सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context२४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
स्थस्य रजतस्याऽऽपरोक्ष्यानुपपत्तेः। ख्यातिबाधानुपपत्त्यादिभिर्भ्रमविषयस्याऽनिर्वचनीयत्वसिद्धेश्च।
न चाऽधिष्ठानसम्प्रयोगमात्रात् प्रातिभासिकस्यैन्द्रियकत्वोपगमे शुक्तिरजताध्याससमये तत्रैव कालान्तरे अध्यसनीयस्य रङ्गस्याऽपि चाक्षुषत्वं
रूपसे रजतकी प्रतीति ) एवं बाधकी अनुपपत्ति आदिसे भ्रमज्ञानके विषय अनिर्वचनीयत्व ही सिद्ध होता है ।
शङ्का होती है कि यदि केवल अधिष्ठानके सम्प्रयोगसे ही प्रातिभासिक रजतादिमें इन्द्रियजन्य ज्ञानकी विषयताका स्वीकार करते हो, तो शुक्तिमें ही कालान्तरमें अध्यस्त होनेवाले रङ्गका भी शुक्तिरजताध्यासके समयमें चक्षुसे ग्रहण
तुल्ययुक्तिसे उस नियमका यही संकोच क्यों न किया जाय कि प्रमामें संन्निकर्ष कारण है, और भ्रममें कारण नहीं है, क्योंकि नैयायिकोंका मत है कि भ्रमका विषय है देशान्तरस्थ रजत, इस विषयमें अन्य वादियोंने शङ्का की है कि असन्निकृष्ट रजतका प्रत्यक्ष कैसे होगा ? तब नैयायिकोंने उत्तर दिया है कि 'प्रत्यक्षमें सन्निकर्ष कारण है' इस नियमका जैसे आप व्यावहारिक पदार्थप्रत्यक्षविषयत्वरूपसे संकोच करते हैं, वैसे हमारे मतमें 'प्रमा-प्रत्यक्षमें सन्निकर्ष कारण है' इस प्रकार संकोच कर सकते हैं, अतः नैयायिकोंके मतमें कोई दोष नहीं है । इसलिए नैयायिकाभिमत उक्त नियमका संकोच भी प्राप्त हो सकता है और शुक्तिरजतस्थलमें देशान्तरस्थ रजतकी प्राप्ति होनेसे अन्यथाख्यातिवाद प्रसक्त हो सकता है, अनिर्वचनीयवाद नहीं, इसपर उत्तर दिया जाता है—विषयप्रत्यक्षत्वमें इन्द्रियसन्निकृष्टत्व प्रयोजक नहीं है, किन्तु अभिव्यक्त चैतन्याभिन्नत्व ही प्रयोजक है, इसका विचार भी आगे किया जायगा । इसलिए यदि शुक्ति-रजतको देशान्तरस्थ ही माना जायगा, तो अभिव्यक्त चैतन्याभेदका असम्भव होनेसे उस रजतका प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा, अतः अभिव्यक्त चैतन्यके अभेदके लिए अवश्य शुक्तिदेशोत्पन्न रजत ही मानना चाहिए । तथा ख्याति और बाधकी अनुपपत्तिसे भी अनिर्वचनीय रजत ही सिद्ध होगा, क्योंकि ख्याति शब्दका अर्थ है—अपरोक्ष प्रतीति, शुक्ति रजतके देशान्तरस्थ होनेपर उसकी अपरोक्षप्रतीति नहीं हो सकती है, और उसे असत् माननेपर भी नहीं हो सकती है, अतः यही प्रतीति शुक्ति-रजतमें असत्त्व और देशान्तरस्थत्वका निरास करती है, और बाधक प्रतीति है—तीनों कालमें भी यह रजत नहीं है, इस बाधक प्रतीतिसे रजतसमयमें भी शुक्तिमें रजतका अभाव सिद्ध होता है, अब देखिये कि यदि शुक्तिमें रजत नहीं है, तो उसकी ख्याति अपरोक्षप्रतीति नहीं होगी, यदि शुक्तिमें रजत सत्य होगा, तो उसका बाध नहीं होगा, क्योंकि सत्य शुक्तित्वका उसमें बाध नहीं होता है, अतः इस प्रकारके ख्याति और बाधकी अनुपपत्तिसे रजतमें अनिर्वचनीयत्वकी भी सिद्धि होती है, अतः पूर्वोक्त रीतिसे किया हुआ नियमका संकोच ही युक्त है ।