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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

DevanagariHindipublished222 pages

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करते हैं, अन्य नियमित आहार करनेवाले प्राणायामपरायण पुरुष प्राण और अपान
की गति रोक कर प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं । ये सभी यज्ञों द्वारा
पापों का नाश करनेवाले और यज्ञों को जानने वाले हैं ।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणोऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगतीरुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
( गीता ४ । २९-३० )
महर्षि पतञ्जलि ने आसन की अभ्यास-सिद्धि के बाद श्वास-प्रश्वास के गति-
विच्छेद को प्राणायाम कहा है । गति-विच्छेद का आशय है गति का रुक जाना,
गति-विच्छेद ही प्राण की स्थिरता है, जिसका संकेत महायोगी गोरखनाथजी ने
किया है ।
तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥
( योगदर्शन २.४९)
पतञ्जलि ने भी गोरखनाथजी की ही तरह प्राणायाम के चार भेद
स्वीकार किये हैं, वे बाह्य ( रेचक ), आभ्यन्तर ( पूरक ) और स्तम्भ
(कुम्भक) की वृत्ति वाले हैं और बाह्य-आभ्यन्तर विषय-वृत्ति का त्याग ही चौथा
( संघटकरण ) प्राणायाम है ।
बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः । .......... बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी
चतुर्थः ।
( योगदर्शन २।५०-५१)
प्राणवायु को नासारन्ध्रों से यथानुक्रम बाहर निकालना और देखना कि कहाँ
कितने समय तक वह स्थिर है, रेचक है । प्राणवायु नासारन्ध्रों से यथानुक्रम
भरना पूरक है और शरीर के भीतर प्राण के जाने और बाहर निकल ने की गति
का अभ्यास न कर, वह जहाँ हो, उसकी गति को स्तम्भित कर देना कुम्भक है ।
बाहर और भीतर जाने-आने वाले प्राण की गति का त्याग कर देने से मन को
इष्ट-चिन्तन में लगा देना और देश-काल-संख्या के ज्ञान के बिना प्राण की गति का
(जिस किसी देश में-सुषुम्ना में) ठहरना चौथा प्राणायाम है । यह राजयोग का
७८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति