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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 263 of 590

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Page 263

सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २३३


शङ्खभ्रमे चक्षुरनपेक्षाप्रसङ्गात् । नहि तत्र शङ्खग्रहणे चक्षुरपेक्षा; रूपं विना केवलशङ्खस्य चक्षुर्ग्राह्यत्वायोगात् । नाऽपि पीतिमग्रहणे, आरोप्ये ऐन्द्रियकत्वानभ्युपगमात् ।

न च पीतिमा स्वरूपतो नाऽध्यस्यते, किन्तु नयनगतपित्तपीतिम्नोऽनुभूयमानस्य शङ्खसंसर्गमात्रमध्यस्यत इति पीतिमाऽनुभवार्थमेव चक्षुरपेक्षेति वाच्यम्; तथा सति शङ्खतत्संसर्गयोरप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । नयनप्रदेशगतपित्तपीतिमाऽऽकारवृत्त्यभिव्यक्तसाक्ष्यसंसर्गेण तयोस्तद्भास्यत्वाभावात् । पीतिमसंसृष्टशङ्खगोचरैकवृत्त्यनभ्युपगमाच्च ।


नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे अर्थात् अधिष्ठानके इन्द्रियजन्यज्ञानके लिए ही इन्द्रियकी अपेक्षा है और आरोप्यके इन्द्रियजन्यज्ञानके लिए इन्द्रियकी अपेक्षा नहीं है, ऐसा स्वीकार करनेसे पीत शङ्खके भ्रमस्थलमें चक्षुकी अपेक्षा नहीं होगी, क्योंकि वहाँ शङ्खके ग्रहणमें चक्षुकी अपेक्षा ही नहीं है, कारण कि रूपके बिना शुद्ध शङ्खका चक्षुसे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, और पीतिमाके ग्रहणमें भी चक्षुकी अपेक्षा नहीं है, क्योंकि आरोप्य पदार्थका इन्द्रियजन्यज्ञान माना ही नहीं गया है ।

शङ्का होती है कि शङ्खमें स्वरूपतः * पीतरूपका अध्यास नहीं होता किन्तु अनुभूयमान चक्षुमें रहनेवाले पित्तदोषके पीतरूपका शङ्खमें सम्बन्धमात्र अध्यस्त होता है, इसलिए पीतिमाके अनुभवके लिए चक्षुकी अपेक्षा है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि नेत्रगत पित्तद्रव्यके ही पीतरूपका अनुभवस्वीकार किया जाय, तो शङ्ख और पीतके संसर्गका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा, क्योंकि नेत्रप्रदेशमें रहनेवाले पित्तद्रव्यका जो पीतरूप है, उस पीताकारवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यरूप साक्षीके साथ शङ्ख और शङ्खमें आरोपित पीतसंसर्गका सम्बन्ध न होनेके कारण शङ्ख और पीतसंसर्गका


* जैसे शुक्तिमें रजतका स्वरूपसे अध्यास होता है, वैसे ही शङ्खमें पीतरूपका स्वरूपसे अध्यास नहीं होता, किन्तु नेत्रमें विद्यमान पीतरूपसे युक्त जो पित्तलक्षण द्रव्य है, उसकी जो पीतिमा है, जिसका कि उस पित्तद्रव्यमें अनुभव होता है, उसका शङ्खमें सम्बन्धमात्र प्रतीत होता है, जैसे लोहित कुसुममें अनुभूयमान रक्तरूपके संसर्गका समीपवर्ती स्फटिकमें अध्यास होता है, इस विषयमें किसीको यदि शङ्का हो कि अन्यके रूपका अन्यत्र आरोप करेंगे, तो अन्यथाख्यातिका प्रवृत्ति होगी ? तो कहिए कि अन्यथाख्यातिका

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