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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

About this granth

The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.

The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.

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चतुर्थाध्याये दुर्गनिरूपणप्रकरणम् ३२५

उससे श्रेष्ठ 'पारिघदुर्ग' और उससे भी श्रेष्ठ 'वनदुर्ग' उससे भी श्रेष्ठ 'धन्वदुर्ग' उससे श्रेष्ठ 'जलदुर्ग' उससे भी श्रेष्ठ 'गिरिदुर्ग' माना गया है ।

सहायसैन्यदुर्गे तु सर्वदुर्गप्रसाधिके ।
ताभ्यां विनाऽन्यदुर्गाणि निष्फलानि महीभुजाम् ॥ ७ ॥
श्रेष्ठं तु सर्वदुर्गेभ्यः सेनादुर्गं स्मृतं बुधैः ।
तत्साधकानि चान्यानि तद्रक्षेन्नृपतिः सदा ॥ ८ ॥
सेनादुर्गं तु यस्य स्यात्तस्य वश्या तु भूरियम् ।

**सहाय तथा सैन्य दुर्गों की सब दुर्गों की साधनता का निर्देश—**वस्तुतः सब दुर्गों से श्रेष्ठ सेना (सैन्य) दुर्ग को विद्वानों ने माना है । और अन्य सारे दुर्ग तो इसके केवल साधनमात्र हैं । अतः राजा सदा { इस (सैन्य) दुर्ग की रक्षा करे जिसके पास सेना (सैन्य) दुर्ग है उस (राजा) के लिये यह सारी पृथ्वी अधीन हुई मानी जाती है ।

बिना तु सैन्यदुर्गेण दुर्गमन्यत्तु बन्धनम् ॥ ९ ॥
आपत्कालेऽन्यदुर्गाणामाश्रयश्चोत्तमो मतः ।

**आपत्काल में अन्य दुर्गों के आश्रय की उत्तमता का निर्देश—**सैन्यदुर्ग को छोड़कर अन्य दुर्ग केवल बन्धनमात्र हैं । वास्तव में आपत्ति पड़ने पर ही अन्य दुर्गों का आश्रय लेना उत्तम माना गया है ।

एकः शतं योधयति दुर्गस्थोऽस्त्रधरो यदि ॥ १० ॥
शतं दशसहस्राणि तस्माद् दुर्गं समाश्रयेत् ।

अस्त्र धारण किया हुआ एक सैनिक अकेला ही यदि दुर्ग में स्थित होकर लड़े तो बाहर के १०० सैनिकों से लड़ सकता है । और यदि १०० सैनिक हों तो १०००० सैनिकों से लड़ सकते हैं । इससे दुर्ग का आश्रय लेना उचित होता है ।

शूरस्य सैन्यदुर्गस्य सर्वं दुर्गमिव स्थलम् ॥ ११ ॥
युद्धसम्भारपुष्टानि राजा दुर्गाणि धारयेत् ।
धान्यवीरास्त्रपुष्टानि कोशपुष्टानि वै तथा ॥ १२ ॥

**अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्ग के लक्षण—**शूर-वीर सैन्य दुर्ग (सेना) के लिये तो सभी स्थल दुर्ग की भांति दुर्भेद्य हो जाते हैं । और राजा युद्ध की सामग्रियों से परिपूर्ण अर्थात् भोजन के लिये अन्न, शूर-वीर सैनिक, अस्त्र-शस्त्र एवं कोष (खजाने) से परिपूर्ण दुर्गों को सुसज्जित रक्खे । और ऐसे ही दुर्गों में रहे ।

सहायपुष्टं यद् दुर्गं तच्च श्रेष्ठतरं मतम् ।
सहायपुष्टदुर्गेण विजयो निश्चयात्मकः ॥ १३ ॥

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३२६ | शुक्रनीतिः

युद्ध-सहायक सामग्रियों से परिपूर्ण दुर्ग से निश्चित विजय होने का निर्देश—
इसलिये युद्ध-सहायक उक्त सामग्रियों से परिपूर्ण जो दुर्ग होता है वही सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। अथवा सहायक शूर-वीर एवं अनुकूल बान्धवों से परिपूर्ण दुर्ग सर्वश्रेष्ठ होते हैं। उक्त रीति से सहायकों से परिपूर्ण दुर्ग रहने से राजा का विजय निश्चित रूप से होता है।

यद्यत्सहायपुष्टं तु तत्सर्वं सफलं भवेत् ।
परस्परानुकूल्यं तु दुर्गाणां विजयप्रदम् ॥ १४ ॥

इति शुक्रनीतौ चतुर्थेऽध्याये दुर्गनिरूपणं नाम षष्ठं प्रकरणम् ।

जो २ दुर्ग सहायकों से परिपूर्ण होते हैं वे सभी राजा के लिये फलप्रद होते हैं। दुर्गों का परस्पर एक दूसरे का सहायक होना विजय देनेवाला होता है।

इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में चतुर्थाध्याय में दुर्ग-निरूपणं-नामक षष्ठ प्रकरण समाप्त हुआ।


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चतुर्थाऽध्याये सप्तमं प्रकरणम् ।

दुर्गं संक्षेपतः प्रोक्तं सैन्यं सप्तममुच्यते ।
सेना शस्त्रास्त्रसंयुक्त-मनुष्यादिगणात्मिका ॥ १ ॥

सेना-निरूपण प्रकरण के आरम्भ में सेना के लक्षण— इस प्रकार से संक्षेप में दुर्गनिरूपण प्रकरण का निरूपण किया गया। अब सप्तम 'सेनानिरूपण' नामक प्रकरण कहता हूँ। शस्त्र (तलवार आदि), अस्त्र (धनुष आदि) से संयुक्त मनुष्य आदि (पैदल सेना, हाथी, घोड़ा) के समूह को 'सेना' कहते हैं।

स्वगमाऽन्यगमा चेति द्विधा सैव पृथक त्रिधा ।
दैव्यासुरि मानवी च पूर्वं पूर्वं बलाधिका ॥ २ ॥

सेना के भेदों का वर्णन— वह (सेना) १. स्वगमा और २. अन्यगमा भेद से दो प्रकार की होती है। पुनः इन दोनों के भी १. दैवी, २. आसुरी और ३ मानवी भेद से ३ भेद होते हैं। इनमें पूर्व-पूर्व (मानवी से आसुरी, आसुरी से दैवी) सेना अधिक बलशालिनी होती है।

स्वगमा या स्वयं गन्त्री यानगाऽन्यगमा स्मृता ।
पादातं स्वगमं चान्यद् रथाश्वगजगं त्रिधा ॥ ३ ॥

स्वगमा और अन्यगमा सेना के लक्षण— जो स्वयं गमन करनेवाली सेना होती है वह 'स्वगमा' और जो अन्य द्वारा गमन करनेवाली होती है, वह 'अन्यगमा' कहलाती है। उसमें पैदल सेना 'स्वगमा' एक ही प्रकार की होती है किन्तु दूसरी (अन्यगमा) सेना अन्य-अर्थात् रथ, घोड़ा और हाथी के द्वारा गमन करने से ३ प्रकार की होती है।

सैन्याद्विना नैव राज्यं न धनं न पराक्रमः ।
बलिनो वशगाः सर्वे दुर्बलस्य च शत्रवः ॥ ४ ॥
भवन्त्यल्पजनस्यापि नृपस्य तु न किं पुनः ।

सैन्य के प्रभाव का निर्देश— सैन्य के बिना राज्य, धन और पराक्रम इनमें से कोई भी स्थिर नहीं रह सकता है। और जब कि सभी लोग बलवान् पुरुष के ही वशीभूत होते हैं और दुर्बल पुरुष के शत्रु हो जाते हैं तब फिर थोड़ी सेना रखनेवाले राजा के लोग शत्रु नहीं होते हैं अर्थात् अवश्य होते हैं।

शारीरं हि बलं शौर्यबलं सैन्यबलं तथा ॥ ५ ॥
चतुर्थंमास्त्रिकबलं पञ्चमं धीबलं स्मृतम् ।
षष्ठमायुर्बलं ह्येतैरुपैतो विष्णुरेव सः ॥ ६ ॥

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३२८ | शुक्रनीतिः

६ प्रकार के बलों का निर्देश—१. शरीर का बल, २. शूरता का बल, ३ सेना का बल, ४. अस्त्र का बल, ५. बुद्धि का बल, ६. आयु का बल, ये ६ प्रकार के बल कहे हुये हैं जो इनसे युक्त होता है वह विष्णु ही माना जाता है ।

न बलेन विनाप्यल्पं रिपुं जेतुं क्षमः सदा ।
देवासुरनरास्त्वन्योपायैर्नित्यं भवन्ति हि ॥ ७ ॥

बल के बिना लोग क्षुद्र (साधारण) शत्रु को भी सदा जीतने के लिये नहीं समर्थ हो सकते हैं क्योंकि देवता, असुर और मनुष्य भी बल न रहने पर अन्य (सेना आदि) उपायों से शत्रु जीतने के लिये नित्य उद्योग करते हैं ।

बलमेव रिपोर्नित्यं पराजयकरं परम् ।
तस्माद्बलमभेद्यं तु धारयेद्यत्नतो नृपः ॥ ८ ॥

एकमात्र मनुष्य का बल ही शत्रु को पराजित करने में नित्य नितान्त समर्थ होता है। इसलिये राजा शत्रुओं के लिये दुर्धर्ष बल को यत्नपूर्वक धारण करे ।

सेनाबलन्तु द्विविधं स्वीयं मैत्रं च तद् द्विधा ।
मौलसाद्यस्कभेदाभ्यां सारासारं पुनर्द्विधा ॥ ९ ॥

२ प्रकार के सेनाबलों का निर्देश—सेना का बल दो प्रकार का होता है जिसमें पहला—अपनी सेना का (स्वीय), दूसरा—मित्र की सेना का (मैत्र) बल है । इनमें से प्रत्येक मौल (क्रमागत) और साद्यस्क (आधुनिक) भेद से दो प्रकार के होते हैं। पुनः सार और असार भेद से भी दो प्रकार के होते हैं ।

अशिक्षितं शिक्षितं च गुल्मीभूतमगुल्मकम् ।
दत्तास्त्रादि स्वशस्त्रास्त्रं स्ववाहि दत्तवाहनम् ॥ १० ॥

इसमें शिक्षित-अशिक्षित, गुल्मीभूत-अगुल्मक, दत्तास्त्रादि-स्वशस्त्रास्त्र, स्ववाहि-दत्तवाहन इन भेदों से प्रत्येक दो २ प्रकार के होते हैं ।

सौजन्यात् साधकं मैत्रं स्वीयं भृत्या प्रपालितम् ।
मौलं बह्वब्दानुबन्धि साद्यस्कं यत्तदन्यथा ॥ ११ ॥

मैत्र, स्वीय, मौल तथा साद्यस्क सेनाओं के लक्षण—मित्रतावश युद्ध के कार्य का निर्वाह करनेवाले सैन्य को 'मैत्र' एवं वेतन देकर रखे हुये को 'स्वीय' कहते हैं। बहुत वर्षों से पास में रहनेवाली को 'मौल' और इसके विपरीत अर्थात् तत्काल भर्ती की हुई सेना को 'साद्यस्क' कहते हैं ।

सुयुद्धकामुकं सारमसारं विपरीतकम् ।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३२५

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३२५

शिक्षितं व्यूहकुशलं विपरीतमशिक्षितम् ॥ १२ ॥
**सार-असार तथा शिक्षित-अशिक्षित सेनाओं के लक्षण—**भली भांति युद्ध करने के लिये उत्सुक रहनेवाळी सेना को 'सार' और इसके विपरीत रहनेवाळी को 'असार' कहते हैं । व्यूह-रचना में कुशल सेना को 'शिक्षित' और इससे विपरीत को 'अशिक्षित' कहते हैं ।

गुल्मीभूतं साधिकारि स्वस्वामिकमगुल्मकम् ।
दत्तास्त्रादि स्वामिना यत् स्वशस्त्रास्त्रमतोऽन्यथा ॥ १३ ॥
**गुल्मीभूत, अगुल्मक, दत्तास्त्रादि तथा स्वशस्त्रास्त्र सेनाओं के लक्षण—**सेनापति के साथ रहनेवाळी सेना को 'गुल्मीभूत' और बिना सेनापति के स्वतन्त्र रहकर लड़नेवाली को 'अगुल्मक' कहते हैं । स्वामी जिसको अस्त्रादि दिये हों उस सेना को 'दत्तास्त्रादि' और इसके विपरीत जिसके पास अपना निजी शस्त्रास्त्र हों उसे 'स्वशस्त्रास्त्र' कहते हैं ।

कृतगुल्मं स्वयंगुल्मं तद्वच्च दत्तवाहनम् ।
आरण्यकं किरातादि यत् स्वाधीनं स्वतेजसा ॥ १४ ॥
**कृतगुल्म, स्वयंगुल्म, दत्तवाहन और आरण्यक सेनाओं के लक्षण—**तथा कृतगुल्म (स्वामी ने सेनापति से युक्त सेना में जिसकी गणना की है), स्वयंगुल्म (अपनी इच्छा से गुल्म का अधिपति बना हुआ सैन्य) तथा दत्तवाहन सेना भी होती है । अपने तेज से स्वाधीन रहनेवाळी कोळ भिल्लादिकों की सेना को 'आरण्यक' कहते हैं ।

उत्सृष्टं रिपुणा वापि भृत्यवर्गे निवेशितम् ।
भेदाधीनं कृतं शत्रोः सैन्यं शत्रुबलं स्मृतम् ॥ १५ ॥
उभयं दुर्बलं प्रोक्तं केवलं साधकं न तत् ।
**शत्रुबल के तथा दुर्बल सेना के लक्षण—**१—जिसमें शत्रु के द्वारा निकाले हुये सैनिक वेतन देकर रख लिये गये हों अथवा २—जो शत्रु की सेना भेद-नीति से अपने अधीन कर ली गई हो, उसे 'शत्रुबल' कहते हैं । ये दोनों प्रकार की सेनायें दुर्बल कही हुई हैं क्योंकि इनपर विश्वास नहीं किया जा सकता है । ये केवल नाममात्र को होती हैं इनसे युद्ध-कार्य वस्तुतः नहीं चलाया जा सकता है ।

समैनियुद्धकुशलैर्व्यायामैर्नतिमितस्तथा ॥ १६ ॥
वर्धयेद्बाहुयुद्धार्थं भोज्यैः शारीरकं बलम् ।
**सेना के शारीरिक बल बढ़ाने के उपाय—**बाहुयुद्ध में कुशल अपने बराबर वालों के साथ कुश्ती लड़ा कर तथा व्यायाम कराकर एवं गुरुजनों को प्रणाम

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३३०शुक्रनीतिः

करना सिखाकर तथा पौष्टिक भोजन खिलाकर बाहुयुद्ध के लिये सैनिकों के शारीरिक बल को बढ़ाना चाहिये ।

मृगयाभिस्तु व्याघ्राणां शस्त्रास्त्राभ्यासतः सदा ॥ १७॥
वर्धयेच्छूरसंयोगात् सम्यक् शौर्यबलं नृपः ।

शौर्यबल बढ़ाने के उपाय— और सदा व्याघ्रों का शिकार, शस्त्र तथा अस्त्रों को चलाने का अभ्यास एवं शूरवीरों की सङ्गति कराकर सैनिकों के 'शौर्यबल' को राजा बढ़ावे ।

सेनाबलं सुभृत्या तु तपोभ्यासैस्तथाऽस्त्रिकम् ॥ १८॥
वर्धयेच्छास्त्रचतुर-संयोगाद् धीबलं सदा ।

सेनाबल, आस्त्रिकबल व बुद्धिबल बढ़ाने के उपाय— सुन्दर वेतन देकर 'सेनाबल' तथा तपस्या और अभ्यास कराकर अर्थात् दिव्यास्त्रों का प्रयोग तपस्या द्वारा बाण चलाने के अभ्यास के द्वारा कराकर 'आस्त्रिकबल' एवं धर्म शास्त्र तथा राजनीति जानने में चतुर लोगों की सङ्गति कराकर 'बुद्धिबल' को सदा बढ़ाना चाहिये ।

सत्क्रियाभिश्चिरस्थायि नित्यं राज्यं भवेद् यथा ॥ १९॥
स्वगोत्रे तु तथा कुर्यात्तदायुर्बलमुच्यते ।
यावद्गोत्रे राज्यमस्ति तावदेव स जीवति ॥ २०॥

आयुर्बल के लक्षण— नित्य सत्कर्म करने के द्वारा जिस भांति से अपने वंश में राज्य चिरस्थायी हो उस भांति से राजा को करना चाहिये इसी को 'आयुर्बल' कहते हैं । क्योंकि जब तक उसके वंश में राज्य बना रहता है तब तक ही वह जीवित रहता है ।

चतुर्गुणं हि पादातमश्वतो धारयेत् सदा ।
पञ्चमांशॉस्तु वृषभानष्टांशांश्च क्रमेलकान् ॥ २१॥
चतुर्थांशान् गजानुष्ट्रान् गजाद्धांश्च रथान् सदा ।
रथात्तु द्विगुणं राजा बृहन्नालीकमेव च ॥ २२ ॥

सेना में पदाति आदियों की संख्या का नियम— घुड़सवार सैनिकों से चौगुनी पैदल सेना एवं घुड़सवार सेना के पञ्चमांश के बराबर बैल, अष्टमांश ऊंट और ऊंट का चतुर्थांश हाथी, हाथी का अर्द्धांश रथ, और रथ का द्विगुण बृहन्नालीक (तोप) इन सबों को राजा अपनी सेना के अन्तर्गत सदा रक्खे ।

पदातिबहुलं सैन्यं मध्याश्वं तु गजाल्यकम् ।
तथा वृषोष्ट्रसामान्यं रत्नेभागाधिकं नहि ॥ २३ ॥

राजा सेना में पैदल सिपाहियों को अधिक संख्या में, घोड़ों को मध्यसंख्या में और हाथियों को थोड़ी संख्या में रक्खे । तथा बैल एवं ऊंटों की संख्या साधारण रक्खे किन्तु हाथियों की संख्या अधिक न रक्खे ।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३१

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३१

सवयःसारवेषोञ्चशस्त्रास्त्रं तु पृथक् शतम् ।
लघुनालिकयुक्तानां पदातीनां शतत्रयम् ॥ २४ ॥
अशीत्यश्वांन् रथं चैकं बृहन्नालद्वयं तथा ।
उष्ट्रान् दश गजौ द्वौ तु शकटौ षोडषर्षभान् ॥ २५ ॥
तथा लेखकषट्कं हि मन्त्रित्रितयमेव च ।
धारयेन्नृपतिः सम्यग् वत्सरे लक्षकर्षभाक् ॥ २६ ॥

एक वर्ष में एक लक्ष १०००००) मुद्रा की आयवाला राजा एक सी अवस्था के युवावस्थावाले दृढ तथा उत्तम वेष ( वर्दी-कवच ) वाले, ऊंचे कद के, अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित ऐसे १०० पैदल सिपाहियों की एक पृथक् टुकड़ी और बन्दूकों से युक्त ३०० पैदल सिपाहियों की एक पृथक् टुकड़ी तथा ८० घोड़े, १ रथ, २ तोपें, १० ऊंट, २ हाथी, २ बैलगाड़ी, १६ बैल, ६ लेखक, ३ मन्त्री, इन सबों को एक सेना के अन्दर अच्छी तरह से रक्खे ।

सम्भारदानभोगार्थं धनं सार्धसहस्रकम् ।
लेखकार्थे शतं मासि मन्त्र्यर्थे तु शतत्रयम् ॥ २७ ॥
त्रिशतं दारपुत्रार्थे विद्वदर्थे शतद्वयम् ।
साद्यश्वपदगार्थे हि राजा चतुःसहस्रकम् ॥ २८ ॥
गजोष्ट्रवृषनालार्थं व्ययीकुर्याच्चतुःशतम् ।
शेषं कोशे धनं स्थाप्यं राज्ञा सार्धसहस्रकम् ॥ २९ ॥
प्रतिवर्षं स्ववेशार्थं सैनिकेभ्यो धनं हरेत् ।

प्रतिमास में व्यय करने का प्रमाण—और १ लाख मुद्रा का सालभर में निम्न रीति से व्यय करे जैसे—सामग्री, दान तथा स्वयं भोग करने के लिये प्रति मास १५००) डेढ़ हजार, लेखकों के लिये १००) एक सौ, मन्त्रियों के लिये ३००) तीन सौ, स्त्री-पुत्र के लिये ३००) तीन सौ विद्वानों के समान के लिये २००) दो सौ घुड़सवार, तथा पैदल सिपाहियों के लिये ४०००) चार हजार, ऊंट, बैल तथा बन्दूक चलानेवाले सिपाही—इनके लिये ४००) चार सौ रुपये प्रतिमास व्यय करे । और १५००) प्रतिवर्ष अपनी २ वर्दी बनवाने के लिये सैनिकों को दे । शेष धन को कोश में राजा सुरक्षित रक्खे ।

लोहसारमयश्चक्रसुगमो मञ्चकासनः ॥ ३० ॥
स्वान्दोलायितरूढस्तु मध्यमासनसारथिः ।
शस्त्रास्त्रसन्धायुदर इष्टच्छायो मनोरमः ॥ ३१ ॥
एवंविधो रथो राज्ञा रच्यो नित्यं सदश्वकः ।

राजा के रथ का वर्णन—कान्तिसार उत्तम लौह का बना हुआ, अत्यन्त सुगमता से फिरने वाले चक्रों से युक्त, शय्या के समान सुखपूर्वक बैठने के लिये

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३३२ | शुक्रनीतिः

स्थान वाला, एवं जिसमें शरीर स्वयम् हिंडोले पर बैठने के समान आन्दोलित हो जाय (अर्थात् सुन्दर कमानीदार), और जिसके आगे की तरफ मध्य भाग में सारथी के बैठने का स्थान हो तथा जिसके अन्दर शस्त्र तथा अस्त्र भरे पड़े हों एवं मनोनुकूल छाया हुआ—इस प्रकार का बना हुआ मनोरम रथ सदा रक्खे, जिसमें अच्छे २ घोड़े जुते हों, राजा सदा सैन्य में रक्खे ।

नीलतालुर्नीलजिह्वो वक्रदन्तो ह्यदन्तकः ॥ ३२ ॥
दीर्घद्वेषी क्रूरमदस्तथा पृष्ठविधूनकः ।
दशाष्टोननखो मन्दो भुविशोधनपुच्छकः ॥ ३३ ॥
एवंविधोऽनिष्टगजो विपरीतः शुभावहः ।

**अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का लक्षण—**नील तालु और जीभवाला, टेढ़े दाँतोंवाला या बिना दाँत का, दीर्घ काल तक द्वेष रखनेवाला, विश्रृङ्खल भाव से मद बहानेवाला, पीठ हिलानेवाला, १८ से कम नखवाला, मन्दगामी और पृथ्वी तक लटकनेवाली पूंछ से युक्त ऐसा हाथी अनिष्ट फल देनेवाला होता है एवं इससे विपरीत लक्षणों से युक्त शुभ फल देनेवाला होता है ।

भद्रो मन्द्रो मृगो मिश्रो गजो जात्या चतुर्विधः ॥ ३४ ॥

**हाथी के ४ प्रकार—**१. भद्र, २. मन्द्र, ३. मृग और ४. मिश्र भेद से गज की ४ जातियां होती हैं ।

मध्वाभदन्तः सबलः समाङ्गो वर्तुलाकृतिः ।
सुमुखोऽवयवश्रेष्ठो ज्ञेयो भद्रगजः सदा ॥ ३५ ॥

**भद्रगज के लक्षण—**मधु (शहद) के समान आभा से युक्त दाँतोंवाला, बलवान, अनुरूप अङ्गोंवाला, गोल आकारवाला, सुन्दर मुख एवं श्रेष्ठ अङ्गों-पाङ्गोंवाला गज 'भद्र' संज्ञक सदा जानना चाहिये ।

स्थूलकुक्षिः सिंहदृक् च बृहत्त्वग्गलशुण्डकः ।
मध्यमावयवो दीर्घकायो मन्द्रगजः स्मृतः ॥ ३६ ॥

**मन्द्रगज के लक्षण—**जिसके पेट स्थूल, आँखें सिंह के समान, चमड़ा मोटा एवं गला और शूंढ लम्बी, अवयव मध्यम आकार का एवं शरीर दीर्घ हो उसे 'मन्द्र' संज्ञक गज समझना चाहिये ।

तनुकण्ठदन्तकर्णशुण्डः स्थूलाक्ष एव हि ।
सुह्रस्वाधरमेढ्रस्तु वामनो मृगसंज्ञकः ॥ ३७ ॥

**मृगगज के लक्षण—**जिसके कण्ठ, दांत, कान एवं शूंढ पतले हों और आँखें स्थूल, ओष्ठ और लिङ्ग अत्यन्त छोटे तथा शरीर का आकार छोटा हो, उसे 'मृग' संज्ञक गज जानना चाहिये ।

एषां लक्षणैर्विमिश्रितो गजो मिश्र इति स्मृतः ।

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् १३३

भिन्नं भिन्नं प्रमाणं तु त्रयाणामपि कीर्तितम् ॥ ३८ ॥
मिश्रगज के लक्षण— इन सबों के कुछ २ लक्षण जिसमें मिलते हों उसे 'मिश्र' संज्ञक गज समझना चाहिये । उक्त तीनों गजों के प्रमाण भी भिन्न २ कहे हुये हैं ।

गजमाने ह्यङ्गुलं स्यादाष्टभिस्तु यवोदरैः ।
चतुर्विंशत्यङ्गुलैस्तैः करः प्रोक्तो मनीषिभिः ॥ ३९ ॥
गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाण— गजों को नापने के लिये जौ के उदर भाग की चौड़ाई के समान चौड़ाई १ अंगुल की होती है । ऐसे २४ अंगुलों का १ हाथ विद्वान लोग कहते हैं ।

सप्तहस्तोन्नतिर्भद्रे ह्यष्टहस्तप्रदीर्घता ।
परिणाहो दशकर उदरस्य भवेत् सदा ॥ ४० ॥
भद्रगज के शरीर का मान— 'भद्रगज' की ऊंचाई ७ हाथ की, लम्बाई ८ हाथ की तथा पेट का विस्तार १० हाथ का सदा होता है ।

प्रमाणं मन्दमृगयोर्हस्तहीनं क्रमाद्गतः ।
कथितं दैर्घ्यसाम्यं तु मुनिभिर्भद्रमन्द्रयोः ॥ ४१ ॥
मन्द्र तथा मृग गज का मान— मन्द्र और मृग की ऊंचाई का प्रमाण भद्रगज से क्रम से १-१ हाथ छोटा होता है अर्थात् मन्द्र की ऊंचाई ६ हाथ की एवं मृग की ५ हाथ की होती है किन्तु मुनियों ने भद्र और मन्द्र की लम्बाई समान ही बताई है ।

बृहद्भ्रूगण्डफालस्तु धृतशीर्षगतिः सदा ।
गजः श्रेष्ठस्तु सर्वेषां शुभलक्षणसंयुतः ॥ ४२ ॥
सर्वश्रेष्ठ जिसके भौंह, गण्डस्थल तथा मस्तक बृहदाकार के हों एवं चाल सदा शीघ्रता से युक्त हो, ऐसा शुभ लक्षणों से युक्त हाथी सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है ।

पञ्चयवाङ्गुलेनैव वाजिमानं पृथक् स्मृतम् ।
चत्वारिंशाङ्गुलमुखो वाजी यश्चोत्तमोत्तमः ॥ ४३ ॥
उत्तमोत्तम अश्व के लक्षण— घोडों का मान हाथियों के मान से भिन्न होता है । इसमें ५ जौ का १ अंगुल माना जाता है । जिसका मुख ४० अंगुल का होता है, वह घोड़ा 'उत्तमोत्तम' माना जाता है ।

षट्त्रिंशदङ्गुलमुखो ह्युत्तमः परिकीर्तितः ।
द्वात्रिंशदङ्गुलमुखो मध्यमः स उदाहृतः ॥ ४४ ॥
उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण— ३६ अंगुल का मुख जिसका होता है वह 'उत्तम' तथा ३२ अंगुल का मुख हो तो 'मध्यम' समझा जाता है ।

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३३४शुक्रनीतिः

अष्टाविंशत्यङ्गुलो यो मुखे नीचः प्रकीर्तितः।
वाजिनां मुखमानेन सर्वावयवकल्पना ॥ ४५ ॥

**नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान-कल्पना—**और जिसका मुख २८ अंगुल का होता है वह 'नीच' घोड़ा समझा जाता है। और घोड़ों के मुख के मान के द्वारा सम्पूर्ण अवयवों के मान की भी कल्पना की जाती है।

औच्चं तु मुखमानेन त्रिगुणं परिकीर्तितम् ।
शिरोमणि समारभ्य पुच्छमूलान्तमेव हि ॥ ४६ ॥
तृतीयांशाधिकं दैर्घ्यं मुखमानाच्चतुर्गुणम् ।
परिणाहस्तूदरस्य त्रिगुणस्त्र्यङ्गुलाधिकः ॥ ४७ ॥

**अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण—**उक्त मुखमान से तिगुनी ऊंचाई कही हुई है। घोड़े की शिरोमणि भाग से लेकर पूंछ के मूल भाग तक की लम्बाई मुखमान से तृतीयांश अधिक चौगुनी होती है। और उदर का विस्तार ३ अंगुल अधिक तिगुना होता है।

साधारणमिदं मानमुच्यते विस्तरादथ ।
अष्टाविंशाङ्गुलमुखं पुरस्कृत्य यथा तथा ॥ ४८ ॥
शफोच्चं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं मणिबन्धोऽङ्गुलाधिकः ।

यह साधारण रूप से मान कहा गया, अब विस्तारपूर्वक कहा जा रहा है। यदि २८ अंगुल प्रमाण मुखवाला नीच संज्ञक अश्व हो तो उसके खुर की ऊंचाई तीन ३ अंगुल प्रमाण की होती है और मणिबन्ध अर्थात् खुर का ऊपरी भाग १ अंगुल अधिक अर्थात् ४ अंगुल प्रमाण का होता है।

चतुर्हस्ताङ्गुला जङ्घा त्र्यङ्गुलं जानु कीर्तितम् ॥ ४९ ॥
चतुर्दशाङ्गुलावूरू कूर्परान्तं स्मृतो बुधैः ।
अष्टत्रिंशाङ्गुलं ज्ञेयं स्कन्धान्तं कूर्परादितः ॥ ५० ॥

और जंघा ४ हस्त के अंगुल प्रमाण की, जानु ३ अंगुल प्रमाण का कहा कहा हुआ है। और कूर्पर के दूनी पर्यन्त दोनों ऊरु १४ अंगुल प्रमाण का पण्डितों ने कहा है। कूर्पर से लेकर स्कन्ध पर्यन्त ऊंचाई ३८ अंगुल की होती है।

प्रत्यगूरू मुखसमौ जङ्घोना पादमानतः ।
प्रोक्तोच्चता चाथ दैर्घ्यमुच्यते शास्त्रसङ्गतम् ॥ ५१ ॥

और पीछे के दोनों ऊरु मुख के समान अर्थात् २८ अंगुल प्रमाण के होते हैं। और पीछे की जंघा चौथाई मान से कम होती है। इस प्रकार से घोड़ों की ऊंचाई का वर्णन किया गया अब शास्त्र-संगत लम्बाई का वर्णन किया जा रहा है।

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३५

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३५

षष्ठांशेनाधिका ग्रीवा द्विगुणा सुप्रसारिता ।
मुखतश्चोच्छ्रिता सार्धपादहीना तु पूर्वतः ॥ ५२ ॥
स्कन्धादि मुष्कमूलान्तं ग्रीवातुल्यं तु तत्र हि ।
द्व्यंशषष्ठं त्रिकं यावत् शेषमंसं प्रकल्पयेत् ॥ ५३ ॥
मुखार्धं पुच्छदण्डं च शिश्न आण्डौ तदर्धकौ ।
कर्णः षडङ्गुलो दीर्घश्चतुःपञ्चाङ्गुलः क्वचित् ॥ ५४ ॥

सुविस्तृत ग्रीवा लम्बाई में मुख की अपेक्षा षष्ठांश अधिक दुगुनी होती है तथा मुख से साढ़े चौथाई हीन उन्नत होती है । उसमें घोड़ों में स्कन्ध से लेकर अण्डकोष के मूल पर्यन्त लम्बाई ग्रीवा के तुल्य होती है । पृष्ठवंश (रीढ़) के (अधोभाग तक शेष भाग स्कन्ध की लम्बाई ग्रीवा के ) दो अंश और षष्ठ भाग तुल्य होती है । पुच्छदण्ड और शिश्न की लम्बाई मुख की आधी होती है, दोनों अण्डकोषों की लम्बाई शिश्न की आधी होती है । कर्ण की लम्बाई ६ अंगुल की होती है और कहीं २ चार या पांच अंगुल की भी होती है ।

परिणाहः शफस्योक्तो मुखार्धेनाङ्गुलाधिकः ।
तदर्धो मणिबन्धस्य जङ्घायाः परिधिः स्मृतः ॥ ५५ ॥
दशैकाङ्गुलपरिधी रम्योरूः कीर्त्तिता बुधैः ।
पृष्ठोरुपरिधिर्मूले त्रिः षष्ठांशो मुखेषु च ॥ ५६ ॥
बहिरन्तर्धनुःखण्डसदृशा शरभोन्मजा ।
मणिबन्धमणेर्ज्ञेयः परिधिश्च नवाङ्गुलः ॥ ५७ ॥
अन्त्यजङ्घादिपरिधिर्विज्ञेयः पूर्ववद् बुधैः ।

खुर का विस्तार एक अंगुल अधिक मुख के परिमाण का आधे भाग का होता है । और मणिबन्ध और जंघा की परिधि उसकी आधी होती है । रमणीय ऊरु की परिधि ११ अंगुल परिमित पण्डितों ने कही है । पीछे की ऊरु की परिधि मूल भाग में ३ अंगुल परिमित और अग्रभाग में षष्ठ अंश परिमित होती है । मणिबन्ध की चिह्न विशेष मणि की परिधि नव अंगुल की होती है और अन्तिम जंघा आदि की परिधि पूर्ववत् पण्डितों को जानना चाहिये ।

अक्ष्णोरन्तरे चिह्नमङ्गुलं पक्ष्ममूलयोः ॥ ५८ ॥
सार्धाङ्गुलं सटास्थानं ग्रीवोपरि सुविस्तृतम् ।
शिरोमणिं समारभ्य दीर्घं स्कन्धान्तमुत्तमम् ॥ ५९ ॥
अधोगमा सटा कार्या हस्तमात्रायता शुभा ।
सार्धहस्ता द्विहस्ता वा पुच्छबालाः सुशोभनाः ॥ ६० ॥

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३३६ शुक्रनीतिः

और दोनों ऊरुओं के मध्य में पार्श्वमूलों का चिह्न अंगुल परिमित होता है। ग्रीवा के ऊपर सुविस्तृत शिरोमणि से लेकर स्कन्ध पर्यन्त प्रधान सटा (अयाल) का स्थान डेढ़ अंगुल लम्बा है। और (मूर्ति में) नीचे की ओर लटकती हुई हाथभर की लम्बी शुभ सटा (अयाल) करनी चाहिये। और पूंछ के बाल डेढ़ हाथ या दो हाथ लम्बे शोभन करने चाहिये।

सप्ताष्टनवदशभिरङ्गुलैः कर्णदीर्घता।
तथा तद्विस्तृतिर्ज्ञेया त्र्यङ्गुला चतुरङ्गुला ॥ ६१ ॥
न स्थूला नापि चिपिटा ग्रीवा मयूरसन्निभा।
ग्रीवाप्रपरिधिस्तुल्यो मुखेनाधिकमुष्टिकः ॥ ६२ ॥
ग्रीवामूलस्य परिधिर्द्विगुणो विदशाङ्गुलः।
तृतीयांशविहीनं तु सत्क्रोडं वक्ष ईरितम् ॥ ६३ ॥

और कर्ण की लम्बाई ७, ८, ९ या १० अंगुल परिमित की होनी चाहिये और उसकी चौड़ाई ३ या ४ अंगुल की होनी चाहिये। और न मोटी, न चिपटी, मयूर के समान ग्रीवा होनी चाहिये। ग्रीवा के अग्रभाग की परिधि मुख के परिमाण से एक मुष्टि अधिक होनी चाहिये। ग्रीवामूल की परिधि मुख के परिमाण से १० अंगुल कम दुगुना होना चाहिये। और उत्तम उत्संगवाला वक्षःस्थल का मान मुख के मान से तृतीयांश कम कहा हुआ है।

नेत्रोपरि परीणाहो मुखेनाष्टाङ्गुलाधिकः।
नासिकोपरि नेत्राधो मुखस्य परिधिस्तु यः ॥ ६४ ॥
तृतीयांशविहीनेन मुखेन सदृशो भवेत्।
द्व्यङ्गुलं नेत्रविस्तृतिस्त्र्यङ्गुला तस्य दीर्घता ॥ ६५ ॥
अर्धाङ्गुलाधिका वापि विस्तृतिर्दीर्घताङ्गुला।
मुखतृतीयांशमेतदूर्वोर्मध्येऽन्तरं स्मृतम् ॥ ६६ ॥
नेत्राग्रयोरन्तरं तु पञ्चमांशं मुखस्य हि।
कर्णयोरन्तरं तद्वत् कर्णनेत्रान्तरं तथा ॥ ६७ ॥

नेत्र के ऊपर का विस्तार मुख के मान के तुल्य होता है किन्तु ८ अंगुल अधिक होता है। नासिका के ऊपर और नेत्र के नीचे जो मुख की परिधि है वह तृतीयांशहीन मुख के मान के तुल्य होती है। नेत्र के विस्तार का मान २ अंगुल एवं नेत्र की लम्बाई का मान ३ अंगुल का होता है अथवा नेत्र का विस्तार आधा अंगुल अधिक अर्थात् ढाई अंगुल मान का और लम्बाई एक अंगुल अधिक अर्थात् तीन अंगुल की होनी चाहिये। ऊरुओं के मध्य में यह अन्तर मुख का तृतीयांश तुल्य होना चाहिये तथा नेत्र के दोनों अग्रभागों का

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३७

अन्तर मुख के पञ्चमांशतुल्य होना चाहिये । दोनों कर्णों का अन्तर भी सदृश तथा कर्ण और नेत्र का अन्तर भी उसी प्रकार से होता है ।

भूस्थयोः शफयोः प्रोक्तं तदेतत् कर्णसंमितम् ।
मणिनेत्रप्रान्तरं च भ्रुवोरन्तरमेव हि ॥ ६८ ॥
सक्थ्यङ्गुलं तृतीयांशं नासानेत्रान्तरं तथा ।
त्रिभागपूरणं प्रोथः सोष्ठश्च परिकीर्तितः ॥ ६९ ॥
नासारन्ध्रान्तरं चैव तद्-दैर्घ्येनवमांशकम् ।
कायो नरार्धविस्तारस्त्रिके हृदयसंमितः ॥ ७० ॥
चतुर्थांशं तु हृदयं बाहुमूलादधः स्मृतम् ।
षष्ठांशमन्तरं बाह्वोर्हृत्समीपे प्रकीत्तितम् ॥ ७१ ॥

और भूमिस्थित दोनों खुरों का जो यह अन्तर है वह कर्ण के मान के तुल्य कहा हुआ है । मणि और नेत्र का अन्तर, दोनों भौंहों का अन्तर तथा नासिका और नेत्र का अन्तर सक्थि (ऊरु) के अंगुलों का तृतीयांश तुल्य मान समझना चाहिये । और ओष्ठ के सहित मुख का अग्रभाग मुख के मान के तृतीयांशतुल्य कहा हुआ है । तथा दोनों नासिकाओं के छिद्रों का अन्तर उन दोनों की लम्बाई के मान के तृतीयांश तुल्य मानवाला होता है । शरीर मनुष्य के विस्तार से आधा विस्तारवाला, पृष्ठवंश (रीढ़) के नीचे भाग में हृदय (वक्षस्थल) के समान विस्तार होता है तथा हृदय बाहुमूल के नीचे चतुर्थांश तुल्य कहा हुआ है । हृदय के समीप में दोनों बाहुओं का अन्तर षष्ठांश तुल्य होता है ।

अधरोष्ठोऽनुचिबुकं सार्धाङ्गुलमथोन्नतम् ।
शोभते चोन्नतग्रीवो नतपृष्ठः सदा हयः ॥ ७२ ॥
यद्रूपं कर्तुमुद्युक्तस्तद्विम्बं वीक्ष्य सर्वतः ।
अदृष्ट्वा कस्य यद्रूपं न कर्तुं क्षमते हि तत् ॥ ७३ ॥
शिल्प्यग्रे वाजिनं ध्यात्वा कुर्यादवयवानतः ।
दिशाऽनया च विभूतेः सर्वमानानि वाजिनाम् ॥ ७४ ॥

अधरोष्ठ चिबुक तक डेढ़ अंगुल उन्नत होता है । और घोड़ा सदा उन्नत ग्रीवा तथा नत पृष्ठवाला शोभायमान होता है । जिसकी आकृति बनाने के लिये जो उद्यत हो वह सब तरफ से देखकर उसके बिम्ब (प्रतिकृति) को करे । किसी का जो रूप हो उसको बिना देखकर उसकी प्रतिकृति बनाने के लिये कोई समर्थ नहीं हो सकता है । अतः शिल्पी (मूर्तिकार) प्रथम घोड़े का ध्यान कर पश्चात् उसके अङ्गों को बनावे । इसी रीति से घोड़ों के अवयवों के सभी मानों की कल्पना करे ।

२२ शु०

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३३८शुक्रनीतिः

श्मश्रुहीनमुखः कान्तः प्रगल्भोत्तुङ्गनासिकः ।
दीर्घोद्धतग्रीवमुखो ह्रस्वकुक्षिखुरश्रुतिः ॥ ७५ ॥
तुरप्रचण्डवेगश्च हंसमेघसमस्वनः ।
नातिक्रूरो नातिमृदुर्देवसत्त्वो मनोरमः ॥ ७६ ॥

उत्तम अश्व के अन्य लक्षण— जिस घोड़े के मुख पर बाल न हों एवं सुन्दर मुख तथा शब्द हो और नासिका ऊंची हो, तथा गर्दन और मुख लम्बे एवं कुछ उठे हुये हों, पेट, खुर एवं कान छोटे हों, अत्यन्त शीघ्र और प्रचण्ड वेग हो, हंस तथा मेघ के समान शब्द हो और स्वभाव न अत्यन्त क्रूर तथा न अत्यन्त मृदु ही हो, देवताओं के घोड़ों के समान उत्तम पराक्रम हो—ऐसा घोड़ा मन को मोहित करनेवाला अतएव उत्तम होता है ।

सुकान्तिगन्धवर्णश्च सद्गुणभ्रमरान्वितः ।
घोड़ों की कान्ति, गन्ध और वर्ण सुन्दर एवं अच्छे गुणवाले भौंरी ( भ्रमर ) होनी चाहिये ।

भ्रमरस्तु द्विधावर्त्तो वाम-दक्षिणभेदतः ॥ ७७ ॥
पूर्णोऽपूर्णः पुनर्द्वेधा दीर्घो ह्रस्वस्तथैव च ।

अश्व के भौंरी के दो भेद— और भौंरी का घुमाव वाम तथा दक्षिण भेद से दो प्रकार का होता है पुनः प्रत्येक के पूर्ण तथा अपूर्ण एवं दीर्घ और ह्रस्व भेद से दो २ प्रकार होते हैं ।

स्त्रीपुंदेहे वामदक्षौ यथोक्तफलदौ क्रमात् ॥ ७८ ॥

घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ भौंरी के शुभ फल— उक्त भौंरियां तभी यथोक्त उत्तम फल देनेवाली होती हैं जब कि वे क्रम से घोड़ी के बाएँ तथा घोड़े के दाहिनी ओर हों ।

न तथा विपरीतो तु शुभाशुभफलप्रदौ ।

अन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश— यदि उक्त प्रकार से विपरीत हों अर्थात् उक्त स्थान ( दायें-बायें ) से अन्यत्र कहीं पर हों तो शुभ या अशुभ कोई फल नहीं देनेवाली होती है ।

नीचोर्ध्वतिर्यङ्मुखतः फलभेदो भवेत्तयोः ॥ ७९ ॥

भौंरियों के नीचे-ऊंचे होने में फलभेद— यदि भौंरियों का मुख नीचा, ऊंचा या तिरछा हो तो तदनुसार फल में भी भेद हो जाता है ।

शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-वेदि-स्वस्तिकसन्निभः ।
प्रासादतोरणधनुःसुपूर्णकलशाकृतिः ॥ ८० ॥
स्वस्तिकस्रङ्मीनखड्गश्रीवत्साभः शुभ्रो भ्रमः ।

शुभ भौंरी के लक्षण— भौंरी शंख, चक्र, गदा, पद्म, वेदी या स्वस्तिक

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३३९

(卐), के चिह्न की किंवा प्रासाद, तोरण, धनुष या पूर्ण कलश के आकार की होती है और स्वस्तिक, माला, मत्स्य, खङ्ग तथा श्रीवत्स के समान आकारवाली भौंरी शुभ मानी जाती है।

नासिकाग्रे ललाटे च शङ्खे कण्ठे च मस्तके ॥ ८१ ॥
आवर्त्तॊ जायते येषां ते धन्यास्तुरगोत्तमाः ।

**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की उत्तमता—**जिन घोड़ों की नासिका के अग्रभाग, ललाट, शङ्ख (कनपटी), कण्ठ या मस्तक में भौंरो हो वे धन्य तथा घोड़ों में 'उत्तम' माने जाते हैं।

हृदि स्कन्धे गले चैव कटिदेशे तथैव च ॥ ८२ ॥
नाभौ कुक्षौ च पार्श्वाग्रे मध्यमाः संप्रकीर्तिताः ।

**भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की मध्यमत्ता—**जिनके हृदय, स्कन्ध (कन्धा), गळा, कमर, नाभि, कुक्षि (उदर) तथा पार्श्व के अग्रभाग में भौंरी होती है वे घोड़े 'मध्यम' माने जाते हैं।

ललाटे यस्य चावर्त्तद्वितयस्य समुद्भवः ॥ ८३ ॥
मस्तके च तृतीयस्य पूर्णहर्षोऽश्व उत्तमः ।

**'पूर्णहर्ष' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिसके ललाट में दो भौरियां हों और तीसरी मस्तक में हों वह 'पूर्णहर्ष' (पूर्ण हर्ष देनेवाला) उत्तम अश्व माना जाता है।

पृष्ठवंशे यदावर्त्तो यस्यैकः संप्रजायते ॥ ८४ ॥
स करोत्यश्वसंघातान् स्वामिनः सूर्यसंज्ञकः ।

**'सूर्यसंज्ञक' अश्व के लक्षण तथा फल—**जिस अश्व के पृष्ठवंश (रीढ़) के ऊपर एक भौंरी हो वह 'सूर्यसंज्ञक' कहा जाता है एवं वह अपने स्वामी के यहां आने पर बहुत से घोड़ों को एकत्र कर देता है।

त्रयो यस्य ललाटस्था आवर्त्तास्तिर्यगुत्तराः ॥ ८५ ॥
त्रिकूटः स परिज्ञेयो वाजिवृद्धिकरः सदा ।

**अश्व-वृद्धिकर 'त्रिकूट' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के ललाट में तीन भौरियां हों और तिरछे मुखवाली हों तो उसे 'त्रिकूट' संज्ञक कहते हैं, जो सदा स्वामी के यहां घोड़ों की वृद्धि करनेवाला होता है।

एवमेव प्रकारेण त्रयो ग्रीवां समाश्रिताः ॥ ८६ ॥
समावर्त्ताः स बाजीशो जायते नृपमन्दिरे ।

**अन्य भौरियों से युक्त अश्वों के लक्षण—**इसी तरह से यदि अश्व की ग्रीवा में ३ भौरियां हों तो वह अश्व श्रेष्ठ राजमन्दिर में ही रहता है अर्थात् ऐसा यदि किसी के पास रह जाय तो स्वामी को राजा बना दे।

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३४० शुक्रनीतिः

कपोलस्थौ यदावर्त्तौ दृश्येते यस्य वाजिनः ॥ ८७ ॥
यशोवृद्धिकरौ प्रोक्तौ राज्यवृद्धिकरौ मतौ ।
एको वाऽथ कपोलस्थो यस्यावर्त्तः प्रदृश्यते ॥ ८८ ॥
सर्वनामा स विख्यातः स इच्छेत् स्वामिनाशनम् ।

यशोवर्द्धक तथा 'सर्व' संज्ञक अश्व के लक्षण— यदि किसी अश्व के दोनों कपोलों पर दो भौरियां हों तो स्वामी के लिये वे दोनों यश तथा राज्य की वृद्धि करनेवाली मानी गई हैं । जिस अश्व के एक ही कपोल पर एक ही भौरी हो वह 'सर्व' संज्ञक होता है तथा स्वामी का नाश चाहता है ।

गण्डसंस्थो यद्यावर्त्तो वाजिनो दक्षिणाश्रितः ॥ ८९ ॥
स करोति महासौख्यं स्वामिनः शिवसंज्ञकः ।
तद्वामाश्रितः क्रूरः प्रकरोति धनक्षयम् ॥ ९० ॥

शिव-संज्ञक तथा क्रूर-संज्ञक के लक्षण— जिसके दक्षिण गण्डस्थल पर एक भौंरी हो वह 'शिव' संज्ञक अश्व स्वामी के लिये महा सुखकारी होता है । इसी प्रकार से बायें गण्डस्थल पर यदि भौंरी हो तो वह अश्व 'क्रूर' संज्ञक होता है तथा धनक्षयकारक होता है ।

इन्द्राख्यौ तावुभौ शस्तौ नृपराज्यविवृद्धिदौ ।

इन्द्र-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— यदि गण्डस्थल के दोनों ओर भौरियां पड़ी हों तो वे 'इन्द्र' संज्ञक होती हैं और उत्तम एवं राजा के राज्य की वृद्धि करनेवाली होती हैं ।

कर्णमूले यदावर्त्तौ स्तनमध्ये तथाऽपरौ ॥ ९१ ॥
विजयाख्यावुभौ तौ तु युद्धकाले यशःप्रदौ ।

विजय-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— अश्व के कर्ण के मूल भाग में दो तथा स्तन के मध्य में दो भौरियां हों तो ये दोनों 'विजय' संज्ञक होती हैं और युद्ध काल में विजय दिलाने से यशप्रद होती हैं ।

स्कन्धपार्श्वे यदावर्त्तौ स भवेत् पद्मैलक्षणः ॥ ९२ ॥
करोति विविधान् पद्मान् स्वामिनः सततं सुखम् ।

पद्म-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— दोनों स्कन्ध के पार्श्व भाग में यदि भौंरी हों तो उसे 'पद्म' संज्ञक कहते हैं । ऐसा अश्व स्वामी के सुख की सदा वृद्धि करता है एवं विविध प्रकार से पद्मसंख्यक धन का आगमन कराता है ।

नासामध्ये यदावर्त्त एको वा यदि वा त्रयम् ॥ ९३ ॥
चक्रवर्ती स विज्ञेयो वाजी भूपालसंज्ञकः ।

भूपाल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिसकी नासिका के मध्य में

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४१

यदि १ या ३ भौरियां हों तो वह 'भूपाल' संज्ञक अश्व होता है जो स्वामी को चक्रवर्ती राजा बना देता है ।

कण्ठे यस्य महावर्त्त एकः श्रेष्ठः प्रजायते ॥ ६४ ॥
चिन्तामणिः स विज्ञेयश्चिन्तितार्थसुखप्रदः ।

चिन्तामणि-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिसके कण्ठ में श्रेष्ठ एक बड़ी-सी भौंरी हो वह अश्व 'चिन्तामणि' संज्ञक होता है जो अभिलषित अर्थ तथा सुख को देनेवाला होता है ।

शुक्लाख्यौ भालकण्ठस्थौ आवर्तौ वृद्धिकीर्तिदौ ॥ ६५ ॥

शुक्ल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल— जिस अश्व के ललाट तथा शंख देश में जो भौरियां होती हैं वे दोनों 'शुक्ल' संज्ञक होती हैं और राज्य-धनादि की वृद्धि तथा कीर्ति को देनेवाली होती हैं ।

यस्यावर्त्तौ वक्त्रगतौ कुद्यन्ते वाजिनो यदि ।
स नूनं मृत्युमाप्नोति कुर्याद् वा स्वामिनाशनम् ॥ ६६ ॥

अनिष्टकारक अश्वों के लक्षण— जिस अश्व के कुक्षि के अन्त भाग में यदि टेढ़ी दो भौरियां हों तो वह निश्चय स्वयं मर जाय या अपने स्वामी का नाश करे ।

जानुसंस्था यदावर्त्तः प्रवासक्लेशकारकाः ।
वाजिमेढ़े यदावर्त्तो विजयश्रोविनाशनः ॥ ६७ ॥

जिस अश्व के जानुओं ( घुट्टों ) पर ३ भौरियां हों, उनसे स्वामी को परदेश में विशेष क्लेश होता है । घोड़े के यदि लिङ्ग में भौंरी हो तो वह विजय और श्री ( लक्ष्मी ) का नाशक होता है ।

त्रिकसंस्थो यदावर्त्तस्त्रिवर्गस्य प्रणाशनः ।
पुच्छमूले यदावर्त्तो धूमकेतुरनर्थकृत् ॥ ६८ ॥

धूमकेतु-संज्ञक भौंरी के लक्षण फल— जिसकी पीठ के त्रिकस्थान में भौंरी हो तो वह त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ, काम ) का नाशक होता है । घोड़े के पूंछ के मूल में जो भौंरी हो, वह 'धूमकेतु' संज्ञक है तथा अनर्थकारक होता है ।

गुह्यपुच्छत्रिकावर्ती स कृतान्तो भयप्रदः ।

कृतान्त-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल— जिस घोड़े की गुदा, पूंछ तथा त्रिकस्थान में भौंरी हो वह 'कृतान्त' संज्ञक होता है जो कि भयदायक होता है ।

मध्यदण्डा पार्श्वगमा सैव शतपदी कचे ॥ ६९ ॥
अतिदुष्टाङ्गुष्ठमिता दीर्घा दुष्टा यथा यथा ।

घोड़े के पूंछ के शुभाशुभ फल— जिसकी पूंछ दोनों पाश्र्वों की ओर जावे और मध्य में दण्ड के आकार का चिह्न हो एवं यह एक अंगुष्ठ बराबर लम्बा

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३४२शुक्रनीतिः

हो तो उसे 'मध्यदण्डा' या 'शतपदी' कहते हैं यह अत्यन्त दुष्ट मानी जाती है। उसके बाद जैसे २ वह लम्बी होती जाती है वैसे २ उसकी दुष्टता नष्ट होकर शुभ फल देनेवाली होती जाती है ।

अश्रुपातो हनुगण्डहृद्गलप्रोथवस्तिषु ॥ १०० ॥
कटिशङ्खजानुमुष्क-ककुन्नाभिगुदेषु च ।
दक्षकुकौ दक्षपादे त्वशुभो भ्रमरः सदा ॥ १०१ ॥

**भौरियों के अशुभप्रद स्थानों का निर्देश—**यदि अश्व के हनु ( ठोढ़ी ), गण्डस्थल, हृदय, गला, प्रोथ ( मुखाग्रभाग ), बस्तिस्थान, कमर, शंख ( कनपटी ), जानु ( घोटू ), मुष्क ( अण्डकोश ), ककुद् ( पीठ पर उभरा हुआ स्थान ), नाभि, गुदा, में भौंरी हो तो अश्रुपातकारक होती है और दक्षिण कुक्षि या दक्षिण पेट में हो तो वह सदा अशुभ फल देनेवाली मानी जाती है।

गलमध्ये पृष्ठमध्ये उत्तरोष्ठेऽधरे तथा ।
कर्णनेत्रान्तरे वामकुक्षौ चैव तु पार्श्वयोः ॥ १०२ ॥
ऊरुषु च शुभावतौ वाजिनामग्रपादयोः ।

**आवत्तं भौरियों के शुभप्रद स्थानों का निर्देश—**अश्व के गले या पीठ के मध्य में, ऊपर या नीचे के ओष्ठ, कर्ण और नेत्र के मध्य में, बाईं कुक्षि, दोनों पार्श्व, दोनों ऊरु, या दोनों अगले पांवों में, भौरियाँ हों तो बड़ी शुभ देने वाली होती हैं।

आवर्तौ सान्तरौ भाले सूर्य्यचन्द्रौ शुभप्रदौ ॥ १०३ ॥
मिलितौ तौ मध्यफलौ ह्यतिलग्नौ तु दुष्फलौ ।

**सूर्य-चन्द्रसंज्ञक भौंरी के स्थानानुसार शुभाशुभ फल का निर्देश—**और भाल में यदि कुछ अन्तर पर दो भौरियाँ हो तो वे सूर्य-चन्द्र संज्ञक होती हैं तथा 'उत्तम' शुभ फल देने वाली होती हैं यदि कुछ सटी हुई हों तो 'मध्यम' शुभ फल देनेवाली एवं अत्यधिक सटी हुई हों तो 'दुष्ट' फल देनेवाली होती हैं।

आवर्तत्रितयं भाले शुभं चोर्ध्वं तु सान्तरम् ॥ १०४ ॥
अशुभं चातिसंलग्नमावर्त्तद्वितयं तथा ।
त्रिकोणत्रितयं भाले आवर्तानां तु दुःखदम् ॥ १०५ ॥
गलमध्ये शुभस्त्वेकः सर्वाशुभनिवारणः ।

**शुभाशुभ फलप्रद भौंरी के स्थानों का निर्देश—**यदि अश्व के भाल में ऊपर की ओर ३ भौरियां अलग २ हों तो शुभ फलप्रद होती हैं। यदि भाल में दो भौरियां अत्यन्त सटी हुई हों तो अशुभ फलप्रद होती हैं। और भाल में

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चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३४३

यदि त्रिकोणाकार ३ भौरियां हों तो दुःखप्रद होती हैं। गले के मध्य में यदि एक भौंरी हो तो वह शुभ फलप्रद और समस्त अशुभ फलों को दूर करने वाली होती है।

अधोमुखः शुभः पादे भाले चोर्ध्वमुखो भ्रमः ॥ १०६ ॥
न चैवात्यशुभा पृष्ठमुखी शतपदी मता।

पैर में अधोमुख एवं भाल में ऊर्ध्वमुख भौंरी शुभ होती है पीठ की ओर मुखवाली जो 'शतपदी' होती है वह अत्यन्त अशुभ फल देनेवाली नहीं होती है।

मेढ्रस्य पश्चाद् भ्रमरी स्तनी बाजी स चाशुभः ॥ १०७ ॥

और जिस अश्व के लिङ्ग के पीछे भौंरी या स्तन हो, वह अशुभ फलप्रद होता है।

भ्रमः कर्णसमीपे तु शृङ्गी चैकः स निन्दितः ।
ग्रीवोर्ध्वेपाश्र्वे भ्रमरी ह्येकरश्मिः स चैकतः ॥ १०८ ॥

**एकशृङ्गी तथा एकरश्मि-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल—**जिस के कान के समीप में भौंरी होती है वह अश्व 'एकशृङ्गी' कहलाता है और निन्दित होता है। ग्रीवा के ऊपर पार्श्व में एक तरफ जो भौंरी होती है वह 'एकरश्मि' कहलाती है वह भी निन्दित होती है।

पादोर्ध्वमुखभ्रमरी कीलोत्पाटी स निन्दितः ।
शुभाशुभौ भ्रमौ यस्मिन्स वाजी मध्यमः स्मृतः ५ १०६ ॥

**कीलोत्पाटी व मध्यम आवत्तों के लक्षण व फल—**पैरों में यदि ऊर्ध्व मुख वाली भौंरी हो तो उसे 'कीलोत्पाटी' कहते हैं। वह निन्दित होता है। जिस अश्व में शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार की भौरियां होती हैं, वह 'मध्यम' कहलाता है।

मुखे पत्सु सितः पञ्चकल्याणोऽश्वः सदा मतः ।
स एव हृदये स्कन्धे पुच्छे श्वेतोऽष्टमङ्गलः ॥ ११० ॥

**पञ्चकल्याण व अष्टमङ्गल अश्व के लक्षण व फल—**जिसके मुख और चारों पैर सफेद हों, वह अश्व 'पञ्चकल्याण' संज्ञक सदा कहलाता है। यही सफेदी हृदय, स्कन्ध तथा पुच्छ में घोड़े को हो तो वह 'अष्टमङ्गल' संज्ञक होता है।

कर्णे श्यामः श्यामकर्णः सर्वतस्त्वेकवर्णभाक् ।
तत्रापि सर्वतः श्वेतो मेध्यः पूज्यः सदैव हि ॥ १११ ॥

**श्यामकर्ण अश्व के लक्षण—**यदि केवल कान ही मात्र कृष्ण वर्ण के हों और सर्वत्र कोई एक वर्ण हो तो वह अश्व 'श्यामकर्ण' संज्ञक होता है। और

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३४४ | शुक्रनीतिः

जिस श्यामकर्ण घोड़े का सारा शरीर एक वर्ण का हो किन्तु वह श्वेत वर्ण हो तो वह अश्वमेध के योग्य होने से सदैव पूज्य होता है।

वैदूर्यसन्निभे नेत्रे यस्य स्तो जयमङ्गलः।
मिश्रवर्णस्त्वेकवर्णः पूज्यः स्यात् सुन्दरो यदि ॥ ११२॥
**जयमङ्गल अश्व के लक्षण—**जिस घोड़े की आंखें वैदूर्य मणि के समान कालापन युक्त सफेद हों वह 'जयमङ्गल' संज्ञक होता है। कोई भी घोड़ा चाहे अनेक वर्ण का या एक वर्ण का हो किन्तु देखने में सुन्दर हो तो वह पूज्य होता है।

कृष्णपादो हरिर्निन्यस्तथा श्वेतैकपादपि ।
रूक्षो धूसरवर्णश्च गर्दभामोऽपि निन्दितः ॥ ११३॥
जिस अश्व के पैर काले हों अथवा एक ही पैर सफेद हो किंवा जो रूप धूसर वर्ण का गदहे के समान हो वह निन्दित होता है।

कृष्णतालुः कृष्णजिह्वः कृष्णोष्ठश्च विनिन्दितः।
सर्वतः कृष्णवर्णो यः पुच्छे श्वेतः स निन्दितः ॥ ११४॥
जिसका तालु, जिह्वा और ओष्ठ कृष्ण वर्ण का हो अथवा सर्वत्र कृष्ण वर्ण का हो किन्तु पूंछ श्वेत वर्ण की हो तो वह निन्दित होता है।

उच्चैः पदन्यासगतिर्द्विपव्याघ्रगतिश्च यः।
मयूरहंसतित्तिरपारावतगतिश्च यः ॥ ११५॥
मृगोष्ट्रश्वानरगतिः पूज्यो वृषगतिर्हयः ।
**अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण—**जो अश्व ऊंचा पैर उठाकर चलता हो किंवा जिसकी चाल हाथी अथवा सिंह की सी हो और जिसकी मोर, हंस, तीतर, कबूतर, मृग, ऊँट या बैल की सी चाल हो तो वह पूज्य (श्रेष्ठ चालवाला) होता है।

अतिमुक्तोऽतिपीतोऽपि यथा सादी न पीड्यते ॥ ११६॥
श्रेष्ठा गतिस्तु सा ज्ञेया स श्रेष्ठस्तुरगो मतः।
घोड़े की वही चाल श्रेष्ठ कहलाती है कि जिससे अत्यन्त भोजन करके या अत्यन्त जल पीकर के भी सवारी करने पर सवार को कष्ट न मालूम पड़े। और वही घोड़ा श्रेष्ठ भी माना जाता है।

सुश्वेतभालतिलको विद्धो वर्णान्तरेण च ॥ ११७॥
स वाजी दलभञ्जी तु यस्य सैवातिनिन्दितः।
**निन्दित 'दलभंजी' अश्व के लक्षण—**जिस अश्व के मस्तक का श्वेत तिलक अन्य वर्ण से मिश्रित भी हो तो वह 'दलभंजी' नामक कहा जाता है और वह तथा उसका स्वामी दोनों निन्दित माने जाते हैं।