सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextशरीर की नाड़ियों में प्राण के प्रवाह के प्रयासपूर्वक उसे स्थिर रखने की
क्रिया ही प्राणायाम है। रेचक, पूरक, कुम्भक और प्राण-अपान का मेलन—संघट-
करण प्राणायाम के चार भेद हैं। ये ही प्राणायाम के लक्षण हैं ॥ ३५ ॥
विशेष—गोरखनाथजी ने शरीर में जीवनी-शक्ति को अक्षुण्ण रखने के लिये
प्राणायाम पर विशेष बल दिया है। रेचक वायु को बाहर निकालना है, पूरक में
नासारन्ध्र से वायु को भीतर भरा जाता है और शरीर के
भीतर वायु को स्थिर रखने की क्रिया कुम्भक है, प्राणवायु और
अपानवायु का ऐक्य ही संघटकरण है। योगियों ने प्राणायाम को पाप को
जलाने वाला पावक कहा है और संसार-सागर का महासेतु बताया है। प्राणायाम
में ही योगी का मोक्षदायक धर्म प्रतिष्ठित है तथा उसके सभी दोष—विकार नष्ट
होते हैं।
प्राणायामे महान्धर्मो योगिनो मोक्षदायकः ।
प्राणायामे दिवारात्रौ दोषजालं परित्यजेत् ॥
( विवेकमार्तण्ड ११४ )
हठयोगप्रदीपिका में प्राणायाम की महत्ता और विधि पर यथेष्ट प्रकाश
डाला गया है। प्राणवायु के स्थिर होने पर ही चित्त निश्चल होता है। चित्त-
वृत्ति का निरोध होता है। षट्कर्म धौति, वस्ति, कपालभाति, नौलि, नेति,
त्राटक आदि क्रियाओं से शरीर का शोधन होने पर नाड़ियाँ मलरहित हो
जाती हैं।
षट्कर्मनिर्गतस्थौल्यंकफदोषमलादिकः ।
प्राणायामं ततः कुर्यादनायासेन सिद्धयति ॥
प्राणायामैरेव सर्वे प्रशुष्यन्ति मला इति ।
( हठयोगप्रदीपिका २। ३६-३७ )
अपान और प्राण के एक होने पर वायु की सुषुम्ना में ऊर्ध्वगति होती है,
यह केवल कुम्भक की सिद्धि से ही सम्भव है। रेचक और पूरक छूट जाते हैं
तथा प्राण की केवल कुम्भक से शरीर के भीतर स्थिरता स्थापित हो जाती है।
अपान-प्राण के संघटकरण पर गीता में उल्लेख है कि अनेक ( दूसरे ) योगी
अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, अन्य प्राणवायु में अपान-वायु को हवन
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