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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 266 of 590

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Page 266
२३६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

स्वरूपतोऽध्यस्यमानस्यैव तिक्तरसस्यैन्द्रियकत्वस्फुटीकरणाच्च । अन्यथा तत्र रसनाव्यापारापेक्षाऽनुपपत्तेः ।

तस्मादुदाहृतनैल्यध्यासस्थलेष्वधिष्ठानसम्प्रयोगादेव तद्गोचरचाक्षुषवृत्तिसमकालोदयोऽध्यासः तस्या वृत्तेर्विषय इति तस्य चाक्षुषत्वमभ्युपगन्तव्यम् । रूपं विना केवलाधिष्ठानगोचरवृत्त्यभावे च विषयचैतन्याभिव्यक्त्यभावेन जलतदध्यस्तनैल्य्यादीनां तद्भास्यत्वायोगात् । तिक्तरसाध्यासस्थले त्वधिष्ठानाध्यासयोरेकेन्द्रियग्राह्यत्वाभावात् त्वगिन्द्रियजन्याधिष्ठानगोचरवृत्त्या तदवच्छिन्नचैतन्याभिव्यक्तौ पित्तोपहतरसनसम्प्रयोगादेव तत्र

वाले पञ्चपादिकाग्रन्थसे स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्तरसमें ही इन्द्रियजन्यज्ञान-विषयत्वका स्पष्टीकरण किया गया है, अन्यथा अर्थात् आरोप्य तिक्तरस यदि इन्द्रियका विषय न माना जाय, तो बालकको तिक्तत्वके अवभासमें रसनाके व्यापारकी अपेक्षा ही नहीं † होगी ।

इससे * जिन नैल्य आदिके अध्यासोंका कथन किया गया है, उन अध्यास स्थलोंमें अधिष्ठानके सम्प्रयोगसे ही अधिष्ठानविषयक चाक्षुषवृत्तिके समकालमें उत्पन्न होनेवाले नीलरूप आदि अध्यास—अध्यस्त पदार्थ—उस वृत्तिके विषय होते हैं, इससे उस अध्यासको चक्षुसे जन्य मानना चाहिए। रूपके विना केवल अधिष्ठान-विषयक वृत्तिके न होनेपर अर्थात् आरोपित पीतरूप आदिसे विशिष्ट शङ्ख आदि अधिष्ठानविषयक वृत्तिका स्वीकार न होनेपर विषयावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेसे जल आदि तथा उससे अवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्त नीलरूप आदिका चैतन्यसे अवभास ही नहीं होगा । तीतेपनका [ जिस स्थलमें बालकको दुग्धमें ] अध्यास होता है, उस स्थलमें, तो अधिष्ठान और अध्यासका एक इन्द्रियसे ग्रहण न होनेके कारण त्वक् इन्द्रियसे उत्पन्न अधिष्ठानको विषय करनेवाली वृत्तिसे मधुर आदि द्रव्यरूप अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर पित्तदोषसे दूषित रसनाके सम्प्रयोगसे ही अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यमें


† अधिष्ठानभूत मधुर द्रव्यका रसनासे प्रत्यक्ष होनेके कारण परिशेषात् स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्त रसमें ही रसनेन्द्रियजन्यवृत्तिविषयत्व है, ऐसा स्पष्ट किया गया, अतः यह ग्रन्थ आरोप्यके ऐन्द्रियकत्व होनेमें प्रमाण है, यह भाव है।

* अर्थात् अध्यस्यमान पदार्थको जो साक्षिभास्य मानते हैं, उनके मतमें पीतशङ्ख आदि अध्यासोंमें चक्षुकी अनुपयोगिताके परिहारका असम्भव होनेसे, यह अर्थ है ।