सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextवृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २४९
रेकशालिनो वृत्तिनिर्गमद्वारस्यानुपलम्भाच्चाऽनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यमेव स्वरूपसम्बन्धेन विषयगोचरमगल्याऽर्थादभ्युपगम्यते इति ।
साक्षात् प्रमातृसम्पर्के सुखादेरापरोक्ष्यतः ॥
अन्यत्राऽपि तथेत्याहुर्वृत्तेर्निर्गमनात् परे ॥११७॥
सुख आदिका अपरोक्षानुभव चैतन्यके साथ साक्षात् सम्बन्ध होनेके कारण ही होता है, अतः अन्यत्र घट आदि प्रत्यक्षस्थलमें भी चैतन्यके साथ वैसा ही सम्बन्ध होनेसे अपरोक्षानुभव होता है, इसलिए वृत्तिनिर्गमन है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥११७॥
अन्ये तु—अहङ्कारसुखदुःखादिष्वापरोक्ष्यं साक्षाच्चैतन्यसंसर्गेषु क्लृप्तमिति घटादावपि विषयसंसृष्टमेव चैतन्यमापरोक्ष्यहेतुरिति तदभिव्यक्तये वृत्तिनिर्गमं समर्थयन्ते ।
इतरे स्पष्टताहेतुमाचख्युर्वृत्तिनिर्गमम् ।
न चानुमितमाधुर्यं स्पष्टमास्वादिते यथा ॥११८॥
स्पष्ट ज्ञानके लिए वृत्तिका निर्गमन अवश्य होना चाहिए, क्योंकि अनुमानगम्य माधुर्य प्रत्यक्ष आस्वादित माधुर्यके समान स्पष्ट नहीं होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥११८॥
इतरे तु—शब्दानुमानावगतेभ्यः प्रत्यक्षावगते स्पष्टता तावदनुभूयते । नहि रसालपरिमलादिविशेषे शतवारमाप्तोपदिष्टेऽपि प्रत्यक्षाव-
वृत्तिसे युक्त चैतन्य ही स्वरूपसम्बन्धसे विषयका प्रकाशक है, ऐसा अर्थतः अगत्त्या स्वीकार किया जाता है ।
अहंकार, सुख, दुःख आदि विषयोंमें, जिनका कि साक्षात् चैतन्यके साथ तादात्म्य है, अपरोक्षता क्लृप्त है, अतः घट आदिमें भी विषयतादात्म्यापन्न चैतन्य ही अपरोक्षत्वका कारण होगा, इसलिए विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिए ही वृत्तिनिर्गमन अपेक्षित है, कुछ लोग ऐसा भी समर्थन करते हैं ।
अन्य लोग कहते हैं कि शब्द, अनुमान आदि प्रमाणोंसे ज्ञात अर्थोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षसे अवगत पदार्थमें अधिक स्पष्टता अनुभूत होती है, क्योंकि आमके परिमल (सुगन्ध), रस आदिके विषयमें आप्त पुरुष यदि सौ वार उपदेश करे, तो भी प्रत्यक्षसे ज्ञात वस्तुके समान उसमें स्पष्टता नहीं भासती है, क्योंकि
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