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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

About this granth

The Siddhantaleshasangraha (सिद्धान्तलेशसंग्रह) is a work on Advaita Vedanta by the sixteenth-century polymath Appayya Dikshita. After Shankara, Advaita teachers differed on many questions: where ignorance resides and what it veils, the nature of the individual soul and of God, whether souls are one or many, and how knowledge of Brahman arises. Appayya gathers these views concisely without taking sides, and the work remains a key guide to the schools of post-Shankara Vedanta.

It has four chapters following the order of the four books of the Brahma Sutras. This edition gives the text with a Hindi translation and notes by Vedantacharya Pandit Mulshankar Vyas, edited by Pandit Chandiprasad Shukla Shastri, principal of the J. G. Goenka Sanskrit College, and Pandit Shrikrishna Pant Shastri, head of the Achyut Granthamala.

It is the sixth volume of section B of the Achyut Granthamala, first published at Kashi by Gaurishankar Goenka in Samvat 1993 (1936) and printed by N. R. Soman at the Lakshminarayan Press, Benares. It runs to 590 pages.

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सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २२९


तरङ्गादिग्राहकासमवधानेन च शौक्ल्यजलराशित्वादिविशेषदर्शनसामग्र्य-भावाञ्छिलातलत्वाद्यध्यासः । विस्तृते पटे परिणाहरूपविशेषदर्शनसामग्री-सत्त्वान्न पुण्डरीकमुकुलत्वाध्यासः; कर्तनादिविघटिततदाकारे तदभावात्तद-ध्यास इति ।

हो सकता है *, क्योंकि अध्यासके कारणभूत नियत नीलरूप दोषसे, और दूर होनेसे नीरत्वके अभिव्यञ्जक तरङ्ग आदिका ग्रहण करनेवाले साधनोंका समवधान न होनेसे शुक्लरूप, जलराशित्व आदि विशेषोंके दर्शनकी सामग्रीका अभाव है † । और विस्तृत वस्त्रमें इसलिए कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास नहीं होता है कि उस समयमें विस्ताररूप विशेषदर्शनकी सामग्री है, और कतरनेसे कमलाकार हो जानेसे विस्ताररूप विशेषदर्शनकी सामग्रीके न होनेसे उसमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास होता है ‡ ।


* तात्पर्य यह है कि जलमें जो नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है, उसमें शुक्लरूपात्मक विशेषका परिज्ञान या जलत्वरूप विशेषका परिदर्शन प्रतिबन्धक है, और इन विशेषदर्शनोंकी सामग्री भी प्रतिबन्धक होगी, इसलिए इन विशेषोंके परिज्ञानकी सामग्रीका अभाव होनेसे ही जलमें नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है। पहले जलमें नैल्यका अध्यास होनेके बाद सादृश्यज्ञानके द्वारा होनेसे उसमें नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है, यह बात नहीं है, दूरस्थ समुद्रजलमें तथा समीपस्थ समुद्रके जलमें नैल्यका नियमतः अध्यास होता है, अतः उसमें नैल्यकाभ्यास नियत से शुक्लरूप, जलत्व आदि विशेषके ग्रहणकी सामग्री अप्रतिबद्ध नहीं है, क्योंकि नैल्यके अभ्याससे शुक्ल रूपकी ग्राहक सामग्री प्रतिबद्ध हो गई है और जलत्वके व्यञ्जक तरङ्ग आदिके ग्रहणका भी दूरत्व दोषसे सन्निधान नहीं है, इसलिए जलत्वका भी ग्रहण नहीं होता है, अतः उक्त प्रतिबन्धक दो ज्ञानोंकी सामग्रीका अभाव होनेसे समुद्रजलमें नीलशीलातलत्वका अध्यास हो सकता है, यह भाव है।

† यहाँपर धर्मिज्ञानमें कारणत्ववादियोंका मत यह है कि समुद्रके जलमें उक्त प्रकारसे विशेषदर्शनसामग्रीका अभाव अपेक्षित है, तथापि उतनेसे ही उसमें वह अध्यास नहीं हो सकता, किन्तु प्रथम जलमें नीलरूपके अध्याससे नीलशिलातलके सादृश्यकी प्रसक्ति होगी और उसके बाद जलमें नीलशिलातलत्वका अध्यास होगा, इसलिए दूरसे समुद्रजलमें उक्त अध्यास करनेवाले समुद्रके पास जाकर कहते हैं कि इस समुद्रके जलमें दूरसे नीलत्व, निश्चलत्व आदिकी समानतासे नीलशिलातलत्वका अध्यास हमें हुआ था, परन्तु अब वह निवृत्त हो गया, इस प्रकारके लोकव्यवहारके देखनेसे सादृश्यज्ञान ही दोषरूपसे अध्यासके प्रति कारण होता है, केवल विशेषदर्शनकी सामग्रीका अभाव नहीं।

‡ अध्यासके प्रति विशेषदर्शनकी सामग्रीके अभावको जो कारण मानते हैं, उनके प्रति ‘स्वतः पद्मपुटे’ (पृ० २२५) इत्यादिसे सादृश्यज्ञानके कारणत्वकी सिद्धिके लिए अन्वय और


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३३०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

नन्वेवं करस्पृष्टे लोहशकले तदीयनीलरूपविशेषदर्शनसामग्र्यभावात् रजताध्यासः किं न भवेत्? सादृश्यज्ञानानपेक्षणादिति चेद्; भवत्येव; किन्तु ताम्रादिन्यावर्तकविशेषदर्शनसामग्र्यभावात् तदध्यासेनाऽपि भाव्यमिति क्वचिदनेकाध्यासे संशयगोचरो भवति। क्वचित्तु रजतप्राये कोशगृहादौ रजताध्यास एव भवति। क्वचित् सत्यपि सादृश्यज्ञाने शुक्तिकादौ कदाचित् करणदोषाद्यभावेनाऽध्यासानुदयवदध्यासानुदयेऽपि न हानिः।

इस विषयमें एक शङ्का होती है वह यह कि यदि सादृश्यज्ञानके विना केवल विशेषदर्शनकी सामग्रीके अभावसे ही अध्यासकी उत्पत्ति होती है, ऐसा माना जाय, तो लोहेके टुकड़ेको हाथसे छूनेपर उसमें रजतका अध्यास क्यों नहीं होता है? क्योंकि लोहेके नीलरूपविशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव उस स्थलमें है, परन्तु यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें लोहेके टुकड़ेमें रजतका अध्यास होता ही है। किन्तु ताम्र आदिकी व्यावृत्ति करने-वाली विशेषदर्शनकी सामग्रीका अभाव होनेसे ताम्र आदिका अध्यास भी हो सकता है, इस प्रकार हाथोंसे स्पृष्ट लोहेके टुकड़ेमें अनेक अध्यास—अध्यस्त वस्तुएँ—संशयके विषय होते हैं, [अर्थात् यह रजत है या ताम्र है अथवा सुवर्ण है, इस तरह संशय होता है]। किसी स्थलमें अर्थात् जिस खजानेमें † रजतका ही आधिक्य है, ऐसे स्थानमें तो लोहेमें रजतका ही अध्यास होता है। जैसे सादृश्यज्ञानके रहनेपर भी शुक्ति आदिमें—कदाचित् करण-दोषके अभावसे—रजतका अध्यास नहीं होता है, वैसे ही हमारे मतमें भी कदाचित् अध्यास नहीं हो, तो भी हानि नहीं है।


व्यतिरेक दिखाये गये हैं, उसीका 'विस्तृते पटे' इत्यादिसे खण्डन किया गया है, अर्थात् लम्बे घटमें जो पटका विस्तार देखा जाता है वही अध्यासमें प्रतिबन्धक है और कैंचीसे ठीक उसकी कमलाकृति बना लेनेपर उसमें उक्त सामग्रीके अभावसे कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास हो सकता है, अतः सादृश्यज्ञान अपेक्षित नहीं है, यह प्रकृतमें भाव है।

† जिसमें सदा रजत ही रखा जाता है, ऐसे कोशगृहमें प्राप्त पुरुष को, दैवसे किसी लोहेके टुकड़ेको छूनेपर भी उसमें उसे रजतका ही अध्यास होता है, क्योंकि उस कोशगृहमें लोहेकी सम्भावना ही उसे नहीं है, इसलिए ऐसे स्थलमें रजत है, या ताम्र है, ऐसा संशयात्मक अध्यास नहीं होता है। और जहाँ ऐसी स्थिति नहीं है वहाँ तो मूलोक्त रीतिसे संशय होता ही है, यह भाव है।

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सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित १३१

तस्मान्न कार्यकल्प्या इदमाकारवृत्तिः, नाऽप्यप्रतिबद्देदमर्थसम्प्रयोग-
कारणकल्प्या; ततो भवन्त्या एवेदंवृत्तेर्दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगक्षुभिताविद्या-
परिणामभूतस्वसमानकालरजतविषयत्वस्याऽस्माभिरुच्यमानत्वात् । तत्र च
ज्ञानसमानकालोत्पत्तिके प्रतिभासमात्रविपरिवर्तिनि रजते तत्प्राचीन-
सम्प्रयोगाभावेऽपि तत्तादात्म्याश्रयेदमर्थसम्प्रयोगादेव तस्याऽपि चक्षुर्ग्राह्य-
त्वोपपत्तेः । ‘चक्षुषा रजतं पश्यामि’ इति प्रातिभासिकरजतस्य स्वसम्प्र-
योगाभावेऽपि चाक्षुषत्वानुभवात् ।

उक्त रीतिसे धर्मिज्ञानके अध्यासके प्रति हेतु न होनेके कारण इदमा-
कारवृत्तिकी ( अध्यासस्वरूप ) कार्यसे कल्पना नहीं करनी चाहिए और प्रति-
बन्धसे शून्य इदमर्थके साथ इन्द्रिय संयोगरूप कारणसे भी उसकी कल्पना नहीं
करनी चाहिए, क्योंकि इन्द्रियसम्प्रयोगसे उत्पन्न होनेवाली इदमाकार
वृत्तिका ही—दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे क्षुभित अविद्याका परिणामभूत तथा
इदमाकारवृत्तिके समानकालमें उत्पन्न हुआ रजत विषय होता है, ऐसा
हम कहते हैं । [ तात्पर्य यह है कि इदमर्थावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली
रजताकारमें परिणम्यमान अविद्या—अध्यासमें निमित्तभूत दोषसे युक्त चक्षु
आदिके सम्प्रयोगसे क्षोभको अर्थात् कार्योन्मुखताको प्राप्त होती है, इसके बाद
रजतरूपसे परिणत होती है, इसी प्रकार दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे वृत्ति भी
उसी कालमें होती है, इसलिए अप्रतिबद्ध इन्द्रियके सम्प्रयोगसे होनेवाली
इदंवृत्ति अपने समानकालमें उत्पन्न हुए रजतसे विशिष्ट इदमर्थको विषय
करती है ] । भ्रमस्थलमें ज्ञानके समानकालमें उत्पन्न तथा प्रतीतिकालमें
ही जिसकी* सत्ता है, ऐसे रजतमें, रजतप्रतिभाससे पूर्व, सम्प्रयोग न
होनेपर भी रजततादात्म्यके आश्रय इदमर्थके सम्प्रयोगसे ही रजत चक्षुसे
गृहीत होता है, क्योंकि ‘आँखसे रजतको देखता हूँ’ इस प्रकार अपने
साथ इन्द्रियसम्प्रयोगके न रहते भी प्रातिभासिक रजतका चक्षुसे प्रत्यक्ष
देखा जाता है ।


* इस शब्दका अर्थ है—प्रतिभासकालमात्रे विपरिवर्तनम्—सत्त्वं यस्य तत् प्रतिभासमात्र-
विपरिवर्ति, तस्मिन् प्रतिभासमात्रनिपरिवर्तिनि अर्थात् जिसका अस्तित्व केवल प्रतीतिकालमें
ही है—प्रतीतिसे व्याप्त है सत्ता जिसकी ऐसा रजत, यह भाव है ।

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२३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

'न च स्वसम्प्रयोगाभावादेव बाधकान्न तच्चाक्षुषम्, नाऽपि दुष्टेन्द्रिय-
सम्प्रयोगजन्यम् इदंवृत्तिसमकालम्, ज्ञानकारणस्येन्द्रियसम्प्रयोगस्याऽर्थका-
रणत्वाक्लप्तेः । किन्त्विदंवृत्यनन्तरभावि तज्जन्यं तदभिव्यक्ते साक्षिण्य-
ध्यासात् तद्भास्यम् ।' चाक्षुषत्वानुभवस्तु स्वभासकचैतन्याभिव्यञ्जकेदं-
वृत्तिजनकत्वेन परम्परया चक्षुरपेक्षामात्रेणेति वाच्यम्, तथा सति पीत-

शङ्का होती है—'इदं रजतम्' इसमें रजतका चाक्षुष प्रत्यक्ष ही नहीं
हो सकता है, क्योंकि उसके साथ इन्द्रियसम्प्रयोग ही नहीं है, यह बाधक
है। और इदंवृत्तिके समानकालमें वह रजत दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे उत्पन्न
भी नहीं हो सकता है, क्योंकि जो इन्द्रियसंयोग ज्ञानके प्रति कारणरूपसे क्लृप्त
है, वह अर्थके प्रति कहींपर भी कारणरूपसे निश्चित नहीं है। किन्तु
वृत्तिके उत्तर कालमें वृत्तिसे ही उत्पन्न होता है और वृत्तिसे अभिव्यक्त
चैतन्यमें उसका अध्यास होनेसे साक्षीसे ही वह रजत भास्य * है, और
रजतमें जो चाक्षुषत्वका अनुभव होता है, वह तो शुक्तिरजतके अवभासक
इदमवच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यञ्जक इदंवृत्तिके प्रति [ चक्षुके कारण होनेसे ]
परम्परया † चक्षुकी अपेक्षा है, इसलिए होता है, परन्तु यह शङ्का युक्त


* पहले इन्द्रियके सम्प्रयोगसे केवल 'इदम्' अर्थको विषय करनेवाली वृत्ति उदित होती
है, और अध्यासकी निमित्तकारण इस इदंवृत्तिसे अविद्या कार्योन्मुखताको प्राप्त कर रजताकारसे
परिणत होती है, परिणत रजतका अधिष्ठान होगा—इदमाकारवृत्तिसे अभिव्यक्त इदमवच्छिन्न
चैतन्य, इसलिए अहङ्कार आदिके समान वृत्तिके बिना ही अध्यस्त रजत आदिका अवभास
होगा, इदमाकार वृत्तिकादाचित्कत्व होनेसे रजताध्यासकी सर्वदा प्रसक्ति नहीं हो सकती
है, यदि इस विषयमें शङ्का हो कि शुक्तिरूप्य, जो बाह्यचैतन्यसे ही भास्य है, अहङ्कारके
समान साक्षीसे भास्य कैसे होगा ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि साक्षिभास्य शब्दका अर्थ
है—विषयकी ज्ञानरूप वृत्तिसे अनुपहित चैतन्यसे जिसका अवभास होता हो, इसलिए अहङ्कार
आदिका अवभासक चैतन्य अविद्या विषयके अज्ञानात्मक वृत्तिसे उपहित नहीं होता है, वैसे
शुक्तिरजतका अवभासक चैतन्य भी शुक्तिरजत आदि विषयक ज्ञानात्मक वृत्तिसे उपहित नहीं
होता है, अतः वह साक्षिभास्य है, इसलिए उक्त शङ्काका अवसर नहीं है, यह भाव है।

† परम्परयाका तात्पर्य यह है कि यद्यपि 'इदं रजतम्' इसमें रजतांशका चक्षुसे ज्ञान
होता है, यह अनुभव है, तथापि वह गौण है, प्राधान्यसे नहीं है क्योंकि उस स्थलमें इदमर्थ
रूप अधिष्ठानकी वृत्तिकाके लिए चक्षुकी अपेक्षा होती है। रजतगोचर वृत्तिके लिए नहीं, इसलिए
किसी अंशमें चक्षुकी अपेक्षा होनेके कारण चाक्षुषत्वकी रजतांशमें परम्परया उपपत्ति होती है।

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सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २३३


शङ्खभ्रमे चक्षुरनपेक्षाप्रसङ्गात् । नहि तत्र शङ्खग्रहणे चक्षुरपेक्षा; रूपं विना केवलशङ्खस्य चक्षुर्ग्राह्यत्वायोगात् । नाऽपि पीतिमग्रहणे, आरोप्ये ऐन्द्रियकत्वानभ्युपगमात् ।

न च पीतिमा स्वरूपतो नाऽध्यस्यते, किन्तु नयनगतपित्तपीतिम्नोऽनुभूयमानस्य शङ्खसंसर्गमात्रमध्यस्यत इति पीतिमाऽनुभवार्थमेव चक्षुरपेक्षेति वाच्यम्; तथा सति शङ्खतत्संसर्गयोरप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । नयनप्रदेशगतपित्तपीतिमाऽऽकारवृत्त्यभिव्यक्तसाक्ष्यसंसर्गेण तयोस्तद्भास्यत्वाभावात् । पीतिमसंसृष्टशङ्खगोचरैकवृत्त्यनभ्युपगमाच्च ।


नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे अर्थात् अधिष्ठानके इन्द्रियजन्यज्ञानके लिए ही इन्द्रियकी अपेक्षा है और आरोप्यके इन्द्रियजन्यज्ञानके लिए इन्द्रियकी अपेक्षा नहीं है, ऐसा स्वीकार करनेसे पीत शङ्खके भ्रमस्थलमें चक्षुकी अपेक्षा नहीं होगी, क्योंकि वहाँ शङ्खके ग्रहणमें चक्षुकी अपेक्षा ही नहीं है, कारण कि रूपके बिना शुद्ध शङ्खका चक्षुसे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, और पीतिमाके ग्रहणमें भी चक्षुकी अपेक्षा नहीं है, क्योंकि आरोप्य पदार्थका इन्द्रियजन्यज्ञान माना ही नहीं गया है ।

शङ्का होती है कि शङ्खमें स्वरूपतः * पीतरूपका अध्यास नहीं होता किन्तु अनुभूयमान चक्षुमें रहनेवाले पित्तदोषके पीतरूपका शङ्खमें सम्बन्धमात्र अध्यस्त होता है, इसलिए पीतिमाके अनुभवके लिए चक्षुकी अपेक्षा है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि नेत्रगत पित्तद्रव्यके ही पीतरूपका अनुभवस्वीकार किया जाय, तो शङ्ख और पीतके संसर्गका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा, क्योंकि नेत्रप्रदेशमें रहनेवाले पित्तद्रव्यका जो पीतरूप है, उस पीताकारवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यरूप साक्षीके साथ शङ्ख और शङ्खमें आरोपित पीतसंसर्गका सम्बन्ध न होनेके कारण शङ्ख और पीतसंसर्गका


* जैसे शुक्तिमें रजतका स्वरूपसे अध्यास होता है, वैसे ही शङ्खमें पीतरूपका स्वरूपसे अध्यास नहीं होता, किन्तु नेत्रमें विद्यमान पीतरूपसे युक्त जो पित्तलक्षण द्रव्य है, उसकी जो पीतिमा है, जिसका कि उस पित्तद्रव्यमें अनुभव होता है, उसका शङ्खमें सम्बन्धमात्र प्रतीत होता है, जैसे लोहित कुसुममें अनुभूयमान रक्तरूपके संसर्गका समीपवर्ती स्फटिकमें अध्यास होता है, इस विषयमें किसीको यदि शङ्का हो कि अन्यके रूपका अन्यत्र आरोप करेंगे, तो अन्यथाख्यातिका प्रवृत्ति होगी ? तो कहिए कि अन्यथाख्यातिका

३०

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२३४ सिद्धान्तलेशसङ्ग्रह [ प्रथम परिच्छेद

न च नयनप्रदेशस्थितस्य पित्तपीतिम्नो दोषाच्छङ्खे संसर्गाध्यासो नोपेयते; किन्तु नयनरश्मिभिः सह निर्गतस्य विषयव्यापिनस्तस्य तत्र संसर्गाध्यासः । कुसुम्भारुणित इव कौसुम्भ इति सम्भवति तदाकारवृत्त्यभिव्यक्तसाक्षिसंसर्ग इति वाच्यम् ; तथा सति सुवर्णलिप्त इव पित्तोपहतनयनेन वीक्ष्यमाणे शङ्खे तदितरेषामपि पीतिमधीप्रसङ्गात् ।

न च स पीतिमा समीपे गृहीत एव दूरे ग्रहीतुं शक्यः, विहायसि उपर्युत्पतन्विहङ्गम इव इतरेषां च समीपे न ग्रहणमिति वाच्यम् ;


साक्षीसे भान ही नहीं होगा और पीतिमासे सम्बद्ध शङ्खविषयक एक वृत्तिका अङ्गीकार भी नहीं है, [ जिससे कि उसके द्वारा भी उनका प्रत्यक्ष हो ] ।

यदि कहो कि नेत्रप्रदेशमें स्थित पित्तद्रव्यकी पीतिमाके दोषसे शङ्खमें संसर्गाध्यास नहीं होता है, किन्तु नयनरश्मियोंके साथ निकलकर विषय-देशको अर्थात् शङ्खरूप अधिष्ठानको व्याप्त पित्तद्रव्यकी पीतिमाका ही शङ्खमें संसर्गाध्यास होता है, जैसे रक्तरङ्गसे व्याप्त पटमें रक्तरङ्गमें अनुभूयमान रक्तरूपके ही संसर्गका भान होता है, इसलिए पित्तपीतमाकारवृत्तिसे शङ्खदेशमें चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे शङ्खपित्तपीतिमाके संसर्गका अपरोक्षानुभव हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे सुवर्णसे लिप्त पदार्थ सभी को पीत भासता है, वैसे ही पित्तदोषसे दुष्ट नेत्र द्वारा देखे गये शङ्खमें सभीको पीतिमबुद्धिकी प्रसक्ति होगी [ कारण कि नयनगत पित्तपीतिमाका, जिसका कि अन्य भी अनुभव कर रहे हैं, उनको भी शङ्खके साथ उसका सम्बन्ध होनेसे 'पीतः शङ्खः' इस ज्ञानकी प्रसक्ति होगी, यह भाव है ] ।

यदि कहो कि उस पीतिमाका दूरमें तभी ग्रहण हो सकता है, जब कि उसका समीपमें ग्रहण हुआ हो, जैसे आकाशमें ऊपर उड़े हुए पक्षीका तभी ग्रहण हो सकता है, जब कि उसका समीपमें ग्रहण हुआ हो, वैसे ही उस पित्तद्रव्यकी पीतिमाका समीपमें दूसरोंने ग्रहण नहीं किया, अतः उसका दूसरोंको अनुभव


प्रसक्ति नहीं होगी, क्योंकि वहांपर अध्यस्यमान अनिर्वचनीय संसर्गकी ही उत्पत्ति मानते हैं, इसलिए अन्यथाख्यातिवादकी प्रसक्ति नहीं है, अन्यथाख्यातिवादी अनिर्वचनीय पदार्थकी उत्पत्ति नहीं मानते हैं, इसलिए अन्यथाख्यातिवादसे संसर्गाध्यास अवश्य विलक्षण है, यह भाव है ।

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संकारणे अध्यासका विचारं ] भाषानुवादसहितं २३५


इतरेषामपि तच्चक्षुर्निकटन्यस्तचक्षुषां पीतिमसामीप्यसत्त्वेन तद्ग्रहणस्य दुर्वारत्वात् । एवमप्यतिधवलसिकतामयतलप्रवहदच्छनदीजले नैल्यध्यासे गगननैल्यध्यासे च रक्तवस्त्रेषु निशि चन्द्रिकायां नैल्यध्यासे चाऽनुभूयमानारोपस्य वक्तुमशक्यत्वेन तत्र नैल्यसंसृष्टाधिष्ठानगोचरचाक्षुषवृत्त्यनभ्युपगमे चक्षुरनुपयोगस्य दुष्परिहरत्वाच्च ।

'अनास्वादिततिक्तरसस्य बालस्य मधुरे तिक्तावभासो जन्मान्तरानुभवजन्यसंस्कारहेतुकः' इति प्रतिपादयता पञ्चपादिकाग्रन्थेन


नहीं * होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस पुरुषके पाण्डुरोगी चक्षुकी सन्निधिमें चक्षुओंको ले जानेवाले अन्य पुरुषोंको भी पीतिमाका सामीप्य होनेसे 'पीतः शङ्खः' यह ज्ञान दुर्वार हो जायगा † । ऐसे ही अत्यन्त श्वेत बालुकामय तलमें बहनेवाले स्वच्छ नदी जलमें नीलत्वके अध्यासमें, गगनमें नैल्यके अध्यासमें तथा चाँदनी रातमें रक्त वस्त्रमें नैल्यके अध्यासमें आरोप्यके सर्वथा अनुभूयमान न होनेसे वहाँ नीलतासे संयुक्त अधिष्ठानविषयक नेत्रवृत्तिका स्वीकार न होनेके कारण चक्षुकी अनुपयोगिताका परिहार किया ही नहीं जा सकता ।

'इस जन्ममें जिसने अपनी रसनासे तिक्तताका (तीतेपनका) अनुभव नहीं किया है, ऐसे बालकको मधुर दूधमें तिक्तताका ‡अवभास—साक्षात्कार—जन्मान्तरके अनुभूत तिक्तरसके संस्कारसे होता है, इस प्रकारसे प्रतिपादन करने-


* तात्पर्य यह है कि नेत्रदेशसे विषयके प्रति पित्तद्रव्यके जानेके समय जैसे पित्तसे युक्त पुरुष नयनदेशसे लेकर विषयदेशतक पीतिमाका ग्रहण करता है, वैसे ही अन्य-पुरुष भी नेत्रदेशसे लेकर विषयदेशतक यदि उसका ग्रहण करें, तो उनको 'पीतः शङ्खः' यह प्रतीति हो, परन्तु ग्रहण नहीं करते हैं, अतः उसका ग्रहण नहीं होता है, जैसे आकाशमें उड़नेके समयमें पक्षीका भूम्यदेशसे लेकर ऊपर तक जो पुरुष ग्रहण करता है वही पुरुष आकाशमें दूर जानेपर भी पक्षीका ग्रहण करता है, अन्य ग्रहण नहीं कर सकते हैं, वैसे प्रकृतमें भी है।

† आशय यह है—आकाशमें ऊपरको गये हुए पक्षीको देखता हुआ कोई पुरुष अन्यके प्रति यदि कहे कि जिधर मेरी आँखें गई हैं उधर ही तुम भी अपनी आँखें लगाओ तो तुम्हें भी वह पक्षी दिखाई पड़ेगा, ऐसा करनेपर अन्य पुरुष भी उस पक्षीको देखता है, वैसे प्रकृतमें नहीं है ।

‡ इस ग्रन्थमें तिक्तताका अवभास संस्कारसे सहकृत रसनाजन्य है, ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि उसको केवल संस्कारजन्य माननेसे स्मृतित्वकी प्रसक्ति होगी । इसलिए तिक्तताके अध्यासके

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२३६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

स्वरूपतोऽध्यस्यमानस्यैव तिक्तरसस्यैन्द्रियकत्वस्फुटीकरणाच्च । अन्यथा तत्र रसनाव्यापारापेक्षाऽनुपपत्तेः ।

तस्मादुदाहृतनैल्यध्यासस्थलेष्वधिष्ठानसम्प्रयोगादेव तद्गोचरचाक्षुषवृत्तिसमकालोदयोऽध्यासः तस्या वृत्तेर्विषय इति तस्य चाक्षुषत्वमभ्युपगन्तव्यम् । रूपं विना केवलाधिष्ठानगोचरवृत्त्यभावे च विषयचैतन्याभिव्यक्त्यभावेन जलतदध्यस्तनैल्य्यादीनां तद्भास्यत्वायोगात् । तिक्तरसाध्यासस्थले त्वधिष्ठानाध्यासयोरेकेन्द्रियग्राह्यत्वाभावात् त्वगिन्द्रियजन्याधिष्ठानगोचरवृत्त्या तदवच्छिन्नचैतन्याभिव्यक्तौ पित्तोपहतरसनसम्प्रयोगादेव तत्र

वाले पञ्चपादिकाग्रन्थसे स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्तरसमें ही इन्द्रियजन्यज्ञान-विषयत्वका स्पष्टीकरण किया गया है, अन्यथा अर्थात् आरोप्य तिक्तरस यदि इन्द्रियका विषय न माना जाय, तो बालकको तिक्तत्वके अवभासमें रसनाके व्यापारकी अपेक्षा ही नहीं † होगी ।

इससे * जिन नैल्य आदिके अध्यासोंका कथन किया गया है, उन अध्यास स्थलोंमें अधिष्ठानके सम्प्रयोगसे ही अधिष्ठानविषयक चाक्षुषवृत्तिके समकालमें उत्पन्न होनेवाले नीलरूप आदि अध्यास—अध्यस्त पदार्थ—उस वृत्तिके विषय होते हैं, इससे उस अध्यासको चक्षुसे जन्य मानना चाहिए। रूपके विना केवल अधिष्ठान-विषयक वृत्तिके न होनेपर अर्थात् आरोपित पीतरूप आदिसे विशिष्ट शङ्ख आदि अधिष्ठानविषयक वृत्तिका स्वीकार न होनेपर विषयावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेसे जल आदि तथा उससे अवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्त नीलरूप आदिका चैतन्यसे अवभास ही नहीं होगा । तीतेपनका [ जिस स्थलमें बालकको दुग्धमें ] अध्यास होता है, उस स्थलमें, तो अधिष्ठान और अध्यासका एक इन्द्रियसे ग्रहण न होनेके कारण त्वक् इन्द्रियसे उत्पन्न अधिष्ठानको विषय करनेवाली वृत्तिसे मधुर आदि द्रव्यरूप अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर पित्तदोषसे दूषित रसनाके सम्प्रयोगसे ही अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यमें


† अधिष्ठानभूत मधुर द्रव्यका रसनासे प्रत्यक्ष होनेके कारण परिशेषात् स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्त रसमें ही रसनेन्द्रियजन्यवृत्तिविषयत्व है, ऐसा स्पष्ट किया गया, अतः यह ग्रन्थ आरोप्यके ऐन्द्रियकत्व होनेमें प्रमाण है, यह भाव है।

* अर्थात् अध्यस्यमान पदार्थको जो साक्षिभास्य मानते हैं, उनके मतमें पीतशङ्ख आदि अध्यासोंमें चक्षुकी अनुपयोगिताके परिहारका असम्भव होनेसे, यह अर्थ है ।

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २३७

तिक्तरसाध्यासः तन्मात्रविषयरासनवृत्तिश्च समकालमुदेतीति तिक्तरसस्य रासनत्वमप्यभ्युपगन्तव्यम् । त्वगिन्द्रियजन्याधिष्ठानगोचरवृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यभास्ये तिक्तरसे परम्परयाऽपि रसनोपयोगाभावेन तत्र कथमपि प्रकारान्तरेण रासनत्वानुभवसमर्थनासम्भवात् । तथैव रजतस्याऽपि चाक्षुषत्वोपपत्तेः ‘पश्यामि’ इत्यनुभवो न बाधनीयः । न चाऽसम्पयुक्तस्य रजतस्य चाक्षुषत्वे ‘प्रत्यक्षमात्रे विषयेन्द्रियसन्निकर्षः कारणम्,’ ‘द्रव्यप्रत्यक्षे

अध्यस्त तिक्तरसका और तिक्तमात्रको विषय करनेवाली रासनवृत्तिका एक कालमें * उदय होता है, अतः तिक्त रसका रसनासे प्रत्यक्ष होता है, यह मानना चाहिए, क्योंकि त्वगिन्द्रियसे उत्पन्न होनेवाली अधिष्ठानविषयकवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यसे भास्य तिक्तरसमें रसनाका परम्परा भी उपयोग नहीं होता है, इसलिए अन्य किसी प्रकारसे भी तिक्तरसका रसनासे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । वैसे ही अर्थात् जैसे रसना (जिह्वा) इन्द्रियकी वृत्तिको लेकर तिक्तरसमें रासनत्वका अनुभव माना गया, वैसे ही चक्षुकी वृत्तिके आधारपर रजत आदिमें चाक्षुषत्वानुभवका समर्थन हो सकता है, अतः ‘रजतं पश्यामि’ (रजतको देखता हूँ) इस प्रकार चाक्षुषानुभवका † बाध मानना युक्तियुक्त नहीं है। यदि शङ्का हो कि इन्द्रियसे असम्प्रयुक्त रजतका प्रत्यक्ष माननेपर ‘प्रत्यक्षमात्रमें विषय और इन्द्रियका संसर्ग कारण है, ‘द्रव्यके प्रत्यक्षमें


* तात्पर्य यह है कि पित्तरूप दोषसे तिरस्कृत जो रसनेन्द्रिय है, उसके साथ मधुर द्रव्य-रूप अधिष्ठानका सम्बन्ध होनेसे मधुरद्रव्यावच्छिन्न चैतन्यमें तिक्तरसाध्यास उत्पन्न होता है, इसीके साथ-साथ अध्यस्यमान तिक्तरसको ही विषय करनेवाली रासनवृत्ति भी उत्पन्न होती है, इसलिए तिक्तरसका रसनासे अनुभव होता है, चाक्षुष स्थलमें जैसे अधिष्ठान और आरोप्यके एकवृत्तित्वयोग्यत्व होनेसे इन्द्रियजन्यज्ञान विषयता है, वैसे प्रकृत में नहीं है ।
† अर्थात् जैसे रजत आदिके अध्यासस्थलमें धर्मिविषयक वृत्तिके उत्पादनद्वारा चाक्षुषत्वका समर्थन किया जाता है, वैसे प्रकृतमें मधुरद्रव्यरूप धर्मिविषयक वृत्तिके उत्पादनद्वारा रासनत्वका समर्थन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि मधुरद्रव्यरूप धर्मी सर्वथा रसनाके अयोग्य है—द्रव्यके ग्रहणमें रसनाकी सामर्थ्य नहीं है । इसलिए परम्परासे भी तिक्त रसका रसनासे ग्रहण नहीं हो सकता है, अतः रासनवृत्तिकी समकालमें उत्पत्ति माननी पड़ती है । यद्यपि साक्षीसे भासित स्वाप्निक पदार्थोंमें रासनत्व, चाक्षुषत्व आदिके आरोपका जैसे आगे प्रतिपादन किया जायगा, वैसे ही प्रकृतस्थलमें रासनत्व आदिकी उपपत्ति कर सकते हैं, तथापि उस विषयके ऊपर दृष्टि न देकर ही यह कहा गया है ।

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२३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद

तत्संयोगः कारणम्,' 'रजतप्रत्यक्षे रजतसंयोगः कारणम्' इति गृहीतानेक-
कार्यकारणभावनियमभङ्गः स्यादिति वाच्यम्, सन्निकर्षत्वस्य संयोगाद्यनु-
गतस्यैकस्याऽभावेन आद्यनियमासिद्धेः । द्वितीयनियमस्य नैयायिकरीत्या
तमसीव संयोगायोग्ये क्वचिदद्रव्येऽपि द्रव्यत्वाध्याससम्भवाद् व्यवहारदृष्ट्या

द्रव्यके साथ इन्द्रियसयोग कारण है और 'रजतके प्रत्यक्षमें रजतका संयोग
कारण है, इस प्रकार निश्चित किये गये अनेक कार्यकारणभावोंका भंग-त्याग
होगा, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि संयोग आदिमें अनुगत एक सन्निकर्ष-
त्वके न होनेसे प्रत्यक्षमात्रमें * विषयेन्द्रियसन्निकर्ष कारण है, इस प्रकार प्रथम
कार्यकारणभाव ही असिद्ध है । जैसे नैयायिकोंके मतमें † संयोगके सर्वथा
अयोग्य तममें ( अन्धकारमें ) द्रव्यत्वका अध्यास होता है, वैसे ही संयोगके
सर्वथा अयोग्य कहीं अद्रव्य ( गुण ) आदिमें भी ‡ द्रव्यत्वका अध्यास


* इस नियमका ठीक-ठीक आकार यह है—शाब्दभिन्न जन्यप्रत्यक्षमात्रमें विषय-इन्द्रियका सन्निकर्ष कारण है, शब्दजन्य ज्ञानको जो अपरोक्ष मानते हैं, उनके मतसे शब्दज्ञानमें व्यभिचारवारण करनेके लिए शाब्दभिन्न विशेषण है और साक्षिरूप प्रत्यक्षमें अतिव्याप्ति वारण करनेके लिए जन्यत्व विशेषण दिया गया है । यहाँपर यह ज्ञातव्य है कि सन्निकर्षत्वका संयोगाद्यन्यतमत्वरूपसे अनुगम हो सकता है, अथवा नैयायिकोंके मतमें अभावत्वको जैसे अखण्डोपाधि मानते हैं, वैसे ही सन्निकर्षत्वको अखण्डोपाधि मान करके अनुगम कर सकते हैं, अतः प्रथम नियमके साथ विरोध ही है ।

† तात्पर्य यह है कि 'द्रव्यप्रत्यक्षमें विषय और इन्द्रियसंयोग कारण है' इस नियमका अर्थ आपको करना होगा व्यवहारमें जो द्रव्यत्वका अधिकरण है उस विषय और इन्द्रियका संयोग कारण है, क्योंकि 'एकत्वम् एकम्' ( एकत्व एक है ) इस प्रकार गुणमें भी एकत्वका भ्रम होनेसे द्रव्यत्वका भ्रम हो सकता है, पर वहाँ द्रव्यके साथ संयोग न होनेके कारण उक्त नियमका व्यभिचार होगा, इसलिए व्यावहारिक दृष्टिसे द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोगको कारण मानना होगा । यदि इसे स्वीकार न किया जाय, तो तममें द्रव्यत्वका भ्रम होनेके अनन्तर उसका प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि वहाँ द्रव्यसंयोग नहीं है, कारण कि तमके नैयायिकरीतिसे अभावरूप होनेके कारण उसके साथ इन्द्रियसंयोग ही नहीं हो सकता है, अतः नैयायिकोंको भी अगत्या व्यावहारिक द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसयोग कारण है, यह मानना होगा और माननेपर विरोध नहीं है, कारण कि शुक्तिरजतके प्रत्यक्षमें उस नियमकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि शुक्तिरजत व्यावहारिक द्रव्यत्वका अधिकरण नहीं है, यह भाव है ।

‡ इस विषयमें कोई लोग शङ्का करते हैं कि घटादिके समान शुक्तिरजतमें भी स्वतः द्रव्यत्व रहता है, अन्यथा उस रजतमें रजतत्व भी नहीं रहेगा, इष्टापत्ति नहीं हो सकती, कारण कि प्रातिभासिक रजतमें रजतत्वका साधन किया गया है, इसलिए शुक्तिरजत भी

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २३९


यद् द्रव्यत्वाधिकरणं तद्विषयत्वेन प्रातिभासिकरजते द्रव्यत्वस्याऽधिष्ठानगतस्यैवेद्ंत्ववदध्यासात् प्रतीत्यभ्युपगमेन च द्वितीयनियमाविरोधात् । द्वितीयनियमरूपसामान्यकार्यकारणभावातिरेकेण विशिष्याऽपि कार्यकारणभावकल्पनाया गौरवपराहतत्वेन तृतीयनियमासिद्धेः । यत्सामान्ये यत्सामान्यं हेतुः, तद्विशेषे तद्विशेषो हेतुः' इति न्यायस्यापि यत्र बीजाङ्कुरादौ


हो सकता है, अतः द्वितीय नियमका यह अर्थ करना होगा कि व्यवहारकी दृष्टिसे जो द्रव्यत्वका अधिकरण हो, उसके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसयोग कारण है, अतः प्रातिभासिक रजतमें इदंत्वके समान अधिष्ठानमें रहनेवाले द्रव्यत्वका भी अध्यास होनेसे प्रतीति होती है, इसलिए द्वितीय नियमके साथ विरोध नहीं है। और 'रजतके प्रत्यक्षमें रजतका संयोग कारण है' इस प्रकारका जो तृतीय नियम है, वह भी असिद्ध है, क्योंकि सामान्य कार्यकारणभावात्मक द्वितीय नियमसे (द्रव्यप्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है, इससे) अतिरिक्त विशेष तृतीय कार्यकारणभावकी कल्पना करनेमें केवल गौरव ही है। जिस सामान्यमें * जो सामान्य कारण होता है उसके विशेषमें उसका विशेष कारण होता है इस न्यायसे तृतीय कार्यकारणभावकी कल्पना करेंगे ? इस प्रकार यदि शङ्का हो, तो वह


व्यावहारिक द्रव्यत्वका अधिकरण है, ऐसा मानना होगा, क्योंकि व्यवहारदशामें जैसे रजतका बाध देखा जाता है, वैसे शुक्तिरजतमें रजतत्वका या द्रव्यत्वका बाध नहीं देखा जाता । इस परिस्थितिमें इन्द्रियासंयुक्त रजतमें इन्द्रियवृत्ति म नी जायगी, तो द्वितीय नियमका विरोध निवृत्त कदापि नहीं होगा, इस पूर्वपक्षके उत्तरमें यह कहा जाता है कि शुक्तिरजत आदिमें शुक्तित्व, द्रव्यत्व आदि धर्म नहीं हैं, ऐसा स्वीकार करनेवालोंके मतसे यह कहा गया है अर्थात् व्यावहारिक दशाका द्रव्यत्व या शुक्तित्व नहीं है परन्तु प्रातीतिक है, अतः इसी अभिप्रायसे मूलमें 'प्रातिभासिकरजते' इत्यादि कहा है ।

* तात्पर्य यह है कि 'द्रव्यप्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है' इस सामान्य नियमके' माननेसे 'रजतप्रत्यक्षमें रजतेन्द्रियसंयोग कारण है' इस विशेष नियमका लाभ होता है, क्योंकि जिस सामान्यमें जो सामान्य कारण होता है उसके विशेषमें उसका विशेष कारण होता है, प्रकृतमें सामान्य द्रव्य प्रत्यक्षमें सामान्य-विषयसंयोग कारण है, अतः रजतरूप विशेषद्रव्यके प्रत्यक्षमें विशेष रजतसंयोग कारण होगा, अतः इन्द्रियसंयोगके बिना यदि रजतकी वृत्ति मानी जायगी, तो तृतीय नियमके साथ विरोध होगा, यह प्रश्न है, इसका उत्तर है कि उस विशेष नियमका तभी स्वीकार किया जाय, जब कि सामान्यमें बाध हो, परन्तु बाध है नहीं, अतः उसको नहीं मानते हैं ।

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२४०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सामान्यकार्यकारणभावाभ्युपगमे बीजान्तरादङ्कुरान्तरोत्पत्त्यादिप्रसङ्गः, तद्विषयत्वेन ततोऽजागलस्तनायमानविशेषकार्यकारणभावासिद्धेः ।

न चाऽत्राऽपि 'द्रव्यप्रत्यक्षे द्रव्यसंयोगः कारणम्' इति सामान्यनियममात्रोपगमे अन्यसंयोगादन्यद्रव्यप्रत्यक्षापत्तिरिति अतिप्रसङ्गोऽस्तीति वाच्यम् ; 'तत्तद्द्रव्यप्रत्यक्षे तत्तद्द्रव्यसंयोगः कारणम्' इति नियमाभ्युपगमात् ; अन्यथा तृतीय नियमेऽप्यतिप्रसङ्गस्य दुर्वारत्वात् ; तस्मान्नास्ति क्लृप्तनियमभङ्गप्रसङ्गः ।

युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त जो 'यत्सामान्ये' यह न्याय है, वह भी वहींपर प्रवृत्त होता है, जहां बीज आदि स्थलमें केवल सामान्य कार्यकारणभाव माननेमें बीजान्तरसे अङ्कुरान्तरकी उत्पत्ति प्रसक्त होती है अर्थात् सामान्य कार्यकारणभावका जहाँ अतिप्रसङ्ग होता है, वहाँ यह न्याय प्रवृत्त होता है, अन्यत्र नहीं, इसलिए उक्त न्यायसे अजागलस्तनके † समान निरर्थक उक्त विशेष कार्यकारणभावकी सिद्धि नहीं होती है ।

यदि शङ्का हो कि 'द्रव्य प्रत्यक्षमें द्रव्यसंयोग कारण है' इस प्रकारके केवल सामान्य नियमके माननेपर अन्य संयोगसे अन्य द्रव्यके प्रत्यक्षकी आपत्ति आ सकती है, इसलिए अतिप्रसङ्ग है [ अतः उक्त तृतीय नियम मानना अत्यन्त आवश्यक है ] तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि तत्-तत् द्रव्यके प्रत्यक्षमें तत्-तत् द्रव्यसंयोग कारण है, इस प्रकारका नियम माननेसे भी * अतिप्रसङ्गका परिहार हो सकता है । यदि उक्तन्यायसे तृतीय नियमकी कल्पना की जायगी, तो उसमें भी अतिप्रसङ्गका परिहार नहीं हो सकता है, इससे उक्त नियमके भङ्गकी प्रसक्ति नहीं है ।


† बकरीके गलेमें लटकनेवाले लम्बे स्तनको अजागलस्तन कहते हैं, जैसे वे बकरीके स्तन किसी काममें नहीं आते हैं, निरर्थक हैं, वैसे ही प्रकृतमें विशेषनियमकी कोई आवश्यकता न होनेसे वह निरर्थक है, यह भाव है ।

* अङ्कुरसामान्यके प्रति बीजसामान्यको कारण माननेसे अन्य बीजसे अन्य अङ्कुरकी उत्पत्तिकी प्रसङ्ग आ सकता है, इसलिए सामान्यनियममें बाधक होने से जैसे तत्-तत् अङ्कुरकी उत्पत्तिके प्रति तत्-तत् बीज ही कारण माना जाता है, वैसे ही तत्-तत् द्रव्यके प्रत्यक्षके प्रति तत्-तत् द्रव्यसंयोगव्यक्तिको कारण मानना चाहिए, इससे अन्य द्रव्यके संयोगसे अन्य द्रव्यके प्रत्यक्षकी आपत्ति नहीं है, इसपर भी यदि तृतीय नियमका अङ्गीकार किया

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २४१

किं चाऽत्र क्लृप्तनियमभङ्गेऽपि न दोषः, 'इदं रजतं पश्यामि, नीलं जलं पश्यामि', इत्यादेरनन्यथासिद्धस्याऽनुभवस्य प्रथमगृहीतानामपि 'प्रत्यक्षमात्रे विषयसन्निकर्षः कारणम्' इत्यादिनियमानां व्यावहारिकविषये सङ्कोचकल्पनमन्तरेणोपपादनासम्भवात् ।

न चैवं सति 'प्रमायां सन्निकर्षः कारणम्, न भ्रमे' इत्यपि सङ्कोचकल्पनासम्भवाद् असन्निकृष्टस्यैव देशान्तरस्थस्य रजतस्य इहाऽऽरोपापत्तिरिति अन्यथाख्यातिवादप्रसारिका; अभिव्यक्तचैतन्यावगुण्ठनशून्यस्य देशान्तर-

किञ्च, शुक्तिरजत आदि स्थलमें नियमका भङ्ग होनेपर भी दोष नहीं है, क्योंकि 'इस रजतको देखता हूँ' 'नील जलको देखता हूँ' इत्यादि अनन्यथासिद्ध अनुभवकी—'प्रत्यक्षमात्रमें विषयका संनिकर्ष कारण है' इत्यादि प्रथमतः गृहीत नियमोंका व्यावहारिक विषयमें संकोच किये बिना—उपपत्ति हो ही नहीं सकती है † ।

यदि शङ्का हो कि 'प्रमामें सन्निकर्ष कारण है, भ्रममें नहीं' इस प्रकारसे भी नियमके संकोचकी कल्पना हो सकनेसे शुक्तिमें असन्निकृष्ट अन्यदेशस्थ रजतके ही आरोपकी आपत्ति होगी, इसलिए अन्यथाख्यातिवाद भी प्रसक्त होता है; नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अभिव्यक्त चैतन्यके तादात्म्यसे शून्य अन्यदेशस्थ रजतकी अपरोक्षता ही नहीं हो सकती ✱। और ख्याति (अपरोक्ष-


जायगा, तो अन्य रजतके संयोगसे अन्य रजतके प्रत्यक्षकी आपत्ति रहेगी ही। इससे अर्थात् प्रथम और तृतीय नियमके असिद्ध होनेसे और द्वितीय नियमके साथ विरोध न होनेसे उक्त नियमोंके साथ असंयुक्त (प्रातिभासिक) पदार्थकी चाक्षुष वृत्ति मानी जाय, तो भी विरोध नहीं है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि जैसे स्वप्नप्रपञ्चके केवल साक्षिभास्य होनेपर भी उसमें चाक्षुषत्वक अनुभव होता है, परन्तु उस दशामें चक्षु आदिका उपराम होनेसे उनके साथ उन विषयोंका सम्बन्ध नहीं है, इसी प्रकार शुक्तिरजत आदिमें 'रजत देखता हूँ' इत्यादि अनुभव होनेसे उनका चाक्षुषत्व स्वीकार किया जाता है, इसलिए उक्त नियमोंके सङ्कुचित होनेपर भी कोई आपत्ति नहीं है।

✱ शङ्का और समाधानका तात्पर्य यह है—पूर्वमें इसका प्रतिपादन हुआ है कि 'प्रत्यक्षमात्रमें विषयसन्निकर्ष कारण है' इस सामान्य नियमका अनुभवके अनुसार व्यावहारिक विषयमें संकोच करना चाहिए, इसलिए प्रातीतिक पदार्थोंके अनुभवमें उक्त नियम बाधक नहीं है, इसपर 'न चैवं सति' इत्यादिसे पुनः शङ्का करते हैं कि जब उक्त नियमका संकोच करना अभीष्ट है, तो

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२४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

स्थस्य रजतस्याऽऽपरोक्ष्यानुपपत्तेः। ख्यातिबाधानुपपत्त्यादिभिर्भ्रमविषयस्याऽनिर्वचनीयत्वसिद्धेश्च।
न चाऽधिष्ठानसम्प्रयोगमात्रात् प्रातिभासिकस्यैन्द्रियकत्वोपगमे शुक्तिरजताध्याससमये तत्रैव कालान्तरे अध्यसनीयस्य रङ्गस्याऽपि चाक्षुषत्वं

रूपसे रजतकी प्रतीति ) एवं बाधकी अनुपपत्ति आदिसे भ्रमज्ञानके विषय अनिर्वचनीयत्व ही सिद्ध होता है ।

शङ्का होती है कि यदि केवल अधिष्ठानके सम्प्रयोगसे ही प्रातिभासिक रजतादिमें इन्द्रियजन्य ज्ञानकी विषयताका स्वीकार करते हो, तो शुक्तिमें ही कालान्तरमें अध्यस्त होनेवाले रङ्गका भी शुक्तिरजताध्यासके समयमें चक्षुसे ग्रहण


तुल्ययुक्तिसे उस नियमका यही संकोच क्यों न किया जाय कि प्रमामें संन्निकर्ष कारण है, और भ्रममें कारण नहीं है, क्योंकि नैयायिकोंका मत है कि भ्रमका विषय है देशान्तरस्थ रजत, इस विषयमें अन्य वादियोंने शङ्का की है कि असन्निकृष्ट रजतका प्रत्यक्ष कैसे होगा ? तब नैयायिकोंने उत्तर दिया है कि 'प्रत्यक्षमें सन्निकर्ष कारण है' इस नियमका जैसे आप व्यावहारिक पदार्थप्रत्यक्षविषयत्वरूपसे संकोच करते हैं, वैसे हमारे मतमें 'प्रमा-प्रत्यक्षमें सन्निकर्ष कारण है' इस प्रकार संकोच कर सकते हैं, अतः नैयायिकोंके मतमें कोई दोष नहीं है । इसलिए नैयायिकाभिमत उक्त नियमका संकोच भी प्राप्त हो सकता है और शुक्तिरजतस्थलमें देशान्तरस्थ रजतकी प्राप्ति होनेसे अन्यथाख्यातिवाद प्रसक्त हो सकता है, अनिर्वचनीयवाद नहीं, इसपर उत्तर दिया जाता है—विषयप्रत्यक्षत्वमें इन्द्रियसन्निकृष्टत्व प्रयोजक नहीं है, किन्तु अभिव्यक्त चैतन्याभिन्नत्व ही प्रयोजक है, इसका विचार भी आगे किया जायगा । इसलिए यदि शुक्ति-रजतको देशान्तरस्थ ही माना जायगा, तो अभिव्यक्त चैतन्याभेदका असम्भव होनेसे उस रजतका प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा, अतः अभिव्यक्त चैतन्यके अभेदके लिए अवश्य शुक्तिदेशोत्पन्न रजत ही मानना चाहिए । तथा ख्याति और बाधकी अनुपपत्तिसे भी अनिर्वचनीय रजत ही सिद्ध होगा, क्योंकि ख्याति शब्दका अर्थ है—अपरोक्ष प्रतीति, शुक्ति रजतके देशान्तरस्थ होनेपर उसकी अपरोक्षप्रतीति नहीं हो सकती है, और उसे असत् माननेपर भी नहीं हो सकती है, अतः यही प्रतीति शुक्ति-रजतमें असत्त्व और देशान्तरस्थत्वका निरास करती है, और बाधक प्रतीति है—तीनों कालमें भी यह रजत नहीं है, इस बाधक प्रतीतिसे रजतसमयमें भी शुक्तिमें रजतका अभाव सिद्ध होता है, अब देखिये कि यदि शुक्तिमें रजत नहीं है, तो उसकी ख्याति अपरोक्षप्रतीति नहीं होगी, यदि शुक्तिमें रजत सत्य होगा, तो उसका बाध नहीं होगा, क्योंकि सत्य शुक्तित्वका उसमें बाध नहीं होता है, अतः इस प्रकारके ख्याति और बाधकी अनुपपत्तिसे रजतमें अनिर्वचनीयत्वकी भी सिद्धि होती है, अतः पूर्वोक्त रीतिसे किया हुआ नियमका संकोच ही युक्त है ।

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[सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २४३


कुतो न स्यादिति वाच्यम्; रजताध्याससमये रङ्गरजतसाधारणचाकचक्यदर्शनाविशेषेऽपि यतो रागादिरूपपुरुषदोषाभावादितस्तत्र तदा न रङ्गाध्यासः, तत एव मया तद्विषयवृत्त्यनुदयस्याऽभ्युपगमात् । तस्मादिदंमंशसंभिन्नरजतगोचरैकैव वृत्तिरिन्द्रियजन्या । न ततः प्रागिदमाकारा वृत्तिरिति नाऽत्रेयमज्ञाननिवर्तकत्वसदसद्भावचिन्ता कार्येति ।


क्यों नहीं होता है †? यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि रजतके अध्यासके समयमें रङ्ग और रजतके साधारण चाकचक्य दर्शनके समान होनेपर भी जिस रागादि पुरुषदोषके अभावसे शुक्तिमें रजताध्यास कालमें रङ्गका अध्यास तुम नहीं मानते हो, उसी कारणसे हम रङ्गविषयक वृत्तिकी उत्पत्ति नहीं मानते हैं, इसलिए रङ्गका अध्यास रजताध्यासकालमें नहीं होता है । इससे अर्थात् धर्मिज्ञानको कारण न माननेसे 'इदं रजतम्' इसमें इदमंशसे सम्मिलित रजतविषयक एक ही वृत्ति इन्द्रियसे उत्पन्न होती है । उससे पूर्व इदमाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं होती है, इसलिए प्रकृतमें अज्ञाननिवर्तकत्वके सद्भाव और असद्भावकी चिन्ता करना व्यर्थ है ।


† शङ्काका तात्पर्य यह है कि यदि अधिष्ठानके सम्प्रयोगमात्रसे ही प्रातिभासिक पदार्थोंका इन्द्रियज्ञान होता है, तो शुक्तिमें अन्य कालमें अध्यस्त होनेवाला रङ्ग रजतके अध्यासकालमें चाक्षुष वृत्तिका विषय क्यों न हो ? कारण कि वह चाक्षुषवृत्ति जैसे रजततादात्म्याश्रय इदमर्थसम्प्रयोगजन्य है, वैसे ही कालान्तरीय रङ्गतादात्म्याश्रय इदमर्थसम्प्रयोगजन्य भी है, इसलिए सम्प्रयोग वृत्तिका हेतु नहीं है, किन्तु सादृश्यविशिष्ट धर्मिज्ञानका हेतु है, और वही सादृश्यज्ञान दोषरूपसे और धर्मिज्ञानरूपसे रजताध्यासमें कारण है, इसी प्रकार रजत साक्षिभास्य है, वही मानना चाहिए। इसपर उत्तर देते हैं कि तुम्हारे मतमें भी रजताध्यासके समयमें रङ्ग आदिका अध्यास क्यों नहीं होता है, इसका उत्तर देना होगा, यदि कहोगे कि चाकचक्य आदि ज्ञानके समान होनेपर भी रजतके अध्याससमयमें रंगविषयक राग आदि, जो पुरुषदोष हैं, उनके न रहनेसे रजताध्यासकालमें रङ्गाध्यास नहीं होता है, तो इसी प्रकार हम (कविताार्किकमतानुयायी) भी कहते हैं कि रागादि पुरुषदोषोंके न होनेसे रजताध्यासकालमें रङ्गवृत्तिका उदय नहीं होता है, यह कविताार्किकमत ही युक्त है, ऐसा 'तस्मात्' इत्यादिसे उपसंहार किया है।

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५४४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अन्ये त्वेकैव सामान्यवृत्तिर्वा भ्रान्तिकारणम् ।
तत्साक्षिभास्यमध्यस्तमलं वृत्त्येति मेनिरे ॥११२॥

कुछ लोग कहते हैं कि ( भ्रमस्थलमें ) इदमाकार सामान्य वृत्ति एक ही है, और वही अध्यासके प्रति कारण है अध्यस्तका उस वृत्तिसे अभिव्यक्त साक्षिचैतन्यसे भान होता है, अतः रजताकार द्वितीय वृत्ति निरर्थक है ॥११२॥

अन्ये तु—‘अधिष्ठानज्ञानमध्यासकारणम्’ इति इदमाकारां वृत्तिमुपेत्य तदभिव्यक्तेनैव साक्षिणा तदध्यस्तस्य रजतस्याऽवभाससम्भवात् तद्भासक-साक्ष्यभिव्यञ्जिकया तयैवेदंवृत्त्या रजतविषयसंस्काराधानोपपत्तेश्च रजताकार-वृत्तिर्व्यर्थेति मन्यन्ते ।

वृत्तिरेकैदमाकारा सामान्यज्ञानरूपिणी ।
इदंरजततादात्म्यगोचराऽन्येति केचन ॥११३॥

कोई लोग कहते हैं कि ( 'इदं रजतम्' इत्यादि स्थलमें ) सामान्य ज्ञानात्मक एक इदमाकार वृत्ति होती है, और दूसरी इदं और रजतके तादात्म्यका अवगाहन करनेवाली वृत्ति होती है ॥११३॥

ज्ञानद्वयपक्षे 'इदम्' इत्येका वृत्तिरध्यासकारणभूता । 'इदं रजतम्' इति


* कुछ लोग तो—अधिष्ठानज्ञान अध्यासके प्रति कारण है, इसलिए इदमाकार वृत्तिका अङ्गीकार करके, इदमाकार वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यरूप साक्षीसे ही उसमें (इदमवच्छिन्न चैतन्यमें) अध्यस्त रजतका अवभास होनेसे और अध्यस्त रजत आदिके अवभासक साक्षीरूप चैतन्यकी अभिव्यञ्जक इदमाकार वृत्तिसे ही रजत-विषयक संस्कारोंका आधान हो सकनेसे रजताकार वृत्ति व्यर्थ ही है—ऐसा मानते हैं।

† दो ज्ञान माननेवालोंके पक्षमें अर्थात् 'इदं रजतम्' इसमें


* पूर्व टिप्पणीमें कहा गया है कि धर्मिज्ञानमें अध्यासकी कारणताका जो खण्डन किया गया है, वह ऊपरी दृष्टिसे किया गया है, वस्तुतः नहीं, इसलिए धर्मिज्ञानवादीका मत कहते हैं—'अन्ये तु' इत्यादिसे ।

† जिस वृत्तिसे युक्त चैतन्यमें जितने पदार्थ भासते हों, उतने पदार्थोंमें उस वृत्तिसे संस्कारोंका आधान होता है, इस पूर्वोक्त नियमसे इदमाकार वृत्तिसे ही रजतका संस्कार हो सकता है, इसलिए रजताकार वृत्ति व्यर्थ है, यह 'अन्ये तु' मतका तात्पर्य है, और इस मतमें उक्त नियम न मानकर स्वगोचरवृत्तिसे ही स्वमें संस्कारोंका आधान होता है, यही नियम माना गया है, इसलिए इस मतमें अध्यस्त रजतविषयक भी वृत्ति मानी गई है, इसीका 'केचित्' और 'अन्ये तु' मतसे विचार हुआ है। इसमें भी पहले मतमें अध्यस्तरजतवृत्ति अध्यस्तरजतविशिष्टधर्मीको विषय करती है, और दूसरे मतमें अध्यस्तरजतमात्रको विषय करती है, यह भेद है ।

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सकारणं अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २४५

द्वितीया वृत्तिरध्यस्तरजतविषया, न त्विदमंशं विनाऽध्यस्तमात्रगोचरा सा । 'इदं रजतं जानामि' इति तस्या इदमर्थतादात्म्यापन्नरजतविषयत्वानुभवादिति केचित् ।

इदं तद्वृत्त्यवच्छिन्नचिन्मोहौ तत्तदन्विते ।
युगपद्रूप्यतद्वृत्ती कुर्वाते इति चाऽपरे ॥११४॥

कुछ लोग कहते हैं कि इदमवच्छिन्न चैतन्यमें और इदमंश-विषय वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले अज्ञान रजत और रजतज्ञानरूपसे परिणत होते हैं ॥११४॥

अन्ये तु—यथा इदमंशावच्छिन्नचैतन्यस्थाऽविद्या रजताकारेण विवर्तते, एवमिदमंशविषयवृत्तिज्ञानावच्छिन्नचैतन्यस्थाऽविद्या रजतज्ञानाभासाकारेण विवर्तते, न त्विदमंशवृत्तित्वदनध्यस्तं रजतज्ञानमस्ति । तथा च रजतस्य अधिष्ठानगतेदंत्वसंसर्गभानवत्तज्ज्ञानस्याऽप्यधिष्ठानगतेदंत्वविषयत्वसंसर्गभानोपपत्तेः, न तस्याऽपीदंविषयत्वमभ्युपगन्तव्यम् ।

न च रजतत्ववदध्यस्तस्य रजतेदंत्वसंसर्गस्य रजतज्ञानगोचरत्वात्

'इदम्' और 'इदं रजतम्' ये दो ज्ञान होते हैं इस पक्षमें 'इदम्' इत्याकारक इदमाकारवृत्ति अध्यासकी कारणभूत है और 'इदं रजतम्' इत्याकारक दूसरी वृत्ति अध्यस्त रजतको अवगाहन करती है, इदमंशको छोड़कर केवल अध्यस्त पदार्थको अवगाहन नहीं करती है, क्योंकि 'मैं इस रजतको जानता हूँ' इस प्रकार उस वृत्तिमें इदमर्थके साथ तादात्म्यापन्न रजतविषयत्वका अनुभव होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।

इतर लोग कहते हैं कि जैसे इदमंशसे युक्त चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या रजताकारसे परिणत होती है, वैसे ही इदमंशविषयक वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या अध्यस्त रजतमात्रको विषय करनेवाली वृत्तिके आकारमें परिणत होती है, इदम् अंशकी वृत्तिके समान अध्यस्त रजतगोचरवृत्ति अनध्यस्त नहीं है अर्थात् रजतज्ञानाभासरूप रजतज्ञान प्रातिभासिक ही है । इसलिए जैसे रजतके अधिष्ठानमें रहनेवाले इदन्त्वका रजतमें संसर्गका भान होता है, वैसे ही रजतके ज्ञानमें भी अधिष्ठानगत इदन्त्वविषयत्वके संसर्गका भान होता है, अतः 'इदं रजतम्' इस द्वितीय ज्ञानको इदंविषयक नहीं मानना चाहिए ।

यदि शङ्का हो कि रजतत्वके समान अध्यस्त रजत और इदन्त्वके संसर्गमें रजतज्ञानकी विषयता होनेसे उस संसर्गके प्रतियोगी इदन्त्वमें भी रजतज्ञानकी

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२४६सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेदं

तत्प्रतियोगिन इदंत्वस्याऽपि तद्विषयत्वं वक्तव्यमिति वाच्यम्; स्वतादात्म्याश्रयस्य इदंत्वविषयत्वादेव तस्य तत्संसर्गविषयत्वे अतिप्रसङ्गाभावात् । न चाऽधिष्ठानाध्यासयोरेकस्मिन् ज्ञाने प्रकाशनियमस्य सम्भावनाभाष्यविवरणे प्रतिपादनाद् एकवृत्तिविषयत्वं वक्तव्यमिति वाच्यम्; वृत्तिभेदेऽपीदमाकारवृत्त्यभिव्यक्ते एकस्मिन् साक्षिणि तयोः प्रकाशोपगमादित्याहुः ॥१८॥

विषयता होनी चाहिए ? [ अन्यथा घटत्व आदिके संसर्गप्रत्यक्षमें घटत्वादिविषयताका भी अभाव प्रसक्त होनेसे अतिप्रसङ्ग होगा, तात्पर्य यह है कि पूर्वमें कहा गया है कि अध्यस्तरजतवृत्तिको इदंविषयक नहीं मानना चाहिए, क्योंकि अन्य रीतिसे उपपत्ति हो सकती है, इसपर शङ्का करनेवाला कहता है कि ज्ञानाभाससे रजतका ग्रहण करनेपर इदन्त्व संसर्गका यदि ग्रहण होता है, तो संसर्गका प्रतियोगिभूत इदन्त्व भी अवश्य गृहीत होगा, इस अवस्थामें अध्यस्त रजतज्ञानमें इदन्त्वविषयकत्व आनेसे अध्यस्तरजतविशिष्ट इदंविषयकत्व सिद्ध ही हुआ, फिर कैसे कह सकते हैं कि ज्ञानाभास रजतमात्रविषयक ही होता है ? ] तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानाभासके साथ तादात्म्यापन्न इदमंशज्ञानके इदन्त्वविषयक होने ही से रजतज्ञानमें रजतेदन्त्वसंसर्गकी विषयता होनेसे अतिप्रसङ्ग नहीं है । [ भाव यह है कि यद्यपि प्रातिभासिक—अध्यस्त रजतज्ञानका इदन्त्वरूप संसर्गप्रतियोगी विषय नहीं है, तथापि ज्ञानाभासके प्रति अधिष्ठान होनेके कारण इदमंश ज्ञानके साथ रजतज्ञानाभासका तादात्म्य है, जो इदमंश ज्ञान है, उसमें इदन्त्वरूप प्रतियोगिविषयकत्व है, अतः ज्ञानाभासमें भी इदन्त्वसंसर्गविषयकत्वका अवगाहन होता है, ] पुनः यदि शङ्का हो कि अधिष्ठान और अध्यासका एक ज्ञानमें प्रकाश होता है, इसका सम्भावनाभाष्यके विवरणमें प्रतिपादन होनेके कारण उनमें एकवृत्तिविषयता होनी चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि अधिष्ठान और अध्यासकी भिन्न-भिन्न वृत्ति मानी जाय, तो भी इदमाकारवृत्तिमें अभिव्यक्त एक साक्षीमें ही उनका प्रकाश माना गया है, [ तात्पर्यार्थ यह है कि अध्यस्तमात्रको विषय करनेवाली वृत्तिका विवरणकारने ही अङ्गीकार किया है, इसलिए ‘एकस्मिन् ज्ञाने’ ( एक ज्ञानमें अधिष्ठान और अध्यासका प्रकाश होता है ) इत्यादि नियममें कथित ज्ञानशब्द साक्षीका ही वाची है, वृत्तिका वाची नहीं है, इसलिए दोष नहीं है ] ॥१८॥

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वृत्तिके निर्गमकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २४७


ननु हेतुनियम्यत्वात् परोक्षत्वापरोक्षयोः ।
वृत्तेर्निर्गमनं व्यर्थमेवं केचित् समादधुः ॥११५॥

परोक्षत्व और अपरोक्षत्वकी विलक्षणताके करणविशेषके अधीन हो सकनेसे वृत्तिका निर्गमन व्यर्थ है, इस प्रकारकी शङ्का होनेपर कोई लोग इस प्रकार समाधान करते हैं ॥११५॥

ननु सर्वपदार्थानां साक्षिप्रसादादेव प्रकाशोपपत्तेः किं वृत्त्या ? घटादिविषयकसंस्काराधानाद्युपपत्तये तदपेक्षेऽपि तन्निर्गमाभ्युपगमो व्यर्थः; परोक्षस्थल इवाऽनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणैव घटादेरपि प्रकाशोपपत्तेः।

न च तथा सति परोक्षापरोक्षवैलक्षण्यानुपपत्तिः; शाब्दानुमित्योरिव करणविशेषप्रयुक्तवृत्तिवैजात्यादेव तदुपपत्तेः ।


अत्र शङ्का होती है कि सम्पूर्ण पदार्थोंका साक्षीसे ही प्रकाश हो सकता है, तो फिर वृत्तिको मानना व्यर्थ ही है। घटादि विषयोंके* संस्कारके आधानके लिए वृत्तिकी उत्पत्ति यदि मान भी ली जाय, तो भी वृत्तिका बहिर्निर्गम अर्थात् चक्षु आदि द्वारा घटाकार अन्तःकरणकी वृत्ति बाहर निकलती है, यह मानना व्यर्थ है, क्योंकि परोक्षस्थलके समान अनिर्गतवृत्तिसे युक्त साक्षीसे ही घट आदिका भी प्रकाश हो सकता है [ तात्पर्यार्थ यह है—जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' ( पर्वत वह्निमान् है, धूम होनेसे ) इस अनुमितिस्थलमें वह्निदेशमें वृत्तिके न जानेपर भी साक्षीसे उसका प्रकाश होता है, वैसे ही घट आदि देशमें अन्तःकरणकी वृत्तिके न जानेपर भी उसका प्रकाश हो सकता है, अतः वृत्तिका बाहर निकलना सर्वथा अनुपयुक्त है ] ।

इसपर यदि शङ्का हो कि वृत्तिका बहिर्गमन न माना जाय, तो परोक्ष और अपरोक्षस्थलमें कोई विशेष नहीं होगा, [ अतः वृत्तिका अपरोक्षस्थलमें बाहर निकलना जरूरी है, अन्यथा परोक्ष ज्ञान और अपरोक्ष ज्ञानमें वैलक्षण्यका वृत्तिके निकलनेसे और न निकलनेसे जो स्वीकार किया † गया है, वह न होगा ]


* तात्पर्य यह है कि यदि वृत्ति न मानी जाय, तो कालान्तरमें किसी भी पदार्थका स्मरण नहीं होगा क्योंकि तत्-तत् विषयोंके अनुभव साक्षीरूप होनेके कारण नित्य होंगे, अतः अनुभवके विनाशरूप संस्कार नहीं होंगे, और संस्कारके न होनेसे स्मरण नहीं होगा, इसलिए अवश्य वृत्ति माननी होगी, अतः 'किं वृत्त्या?' इसको छोड़कर दूसरा प्रश्न किया गया कि वृत्तिका बहिर्निर्गम क्यों माना जाता है ?

† बहिर्निर्गतवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य अपरोक्षज्ञान है, अनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य परोक्षज्ञान है, इस प्रकारका प्रत्यक्ष और परोक्षमें वैलक्षण्य केवल वृत्तिप्रयुक्त है, अतः वृत्तिनिर्गमन

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२५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अर्थेष्वाश्रयवृत्तिस्थचिद्भास्येष्वेवापरोक्षतः ॥
कल्प्यते निर्गमो वृत्तेः परोक्षेऽगतिकल्पना ॥११६॥

आश्रय (विषयाकार) वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे भासित होनेवाले अर्थोंमें अपरोक्षता होनेसे प्रत्यक्ष स्थलमें वृत्तिका निर्गम माना जाता है, और परोक्षस्थलमें वृत्तिनिर्गमकी कल्पना नहीं करते हैं ॥११६॥

अत्र केचिदाहुः—प्रत्यक्षस्थले विषयाधिष्ठानतया तदवच्छिन्नमेव चैतन्यं विषयप्रकाशः। साक्षात्तादात्म्यरूपसम्बन्धसम्भवे स्वरूपसम्बन्धस्य वाऽन्यस्य वा कल्पनायोगादिति तदभिव्यक्त्यर्थं युक्तो वृत्तिनिर्गमाभ्युपगमः।
परोक्षस्थले व्यवहिते वह्नयादौ वृत्तिसंसर्गायोगादिन्द्रियवदन्वयव्यति-


तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शाब्दबोध और अनुमितिमें जैसे करणविशेषसे वैलक्षण्यका प्रतिपादन किया गया है, वैसे ही प्रत्यक्ष, अनुमान आदिमें करणविशेषके आधारपर ही वैलक्षण्यकी उपपत्ति हो सकती है।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—प्रत्यक्षस्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्य ही विषयका अधिष्ठान है, अतः वही विषयावच्छिन्न चैतन्य विषयका प्रकाश है, [जीवचैतन्य नहीं है, क्योंकि जीवचैतन्य विषयके प्रति उपादान नहीं है, अतः उसके साथ विषयका तादात्म्य नहीं हो सकता] क्योंकि साक्षात्तादात्म्यसम्बन्धका सम्भव होनेपर स्वरूपसम्बन्धकी अन्य परम्परासम्बन्धकी कल्पना नहीं की जाती है, अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके ही विषयप्रकाशक होनेसे उसके आवरणके अभिभवके लिए वृत्तिका बाहर निकलना आवश्यक है।

अनुमिति आदि परोक्षस्थलमें व्यवहित वह्नि आदि विषयमें वृत्तिसंसर्गके न होनेसे और इन्द्रियके समान अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त वृत्तिके निकलनेके लिए किसी द्वारकी उपलब्धि न होनेसे अनिर्गत-


नहीं मानना चाहिए, यह वृत्तिनिर्गमवादीका कहना है, इसपर उत्तर दिया कि 'इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, और इन्द्रियाजन्यम् ज्ञानं परोक्षम्' इस प्रकारसे अपरोक्ष और परोक्षके वैलक्षण्यका उपपादन हो सकता है, क्योंकि अनुमिति और शाब्दमें भी अनुमानादिप्रयुक्त वैलक्षण्य ही है, अतः वृत्तिनिर्गमनकी कोई आवश्यकता नहीं है, यह भाव है।