्ये तु' मतसे विचार हुआ है। इसमें भी पहले मतमें अध्यस्तरजतवृत्ति अध्यस्तरजतविशिष्टधर्मीको विषय करती है, और दूसरे मतमें अध्यस्तरजतमात्रको विषय करती है, यह भेद है ।

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सकारणं अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २४५

द्वितीया वृत्तिरध्यस्तरजतविषया, न त्विदमंशं विनाऽध्यस्तमात्रगोचरा सा । 'इदं रजतं जानामि' इति तस्या इदमर्थतादात्म्यापन्नरजतविषयत्वानुभवादिति केचित् ।

इदं तद्वृत्त्यवच्छिन्नचिन्मोहौ तत्तदन्विते ।
युगपद्रूप्यतद्वृत्ती कुर्वाते इति चाऽपरे ॥११४॥

कुछ लोग कहते हैं कि इदमवच्छिन्न चैतन्यमें और इदमंश-विषय वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अज्ञान रजत और रजतज्ञानरूपसे परिणत होते हैं ॥११४॥

अन्ये तु—यथा इदमंशावच्छिन्नचैतन्यस्थाऽविद्या रजताकारेण विवर्तते, एवमिदमंशविषयवृत्तिज्ञानावच्छिन्नचैतन्यस्थाऽविद्या रजतज्ञानाभासाकारेण विवर्तते, न त्विदमंशवृत्तित्वदनध्यस्तं रजतज्ञानमस्ति । तथा च रजतस्य अधिष्ठानगतेदंत्वसंसर्गभानवत्तज्ज्ञानस्याऽप्यधिष्ठानगतेदंत्वविषयत्वसंसर्गभानोपपत्तेः, न तस्याऽपीदंविषयत्वमभ्युपगन्तव्यम् ।

न च रजतत्ववदध्यस्तस्य रजतेदंत्वसंसर्गस्य रजतज्ञानगोचरत्वात्

'इदम्' और 'इदं रजतम्' ये दो ज्ञान होते हैं इस पक्षमें 'इदम्' इत्याकारक इदमाकारवृत्ति अध्यासकी कारणभूत है और 'इदं रजतम्' इत्याकारक दूसरी वृत्ति अध्यस्त रजतको अवगाहन करती है, इदमंशको छोड़कर केवल अध्यस्त पदार्थको अवगाहन नहीं करती है, क्योंकि 'मैं इस रजतको जानता हूँ' इस प्रकार उस वृत्तिमें इदमर्थके साथ तादात्म्यापन्न रजतविषयत्वका अनुभव होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।

इतर लोग कहते हैं कि जैसे इदमंशसे युक्त चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या रजताकारसे परिणत होती है, वैसे ही इदमंशविषयक वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या अध्यस्त रजतमात्रको विषय करनेवाली वृत्तिके आकारमें परिणत होती है, इदम् अंशकी वृत्तिके समान अध्यस्त रजतगोचरवृत्ति अनध्यस्त नहीं है अर्थात् रजतज्ञानाभासरूप रजतज्ञान प्रातिभासिक ही है । इसलिए जैसे रजतके अधिष्ठानमें रहनेवाले इदन्त्वका रजतमें संसर्गका भान होता है, वैसे ही रजतके ज्ञानमें भी अधिष्ठानगत इदन्त्वविषयत्वके संसर्गका भान होता है, अतः 'इदं रजतम्' इस द्वितीय ज्ञानको इदंविषयक नहीं मानना चाहिए ।

यदि शङ्का हो कि रजतत्वके समान अध्यस्त रजत और इदन्त्वके संसर्गमें रजतज्ञानकी विषयता होनेसे उस संसर्गके प्रतियोगी इदन्त्वमें भी रजतज्ञानकी

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२४६सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेदं

तत्प्रतियोगिन इदंत्वस्याऽपि तद्विषयत्वं वक्तव्यमिति वाच्यम्; स्वतादात्म्याश्रयस्य इदंत्वविषयत्वादेव तस्य तत्संसर्गविषयत्वे अतिप्रसङ्गाभावात् । न चाऽधिष्ठानाध्यासयोरेकस्मिन् ज्ञाने प्रकाशनियमस्य सम्भावनाभाष्यविवरणे प्रतिपादनाद् एकवृत्तिविषयत्वं वक्तव्यमिति वाच्यम्; वृत्तिभेदेऽपीदमाकारवृत्त्यभिव्यक्ते एकस्मिन् साक्षिणि तयोः प्रकाशोपगमादित्याहुः ॥१८॥

विषयता होनी चाहिए ? [ अन्यथा घटत्व आदिके संसर्गप्रत्यक्षमें घटत्वादिविषयताका भी अभाव प्रसक्त होनेसे अतिप्रसङ्ग होगा, तात्पर्य यह है कि पूर्वमें कहा गया है कि अध्यस्तरजतवृत्तिको इदंविषयक नहीं मानना चाहिए, क्योंकि अन्य रीतिसे उपपत्ति हो सकती है, इसपर शङ्का करनेवाला कहता है कि ज्ञानाभाससे रजतका ग्रहण करनेपर इदन्त्व संसर्गका यदि ग्रहण होता है, तो संसर्गका प्रतियोगिभूत इदन्त्व भी अवश्य गृहीत होगा, इस अवस्थामें अध्यस्त रजतज्ञानमें इदन्त्वविषयकत्व आनेसे अध्यस्तरजतविशिष्ट इदंविषयकत्व सिद्ध ही हुआ, फिर कैसे कह सकते हैं कि ज्ञानाभास रजतमात्रविषयक ही होता है ? ] तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानाभासके साथ तादात्म्यापन्न इदमंशज्ञानके इदन्त्वविषयक होने ही से रजतज्ञानमें रजतेदन्त्वसंसर्गकी विषयता होनेसे अतिप्रसङ्ग नहीं है । [ भाव यह है कि यद्यपि प्रातिभासिक—अध्यस्त रजतज्ञानका इदन्त्वरूप संसर्गप्रतियोगी विषय नहीं है, तथापि ज्ञानाभासके प्रति अधिष्ठान होनेके कारण इदमंश ज्ञानके साथ रजतज्ञानाभासका तादात्म्य है, जो इदमंश ज्ञान है, उसमें इदन्त्वरूप प्रतियोगिविषयकत्व है, अतः ज्ञानाभासमें भी इदन्त्वसंसर्गविषयकत्वका अवगाहन होता है, ] पुनः यदि शङ्का हो कि अधिष्ठान और अध्यासका एक ज्ञानमें प्रकाश होता है, इसका सम्भावनाभाष्यके विवरणमें प्रतिपादन होनेके कारण उनमें एकवृत्तिविषयता होनी चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि अधिष्ठान और अध्यासकी भिन्न-भिन्न वृत्ति मानी जाय, तो भी इदमाकारवृत्तिमें अभिव्यक्त एक साक्षीमें ही उनका प्रकाश माना गया है, [ तात्पर्यार्थ यह है कि अध्यस्तमात्रको विषय करनेवाली वृत्तिका विवरणकारने ही अङ्गीकार किया है, इसलिए ‘एकस्मिन् ज्ञाने’ ( एक ज्ञानमें अधिष्ठान और अध्यासका प्रकाश होता है ) इत्यादि नियममें कथित ज्ञानशब्द साक्षीका ही वाची है, वृत्तिका वाची नहीं है, इसलिए दोष नहीं है ] ॥१८॥

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वृत्तिके निर्गमकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २४७


ननु हेतुनियम्यत्वात् परोक्षत्वापरोक्षयोः ।
वृत्तेर्निर्गमनं व्यर्थमेवं केचित् समादधुः ॥११५॥

परोक्षत्व और अपरोक्षत्वकी विलक्षणताके करणविशेषके अधीन हो सकनेसे वृत्तिका निर्गमन व्यर्थ है, इस प्रकारकी शङ्का होनेपर कोई लोग इस प्रकार समाधान करते हैं ॥११५॥

ननु सर्वपदार्थानां साक्षिप्रसादादेव प्रकाशोपपत्तेः किं वृत्त्या ? घटादिविषयकसंस्काराधानाद्युपपत्तये तदपेक्षेऽपि तन्निर्गमाभ्युपगमो व्यर्थः; परोक्षस्थल इवाऽनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणैव घटादेरपि प्रकाशोपपत्तेः।

न च तथा सति परोक्षापरोक्षवैलक्षण्यानुपपत्तिः; शाब्दानुमित्योरिव करणविशेषप्रयुक्तवृत्तिवैजात्यादेव तदुपपत्तेः ।


अत्र शङ्का होती है कि सम्पूर्ण पदार्थोंका साक्षीसे ही प्रकाश हो सकता है, तो फिर वृत्तिको मानना व्यर्थ ही है। घटादि विषयोंके* संस्कारके आधानके लिए वृत्तिकी उत्पत्ति यदि मान भी ली जाय, तो भी वृत्तिका बहिर्निर्गम अर्थात् चक्षु आदि द्वारा घटाकार अन्तःकरणकी वृत्ति बाहर निकलती है, यह मानना व्यर्थ है, क्योंकि परोक्षस्थलके समान अनिर्गतवृत्तिसे युक्त साक्षीसे ही घट आदिका भी प्रकाश हो सकता है [ तात्पर्यार्थ यह है—जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' ( पर्वत वह्निमान् है, धूम होनेसे ) इस अनुमितिस्थलमें वह्निदेशमें वृत्तिके न जानेपर भी साक्षीसे उसका प्रकाश होता है, वैसे ही घट आदि देशमें अन्तःकरणकी वृत्तिके न जानेपर भी उसका प्रकाश हो सकता है, अतः वृत्तिका बाहर निकलना सर्वथा अनुपयुक्त है ] ।

इसपर यदि शङ्का हो कि वृत्तिका बहिर्गमन न माना जाय, तो परोक्ष और अपरोक्षस्थलमें कोई विशेष नहीं होगा, [ अतः वृत्तिका अपरोक्षस्थलमें बाहर निकलना जरूरी है, अन्यथा परोक्ष ज्ञान और अपरोक्ष ज्ञानमें वैलक्षण्यका वृत्तिके निकलनेसे और न निकलनेसे जो स्वीकार किया † गया है, वह न होगा ]


* तात्पर्य यह है कि यदि वृत्ति न मानी जाय, तो कालान्तरमें किसी भी पदार्थका स्मरण नहीं होगा क्योंकि तत्-तत् विषयोंके अनुभव साक्षीरूप होनेके कारण नित्य होंगे, अतः अनुभवके विनाशरूप संस्कार नहीं होंगे, और संस्कारके न होनेसे स्मरण नहीं होगा, इसलिए अवश्य वृत्ति माननी होगी, अतः 'किं वृत्त्या?' इसको छोड़कर दूसरा प्रश्न किया गया कि वृत्तिका बहिर्निर्गम क्यों माना जाता है ?

† बहिर्निर्गतवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य अपरोक्षज्ञान है, अनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य परोक्षज्ञान है, इस प्रकारका प्रत्यक्ष और परोक्षमें वैलक्षण्य केवल वृत्तिप्रयुक्त है, अतः वृत्तिनिर्गमन

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२५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अर्थेष्वाश्रयवृत्तिस्थचिद्भास्येष्वेवापरोक्षतः ॥
कल्प्यते निर्गमो वृत्तेः परोक्षेऽगतिकल्पना ॥११६॥

आश्रय (विषयाकार) वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे भासित होनेवाले अर्थोंमें अपरोक्षता होनेसे प्रत्यक्ष स्थलमें वृत्तिका निर्गम माना जाता है, और परोक्षस्थलमें वृत्तिनिर्गमकी कल्पना नहीं करते हैं ॥११६॥

अत्र केचिदाहुः—प्रत्यक्षस्थले विषयाधिष्ठानतया तदवच्छिन्नमेव चैतन्यं विषयप्रकाशः। साक्षात्तादात्म्यरूपसम्बन्धसम्भवे स्वरूपसम्बन्धस्य वाऽन्यस्य वा कल्पनायोगादिति तदभिव्यक्त्यर्थं युक्तो वृत्तिनिर्गमाभ्युपगमः।
परोक्षस्थले व्यवहिते वह्नयादौ वृत्तिसंसर्गायोगादिन्द्रियवदन्वयव्यति-


तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शाब्दबोध और अनुमितिमें जैसे करणविशेषसे वैलक्षण्यका प्रतिपादन किया गया है, वैसे ही प्रत्यक्ष, अनुमान आदिमें करणविशेषके आधारपर ही वैलक्षण्यकी उपपत्ति हो सकती है।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—प्रत्यक्षस्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्य ही विषयका अधिष्ठान है, अतः वही विषयावच्छिन्न चैतन्य विषयका प्रकाश है, [जीवचैतन्य नहीं है, क्योंकि जीवचैतन्य विषयके प्रति उपादान नहीं है, अतः उसके साथ विषयका तादात्म्य नहीं हो सकता] क्योंकि साक्षात्तादात्म्यसम्बन्धका सम्भव होनेपर स्वरूपसम्बन्धकी अन्य परम्परासम्बन्धकी कल्पना नहीं की जाती है, अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके ही विषयप्रकाशक होनेसे उसके आवरणके अभिभवके लिए वृत्तिका बाहर निकलना आवश्यक है।

अनुमिति आदि परोक्षस्थलमें व्यवहित वह्नि आदि विषयमें वृत्तिसंसर्गके न होनेसे और इन्द्रियके समान अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त वृत्तिके निकलनेके लिए किसी द्वारकी उपलब्धि न होनेसे अनिर्गत-


नहीं मानना चाहिए, यह वृत्तिनिर्गमवादीका कहना है, इसपर उत्तर दिया कि 'इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, और इन्द्रियाजन्यम् ज्ञानं परोक्षम्' इस प्रकारसे अपरोक्ष और परोक्षके वैलक्षण्यका उपपादन हो सकता है, क्योंकि अनुमिति और शाब्दमें भी अनुमानादिप्रयुक्त वैलक्षण्य ही है, अतः वृत्तिनिर्गमनकी कोई आवश्यकता नहीं है, यह भाव है।

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २४९

रेकशालिनो वृत्तिनिर्गमद्वारस्यानुपलम्भाच्चाऽनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यमेव स्वरूपसम्बन्धेन विषयगोचरमगल्याऽर्थादभ्युपगम्यते इति ।

साक्षात् प्रमातृसम्पर्के सुखादेरापरोक्ष्यतः ॥
अन्यत्राऽपि तथेत्याहुर्वृत्तेर्निर्गमनात् परे ॥११७॥

सुख आदिका अपरोक्षानुभव चैतन्यके साथ साक्षात् सम्बन्ध होनेके कारण ही होता है, अतः अन्यत्र घट आदि प्रत्यक्षस्थलमें भी चैतन्यके साथ वैसा ही सम्बन्ध होनेसे अपरोक्षानुभव होता है, इसलिए वृत्तिनिर्गमन है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥११७॥

अन्ये तु—अहङ्कारसुखदुःखादिष्वापरोक्ष्यं साक्षाच्चैतन्यसंसर्गेषु क्लृप्तमिति घटादावपि विषयसंसृष्टमेव चैतन्यमापरोक्ष्यहेतुरिति तदभिव्यक्तये वृत्तिनिर्गमं समर्थयन्ते ।

इतरे स्पष्टताहेतुमाचख्युर्वृत्तिनिर्गमम् ।
न चानुमितमाधुर्यं स्पष्टमास्वादिते यथा ॥११८॥

स्पष्ट ज्ञानके लिए वृत्तिका निर्गमन अवश्य होना चाहिए, क्योंकि अनुमानगम्य माधुर्य प्रत्यक्ष आस्वादित माधुर्यके समान स्पष्ट नहीं होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥११८॥

इतरे तु—शब्दानुमानावगतेभ्यः प्रत्यक्षावगते स्पष्टता तावदनुभूयते । नहि रसालपरिमलादिविशेषे शतवारमाप्तोपदिष्टेऽपि प्रत्यक्षाव-


वृत्तिसे युक्त चैतन्य ही स्वरूपसम्बन्धसे विषयका प्रकाशक है, ऐसा अर्थतः अगत्त्या स्वीकार किया जाता है ।

अहंकार, सुख, दुःख आदि विषयोंमें, जिनका कि साक्षात् चैतन्यके साथ तादात्म्य है, अपरोक्षता क्लृप्त है, अतः घट आदिमें भी विषयतादात्म्यापन्न चैतन्य ही अपरोक्षत्वका कारण होगा, इसलिए विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिए ही वृत्तिनिर्गमन अपेक्षित है, कुछ लोग ऐसा भी समर्थन करते हैं ।

अन्य लोग कहते हैं कि शब्द, अनुमान आदि प्रमाणोंसे ज्ञात अर्थोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षसे अवगत पदार्थमें अधिक स्पष्टता अनुभूत होती है, क्योंकि आमके परिमल (सुगन्ध), रस आदिके विषयमें आप्त पुरुष यदि सौ वार उपदेश करे, तो भी प्रत्यक्षसे ज्ञात वस्तुके समान उसमें स्पष्टता नहीं भासती है, क्योंकि

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२५०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

गत इव स्पष्टताऽस्ति । तदनन्तरमपि 'कथं तद् ?' इति जिज्ञासाऽनुवृत्तेः ।

न च शब्दान्माधुर्यमात्रावगमेऽपि रसालमाधुर्यादिवृत्त्यवान्तरजाति-विशेषवाचिशब्दाभावात्, तत्सत्त्वेऽपि श्रोत्रात्तस्याऽगृहीतसङ्गतिकत्वात् शब्दादसाधारणजातिविशेषावच्छिन्नमाधुर्यावगमो नास्तीति जिज्ञासाऽनु-वृत्तिर्युक्तेति शङ्क्यम्, 'रसाले सर्वातिशायी माधुर्यविशेषोऽस्ति' इत्य-स्माच्छब्दात्तद्गतावान्तरजातिविशेषस्याऽप्यवगमात् । नह्ययं विशेषशब्द-स्तद्गतविशेषं विहायान्यगतं विशेषं तत्र बोधयति, अप्रामाण्यापत्तेः । न च तद्गतमेव विशेषं विशेषत्वेन सामान्येन रूपेण बोधयति, न

उपदेशके अनन्तर भी वह कैसा है ? या वह किस प्रकारका है ? ऐसी जिज्ञासा बनी रहती है *।

यदि शङ्का हो कि 'आम्र-फलमें मधुर रस आदि हैं' इस प्रकारके सौ बार उपदिष्ट आप्तवाक्यसे केवल मधुर रसके ज्ञात होनेपर भी आमके माधुर्य आदिमें रहनेवाली अवान्तर जातिके बोधक शब्दका अभाव होनेसे और उसके बोधक शब्दके अस्तित्वमें भी श्रोत्रसे ( कानसे ) अवान्तर जाति-विशेषके वाचकशब्दकी शक्तिका ग्रहण न होनेसे उक्तशब्दसे (वाक्यसे) असाधारण जातिविशेषसे युक्त माधुर्यका ज्ञान नहीं होता, इसलिए उक्त स्थलमें जिज्ञासाकी अनुवृत्ति हुआ करती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'रसाले सर्वातिशायी माधुर्यविशेषोऽस्ति' ( आममें सबको मात करनेवाला माधुर्यविशेष है ) इस शब्दसे माधुर्यगत अवान्तरजातिविशेषका भी अवगम होता है, [ परन्तु प्रत्यक्षके समान स्पष्टता नहीं भासती है और जिज्ञासा रहती है ] क्योंकि यह वाक्यविशेष माधुर्यगत विशेषका बोधन न कर अन्यगत विशेषका बोधन करता है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा माननेसे वाक्यमें अप्रामाण्यापत्ति होगी और यह भी शङ्का नहीं कर सकते हैं कि माधुर्यगत जो विशेष है, उसका उक्त शब्द ⁑ सामान्यतः विशेषरूपसे बोध करता है,


* 'आममें बड़ी सुगन्ध और अत्यन्त मीठा रस है, इस विषयके किसी प्रामाणिक पुरुषके हजार बार कहनेपर भी निःसंशय रसादिका ज्ञान नहीं होता है, क्योंकि 'वह मीठा रस कैसा है ?' यह जिज्ञासा उपदेशके बाद भी बनी रहती है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि उक्त आप्तशब्दसे आमके माधुर्यका विशेषत्व विशेषरूप सामान्यधर्मसे गृहीत होता है, विशेषवृत्ति विशेषरूपसे गृहीत नहीं होता है, अतः जिज्ञासा होती है, यह शङ्काका

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २५१


विशिष्येति जिज्ञासेति वाच्यम्, प्रत्यक्षेणापि मधुररसविशेषणस्य जाति-
विशेषस्य स्वरूपत एव विषयीकरणेन जातिविशेषगतविशेपान्तराविषयी-
करणाद् जिज्ञासाऽनुवृत्तिप्रसङ्गात् ।
तस्मात् प्रत्यक्षग्राह्येऽभिव्यक्तापरोक्ष्यैकरसचैतन्यावगुण्ठनात् स्पष्टता
जिज्ञासानिवर्तनक्षमा, शब्दादिगम्ये तु तदभावादस्पष्टेति व्यवस्थाऽभ्यु-
पगन्तव्या । अत एव साक्षिवेद्यस्य सुखादेः स्पष्टता । शाब्दवृत्तिवेद्यस्याऽपि

विशेषतः विशेषरूपसे बोध नहीं करता है, इसलिए जिज्ञासा होती है, तो यह
भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षस्थलमें भी मधुर रसमें विशेषणरूपसे रहनेवाले
जातिविशेषका प्रत्यक्षसे स्वरूपतः ग्रहण होनेके कारण जातिविशेषमें
रहनेवाले विशेषान्तरका ग्रहण न होनेसे जिज्ञासाकी निवृत्ति नहीं होगी ।

इससे अर्थात् प्रत्यक्षसे अवगत पदार्थकी अपेक्षा शब्द आदिगम्य
पदार्थोंमें स्पष्टत्वके न होनेसे प्रत्यक्षसे गृहीत पदार्थमें अभिव्यक्त स्वप्रकाश
और एकरूप ब्रह्मचैतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे जिज्ञासाकी निवृत्ति करनेमें
समर्थ विषयताविशेषरूप स्पष्टता होती है, और शब्द आदि द्वारा गृहीत
पदार्थमें अभिव्यक्त चैतन्यके साथ तादात्म्य न होनेके कारण स्पष्टत्व नहीं
प्रतीत होता है, इस प्रकारकी व्यवस्था करनी चाहिए, अभिव्यक्त चैतन्यका
सम्बन्ध होनेसे ही साक्षीसे वेद्य सुख आदिमें स्पष्टता प्रतीत होती है । शब्द-
जन्यवृत्तिसे वेद्य ब्रह्ममें भी मनन आदिसे पूर्व अज्ञानकी निवृत्तिके न होनेसे


भाव है, इसपर उत्तरदाताका कहना है कि माधुर्यगत जातिविशेषमें रहनेवाला असाधारण
धर्म जातिरूप है या उपाधिरूप है ? जातिरूप तो नहीं हो सकता है, क्योंकि उसकी जातितामें
प्रमाण नहीं है और जातिमें उसका अंगीकार भी नहीं है, यदि उपाधिरूप मानेंगे, तो वह
उपाधि होगी—जातिविशेषाश्रयातिरिक्तवृत्तित्वे सति जातिविशेषाश्रयवृत्तित्वम्, अर्थात् जाति
विशेषके आश्रयसे भिन्नमें न रहकर जातिविशेषके आश्रयमें रहे । परन्तु यह भी युक्त
नहीं होगा, क्योंकि प्रत्यक्ष स्थलमें भी आमके माधुर्यके जातिविशेषमें प्रत्यक्षसे उसका ग्रहण
न होनेके कारण जिज्ञासाकी अनुवृत्ति होगी ।

* अर्थात् वृत्ति द्वारा अभिव्यक्त चैतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे प्रत्यक्ष ग्राह्य पदार्थोंमें
स्पष्टत्वकी प्रतीति होती है, इसके विना नहीं होती । इससे विषयमें रहनेवाली स्पष्टताका प्रयोजक
जो आवरणनिवृत्तिरूप विषयचैतन्याभिव्यक्ति है, उसकी सिद्धिके लिए वृत्तिका निर्गमन अपेक्षित
है, यह सूचित हुआ ।

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३५२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

ब्रह्मणो मननादेः प्रागज्ञानानिवृत्तावस्पष्टता, तदनन्तरं तन्निवृत्तौ स्पष्टतेति वृत्तिनिर्गममुपपादयन्ति ।

न चावरणविच्छेदः स्पष्टता तामनिर्गता ।
करोतु तुल्यविषयतत्तदज्ञाननाशिनी ॥११९॥

यदि शङ्का हो कि आवरणविच्छेदस्वरूप स्पष्टता अनिर्गत वृत्तिसे ही होगी, क्योंकि समानविषयक अज्ञानका समानविषयक वृत्तिज्ञान विनाश करता है ॥११९॥

नन्वेतावताऽपि विषयावरकाज्ञाननिवृत्त्यर्थं वृत्तिनिर्गम इत्युक्तम् । तदयुक्तम् । विषयावच्छिन्नचैतन्यगतस्य तदावरकाज्ञानस्यानिर्गतवृत्त्या निवृत्त्यभ्युपगमेऽप्यनतिप्रसङ्गात् । न च तथा सति देवदत्तीयघटज्ञानेन यज्ञदत्तीयघटाज्ञानस्यापि निवृत्तिप्रसङ्गः, समानविषयकत्वस्य सत्त्वात् ।


अस्पष्टता ही है और मनन आदिके बाद अज्ञानकी † निवृत्ति हो जानेसे ब्रह्ममें स्पष्टता प्रतीत होती है, अतः वृत्तिका बाहर निकलना अत्यन्त अपेक्षित है ।

शङ्का होती है कि इतने ग्रन्थसे अर्थात् 'अत्र केचिदाहुः' इत्यादि ग्रन्थसे भी यही कहा गया है—विषयको आवृत करनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिकी आवश्यकता है, परन्तु यह अयुक्त है, क्योंकि विषयावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले विषयावरक अज्ञानकी अनिर्गतवृत्तिसे यदि निवृत्ति मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है । यदि शङ्का हो कि ऐसा होनेपर देवदत्तके घटज्ञानसे यज्ञदत्तके भी घटाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, क्योंकि उनमें समानविषयकत्व ⁜


† 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यजन्य वृत्ति मनन आदिके अनुष्ठानके पूर्वमें असम्भावना और विपरीतभावनासे सर्वथा प्रतिबद्ध है, अतः वह मनन आदिके पूर्वमें अज्ञानकी निवर्तक नहीं है, और उसके बाद तो असम्भावना और विपरीतभावनाके निवृत्त होनेसे वह वृत्ति अज्ञानकी निवर्तक होगी और ब्रह्ममें स्पष्टत्वका अवगम करावेगी, यह भाव है ।

⁜ विषयको आवृत करनेवाला अज्ञान किसीके मतसे विषयमें रहता है और किसीके मतसे पुरुषमें रहता है, जो लोग पुरुषमें अज्ञान मानते हैं, उनके मतसे वृत्तिके निर्गमके बिना भी—अनिर्गत वृत्तिसे भी, अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, परन्तु जिनके मतसे विषयगत-अज्ञान अर्थात् विषयावच्छिन्नचैतन्यनिष्ठ अज्ञान है, उनके मतमें भी अनिर्गत वृत्तिसे अज्ञान-की निवृत्ति यदि मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, यदि इसपर शङ्का हो कि ज्ञान और अज्ञानके निवर्त्य-निवर्तकरूप विरोधमें समानाश्रयत्व होकर समानविषयकत्व प्रयोजक है। यदि वृत्तिका निर्गमन नहीं माना जायगा, तो केवल ज्ञान और अज्ञानमें समानाश्रयत्वके लब्ध न होनेसे केवल समानविषयकत्व ही प्रयोजक होगा, अतः देवदत्तीय घटज्ञानसे यज्ञदत्तीय

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २५३

अहमर्थविषयचैतन्यनिष्ठयोर्ज्ञानाज्ञानयोर्भिन्नाश्रयत्वेन तयोर्विरोधे समानाश्रयत्वस्याऽतन्त्रत्वादिति वाच्यम्। समानाश्रयविषयत्वं ज्ञानाज्ञानयोर्विरोधप्रयोजकमङ्गीकृत्य वृत्तिनिर्गमनाभ्युपगमेऽपि देवदत्तीयघटवृत्तेः यज्ञदत्तीयघटाज्ञानस्य च घटावच्छिन्नचैतन्यैकाश्रयत्वप्राप्त्याऽतिप्रसङ्गतादवस्थ्येन 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति यद्विषयावरकं, तत् तदीयन्तद्विषयकज्ञाननिवर्त्यम्' इति पृथगेव विरोधप्रयोजकस्य वक्तव्यतया समानाश्रयत्वस्याऽनपेक्षणात् ।
मैवं, परोक्षवृत्त्याऽपि मोहोच्छेदप्रसङ्गतः।
आपरोक्ष्यं तु नो जातिरांशिकत्वाच्च सङ्करात् ॥१२०॥

तो उक्त शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि परोक्षवृत्तिसे भी अज्ञानका विनाश प्रसक्त होगा और अपरोक्षत्व जाति भी नहीं है, क्योंकि आंशिक होनेसे सङ्करदोषसे दुष्ट है ॥१२०॥

अत्राहूः—वृत्तिनिर्गमनानभ्युपगमे ज्ञानाज्ञानयोर्विरोधप्रयोजकमेव दुर्निरूपम्। 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्याद्युक्तमिति चेत्, न; परोक्षज्ञानेनाऽपि विषयगताज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्गात् ।

हैं। कारण कि वृत्तिनिर्गमके न होनेसे अहमर्थ और विषयचैतन्यमें रहनेवाले क्रमशः ज्ञान और अज्ञानका असमानाश्रय होनेसे ज्ञान और अज्ञानके विरोधमें समानाश्वत्व प्रयोजक नहीं है, किन्तु समानविषयत्व ही प्रयोजक है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञान और अज्ञानके विरोधमें समानाश्रयत्वविशिष्ट समानविषयकत्वको प्रयोजक मान कर वृत्तिके निर्गमका अङ्गीकार करनेपर भी देवदत्तकी घटवृत्तिका और यज्ञदत्तके घटाज्ञानका घटावच्छिन्न चैतन्यरूप एक आश्रय होनेसे वृत्तिनिर्गमनपक्षमें भी अतिप्रसक्तिके तदवस्थ होनेसे 'यदज्ञानम्' (जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवारक हो, वह अज्ञान उस पुरुषके उस विषयके ज्ञानसे निवृत्त होता है) इस प्रकार अलग ही विरोधका प्रयोजक मानना होगा, इससे समानाश्रयत्वकी अपेक्षा ही नहीं है, [इससे वृत्तिनिर्गम व्यर्थ है, यह शङ्काका स्वरूप है]।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—वृत्तिका बहिर्निर्गमन न माना जाय, तो ज्ञान और अज्ञानके परस्पर विरोधके प्रयोजकका निरूपण ही नहीं हो सकेगा। यदि कहो कि 'यदज्ञानम्' इत्यादिसे विरोधके हेतुका


घटाज्ञान नष्ट होना चाहिए ? परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इसका उत्तर 'समानाश्रय' इत्यादि ग्रन्थसे दिया गया है।

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२५४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अपरोक्षत्वमपि निवर्तकज्ञानविशेषणमिति चेत्, किं तदपरोक्षत्वम् ? न तावज्जातिः । 'दण्ड्ययमासीत्' इति संस्कारोपनीतदण्डविशिष्टपुरुषविषयकस्य चाक्षुषज्ञानस्य दण्डांशेऽपि तत्सत्त्वे तत्रापि विषयगताज्ञाननिवृत्त्यापातात् । 'दण्डं साक्षात्करोमि' इति तदंशेऽप्यापरोक्ष्यानुभवापत्तेश्च । अननुभवेऽपि संस्कारं सन्निकर्षं परिकल्प्य इन्द्रियसन्निकर्षजन्यतया तत्र काल्पनिकापरोक्ष्याभ्युपगमे अनुमित्यादावपि लिङ्गज्ञानादिकं सन्निकर्षं परिकल्प्य तदङ्गीकारापत्तेः । दण्डांशे आपरोक्ष्यासत्त्वे तु तस्य

निरूपण किया ही जा चुका है, यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे परोक्षज्ञानसे भी विषयके अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी ।

यदि शङ्का हो कि अज्ञानके निवर्तक ज्ञानमें अपरोक्षत्व विशेषण देंगे, [ अर्थात् अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्तक होता है अन्य नहीं, अतः अपरोक्ष ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है ] यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपरोक्षत्व क्या है ? [ उसका निर्वचन करना होगा, तात्पर्य यह है कि ज्ञानमें जो अपरोक्षत्व विशेषण देते हैं, वह जातिरूप है या उपाधिरूप है ? ] जातिरूप नहीं हो सकता है, क्योंकि 'अयं दण्डी आसीत्' ( यह दण्डी था ) इस प्रकार संस्कारसे उपनीत दण्डसे युक्त पुरुषविषयक चाक्षुष ज्ञानके दण्ड अंशमें यदि अपरोक्षत्व जाति है, तो उसमें भी विषयके अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी * । अनुभव न होनेपर भी यदि दण्डांशमें संस्काररूप सन्निकर्षकी कल्पना करके इन्द्रियसन्निकर्षसे जन्य होनेके कारण उसमें काल्पनिक अपरोक्षत्वकी कल्पना की जाय, तो अनुमिति आदिमें भी लिङ्गज्ञान आदि सन्निकर्षकी† कल्पना करके—अपरोक्षत्वप्रसक्ति होगी । दण्ड अंशमें अपरोक्षत्व


* तात्पर्य यह है कि किसी समयमें दण्डसे युक्त विष्णुमित्रका ग्रहण हुआ था, कालान्तरमें दण्डरहित विष्णुमित्रको देखकर संस्कार और इन्द्रियसे ज्ञान होता है कि 'यह विष्णुमित्र दण्डी था'। यहां पर शङ्का होती है—इसमें दण्डांशमें प्रत्यक्षत्व है, या नहीं है। यदि प्रत्यक्षत्व माना जाय, तो दण्डांशमें अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी । इष्टापत्ति नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह दण्ड कैसा था, इस प्रकार जिज्ञासा होती है, यदि तद्गत अज्ञानकी निवृत्ति होती, तो यह जिज्ञासा उदित नहीं होती ।

† तात्पर्य यह है कि 'स्वविषयप्रत्यासत्तिः सन्निकर्षः' ( स्वविषयके साथ सम्बन्ध सन्निकर्ष है ) इस मतका अङ्गीकार करके संस्कारकी कल्पनाकर इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्वरूप कल्पनाके

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २५५


जातित्वायोगाद्, जातेर्व्याप्यवृत्तित्वनियमात् । तदनियमेऽप्यवच्छेदकोपा-
धिभेदानिरूपणेन तस्याव्याप्यवृत्तिजातित्वायोगाच्च ।

नाप्युपाधिः, तदनिर्वचनात् । इन्द्रियजन्यत्वमिति चेत्, न; साक्षि-
प्रत्यक्षाव्यापनात् । अनुमितिशाब्दज्ञानोपनीतगुरुत्वादि विशिष्टघटप्रत्यक्षे
विशेषणांशातिव्यापनाच्च । करणान्तराभावेन तदंशे परोक्षेऽप्युपनयसहकारि-


न माना जाय, तो अपरोक्षत्व जाति नहीं होगी, क्योंकि जाति सर्वदा व्याप्य-
वृत्ति हुआ करती है, यह नियम है, यदि 'जाति व्याप्यवृत्ति होती है' यह
नियम न माना जाय, तो भी अवच्छेदक उपाधियोंका निरूपण न हो सकनेसे
अपरोक्षत्व जाति अव्याप्यवृत्ति नहीं हो सकती है* ।

अपरोक्षत्व उपाधि भी नहीं है, क्योंकि उसका निर्वचन ही नहीं हो सकता,
यदि कहो कि इन्द्रियजन्यत्व ( इन्द्रियसे उत्पन्न होना ) अपरोक्षत्व है,
तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सुख आदिकी नित्यसाक्षीरूप प्रत्यक्षमें
अव्याप्ति हो जायगी । और अनुमितिसे एवं शब्दजन्य ज्ञानसे उपनीत
गुरुता आदिसे विशिष्ट घटके प्रत्यक्षमें विशेषणीभूत गुरुत्वमें उक्त लक्षणकी
अतिव्याप्ति हो जायगी † । क्योंकि गुरुत्वमें प्रत्यक्षत्वसम्पादक अन्य
करणके न होनेसे गुरुत्वांशके परोक्ष होनेपर भी उपनयकी सहकारितासे


आधारपर दण्डांशमें अपरोक्षत्वकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि लिङ्गज्ञान आदि
सन्निकर्षकी कल्पना करके अनुमिति आदिमें अपरोक्षत्वका अङ्गीकार प्रसक्त होगा, यदि दण्डांशमें
अपरोक्षत्व न माना जाय, तो 'दण्डी विष्णुमित्र आसीत्' इत्यादि प्रत्यभिज्ञानात्मक एक ज्ञानमें
स्मृतित्व और अपरोक्षत्वके रहनेसे सङ्कर हो जायगा, इसलिए अपरोक्षत्व जाति नहीं हो सकती,
क्योंकि जो जाति होती है, वह व्याप्यवृत्ति होती है, यह नियम है।

* भाव यह है कि यदि जाति व्याप्यवृत्ति न मानी जाय, तो भी प्रत्यभिज्ञामें विष्णुमित्र अंशमें
प्रत्यक्षत्व और दण्ड अंशमें तदभाव मानना चाहिए, परन्तु वह तभी उपपन्न हो सकता है,
जब कि उपाधिभेद माना जाय, क्योंकि अवच्छेदकके भेदसे ही प्रतियोगी और तदभावकी
अवस्थिति एकत्र रहती है, प्रकृतमें उपाधिभेदका निरूपण अशक्य है, इसलिए अपरोक्षत्वमें
( समानाधिकरणात्यन्ताभावप्रतियोगित्वरूप, स्व के आश्रयमें ही स्व का अभाव हो ) अव्याप्य
वृत्तित्वके असम्भव होनेसे व्याप्यवृत्ति ही जाति होगी, अतः पूर्वोक्त दोष तदवस्थ ही रहेगा।

† अर्थात् जिस घटमें शब्दसे या अनुमानसे गुरुत्वका अनुभव किया गया है, उस घटके
साथ इन्द्रियसम्बन्ध होनेपर 'घटोऽयं गुरुः' ( यह घड़ा वजनदार है ), ऐसा प्रत्यक्ष होता
है। इसमें विशेषणीभूत गुरुत्वमें अतिव्याप्ति होगी, अतः इन्द्रियजन्यत्व प्रत्यक्षका लक्षण
युक्त नहीं है।

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