सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextजाने में सुरक्षा समझती है, इसी तरह मन का धर्म स्थैर्य्य है, स्थिरता ही
उसकी सुरक्षा है। यह इन्द्रियरूपी घोड़ों के लिये प्रग्रह--लगाम है।
मन मकड़ी का ताग ज्यूं उलटि अनूठी आंणि ।
( गोरखवानी सबदी २३४ )
प्रत्याहार इन्द्रियविजय का महान् साधन है । अपने विषयों के सम्बन्ध से
रहित होने पर इन्द्रियों का चित्त के स्वरूप में तदाकार हो जाना ही प्रत्याहार है ।
प्रत्याहार सिद्ध हो जाने पर योगसाधक की इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं ।
स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ।
ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ।
( पातञ्जलयोगदर्शन २ । ५४-५५ )
इन्द्रियों की वश्यता, प्राण और मन की स्थिरता पर निर्भर है । हठयोग
की साधना में स्पष्ट निर्देश है कि शरीर में प्राण की स्थिरता से ही मन
स्थिर होता है, इसलिये प्राणसाधना इन्द्रियों के प्रत्याहार की दिशा में आवश्यक
है । प्रत्याहार की सिद्धि से काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ, मोह आदि छः शत्रुओं
का नाश हो जाता है। जहाँ-जहाँ मन जाता है, उसे वहाँ-वहाँ से लौटा कर
आत्मा के वश में करना चाहिये, यही प्रत्याहार है । महर्षि घेरण्ड की दृष्टि में :
यतो यतो मनश्चरति चाञ्चल्यवशतः सदा ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
( घेरण्डसंहिता ४ । २ )
रेचक-पूरक-कुम्भक, लयक्रमपूर्वक बारह बार प्राणायाम कर वायु को शरीर
के भीतर स्थिर करने से मन स्थिर होता है और प्राणायाम के द्वारा इस तरह
इन्द्रियों का प्रत्याहार हो जाता है ।
प्राणायामद्विष्ट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः ।
( विवेकमार्तण्ड ११७ )
—शिवसंहिता में प्रत्याहार के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है कि जब योग-
साधक एक प्रहर तक वायु-धारण की शक्ति प्राप्त करता है, तब प्रत्याहार होता
है । योगसाधक को जिस-जिस पदार्थ की जानकारी हो, उसमें उसे आत्मभाव
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