सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextवृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २५१
विशिष्येति जिज्ञासेति वाच्यम्, प्रत्यक्षेणापि मधुररसविशेषणस्य जाति-
विशेषस्य स्वरूपत एव विषयीकरणेन जातिविशेषगतविशेपान्तराविषयी-
करणाद् जिज्ञासाऽनुवृत्तिप्रसङ्गात् ।
तस्मात् प्रत्यक्षग्राह्येऽभिव्यक्तापरोक्ष्यैकरसचैतन्यावगुण्ठनात् स्पष्टता
जिज्ञासानिवर्तनक्षमा, शब्दादिगम्ये तु तदभावादस्पष्टेति व्यवस्थाऽभ्यु-
पगन्तव्या । अत एव साक्षिवेद्यस्य सुखादेः स्पष्टता । शाब्दवृत्तिवेद्यस्याऽपि
विशेषतः विशेषरूपसे बोध नहीं करता है, इसलिए जिज्ञासा होती है, तो यह
भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षस्थलमें भी मधुर रसमें विशेषणरूपसे रहनेवाले
जातिविशेषका प्रत्यक्षसे स्वरूपतः ग्रहण होनेके कारण जातिविशेषमें
रहनेवाले विशेषान्तरका ग्रहण न होनेसे जिज्ञासाकी निवृत्ति नहीं होगी ।
इससे अर्थात् प्रत्यक्षसे अवगत पदार्थकी अपेक्षा शब्द आदिगम्य
पदार्थोंमें स्पष्टत्वके न होनेसे प्रत्यक्षसे गृहीत पदार्थमें अभिव्यक्त स्वप्रकाश
और एकरूप ब्रह्मचैतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे जिज्ञासाकी निवृत्ति करनेमें
समर्थ विषयताविशेषरूप स्पष्टता होती है, और शब्द आदि द्वारा गृहीत
पदार्थमें अभिव्यक्त चैतन्यके साथ तादात्म्य न होनेके कारण स्पष्टत्व नहीं
प्रतीत होता है, इस प्रकारकी व्यवस्था करनी चाहिए, अभिव्यक्त चैतन्यका
सम्बन्ध होनेसे ही साक्षीसे वेद्य सुख आदिमें स्पष्टता प्रतीत होती है । शब्द-
जन्यवृत्तिसे वेद्य ब्रह्ममें भी मनन आदिसे पूर्व अज्ञानकी निवृत्तिके न होनेसे
भाव है, इसपर उत्तरदाताका कहना है कि माधुर्यगत जातिविशेषमें रहनेवाला असाधारण
धर्म जातिरूप है या उपाधिरूप है ? जातिरूप तो नहीं हो सकता है, क्योंकि उसकी जातितामें
प्रमाण नहीं है और जातिमें उसका अंगीकार भी नहीं है, यदि उपाधिरूप मानेंगे, तो वह
उपाधि होगी—जातिविशेषाश्रयातिरिक्तवृत्तित्वे सति जातिविशेषाश्रयवृत्तित्वम्, अर्थात् जाति
विशेषके आश्रयसे भिन्नमें न रहकर जातिविशेषके आश्रयमें रहे । परन्तु यह भी युक्त
नहीं होगा, क्योंकि प्रत्यक्ष स्थलमें भी आमके माधुर्यके जातिविशेषमें प्रत्यक्षसे उसका ग्रहण
न होनेके कारण जिज्ञासाकी अनुवृत्ति होगी ।
* अर्थात् वृत्ति द्वारा अभिव्यक्त चैतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे प्रत्यक्ष ग्राह्य पदार्थोंमें
स्पष्टत्वकी प्रतीति होती है, इसके विना नहीं होती । इससे विषयमें रहनेवाली स्पष्टताका प्रयोजक
जो आवरणनिवृत्तिरूप विषयचैतन्याभिव्यक्ति है, उसकी सिद्धिके लिए वृत्तिका निर्गमन अपेक्षित
है, यह सूचित हुआ ।