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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 283 of 590

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Page 283

वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २५३

अहमर्थविषयचैतन्यनिष्ठयोर्ज्ञानाज्ञानयोर्भिन्नाश्रयत्वेन तयोर्विरोधे समानाश्रयत्वस्याऽतन्त्रत्वादिति वाच्यम्। समानाश्रयविषयत्वं ज्ञानाज्ञानयोर्विरोधप्रयोजकमङ्गीकृत्य वृत्तिनिर्गमनाभ्युपगमेऽपि देवदत्तीयघटवृत्तेः यज्ञदत्तीयघटाज्ञानस्य च घटावच्छिन्नचैतन्यैकाश्रयत्वप्राप्त्याऽतिप्रसङ्गतादवस्थ्येन 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति यद्विषयावरकं, तत् तदीयन्तद्विषयकज्ञाननिवर्त्यम्' इति पृथगेव विरोधप्रयोजकस्य वक्तव्यतया समानाश्रयत्वस्याऽनपेक्षणात् ।
मैवं, परोक्षवृत्त्याऽपि मोहोच्छेदप्रसङ्गतः।
आपरोक्ष्यं तु नो जातिरांशिकत्वाच्च सङ्करात् ॥१२०॥

तो उक्त शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि परोक्षवृत्तिसे भी अज्ञानका विनाश प्रसक्त होगा और अपरोक्षत्व जाति भी नहीं है, क्योंकि आंशिक होनेसे सङ्करदोषसे दुष्ट है ॥१२०॥

अत्राहूः—वृत्तिनिर्गमनानभ्युपगमे ज्ञानाज्ञानयोर्विरोधप्रयोजकमेव दुर्निरूपम्। 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्याद्युक्तमिति चेत्, न; परोक्षज्ञानेनाऽपि विषयगताज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्गात् ।

हैं। कारण कि वृत्तिनिर्गमके न होनेसे अहमर्थ और विषयचैतन्यमें रहनेवाले क्रमशः ज्ञान और अज्ञानका असमानाश्रय होनेसे ज्ञान और अज्ञानके विरोधमें समानाश्वत्व प्रयोजक नहीं है, किन्तु समानविषयत्व ही प्रयोजक है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञान और अज्ञानके विरोधमें समानाश्रयत्वविशिष्ट समानविषयकत्वको प्रयोजक मान कर वृत्तिके निर्गमका अङ्गीकार करनेपर भी देवदत्तकी घटवृत्तिका और यज्ञदत्तके घटाज्ञानका घटावच्छिन्न चैतन्यरूप एक आश्रय होनेसे वृत्तिनिर्गमनपक्षमें भी अतिप्रसक्तिके तदवस्थ होनेसे 'यदज्ञानम्' (जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवारक हो, वह अज्ञान उस पुरुषके उस विषयके ज्ञानसे निवृत्त होता है) इस प्रकार अलग ही विरोधका प्रयोजक मानना होगा, इससे समानाश्रयत्वकी अपेक्षा ही नहीं है, [इससे वृत्तिनिर्गम व्यर्थ है, यह शङ्काका स्वरूप है]।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—वृत्तिका बहिर्निर्गमन न माना जाय, तो ज्ञान और अज्ञानके परस्पर विरोधके प्रयोजकका निरूपण ही नहीं हो सकेगा। यदि कहो कि 'यदज्ञानम्' इत्यादिसे विरोधके हेतुका


घटाज्ञान नष्ट होना चाहिए ? परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इसका उत्तर 'समानाश्रय' इत्यादि ग्रन्थसे दिया गया है।