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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

DevanagariHindipublished222 pages

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दरसण माहीं आपै आप ॥
( गोरखवानी सबदी २७२ )
महर्षि पतञ्जलि की दृष्टि में जिस ध्येय वस्तु में चित्त लगाया जाय, उसी
में उसका एकाग्र हो जाना, ध्येय मात्र की एक ही तरह की वृत्ति का प्रवाह
चलना, किसी दूसरी वृत्ति का बीच में न उठना ध्यान है।
'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ।'
( योगदर्शन ३ । २ )
ध्यान का विशिष्ट उपक्रम आत्मा में चित्तवृत्ति का लय होना है। सहस्रार
कमल का ज्ञान प्राप्त होने पर साधक की चित्तवृत्ति लय को प्राप्त हो जाती है।
योगी की चित्तवृत्ति जब लय को प्राप्त होती है, तब अखण्ड ज्ञानस्वरूप निरंजन
आत्मा का प्रकाश होता है। ब्रह्माण्ड में अपने ( आत्मचैतन्य ) प्रतीक का ध्यान
करना चाहिये, जब ध्यान में चित्त स्थिरता को प्राप्त हो जाय, तब उसमें महत्
शून्य का चिन्तन करना चाहिये। आदि, मध्य और अन्तरूप शून्य में करोड़ों सूर्यं
के समान प्रभावाले और करोड़ों चन्द्रमा के समान शीतल प्रकाशवाले शून्य
रूप आत्मा के दर्शन ( ध्यान ) का अभ्यास करने वाले साधक को सिद्धि प्राप्त
होती है।
चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन् योगी भवेद् ध्रुवम् ।
तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपी निरञ्जनः ॥
ब्रह्माण्डबाह्ये संचिन्त्य स्वप्रतीकं यथोदितम् ।
तमावेश्य महच्छून्यं चिन्तयेदविरोधतः ॥
आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाप्नुयात् ।
( शिवसंहिता ५ । १६५-१६७ )
इस प्रकार का ध्यान बड़ा उपयोगी होता है और साधक का मन अथवा
चित्त जब वृत्तिहीन हो जाता है, तब वह पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर आत्मस्वरूप
में स्थित होता है।
वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णारूपं स्वयं भवेत् ॥
( शिवसंहिता ५ । २०६ )
८६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति