सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| ३३० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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नन्वेवं करस्पृष्टे लोहशकले तदीयनीलरूपविशेषदर्शनसामग्र्यभावात् रजताध्यासः किं न भवेत्? सादृश्यज्ञानानपेक्षणादिति चेद्; भवत्येव; किन्तु ताम्रादिन्यावर्तकविशेषदर्शनसामग्र्यभावात् तदध्यासेनाऽपि भाव्यमिति क्वचिदनेकाध्यासे संशयगोचरो भवति। क्वचित्तु रजतप्राये कोशगृहादौ रजताध्यास एव भवति। क्वचित् सत्यपि सादृश्यज्ञाने शुक्तिकादौ कदाचित् करणदोषाद्यभावेनाऽध्यासानुदयवदध्यासानुदयेऽपि न हानिः।
इस विषयमें एक शङ्का होती है वह यह कि यदि सादृश्यज्ञानके विना केवल विशेषदर्शनकी सामग्रीके अभावसे ही अध्यासकी उत्पत्ति होती है, ऐसा माना जाय, तो लोहेके टुकड़ेको हाथसे छूनेपर उसमें रजतका अध्यास क्यों नहीं होता है? क्योंकि लोहेके नीलरूपविशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव उस स्थलमें है, परन्तु यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें लोहेके टुकड़ेमें रजतका अध्यास होता ही है। किन्तु ताम्र आदिकी व्यावृत्ति करने-वाली विशेषदर्शनकी सामग्रीका अभाव होनेसे ताम्र आदिका अध्यास भी हो सकता है, इस प्रकार हाथोंसे स्पृष्ट लोहेके टुकड़ेमें अनेक अध्यास—अध्यस्त वस्तुएँ—संशयके विषय होते हैं, [अर्थात् यह रजत है या ताम्र है अथवा सुवर्ण है, इस तरह संशय होता है]। किसी स्थलमें अर्थात् जिस खजानेमें † रजतका ही आधिक्य है, ऐसे स्थानमें तो लोहेमें रजतका ही अध्यास होता है। जैसे सादृश्यज्ञानके रहनेपर भी शुक्ति आदिमें—कदाचित् करण-दोषके अभावसे—रजतका अध्यास नहीं होता है, वैसे ही हमारे मतमें भी कदाचित् अध्यास नहीं हो, तो भी हानि नहीं है।
व्यतिरेक दिखाये गये हैं, उसीका 'विस्तृते पटे' इत्यादिसे खण्डन किया गया है, अर्थात् लम्बे घटमें जो पटका विस्तार देखा जाता है वही अध्यासमें प्रतिबन्धक है और कैंचीसे ठीक उसकी कमलाकृति बना लेनेपर उसमें उक्त सामग्रीके अभावसे कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास हो सकता है, अतः सादृश्यज्ञान अपेक्षित नहीं है, यह प्रकृतमें भाव है।
† जिसमें सदा रजत ही रखा जाता है, ऐसे कोशगृहमें प्राप्त पुरुष को, दैवसे किसी लोहेके टुकड़ेको छूनेपर भी उसमें उसे रजतका ही अध्यास होता है, क्योंकि उस कोशगृहमें लोहेकी सम्भावना ही उसे नहीं है, इसलिए ऐसे स्थलमें रजत है, या ताम्र है, ऐसा संशयात्मक अध्यास नहीं होता है। और जहाँ ऐसी स्थिति नहीं है वहाँ तो मूलोक्त रीतिसे संशय होता ही है, यह भाव है।