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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

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विवेकमार्तण्ड में यम के ये ही लक्षण वर्णित हैं। जिसमें प्राण-विच्छेद के
व्यापार का अभाव हो, वह अहिंसा है। सत्य से आशय यथार्थ भाषण का है।
दूसरे के पदार्थ का अपहरण न करना अस्तेय है, जितेन्द्रियता ब्रह्मचर्य है, सहन-
शीलता क्षमा है, धैर्य ही धृति है, दूसरे के दुःख को मिटाने की इच्छा दया है।
निष्कपट व्यवहार ही आर्जव है, चतुर्थांशविवर्जित सात्विक आहार का सेवन
ही मिताहार है, श्रुतिस्मृतिप्रतिपादित नित्यकर्मजन्य शुद्धि ही शौच है। इन दशों
लक्षणों के संदर्भ में इन्द्रियजय, आहारनिद्रा तथा शीतादि द्वन्द्व की जय आदि से
उपशम की प्राप्ति होती है। यम को गोरखनाथ ने उपशम का पर्याय कहा है।
इससे सात्विक साधनामय जीवन का प्रारम्भ होता है। साधक वाह्य व्यवहार
से सम्बन्ध रखने वाले राग-द्वेषादि द्वन्द्वों से निवृत्त होकर निष्काम कर्म
के आचरण को महत्व देता है।
नियम इति मनोवृत्तीनां नियमनमित्येकान्तवासो निः
सङ्गतौदासीन्यं यथाप्राप्तिसन्तुष्टिर्वैरस्यं गुरुचरणावरूढ़त्व
मितिनियमलक्षणम् ॥ ३३ ॥
मन के व्यापार का नियमन—नियन्त्रण ही नियम है, एकान्तवास, असङ्गता,
उदासीनता, जो कुछ भी (जीविका के निर्वाह के लिये) प्राप्त हो जाय, उसमें
संतोष धारण करना, राग-द्वेष रूपीद्वन्द्वों में उपरामता और गुरुचरण के आश्रय
में ही निर्भरता नियम के लक्षण हैं।
विशेष—महर्षि पतञ्जलि ने नियम के पाँच लक्षण स्वीकार किये हैं, वे
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान (शरणागति) हैं।
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥
(पतञ्जलि योगदर्शन २।३२)
विवेकमार्तण्ड-८ में गोरखनाथजी ने तप, संतोष, आस्तिक्य, दान,
ईश्वरपूजन, सिद्धान्तश्रवण, ह्री, मति, जप, और हवन को नियम के दस लक्षण
बताये हैं। इसी तरह हठयोगप्रदीपिका में उल्लेख है।
तपःसन्तोष आस्तिक्यं दानमीश्वरपूजनम् ।
सिद्धान्तवाक्यश्रवणं ह्रीमती च तपोहुतम् ।
७० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति