सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextसुंनि कै परचै भयः सथोर । निश्चल जोगी गहर गंभीर ॥
( गोरखबानी सबदी २३१ )
महर्षि पतञ्जलि ने समाधि के स्वरूप का वर्णन किया है कि जब ध्यान में
केवल ध्येय मात्र की ही प्रतीति होती है और चित्त का निजस्वरूप शून्य-सा हो
जाता है, तब यह ध्यान ही समाधि हो जाता है ।
तदेवार्थ. [त्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।
( योगदर्शन ३।३ )
महाराजा भोज ने योगदर्शन के उपर्युक्त सूत्र के भाष्य में समाधि का लक्षण
बताया है कि जिसमें मन विक्षेपों को हटाकर यथार्थता से धारण किया जाता
है--एकाग्र किया जाता है, वही समाधि है ।
'सम्यगाधीयत एकाग्रो [क्रियते, विक्षेपान्परिहृत्य मनो यत्र स
समाधिः ।'
( भोजवृत्ति ३।३ )
समाधि में ब्रह्म अपने साकार रूप में-ध्येय रूप में प्रतिभासित होता है
और निराकार रूप में ( निर्बीज समाधि में ) ज्योतिस्वरूप अभिव्यक्त अथवा
प्रकाशित होता है। यह ब्रह्मपद मन-वचनसापेक्ष नहीं है, साधन की सिद्धि से
अमल ज्ञानरूप में स्वयं स्फुरित ( प्रकाशित ) होता है ।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद् ध्रुवम् ॥
( शिवसंहिता ५। २१६ )
महर्षि घेरण्ड का कथन है कि कुम्भक की सिद्धि के द्वारा मन को आत्मा
के स्वरूपभूत करना चाहिये, इस तरह परमात्मा के योग से समाधि राजयोग-
समाधि है ।
परात्मनः समायोगात् समाधिं समवाप्नुयात् ॥
( घेरण्डसंहिता ७। १६ )
हठयोगप्रदीपिका में उल्लेख है कि योगी जाग्रत्, सुषुप्ति आदि सभी अवस्थाओं
से रहित और समस्त चिन्ताओं से परे होकर शव के समान शरीर धारण करता
है, ब्रह्मारन्ध्र में प्राण लीन कर लेता है, वह निस्सन्देह मुक्त है ।
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