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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 270 of 590

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Page 270
२४०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सामान्यकार्यकारणभावाभ्युपगमे बीजान्तरादङ्कुरान्तरोत्पत्त्यादिप्रसङ्गः, तद्विषयत्वेन ततोऽजागलस्तनायमानविशेषकार्यकारणभावासिद्धेः ।

न चाऽत्राऽपि 'द्रव्यप्रत्यक्षे द्रव्यसंयोगः कारणम्' इति सामान्यनियममात्रोपगमे अन्यसंयोगादन्यद्रव्यप्रत्यक्षापत्तिरिति अतिप्रसङ्गोऽस्तीति वाच्यम् ; 'तत्तद्द्रव्यप्रत्यक्षे तत्तद्द्रव्यसंयोगः कारणम्' इति नियमाभ्युपगमात् ; अन्यथा तृतीय नियमेऽप्यतिप्रसङ्गस्य दुर्वारत्वात् ; तस्मान्नास्ति क्लृप्तनियमभङ्गप्रसङ्गः ।

युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त जो 'यत्सामान्ये' यह न्याय है, वह भी वहींपर प्रवृत्त होता है, जहां बीज आदि स्थलमें केवल सामान्य कार्यकारणभाव माननेमें बीजान्तरसे अङ्कुरान्तरकी उत्पत्ति प्रसक्त होती है अर्थात् सामान्य कार्यकारणभावका जहाँ अतिप्रसङ्ग होता है, वहाँ यह न्याय प्रवृत्त होता है, अन्यत्र नहीं, इसलिए उक्त न्यायसे अजागलस्तनके † समान निरर्थक उक्त विशेष कार्यकारणभावकी सिद्धि नहीं होती है ।

यदि शङ्का हो कि 'द्रव्य प्रत्यक्षमें द्रव्यसंयोग कारण है' इस प्रकारके केवल सामान्य नियमके माननेपर अन्य संयोगसे अन्य द्रव्यके प्रत्यक्षकी आपत्ति आ सकती है, इसलिए अतिप्रसङ्ग है [ अतः उक्त तृतीय नियम मानना अत्यन्त आवश्यक है ] तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तत्-तत् द्रव्यके प्रत्यक्षमें तत्-तत् द्रव्यसंयोग कारण है, इस प्रकारका नियम माननेसे भी * अतिप्रसङ्गका परिहार हो सकता है । यदि उक्तन्यायसे तृतीय नियमकी कल्पना की जायगी, तो उसमें भी अतिप्रसङ्गका परिहार नहीं हो सकता है, इससे उक्त नियमके भङ्गकी प्रसक्ति नहीं है ।


† बकरीके गलेमें लटकनेवाले लम्बे स्तनको अजागलस्तन कहते हैं, जैसे वे बकरीके स्तन किसी काममें नहीं आते हैं, निरर्थक हैं, वैसे ही प्रकृतमें विशेषनियमकी कोई आवश्यकता न होनेसे वह निरर्थक है, यह भाव है ।

* अङ्कुरसामान्यके प्रति बीजसामान्यको कारण माननेसे अन्य बीजसे अन्य अङ्कुरकी उत्पत्तिकी प्रसङ्ग आ सकता है, इसलिए सामान्यनियममें बाधक होने से जैसे तत्-तत् अङ्कुरकी उत्पत्तिके प्रति तत्-तत् बीज ही कारण माना जाता है, वैसे ही तत्-तत् द्रव्यके प्रत्यक्षके प्रति तत्-तत् द्रव्यसंयोगव्यक्तिको कारण मानना चाहिए, इससे अन्य द्रव्यके संयोगसे अन्य द्रव्यके प्रत्यक्षकी आपत्ति नहीं है, इसपर भी यदि तृतीय नियमका अङ्गीकार किया