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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 261 of 590

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Page 261

सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित १३१

तस्मान्न कार्यकल्प्या इदमाकारवृत्तिः, नाऽप्यप्रतिबद्देदमर्थसम्प्रयोग-
कारणकल्प्या; ततो भवन्त्या एवेदंवृत्तेर्दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगक्षुभिताविद्या-
परिणामभूतस्वसमानकालरजतविषयत्वस्याऽस्माभिरुच्यमानत्वात् । तत्र च
ज्ञानसमानकालोत्पत्तिके प्रतिभासमात्रविपरिवर्तिनि रजते तत्प्राचीन-
सम्प्रयोगाभावेऽपि तत्तादात्म्याश्रयेदमर्थसम्प्रयोगादेव तस्याऽपि चक्षुर्ग्राह्य-
त्वोपपत्तेः । ‘चक्षुषा रजतं पश्यामि’ इति प्रातिभासिकरजतस्य स्वसम्प्र-
योगाभावेऽपि चाक्षुषत्वानुभवात् ।

उक्त रीतिसे धर्मिज्ञानके अध्यासके प्रति हेतु न होनेके कारण इदमा-
कारवृत्तिकी ( अध्यासस्वरूप ) कार्यसे कल्पना नहीं करनी चाहिए और प्रति-
बन्धसे शून्य इदमर्थके साथ इन्द्रिय संयोगरूप कारणसे भी उसकी कल्पना नहीं
करनी चाहिए, क्योंकि इन्द्रियसम्प्रयोगसे उत्पन्न होनेवाली इदमाकार
वृत्तिका ही—दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे क्षुभित अविद्याका परिणामभूत तथा
इदमाकारवृत्तिके समानकालमें उत्पन्न हुआ रजत विषय होता है, ऐसा
हम कहते हैं । [ तात्पर्य यह है कि इदमर्थावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली
रजताकारमें परिणम्यमान अविद्या—अध्यासमें निमित्तभूत दोषसे युक्त चक्षु
आदिके सम्प्रयोगसे क्षोभको अर्थात् कार्योन्मुखताको प्राप्त होती है, इसके बाद
रजतरूपसे परिणत होती है, इसी प्रकार दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे वृत्ति भी
उसी कालमें होती है, इसलिए अप्रतिबद्ध इन्द्रियके सम्प्रयोगसे होनेवाली
इदंवृत्ति अपने समानकालमें उत्पन्न हुए रजतसे विशिष्ट इदमर्थको विषय
करती है ] । भ्रमस्थलमें ज्ञानके समानकालमें उत्पन्न तथा प्रतीतिकालमें
ही जिसकी* सत्ता है, ऐसे रजतमें, रजतप्रतिभाससे पूर्व, सम्प्रयोग न
होनेपर भी रजततादात्म्यके आश्रय इदमर्थके सम्प्रयोगसे ही रजत चक्षुसे
गृहीत होता है, क्योंकि ‘आँखसे रजतको देखता हूँ’ इस प्रकार अपने
साथ इन्द्रियसम्प्रयोगके न रहते भी प्रातिभासिक रजतका चक्षुसे प्रत्यक्ष
देखा जाता है ।


* इस शब्दका अर्थ है—प्रतिभासकालमात्रे विपरिवर्तनम्—सत्त्वं यस्य तत् प्रतिभासमात्र-
विपरिवर्ति, तस्मिन् प्रतिभासमात्रनिपरिवर्तिनि अर्थात् जिसका अस्तित्व केवल प्रतीतिकालमें
ही है—प्रतीतिसे व्याप्त है सत्ता जिसकी ऐसा रजत, यह भाव है ।