सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextस्वस्तिक आसन के अभ्यास से सभी दुःखों का नाश होता है, यह आसन
परम गोप्य है, सर्वश्रेष्ठ और कल्याणकारी है ॥
पद्मासन दूसरा आसन है, जिसे 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में गोरखनाथजी
ने महत्व दिया है ।
वामोरूपरि दक्षिणाञ्च चरणं संस्थाप्यवामं तथा
दक्षोरूपरि पश्चिमेन विधिना धृत्वा कराभ्यां दृढ़म् ।
अङ्गुष्ठौ हृदयेनिधाय चिबुकं नासाग्रमवलोकये-
देतद् व्याधिविकारनाशनकरं पद्मासनं प्रोच्यते ॥
( गोरक्षशतक-१२ )
वाम ऊरु, जानुमूल में दाहिना पैर स्थापित करे और उसी तरह दायें
जानुमूल में बायाँ पैर स्थिर करे और दोनों हाथों को पीछे से ले जाकर दायें हाथ
से बायें पैर के अँगूठे और बायें हाथ से दायें पैर के अँगूठे को दृढ़ता से पकड़ कर
चिबुक को हृदय से लगाकर नासा के अग्र भाग को दोनों नेत्रों से देखे, यही
समस्त व्याधि तथा मानसिक-शारीरिक विकारों को नष्ट करनेवाला
पद्मासन है ।
भगवान् शिव का कथन है कि इस आसन का अभ्यास करनेवाले साधक
के प्राण सम हो जाते हैं और सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं । जो योगी पद्मासन में
स्थित होकर प्राण-अपान के ऐक्य का अभ्यास सिद्ध कर लेता है, वह निःसन्देह
संसार-सागर के पार उतर जाता है ।
अनुष्ठाने कृते प्राणः समश्चलति तत्क्षणात् ।
भवेदभ्यासने सम्यक् साधकस्य न संशयः ॥
पद्मासने स्थितो योगी प्राणापानविधानतः :
पूरयेत्स विमुक्तः स्यात्सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥
( शिवसंहिता ३ । १०९-११० )
इस आसन के अभ्यास से स्वरूपावस्थान सिद्ध होता है ।
पद्मासने स्थितो योगी नाड़ीद्वारेण पूरितम् ।
मारुतं धारयेद् यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ॥
( हठयोगप्रदीपिका १ । ५१ )
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७५