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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

About this granth

The Siddha Siddhanta Paddhati (सिद्धसिद्धान्तपद्धति) is a principal Sanskrit text of the Nath tradition, ascribed to Guru Gorakhnath (Goraksha). It sets out the philosophy of the Nath yogis in systematic form, centred on the idea that the body (pinda) and the cosmos are two forms of one reality, so that the yogi can realise the highest state within his own body.

It has six teachings (upadeshas): the origin of the body, tracing the unfolding of Shakti from the supreme state; reflection on the body; awareness of the holy places and deities within it; its supports, namely nine chakras, sixteen adharas, three lakshyas and five voids; the harmony of body and the supreme; and the marks of the avadhuta yogi.

This edition with Hindi translation is published by the Gorakhnath Temple, Gorakhpur. It opens with a picture of the perpetual flame in the temple's sanctum, believed to have been lit by Gorakhnath, followed by a verse in praise of Ganapati from the sixth teaching with its Hindi meaning. The translator is not named in the opening pages. It runs to 222 pages.

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विवेकमार्तण्ड में यम के ये ही लक्षण वर्णित हैं। जिसमें प्राण-विच्छेद के
व्यापार का अभाव हो, वह अहिंसा है। सत्य से आशय यथार्थ भाषण का है।
दूसरे के पदार्थ का अपहरण न करना अस्तेय है, जितेन्द्रियता ब्रह्मचर्य है, सहन-
शीलता क्षमा है, धैर्य ही धृति है, दूसरे के दुःख को मिटाने की इच्छा दया है।
निष्कपट व्यवहार ही आर्जव है, चतुर्थांशविवर्जित सात्विक आहार का सेवन
ही मिताहार है, श्रुतिस्मृतिप्रतिपादित नित्यकर्मजन्य शुद्धि ही शौच है। इन दशों
लक्षणों के संदर्भ में इन्द्रियजय, आहारनिद्रा तथा शीतादि द्वन्द्व की जय आदि से
उपशम की प्राप्ति होती है। यम को गोरखनाथ ने उपशम का पर्याय कहा है।
इससे सात्विक साधनामय जीवन का प्रारम्भ होता है। साधक वाह्य व्यवहार
से सम्बन्ध रखने वाले राग-द्वेषादि द्वन्द्वों से निवृत्त होकर निष्काम कर्म
के आचरण को महत्व देता है।
नियम इति मनोवृत्तीनां नियमनमित्येकान्तवासो निः
सङ्गतौदासीन्यं यथाप्राप्तिसन्तुष्टिर्वैरस्यं गुरुचरणावरूढ़त्व
मितिनियमलक्षणम् ॥ ३३ ॥
मन के व्यापार का नियमन—नियन्त्रण ही नियम है, एकान्तवास, असङ्गता,
उदासीनता, जो कुछ भी (जीविका के निर्वाह के लिये) प्राप्त हो जाय, उसमें
संतोष धारण करना, राग-द्वेष रूपीद्वन्द्वों में उपरामता और गुरुचरण के आश्रय
में ही निर्भरता नियम के लक्षण हैं।
विशेष—महर्षि पतञ्जलि ने नियम के पाँच लक्षण स्वीकार किये हैं, वे
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान (शरणागति) हैं।
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥
(पतञ्जलि योगदर्शन २।३२)
विवेकमार्तण्ड-८ में गोरखनाथजी ने तप, संतोष, आस्तिक्य, दान,
ईश्वरपूजन, सिद्धान्तश्रवण, ह्री, मति, जप, और हवन को नियम के दस लक्षण
बताये हैं। इसी तरह हठयोगप्रदीपिका में उल्लेख है।
तपःसन्तोष आस्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम् ।
सिद्धान्तवाक्यश्रवणं ह्रीमती च तपोहुतम् ।
७० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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नियमा दशसंप्रोक्ता योगशास्त्रविशारदैः ।
( हठयोग० १ । १८ )
हठयोगप्रदीपिका का कथन शिवसंहिता-सम्मत है । नियम-पालन के सम्बन्ध
में भगवान् शिव का स्पष्ट आदेश है कि सिद्धान्तग्रन्थों का श्रवण करना चाहिये ।
परमेश्वर सर्वव्यापक का नाम-संकीर्तन करना चाहिये, शुभ को ही कानों से सुनना
चाहिये, धृति, क्षमा, तप, शौच और लज्जा का ध्यान रखना चाहिये, गुरु का
सेवन करना चाहिये । वैराग्य भाव से घर में रहना चाहिये ।
सिद्धान्तश्रवणं नित्यं वैराग्यगृहसेवनम् ।
नामसङ्कीर्तनं विष्णोः सुसादश्रवणं परम् ॥
धृतिः क्षमा तपः शौचं ह्रीर्मतिगुरुसेवनम् ।
सदैतांश्च परं योगी नियमांश्च समाचरेत् ॥
( शिवसंहिता ३।४१-४२ )
इस सिद्धसिद्धान्तपद्धति रचना में गोरखनाथजी ने दस नियमों को ध्यान में
रख कर उन्हें पाँच प्रकार के लक्षित किये हैं । एकान्तवास, उदासीनता, यथा-
प्राप्ति संतुष्टि, वैरत्याग, और गुरुचरणाश्रय । एकान्तवास का अभिप्राय है जन-
सम्पर्क से दूर रह कर योगमठ आदि के वातावरण में कुटी का निर्माण कर उसमें
निवास करते हुए विषय-भोग में आसक्त न होना। सर्वथा निःसंग रहना ।
उदासीन और द्वन्द्वों में तटस्थ रहकर निःस्पृह भाव से साधन में तत्परता ही
उदासीनता है । शत्रु और मित्र में समान भाव रखकर मन में कभी राग-द्वेष
न उत्पन्न होने देना ही वैर का अभाव है । जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसी में
सन्तुष्ट और प्रसन्न रहना यथाप्राप्ति-संतुष्टि है और गुरु के प्रसाद — प्रसन्नता से ही
उनकी सेवा में प्रवृत्त रहने से योगसाधक को स्वरूपावस्थान की प्राप्ति होती है ।
एकान्तवास, निःसंगता के सम्बन्ध में श्रीमद्भगवद्गीता का कथन है—
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥
( गीता ६।१० )
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और
संग्रहरहित योगी को अकेला ही एकान्त स्थान में निवास कर आत्मा को निरन्तर
परमात्मा में लगाना चाहिये । गीता के ही बारहवें अध्याय के १८ वें, श्लोक के-
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७१

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'अनिकेतः स्थिरमतिः' वचन से यह भाव स्पष्ट हो जाता है। उदासीनता के
सम्बन्ध में गीता में विवेचन है कि जो साधक समस्त कामनाओं का त्याग कर
ममता-अहंकारस्पृहारहित होकर जीवन-यापन करता है, वही शान्ति को प्राप्त
होता है।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥
( गीता २।७१ )
यथाप्राप्ति संतुष्टि का आशय है दुःखों की प्राप्ति होने पर मन में उद्वेग
न होना, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह रहना।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
( गीता २।५६ )
इसी भाव का गीता में स्पष्टीकरण किया गया है।
अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः ।
( गीता १२।१६ )
गोरखनाथजी ने रागद्वेष से ऊपर उठजाना साधक के लिए बहुत आवश्यक
नियम बताया है। जो सर्वत्र स्नेह ( राग ) रहित होकर शुभ-अशुभ वस्तु
की प्राप्ति में न प्रसन्न होता है, न द्वेष करता है, वही स्थिरबुद्धि साधक है।
ऐसा पुरुष न किसी से द्वेष करता है, न किसी में रागयुक्त होता है।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥
( गीता १२।१८ )
गोरखनाथजी ने गुरु के चरणाश्रय में साधक के शरीर का चिन्मय होना
स्वीकार किया है, चिन्मयता का अर्थ स्वरूप में स्थिति है। गोरखनाथजी का
कथन है।
सतगुरु मिलै तो सांसा भागै। मूल विचार्या माहीं ॥
( गो० बानी ग्यानतिलक ४० )
७२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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महायोगज्ञान से सम्पन्न सद्गुरु की शरणागति से योगसाधक अपने हृदय में
मूलतत्व—अलखनिरंजन के स्वरूप का विचार करता है । इसके परिणामस्वरूप
उसका संशय ( व्यामोह ) नष्ट हो जाता है ।
आसनमिति स्वस्वरूपे समासन्नता स्वस्तिकासनं पद्मासनं
सिद्धासनमेतेषां मध्ये यथेष्टमेकं विधाय सावधानेन स्थातव्यम् ।
इत्यासनलक्षणम् ॥ ३४ ॥
अपने ( स्वसंवेद्य, द्वैताद्वैतविवर्जित परमात्म ) स्वरूप में चेतना की
संस्थिति अथवा स्थापन ( समासन्नता ) ही आसन है । स्वस्तिकासन, पद्मासन,
सिद्धासन -- इन तीनों में से एक आसन में ( योगयुक्ति की ) विधि से सावधान
होकर ( ध्येय तत्व में ) स्थिर हो जाना, ठहर जाना ही आसन का लक्षण
है ॥ ३४ ॥
विशेष—महायोगी गोरखनाथजी की दृष्टि में यद्यपि वाह्य आसनाभ्यास
का विशेष महत्व नहीं है, तथापि उन्होंने साधना में संतुष्टि के लिये आसनों की
दिशा में स्वस्तिकासन, पद्मासन और सिद्धासन को वरीयता प्रदान की है ।
उन्होंने कहा है ।
आसण दिढ़ अहार दिढ़ जे न्यंद्रा दिढ़ होई ।
गोरष कहै सुणौ रे पूता मरै न बूढ़ा होई ॥
( गोरखबानी सबदी १२५ )
महर्षि पतञ्जलि ने सुखपूर्वक बैठने को आसन कहा है । शरीर को सीधा
और स्थिर कर सुखपूर्वक बैठ कर समस्त चेष्टा के त्यागपूर्वक प्रयत्न के शैथिल्य
और अनन्त अलखनिरञ्जन परमात्मा में मन को प्रवृत्त करने से ही आसन की
सिद्धि होती है और साधक द्वन्द्वों से विमुक्त होकर स्वरूप ( सुख ) में समासन्न
हो उठता है ।
'स्थिरसुखमासनम्'
( योगदर्शन २ । ४६ )
महर्षि पतञ्जलि और महायोगी गोरखनाथ की शब्दावली 'स्थिरसुख
मासनम्' और 'स्वस्वरूपे समासन्नता' में योगासनों के अभ्यास की फलदृष्टि में
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७३

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तादात्म्य परिलक्षित है । उपर्युक्त ( पातञ्जल सूत्र २ । ४६ ) के व्यासभाष्य
और भोजवृत्ति में भी परमात्मा में चित्त की तदाकारता ही स्वरूपसमासन्नता
का प्रतिपादन है । व्यासभाष्य में संकेत है :-
अनन्ते वा समापन्नं चित्तमासनं निर्वर्तयतीति ।
अनन्त में समापन्न चित्त आसन को सिद्धि करता है । भोजवृत्ति में यही
बात उपलक्षित है ।
यदा चाकाशादिगत आनन्त्ये चेतसः समापत्तिः क्रियतेऽव्यव-
धानेन तादात्म्यमापद्यते तदा देहाहंकाराभावान्नासनं दुःखजनकं
भवति ।
जब आकाश आदि में रहनेवाली अनन्तता में चित्त व्यवधानरहित तदाकार
किया जाता है, तब उसकी तद्रूपता प्राप्त हो जाने पर शरीराभिमान का अभाव
हो जाने से देह की सुधि न रहने से आसन दुःख का उत्पादक नहीं होता । यही
स्वरूप में समासन्नता का विशिष्ट फल है ।
जानु और ऊरु ( जंघाओं ) के मध्य में पैरों के तलवों को अच्छी तरह
लगाकर समान अवस्था में शरीर को एकसोध में कर बैठना ही स्वस्तिक आसन
है ।
जानूर्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले उभे ।
ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकं तत् प्रचक्षते ॥
( हठयोगप्रदीपिका १ । २१ )
इस आसन के द्वारा योगाभ्यासी वायु का साधन यथाशीघ्र करने में सफल
होता है । राजयोग-साधना में इसे बहुत उपयोगी कहा गया है, इस आसन में
मन स्थिर होता है, साधक को ध्यान में सुविधा होती है, रीढ़ की स्थिरता बनी
रहती है, वीर्य उर्ध्वमुखी होता है, ब्रह्मचर्य की शक्ति बढ़ती है । भगवान् शिव का
कथन है ।
सुखासनमिदं प्रोक्तं सर्वदुःखप्रणाशनम् ।
स्वस्तिकं योगिभिर्गोप्यं स्वस्तीकरणमुत्तमम् ॥
( शिवसंहिता ३ । ११८ )
७४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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स्वस्तिक आसन के अभ्यास से सभी दुःखों का नाश होता है, यह आसन
परम गोप्य है, सर्वश्रेष्ठ और कल्याणकारी है ॥
पद्मासन दूसरा आसन है, जिसे 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में गोरखनाथजी
ने महत्व दिया है ।
वामोरूपरि दक्षिणाञ्च चरणं संस्थाप्यवामं तथा
दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढ़म् ।
अङ्गुष्ठौ हृदयेनिधाय चिबुकं नासाग्रमवलोकये-
देतद् व्याधिविकारनाशनकरं पद्मासनं प्रोच्यते ॥
( गोरक्षशतक-१२ )
वाम ऊरु, जानुमूल में दाहिना पैर स्थापित करे और उसी तरह दायें
जानुमूल में बायाँ पैर स्थिर करे और दोनों हाथों को पीछे से ले जाकर दायें हाथ
से बायें पैर के अँगूठे और बायें हाथ से दायें पैर के अँगूठे को दृढ़ता से पकड़ कर
चिबुक को हृदय से लगाकर नासा के अग्र भाग को दोनों नेत्रों से देखे, यही
समस्त व्याधि तथा मानसिक-शारीरिक विकारों को नष्ट करनेवाला
पद्मासन है ।
भगवान् शिव का कथन है कि इस आसन का अभ्यास करनेवाले साधक
के प्राण सम हो जाते हैं और सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं । जो योगी पद्मासन में
स्थित होकर प्राण-अपान के ऐक्य का अभ्यास सिद्ध कर लेता है, वह निःसन्देह
संसार-सागर के पार उतर जाता है ।
अनुष्ठाने कृते प्राणः समश्चलति तत्क्षणात् ।
भवेदभ्यासने सम्यक् साधकस्य न संशयः ॥
पद्मासने स्थितो योगी प्राणापानविधानतः :
पूरयेत्स विमुक्तः स्यात्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
( शिवसंहिता ३ । १०९-११० )
इस आसन के अभ्यास से स्वरूपावस्थान सिद्ध होता है ।
पद्मासने स्थितो योगी नाड़ीद्वारेण पूरितम् ।
मारुतं धारयेद् यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ॥
( हठयोगप्रदीपिका १ । ५१ )
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७५

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पद्मासन में स्थित जो योगी नाड़ी-द्वार से पूरित की गयी वायु स्थिर कर
लेता है—सुषुम्ना में स्थापित कर ऊर्ध्वमुखी कर लेता है, वह मुक्त ( अपने स्वरूप
में स्थित ) हो जाता है ।
स्वरूप में स्थिति की दृढ़ता के लिये सिद्धासन का अभ्यास बहुत
आवश्यक है ।
योनिस्थानकमङ्घ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेन्
मेढ्रेपादमथैकमेव नियतं कृत्वा समं विग्रहम् ।
स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन् भ्रुवोरन्तर
मेतन्मोक्षकपाटभेदनकं सिद्धासनं प्रोच्यते ॥
( गोरक्षशतक-११ )
गुदा और मेढ्र के मध्य में योनि, कुण्डलिनी-स्थान है। योगी इस योनि
स्थान को बायें पैर की एड़ी से दबा कर दायें पैर की एड़ी को मेढ्र ( उपस्थ )
पर लगा ले, शरीर को सीधा रखे, सभी इन्द्रियों को वश में रखे, भ्रू के मध्य
में दृष्टि को स्थिर कर बिना हिले-डुले रहे, यही मोक्ष के दरवाजे को खोलनेवाला
सिद्धासन कहा गया है ।
यह आसन सिद्धों को भी सिद्धि प्रदान करनेवाला है । इस सिद्धासन के
अभ्यास से साधक को योगज्ञान प्राप्त हो जाता है । वायु के अभ्यासी के लिये
यह आसन बड़ा उपयोगी है । योगी संसार-सागर से पार होकर मुक्तिपूर्वक परम
गति पाता है । इसके ध्यान मात्र से योगी पाप से छूट जाता है ।
येनाभ्यासवशात् शीघ्रं योगनिष्पत्तिमाप्नुयात् ।
सिद्धासनं सदा सेव्यं पवनाभ्यासिना परम् ॥
ये संसारमुत्सृज्य लभते परमां गतिम् ।
नातः परतरं गुह्यासनं विद्यते भुवि ।
येनानुध्यानमात्रेण योगी पापाद् विमुच्यते ॥
( शिवसंहिता ३ । १०३-१०४ )
सिद्धासन का अभ्यास अत्यन्त शुभकारी और परमोपयोगी है ।
प्राणायाम इति प्राणस्य स्थिरता । रेचकपूरककुम्भक
संघटकरणानि चत्वारि प्राणायामलक्षणानि ॥ ३५ ॥
७६ ] { सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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शरीर की नाड़ियों में प्राण के प्रवाह के प्रयासपूर्वक उसे स्थिर रखने की
क्रिया ही प्राणायाम है। रेचक, पूरक, कुम्भक और प्राण-अपान का मेलन—संघट-
करण प्राणायाम के चार भेद हैं। ये ही प्राणायाम के लक्षण हैं ॥ ३५ ॥
विशेष—गोरखनाथजी ने शरीर में जीवनी-शक्ति को अक्षुण्ण रखने के लिये
प्राणायाम पर विशेष बल दिया है। रेचक वायु को बाहर निकालना है, पूरक में
नासारन्ध्र से वायु को भीतर भरा जाता है और शरीर के
भीतर वायु को स्थिर रखने की क्रिया कुम्भक है, प्राणवायु और
अपानवायु का ऐक्य ही संघटकरण है। योगियों ने प्राणायाम को पाप को
जलाने वाला पावक कहा है और संसार-सागर का महासेतु बताया है। प्राणायाम
में ही योगी का मोक्षदायक धर्म प्रतिष्ठित है तथा उसके सभी दोष—विकार नष्ट
होते हैं।
प्राणायामे महान्धर्मो योगिनो मोक्षदायकः ।
प्राणायामे दिवारात्रौ दोषजालं परित्यजेत् ॥
( विवेकमार्तण्ड ११४ )
हठयोगप्रदीपिका में प्राणायाम की महत्ता और विधि पर यथेष्ट प्रकाश
डाला गया है। प्राणवायु के स्थिर होने पर ही चित्त निश्चल होता है। चित्त-
वृत्ति का निरोध होता है। षट्कर्म धौति, वस्ति, कपालभाति, नौलि, नेति,
त्राटक आदि क्रियाओं से शरीर का शोधन होने पर नाड़ियाँ मलरहित हो
जाती हैं।
षट्कर्मनिर्गतस्थौल्यंकफदोषमलादिकः ।
प्राणायामं ततः कुर्यादनायासेन सिद्धयति ॥
प्राणायामैरेव सर्वे प्रशुष्यन्ति मला इति ।
( हठयोगप्रदीपिका २। ३६-३७ )
अपान और प्राण के एक होने पर वायु की सुषुम्ना में ऊर्ध्वगति होती है,
यह केवल कुम्भक की सिद्धि से ही सम्भव है। रेचक और पूरक छूट जाते हैं
तथा प्राण की केवल कुम्भक से शरीर के भीतर स्थिरता स्थापित हो जाती है।
अपान-प्राण के संघटकरण पर गीता में उल्लेख है कि अनेक ( दूसरे ) योगी
अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, अन्य प्राणवायु में अपान-वायु को हवन
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७७

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करते हैं, अन्य नियमित आहार करनेवाले प्राणायामपरायण पुरुष प्राण और अपान
की गति रोक कर प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं । ये सभी यज्ञों द्वारा
पापों का नाश करनेवाले और यज्ञों को जानने वाले हैं ।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणोऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगतीरुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
( गीता ४ । २९-३० )
महर्षि पतञ्जलि ने आसन की अभ्यास-सिद्धि के बाद श्वास-प्रश्वास के गति-
विच्छेद को प्राणायाम कहा है । गति-विच्छेद का आशय है गति का रुक जाना,
गति-विच्छेद ही प्राण की स्थिरता है, जिसका संकेत महायोगी गोरखनाथजी ने
किया है ।
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥
( योगदर्शन २.४९)
पतञ्जलि ने भी गोरखनाथजी की ही तरह प्राणायाम के चार भेद
स्वीकार किये हैं, वे बाह्य ( रेचक ), आभ्यन्तर ( पूरक ) और स्तम्भ
(कुम्भक) की वृत्ति वाले हैं और बाह्य-आभ्यन्तर विषय-वृत्ति का त्याग ही चौथा
( संघटकरण ) प्राणायाम है ।
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः । .......... बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी
चतुर्थः ।
( योगदर्शन २।५०-५१)
प्राणवायु को नासारन्ध्रों से यथानुक्रम बाहर निकालना और देखना कि कहाँ
कितने समय तक वह स्थिर है, रेचक है । प्राणवायु नासारन्ध्रों से यथानुक्रम
भरना पूरक है और शरीर के भीतर प्राण के जाने और बाहर निकल ने की गति
का अभ्यास न कर, वह जहाँ हो, उसकी गति को स्तम्भित कर देना कुम्भक है ।
बाहर और भीतर जाने-आने वाले प्राण की गति का त्याग कर देने से मन को
इष्ट-चिन्तन में लगा देना और देश-काल-संख्या के ज्ञान के बिना प्राण की गति का
(जिस किसी देश में-सुषुम्ना में) ठहरना चौथा प्राणायाम है । यह राजयोग का
७८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

३. चतुर्थ उपदेश: पिण्डाधार विचार (नव चक्र, षोडश आधार, त्रिलक्ष्य व पञ्चव्योम)

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प्राणायाम है। यही प्राण-अपान अथवा अपान-प्राण का पारस्परिक हवन अथवा .
यज्ञकर्म है। यही संघटककरण प्राण-अपान का मेलन है । महायोगी गोरखनाथ
जी ने कहा है कि अपान-वायु के निरोध से देह में स्थित प्राणवायु का उसमें
एकश्वासमय होकर ऊर्ध्वगामी होना प्राणापान के मेलन अथवा ऐक्य का
स्वारस्य है ।
प्राणो देहे स्थितो वायुरपानस्य निरोधनात् ।
एकश्वासमयो भूत्वोद्घाटयेद् गगने गतिम् ॥
( विवेकमार्तण्ड १०४)
महर्षि घेरण्ड का कथन है कि प्राणायाम के साधन से आकाशगमन,
रोगनिवृत्ति तथा कुण्डलिनी का जागरण होता है । चित्त में आनन्द उत्पन्न होता
है और प्राणायाम का अभ्यास करने वाला सुखी होता है । प्राणायाम से उन्मनी
सिद्ध होती है ।
प्राणायामात् खेचरत्वं प्राणायामाद् रोगनाशनम् ।
प्राणायामाद् बोधयेच्छक्तिं प्राणायामान्मनोन्मनी ।
आनन्दो जायते चित्ते प्राणायामी सुखी भवेत् ॥
( घेरण्ड-संहिता ५।५६ )
प्राणायाम के अभ्यास से ही अजपा गायत्री सिद्ध होती है, साधक आकाश-
चक्र में शिव का साक्षात्कार करता है ।
प्रत्याहारमिति चैतन्यतुरङ्गाणां प्रत्याहरणं विकारग्रसन
उत्पन्नविकारस्यापि निवृत्तिर्निभातीति प्रत्याहार लक्षणम् ।।३६।।
प्रत्याहार का वर्णन किया जाता है । चैतन्य आत्मा के इन्द्रियरूपी घोड़ों
के ( उनके शब्द, रूप, रस, स्पर्श, गन्धादि में) प्रत्याहरण से उनके विकारग्रस्त
होने से उत्पन्न विकारों की समाप्ति हो जाती है—यही प्रत्याहार का
लक्षण है ।। ३६ ।।
विशेष--प्रत्याहार के सम्बन्ध में हमारे औपनिषद वाङ्मय तथा योग-
शास्त्रों में विशद विवेचन उपलब्ध होता है। महायोगी गोरखनाथ ने इन्द्रियों को
तुरंग माना हैं, इसी तरह उपनिषदों मैं इन्द्रियों को तुरंग (घोड़ों) के रूप में
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७९

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परिलक्षित किया गया है । यम ने नचिकेता को समझाया है कि शरीर में
जीवात्मा रथ का स्वामी (रथी) है, शरीर ही रथ है, बुद्धि इस रथ का सारथी
है, मन लगाम है, ज्ञानियों ने इन्द्रियों को घोड़े कहा है, विषय उन घोड़ों के
विचरने का मार्ग है, शरीर, इन्द्रिय और मन के साथ चैतन्य जीवात्मा रहता है ।
जो सदा विवेकहीन बुद्धिवाला और चंचल मन से रहता है, उसकी इन्द्रियाँ
असावधान सारथी के दुष्ट घोड़ों की भाँति वश में न रहनेवाली हो जाती हैं ।
जो सदा विवेकयुक्त बुद्धि तथा वश में किये हुए स्थिर मन से सम्पन्न है, उसकी
इन्द्रियाँ सावधान सारथी के अच्छे घोड़ों की तरह वश में रहती हैं ।
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गाचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥
( कठोपनिषद् १।३।३-६)
गोरखनाथजी ने इन्हीं घोड़े के समान इन्द्रियों को विषयों से प्रत्याहारित
कर आत्ममुखी करने पर बल दिया है । श्रीगीता में भी कहा गया है कि
जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषय से निगृहीत हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है ।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
(गीता २।६८)
इन्द्रियों को उनके विषयों से मोड़कर आत्मचिन्तन में मन के साथ जोड़
देना प्रत्याहार की सिद्धि है । इन्द्रियों का राजा मन है । इसी लिये मन को
प्रत्याहारित करने पर भी गोरखनाथजी ने बल दिया है । सावधानी की बात
यही है कि इसे पीठ की ओर (अ-पूठौ), पीछे जहाँ से इसकी चंचलता आरम्भ
होती है, वापस ले जाना चाहिये, मकड़ी के तार की तरह वापस ले जाना
चाहिये । जिस तरह मकड़ी तार (जाल) से बाहर निकलने पर उसी में वापस
८० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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जाने में सुरक्षा समझती है, इसी तरह मन का धर्म स्थैर्य्य है, स्थिरता ही
उसकी सुरक्षा है। यह इन्द्रियरूपी घोड़ों के लिये प्रग्रह--लगाम है।
मन मकड़ी का ताग ज्यूं उलटि अनूठी आंणि ।
( गोरखवानी सबदी २३४ )
प्रत्याहार इन्द्रियविजय का महान् साधन है । अपने विषयों के सम्बन्ध से
रहित होने पर इन्द्रियों का चित्त के स्वरूप में तदाकार हो जाना ही प्रत्याहार है ।
प्रत्याहार सिद्ध हो जाने पर योगसाधक की इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं ।
स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ।
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ।
( पातञ्जलयोगदर्शन २ । ५४-५५ )
इन्द्रियों की वश्यता, प्राण और मन की स्थिरता पर निर्भर है । हठयोग
की साधना में स्पष्ट निर्देश है कि शरीर में प्राण की स्थिरता से ही मन
स्थिर होता है, इसलिये प्राणसाधना इन्द्रियों के प्रत्याहार की दिशा में आवश्यक
है । प्रत्याहार की सिद्धि से काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ, मोह आदि छः शत्रुओं
का नाश हो जाता है। जहाँ-जहाँ मन जाता है, उसे वहाँ-वहाँ से लौटा कर
आत्मा के वश में करना चाहिये, यही प्रत्याहार है । महर्षि घेरण्ड की दृष्टि में :
यतो यतो मनश्चरति चाञ्चल्यवशतः सदा ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
( घेरण्डसंहिता ४ । २ )
रेचक-पूरक-कुम्भक, लयक्रमपूर्वक बारह बार प्राणायाम कर वायु को शरीर
के भीतर स्थिर करने से मन स्थिर होता है और प्राणायाम के द्वारा इस तरह
इन्द्रियों का प्रत्याहार हो जाता है ।
प्राणायामद्विष्ट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः ।
( विवेकमार्तण्ड ११७ )
—शिवसंहिता में प्रत्याहार के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है कि जब योग-
साधक एक प्रहर तक वायु-धारण की शक्ति प्राप्त करता है, तब प्रत्याहार होता
है । योगसाधक को जिस-जिस पदार्थ की जानकारी हो, उसमें उसे आत्मभाव
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८१

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करना चाहिये । जिस इन्द्रिय के द्वारा जिस विषय का बोध होता हो, उसी में
आत्मभाव करने से इन्द्रियजय होना ही प्रत्याहार है ।
यं यं जानाति योगीन्द्रस्तं तमात्मेति भावयेत् ।
यैरिन्द्रियैर्यद्विधानस्तदिन्द्रियजयो भवेत् ॥
( शिवसंहिता ३ । ६८ )
प्रत्याहार की सिद्धि ही धारणा, ध्यान और समाधि में आत्मसाक्षात्कार
अथवा परमात्म पद में स्वरूपावस्थान का सोपान है ।
धारणेति सा बाह्याभ्यन्तर एकमेवनिBS... wait: एकमेवनिBS
Wait, exact characters in L8: धारणेति सा बाह्याभ्यन्तर एकमेवनिBS... no, एकमेवनिजतत्वस्वरूपमेवान्तः
धारणेति सा बाह्याभ्यन्तर एकमेवनिजतत्वस्वरूपमेवान्तः
करणेन साधयेद् यथा यद्यदुत्पद्यते तत्तन्निराकारे धारयेत्
स्वात्मानं निर्वातदीपमिव संधारयेदिति धारणा-
लक्षणम् ॥ ३७ ॥
( धारणा अष्टांगयोग का छठा अंग है, इसका निरूपण किया जाता है । )
शरीर से बाहर-भीतर एक ही निज तत्त्वस्वरूप ( आत्मा ) व्याप्त है, अन्तःकरण
से इस तरह की भावना ही धारणा है । जो-जो भौतिक प्रपञ्च उत्पन्न होता है,
उसकी निराकार आत्मा रूप में धारणा करनी चाहिये और वायुरहित दीपक
के निश्चल प्रकाश के समान ( प्रपञ्चातीत ) आत्मचैतन्य का ही चिन्तन करना
चाहिये । यही धारणा का लक्षण है ॥ ३७ ॥
विशेष—धारणा, ध्यान और समाधि—अष्टांगयोग के तीन अंग स्वरूपा-
वस्थान के यथाक्रम परस्पर सम्बद्ध-अन्योन्‍याश्रित सोपान हैं, पर इनमें से किसी
एक के भी आश्रय से स्वरूप-प्राप्ति होती है —ऐसा भी कहा जा सकता है ।
पांच तत्व--पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश की धारणा के सम्बन्ध में
हठयोगशास्त्रों में विशद विवेचन किया गया है । पृथ्वी तत्व की धारणा का
वर्णन है कि जिस साधक को भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश की धारणा हो
जाती है, उसका चित्त निश्चल हो जाता है ।
या पृथ्वी हरितालहेमरुचिरा तत्त्वं लकारान्वितं
संयुक्ता कमलासनेन हि चतुष्कोणा हृदिस्थायिनी ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये
८२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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देषा स्तम्भकरी सदा क्षितिजयं कुर्याद् भुवो धारणा ।
अर्धेन्दुप्रतिमं च कुन्दधवलं कण्ठेऽम्बुतत्त्वं स्थितं
तत्पीयूषवकारबीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये-
देषा दुःसहकालकूटजरणी स्यादम्बवी धारणा ॥
यत्तालुस्थितमिन्द्रगोपसदृशं तत्त्वं त्रिकोणांज्वल-
तेजोरेफयुक्तं प्रवालरुचिरं रुद्रेण यत्सङ्गतम् ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये-
देषा वह्निजयं सदा विदधती वैश्वानरी धारणा ॥
यद्भिन्नाञ्जनपुञ्जसन्निभमिदं वृत्तं भ्रुवोरन्तरे
तत्त्वं वायुमयंयकारसहितं तत्रेश्वरो देवता ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये-
देषा खेगमनं करोति यमिनां वै वायवी धारणा ।
आकाशं सुविशुद्धवारिसदृशं यद् ब्रह्मरन्ध्रे स्थितं
तन्नाथेन सदाशिवेन सहितं शान्तं हकाराक्षरम् ।
प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये-
देषा मोक्षकपाटपाटनपटुः प्रोक्ता नभोधारणा ।
( विवेकमार्तण्ड १५८-१६२ )
यह हरिताल स्वर्ण के समान रुचिर है, यह 'ल' कार बीज से युक्त है,
इसके अधिष्ठातृ देवता ब्रह्मा हैं, यह चौकोर है, हृदय में स्थित है, मनसहित प्राण
को इसमें लीन कर लेना ही पृथ्वीतत्व की धारणा है, इसका पांच घड़ी
( दो घंटे ) तक अभ्यास करना चाहिये, इसके प्रभाव से पृथ्वीतत्व वश में हो जाता
है। ( इस धारणा के प्रभाव से साधक मृत्यु को वश में कर लेता है।)
जलतत्व अर्धचन्द्राकार कुन्द पुष्प के समान श्वेत है, यह कण्ठ में अमृतरूप वकार
बीजयुक्त के समान स्थित है, विष्णु इसके अधिष्ठातृ देवता हैं, इस जलतत्व की
प्राण और मन का विलय कर पाँच घड़ी तक धारणा करनी चाहिये, इससे दुःसह
कालकूट विष भी भस्म हो जाता है, यह वारुणी धारणा है। इस धारणा से न
तो जल का भय रहता है और न जल से मृत्यु होती है। अग्नितत्व तालु में
स्थित है, यह इन्द्रगोप के समान लाल, मूँगे के समान रुचिर है, यह त्रिकोण है,
तेजःस्वरूप 'र' बीज से युक्त है। इसके अधिष्ठातृ देवता रुद्र हैं, चित्त को प्राण
में लीन कर इस तत्व की पाँच घड़ी तक धारणा करनी चाहिये, इससे अग्नितत्व
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८३

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वश में हो जाता है, यह वैश्वानरी धारणा है। वायुतत्व सुरमा के रंग का है,
यह भ्रू में स्थित है, इसके अधिष्ठातृ देवता ईश्वर हैं, इसका बीज 'य' है। मन-
प्राणसहित वायुतत्व की धारणा करनी चाहिये, पाँच घड़ी तक की धारणा से
साधक को आकाश-गमन की शक्ति प्राप्त हो जाती है। यह वायवी धारणा है।
आकाशतत्व स्वच्छ जल के समान निर्मल है, इसका बीज 'ह' कार है, इसके
अधिष्ठात देवता नाथस्वरूप सदाशिव हैं, यह तत्व ब्रह्मरन्ध्र में स्थित है, मन और
प्राण को लय कर पाँच घड़ी तक साधक को आकाशतत्व की धारणा करनी चाहिये,
यह नभोधरणा है, इसके अभ्यास के फलस्वरूप मोक्ष का बन्द दरवाजा खुल जाता
है। गोरखनाथजी की सबदी ( गो० बा० सबदी १६८) है कि—आकास
तत सदासिव जांण ) । इन पाँच महाभूतों की धारणा से मोक्ष की प्राप्ति
होती है।
महर्षि पतञ्जलि का कथन है कि शरीर के बाहर या भीतर—कहीं एक
विशेष देश ( स्थान ) में चित्त को ठहराना ही धारणा है।
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।
( योगदर्शन ३ । १ )
जहाँ चित्त को लगाया जाता है, उसी ध्येय में चित्त की एकाग्रता ध्यान
है और जब ध्यान में केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है और चित्त का
निज स्वरूप शून्य-सा अथवा तदाकार हो जाता है, तब वही समाधि है। इन
तीनों धारणा, ध्यान और समाधि को महर्षि पतञ्जलि ने संयम कहा है। ये
तीनों अन्तरंग साधन हैं। पञ्च भूततत्व की वश्यता के सम्बन्ध में योगदर्शन में
कहा गया है :
स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजयः ।
( योगदर्शन ३ । ४४ )
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पाँच भूत हैं। इनमें प्रत्येक की पाँच
अवस्था होती है। पहली स्थूलावस्था है। इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभव में आने
वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इनकी स्थूलावस्था है। दूसरी स्वरूपावस्था
है। पृथ्वी की मूर्ति, जल का गीलापन, अग्नि की उष्णता और प्रकाश, वायु की
गति और कम्पन, आकाश का अवकाश स्वरूपावस्था है। तीसरी सूक्ष्मावस्था है।
कारण-अवस्था या तन्मात्रा ही सूक्ष्मावस्था है। पृथ्वी की गन्ध तन्मात्रा, जल
८४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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की रसतन्मात्रा, अग्नि की रूपतन्मात्रा, वायु की स्पर्श तन्मात्रा और आकाश की
शब्दतन्मात्रा ही सूक्ष्मावस्था है । चौथी अन्वय-अवस्था है । पाँचों भूतों में तीनों
गुणों के स्वभाव ( प्रकाश, क्रिया और स्थिति ) की व्याप्ति ही अन्वय-अवस्था
है । पाँचवीं अर्थवत्व-अवस्था का तात्पर्य है कि पाँचों भूत पुरुष के भोग और
अपवर्ग के लिये हैं । इन भूतों की प्रत्येक अवस्था के क्रम से सम्पूर्ण अवस्थाओं में
संयम कर जब योगसाधक इन को प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उसका इन भूतों पर-
तत्वों पर अधिकार हो जाता है ।
अथ ध्यानमिति कश्चन परमाद्वैतस्य भावः स एवात्मेति
यथा यद्यत्स्फुरति तत्तत्स्वरूपमेवेति भावयेत् सर्वभूतेषु
समदृष्टिश्च इति ध्यानलक्षणम् ॥ ३८ ॥
( अष्टांगयोग के सातवें अंग ) ध्यान का वर्णन किया जाता है । ( नाम-
रूप से परे ) अद्वैतस्वरूप परमात्मा है, यही आत्मा है । जो-जो वस्तु प्रतीत हो,
उस में आत्मस्वरूप की ही भावना करनी चाहिये, समस्त भूतमात्र में समदृष्टि-
आत्मदृष्टि अथवा आत्मस्वरूप की ( सभी प्राणियों में एकमात्र परमात्मा की
व्याप्ति की ) भावना ही ध्यान है । यही ध्यान का लक्षण है ॥ ३८ ॥
विशेष-महायोगी गोरखनाथजी ने अष्टांगयोग के सातवें अंग ध्यान की
सार्थकता के लिये निराकार आत्मस्वरूप में तथा सम्पूर्ण चैतन्य-परमात्मा की
अभिव्यक्ति में समदृष्टि को बड़ा महत्व दिया है । अपनी एक संक्षिप्त रचना
में उन्होंने कहा है कि एकमात्र ध्येय-ध्यान का विषय निरञ्जन है, निरञ्जन
के उपरान्त ध्यान के लिये रह ही क्या जाता है :
निरंजन उपरांति ध्यान नाहीं ।
( गोरखबानी-सिष्टपुराण )
गोरखनाथजी का कथन है कि ध्यान दर्शन है, चैतन्य तत्व का सर्वत्र
अनुभव ही दर्शन अथवा ध्यान है । साधक आज्ञाचक्र में स्थित दोनों भ्रू के मध्य
में प्रदीप्त ज्ञानदीप्ति- -ज्ञाननेत्र अथवा शिवनेत्र की ज्योति से समृद्ध होकर
दर्शन की सीमा में-ध्यान की दशा में अलखनिरञ्जन--परमेश्वर शिव में
प्रतिष्ठित हो जाता है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८५

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दरसण माहीं आपै आप ॥
( गोरखवानी सबदी २७२ )
महर्षि पतञ्जलि की दृष्टि में जिस ध्येय वस्तु में चित्त लगाया जाय, उसी
में उसका एकाग्र हो जाना, ध्येय मात्र की एक ही तरह की वृत्ति का प्रवाह
चलना, किसी दूसरी वृत्ति का बीच में न उठना ध्यान है।
'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ।'
( योगदर्शन ३ । २ )
ध्यान का विशिष्ट उपक्रम आत्मा में चित्तवृत्ति का लय होना है। सहस्रार
कमल का ज्ञान प्राप्त होने पर साधक की चित्तवृत्ति लय को प्राप्त हो जाती है।
योगी की चित्तवृत्ति जब लय को प्राप्त होती है, तब अखण्ड ज्ञानस्वरूप निरंजन
आत्मा का प्रकाश होता है। ब्रह्माण्ड में अपने ( आत्मचैतन्य ) प्रतीक का ध्यान
करना चाहिये, जब ध्यान में चित्त स्थिरता को प्राप्त हो जाय, तब उसमें महत्
शून्य का चिन्तन करना चाहिये। आदि, मध्य और अन्तरूप शून्य में करोड़ों सूर्यं
के समान प्रभावाले और करोड़ों चन्द्रमा के समान शीतल प्रकाशवाले शून्य
रूप आत्मा के दर्शन ( ध्यान ) का अभ्यास करने वाले साधक को सिद्धि प्राप्त
होती है।
चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन् योगी भवेद् ध्रुवम् ।
तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपी निरञ्जनः ॥
ब्रह्माण्डबाह्ये संचिन्त्य स्वप्रतीकं यथोदितम् ।
तमावेश्य महच्छून्यं चिन्तयेदविरोधतः ॥
आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाप्नुयात् ।
( शिवसंहिता ५ । १६५-१६७ )
इस प्रकार का ध्यान बड़ा उपयोगी होता है और साधक का मन अथवा
चित्त जब वृत्तिहीन हो जाता है, तब वह पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर आत्मस्वरूप
में स्थित होता है।
वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णारूपं स्वयं भवेत् ॥
( शिवसंहिता ५ । २०६ )
८६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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महर्षि घेरण्ड ने ध्यान के तीन भेद बताये हैं। पहला स्थूल ध्यान है, दूसरा
ज्योतिर्ध्यान है और तीसरा सूक्ष्मध्यान है। जिस ध्यान में मूर्ति, इष्टदेव अथवा
गुरु का चिन्तन हो, वह स्थूल ध्यान है, जिसमें तेजोमय ब्रह्म या शक्ति की भावना
हो वह ज्योतिर्ध्यान है, जिसमें विन्दुमयं ब्रह्मकुण्डलिनी का ध्यान हो, वह सूक्ष्म
ध्यान है।
स्थूलं ज्योतिस्तथा सूक्ष्मं ध्यानस्य त्रिविधं विदुः।
स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं तथा।
सूक्ष्मं विन्दुमयं ब्रह्मकुण्डली परदेवता ॥
(घेरण्डसंहिता ६।१)
भ्रूमध्य में और मन के ऊर्ध्व भाग में ॐकारमय शिखामालायुक्त ज्योति
का ध्यान ही ज्योतिर्ध्यान अथवा तेजो ध्यान है। शाम्भवी मुद्रा के अभ्यास द्वारा
कुण्डलिनी महाशक्ति का ध्यान सूक्ष्म ध्यान है।
महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि योगी के हृदय में विद्यमान आत्मवस्तु
का निश्चल चिन्तन ही ध्यान है। सगुण ध्यान, निर्गुण ध्यान के रूप में ध्यान
के दो प्रकार हैं।
सर्वं चिन्तासमावर्ति योगिनो हृदि वर्तते।
या तत्वे निश्चला चिन्ता तद्धि ध्यानं प्रचक्षते ॥
द्विधा भवति तद्ध्यानं सगुणं निर्गुणं तथा।
सगुणं वर्णभेदेन निर्गुणं केवलं विदुः॥
(विवेकमार्तण्ड १६५-१६६)
गुणमात्रोपलक्षित वर्णपद सगुण ध्यान का विषय है। शुद्धचैतन्यविषयक
ध्यान निर्गुणं ध्यान है। निर्गुणं ध्यान का फल समाधि है।
निर्गुणध्यानयुक्तस्य समाधिश्च ततो भवेत्।
(योगतत्त्वोपनिषद्)
ध्यानयोग के द्वारा साधक आत्मसाक्षात्कार में समर्थ होता है। साधक को
भावना करनी चाहिये कि—
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८७

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निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ।
अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥
( श्वेताश्वतर० ६ । १९ )
मैं कलाओं से रहित, क्रियारहित, शान्त, निर्विकार, निरञ्जन, अमृत के
परमसेतु, जले इन्धन से युक्त अग्नि की भाँति ज्योतिःस्वरूप परमात्मा का चिन्तन
करता हूँ । यही योगसाधक के लिये निराकार आत्मस्वरूप के ध्यान का गोरखनाथ
जी द्वारा भी निर्दिष्ट क्रम है ।
अथ समाधिलक्षणं सर्वतत्त्वानां समावस्था निरुद्यमत्व
मनायासस्थितिमत्त्वमिति समाधिलक्षणम् । इत्यष्टाङ्गयोग-
लक्षणम् ॥ ३६ ॥
समाधि के लक्षण का निरूपण किया जाता है । समस्त तत्त्वों की समावस्था-
गत अनायास, स्वाभाविक ( सहज ) स्थिति ही समाधि का लक्षण है । ( इस
वर्णन में समाधिसिद्धि राजयोग परिलक्षित है । ) इस तरह अष्टांगयोग के लक्षण
का निरूपण-वर्णन किया गया ॥ ३६ ॥
विशेष—समस्त तत्त्वों की समावस्था का आशय है तत्त्वों की अभेदरूपता—
आत्मस्वरूप में विद्यमानता । इस समावस्था में सहज प्रतिष्ठा ही समाधि
( राजयोग ) की सिद्धि है । यही उन्मनी अथवा सहजावस्था है । समाधि के
दो रूप हैं—पहला सविकल्प ( सबीज अथवा सम्प्रज्ञात ) समाधि है; दूसरा
निर्विकल्प ( निर्बीज अथवा असम्प्रज्ञात ) समाधि है । जब तक ध्याता, ध्येय
और ध्यान—इन तीनों का साधक को प्रतिभास होता है, तब तक सम्प्रज्ञात
समाधि है और ध्याता और ध्यान ध्येय में समाहित--आकारित हो जाते हैं, तब
निर्विकल्प समाधि की अवस्था समझनी चाहिये । इस समाधि की सिद्धि होने
पर योगी को बिना परिश्रम के ही सहज रूप से जाग्रत् अवस्था में भी समाधि
लगी रहती है, सर्वत्र उसकी चित्तवृत्ति आत्माकारित हो उठती है, । उन्मनी
समाधि के परे की अवस्था शून्य है, योगसिद्ध पुरुष को स्वरूप में स्थिति का फल
शून्य समाधि है । शून्य समाधि में परिचय (आत्मस्वरूप ज्ञान अथवा स्वरूपवोध)
से अटल पद—शाश्वत सनातन पद में स्थैर्य्य की प्राप्ति होती है ।
८८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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सुंनि कै परचै भयः सथोर । निश्चल जोगी गहर गंभीर ॥
( गोरखबानी सबदी २३१ )
महर्षि पतञ्जलि ने समाधि के स्वरूप का वर्णन किया है कि जब ध्यान में
केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है और चित्त का निजस्वरूप शून्य-सा हो
जाता है, तब यह ध्यान ही समाधि हो जाता है ।
तदेवार्थ. [त्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।
( योगदर्शन ३।३ )
महाराजा भोज ने योगदर्शन के उपर्युक्त सूत्र के भाष्य में समाधि का लक्षण
बताया है कि जिसमें मन विक्षेपों को हटाकर यथार्थता से धारण किया जाता
है--एकाग्र किया जाता है, वही समाधि है ।
'सम्यगाधीयत एकाग्रो [क्रियते, विक्षेपान्परिहृत्य मनो यत्र स
समाधिः ।'
( भोजवृत्ति ३।३ )
समाधि में ब्रह्म अपने साकार रूप में-ध्येय रूप में प्रतिभासित होता है
और निराकार रूप में ( निर्बीज समाधि में ) ज्योतिस्वरूप अभिव्यक्त अथवा
प्रकाशित होता है। यह ब्रह्मपद मन-वचनसापेक्ष नहीं है, साधन की सिद्धि से
अमल ज्ञानरूप में स्वयं स्फुरित ( प्रकाशित ) होता है ।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद् ध्रुवम् ॥
( शिवसंहिता ५। २१६ )
महर्षि घेरण्ड का कथन है कि कुम्भक की सिद्धि के द्वारा मन को आत्मा
के स्वरूपभूत करना चाहिये, इस तरह परमात्मा के योग से समाधि राजयोग-
समाधि है ।
परात्मनः समायोगात् समाधिं समवाप्नुयात् ॥
( घेरण्डसंहिता ७। १६ )
हठयोगप्रदीपिका में उल्लेख है कि योगी जाग्रत्, सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं
से रहित और समस्त चिन्ताओं से परे होकर शव के समान शरीर धारण करता
है, ब्रह्मारन्ध्र में प्राण लीन कर लेता है, वह निस्सन्देह मुक्त है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८६