शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याये दुर्गनिरूपणप्रकरणम् ३२५
उससे श्रेष्ठ 'पारिघदुर्ग' और उससे भी श्रेष्ठ 'वनदुर्ग' उससे भी श्रेष्ठ 'धन्वदुर्ग' उससे श्रेष्ठ 'जलदुर्ग' उससे भी श्रेष्ठ 'गिरिदुर्ग' माना गया है ।
सहायसैन्यदुर्गे तु सर्वदुर्गप्रसाधिके ।
ताभ्यां विनाऽन्यदुर्गाणि निष्फलानि महीभुजाम् ॥ ७ ॥
श्रेष्ठं तु सर्वदुर्गेभ्यः सेनादुर्गं स्मृतं बुधैः ।
तत्साधकानि चान्यानि तद्रक्षेन्नृपतिः सदा ॥ ८ ॥
सेनादुर्गं तु यस्य स्यात्तस्य वश्या तु भूरियम् ।
**सहाय तथा सैन्य दुर्गों की सब दुर्गों की साधनता का निर्देश—**वस्तुतः सब दुर्गों से श्रेष्ठ सेना (सैन्य) दुर्ग को विद्वानों ने माना है । और अन्य सारे दुर्ग तो इसके केवल साधनमात्र हैं । अतः राजा सदा { इस (सैन्य) दुर्ग की रक्षा करे जिसके पास सेना (सैन्य) दुर्ग है उस (राजा) के लिये यह सारी पृथ्वी अधीन हुई मानी जाती है ।
बिना तु सैन्यदुर्गेण दुर्गमन्यत्तु बन्धनम् ॥ ९ ॥
आपत्कालेऽन्यदुर्गाणामाश्रयश्चोत्तमो मतः ।
**आपत्काल में अन्य दुर्गों के आश्रय की उत्तमता का निर्देश—**सैन्यदुर्ग को छोड़कर अन्य दुर्ग केवल बन्धनमात्र हैं । वास्तव में आपत्ति पड़ने पर ही अन्य दुर्गों का आश्रय लेना उत्तम माना गया है ।
एकः शतं योधयति दुर्गस्थोऽस्त्रधरो यदि ॥ १० ॥
शतं दशसहस्राणि तस्माद् दुर्गं समाश्रयेत् ।
अस्त्र धारण किया हुआ एक सैनिक अकेला ही यदि दुर्ग में स्थित होकर लड़े तो बाहर के १०० सैनिकों से लड़ सकता है । और यदि १०० सैनिक हों तो १०००० सैनिकों से लड़ सकते हैं । इससे दुर्ग का आश्रय लेना उचित होता है ।
शूरस्य सैन्यदुर्गस्य सर्वं दुर्गमिव स्थलम् ॥ ११ ॥
युद्धसम्भारपुष्टानि राजा दुर्गाणि धारयेत् ।
धान्यवीरास्त्रपुष्टानि कोशपुष्टानि वै तथा ॥ १२ ॥
**अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्ग के लक्षण—**शूर-वीर सैन्य दुर्ग (सेना) के लिये तो सभी स्थल दुर्ग की भांति दुर्भेद्य हो जाते हैं । और राजा युद्ध की सामग्रियों से परिपूर्ण अर्थात् भोजन के लिये अन्न, शूर-वीर सैनिक, अस्त्र-शस्त्र एवं कोष (खजाने) से परिपूर्ण दुर्गों को सुसज्जित रक्खे । और ऐसे ही दुर्गों में रहे ।
सहायपुष्टं यद् दुर्गं तच्च श्रेष्ठतरं मतम् ।
सहायपुष्टदुर्गेण विजयो निश्चयात्मकः ॥ १३ ॥