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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

About this granth

The Shatapatha Brahmana (शतपथ ब्राह्मण), the Brahmana of the White Yajurveda, is the largest and most important work of Vedic prose. Named for its hundred chapters and linked by tradition to the sage Yajnavalkya, it has fourteen books in the Madhyandina recension. It explains the procedure and meaning of the new- and full-moon offerings, the setting up of the fires, the agnihotra, the soma sacrifice, the building of the fire altar and the horse sacrifice, and its final part contains the Brihadaranyaka Upanishad. The first book includes the well-known story of Manu and the fish in the great flood.

This is the first of three volumes. The text follows Albrecht Weber's edition, with the Hindi translation (Ratnadipika) of Pandit Gangaprasad Upadhyaya, edited by Swami Satyaprakash Saraswati. Introductions on the Brahmanas and on the accent marks, a note on the translation, an English preface and contents precede the text, which runs by kanda, adhyaya and brahmana. This scan is of the 2014 Govindram Hasanand edition, 699 pages.

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कां० ४, अ० १-२, ब्रा० ५-१, कं० १५-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ५४६
की स्तुति के पश्चात् ही वे आये थे ॥१५॥
वे बोले, 'हम अध्वर्यु हैं, हमीं यज्ञ में मुख्य हैं । हमारे इस पहले ग्रह को द्विदेवतों के लिए
दे दो ।' उन्होंने उस पहले ग्रह को द्विदेवतों को दे दिया । इसलिए यह दसवाँ ग्रह है और तीसरा
वषट्कार होता है । ये अश्विन कौन हैं ? द्यौ और पृथिवी । यही दो तो हैं जो सबको अश्नुवातां
या प्राप्त करते हैं । यह पुष्कर स्रज अर्थात् पुष्कर की माला वाले हैं, क्योंकि पृथिवी का पुष्कर
अग्नि है और द्यौ का सूर्य ॥१६॥
वह अश्विन ग्रह को इस मन्त्र से लेता है— “या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनूतावती ।
तया यज्ञं मिमिक्षतम्” (यजु० ७।११, ऋ० १।२२।३) — 'हे अश्विन, यह जो तुम्हारी मीठी
और प्रसन्न करनेवाली कशा या वाणी है उससे यज्ञ को मिलाओ ।' "उपयामगृहीतोऽस्यश्विभ्यां
त्वा” (यजु० ७।११) — 'तुझे आश्रय के लिए ग्रहण किया है। दोनों अश्विनों के लिए तुझको ।'
इस मन्त्रांश से उसको रख देता है— “एष ते योनिर्मध्वीभ्यां त्वा” (यजु० ७।११) — 'यह तेरी
योनि है, मधु-प्रियों के लिए तुझे ।' 'मधु' शब्द वाली ऋचा के साथ क्यों उठाता है और 'मधु-
प्रियों के लिए तुझे' ऐसा कहकर क्यों रख देता है ? ॥१७॥
दध्यङ् अथर्वा ने 'मधु-ब्राह्मण' को अश्विनों को बताया था । यह इनका प्रिय धाम है ।
उनके इसी प्रिय से वह उनके पास जाता है। इसलिए मधु शब्द वाली ऋचा से उठाता है और
'मधुप्रियों के लिए तुझको' यह कहकर रखता है ॥१८॥
ये पात्र चिकने होते हैं । इन्द्र और वायु के पात्र के बीच में मेखला होती है । यह
इसका दूसरा रूप है । इसलिए यह दो देवों का होता है। मित्र-वरुण का पात्र बकरी की आकृति
का होता है। यह इसका दूसरा रूप है। इसलिए यह दो देवताओं का है। आश्विनों का ग्रह होंठ
की आकृति का होता है। यह उसका दूसरा रूप है, इसलिए यह दो देवताओं का है। यह पात्र
अश्विनों का इसलिए होता है कि अश्विन यज्ञ का मुख (मुख्य) हैं और मुख में होंठ होते हैं ।
इसलिए आश्विन-ग्रह होंठ की आकृति का होता है ॥१९॥
शुक्रामन्थि ग्रहौ
अध्याय २–ब्राह्मण १
शुक्र और मन्थिन् ग्रह उसकी आँख हैं। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, वह शुक्र है। चूँकि
तपता है इसलिए इसका नाम सूर्य है । चन्द्रमा मन्थी है ॥१॥
उसमें सत्तू मिलाता है। यह जो मथता है इसलिए इसका नाम मन्थी है। ये दोनों सूर्य
और चाँद इन प्रजाओं की आंख हैं, क्योंकि यदि दोनों उदय न हों तो लोगों को अपने दोनों हाथ
भी न दीखें ॥२॥
इनमें एक खानेवाला है और एक खाद्य । शुक्र खानेवाला है और मन्थी खाद्य ॥३॥
एक इनमें से खानेवाले के अनुकूल है, दूसरा खाद्य के—शुक्र खानेवाले के, मन्थिन् खाद्य
के । ये ग्रह एक के लिए जाते हैं और दूसरे के लिए इनकी आहुति दी जाती है । शण्ड और मर्क
दो असुर राक्षस हैं । इनके लिए ग्रह लिये जाते हैं और देवों के लिए इनकी आहुति दी जाती है ।
यह इस प्रकार से—॥४॥

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दे॒वाः । असुर॒रक्ष॒सान्यप॑जघ्निरे तदे॒तावेव न॒ शेकु॒रपह॑न्तुं यद्ध स्म दे॒वाः किं च
कर्म॒ कुर्व॑ते॒ तद्ध॒ स्म मो॒हयि॒त्वा क्षिप्र॒ऽएव पुन॒रप॑द्रवतः ॥५॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः ।
उप॑जानीत यथे॒मावपह॑नामहा॒ऽइति॒ ते होचुर्गृहा॑वे॒वाभ्यां॒ गृहाम॒ ताव॒भ्यवै॑ष्यत-
स्तौ स्वी॒कृत्या॒पह॑निष्यामहा॒ऽइति॒ ताभ्यां॒ ग्रहौ॑ जगृहू॒स्ताव॒भ्यवै॑तां तौ स्वी॒कृत्या॑-
पाघ्नत॒ तस्मा॑च्छण्डा॒मर्का॑भ्या॒मिति॑ गृह्येते दे॒वता॑भ्यो हूयेते ॥६॥ अ॒पि होवाच
याज्ञवल्क्यः । नो स्त्वि॑द्दे॒वता॑भ्य ए॒व गृह्णीयामा३ विजि॑तरूपमिव॒ हीद॒मिति॒ तद्धे
स तन्मीमाꣳसा॑मेव॒ चक्रे नेत्तु चकार ॥७॥ इ॒मामु॒ हैके शुक्रस्य पुरोरुचं कुर्व-
न्ति । अ॒यं वे॒नश्चोद्य॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒मान॒ऽइति॒ तदे॒तस्य रू॒पं
कुर्मो य ए॒ष तप॑तीति॒ यदा॒ह ज्योति॑र्जरा॒युरिति॑ ॥८॥ इमां त्वे॒व शुक्रस्य॑ पुरो॒रुचं
कुर्या॒त् । तं प्र॒त्नथा॒ पूर्व॑था वि॒श्वथे॒मथाᳵ ज्येष्ठता॑तिं बर्हि॒षद॒ꣳ स्व॑र्वि॒दमित्ये॒ता ह्ये॑-
तम॒न्वत्ता हि ज्येष्ठस्तस्मादाह॒ ज्येष्ठता॑तिं बर्हि॒षद॒ꣳ स्व॑र्विदम् प्रती॒चीनं॑ वृज॒नं
दोहसे धुनि॒माशुं जय॑न्त॒मनु॒ यासु॒ वर्ध॑से । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ शण्डा॑य त्वै॒ष ते॒
योनि॑र्वी॒रतां पा॒हीति॑ सादयत्ये॒ता ह्ये॑तम॒न्वत्ता हि वी॒रस्तस्मा॒दाहै॒ष ते॒ योनि॑-
र्वी॒रतां पा॒हीति॒ दक्षि॑णार्धे सादयत्ये॒ताꣳ ह्ये॑ष दि॒शम॑नु॒ संचर॑ति ॥९॥ अथ म-
न्थि॒नं गृह्णा॑ति । अ॒यं वे॒नश्चोद॑य॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒माने॑ । इ॒मम॒-
पाꣳ स॑ङ्ग॒मे सूर्य॑स्य॒ शिशुं न विप्रा॑ म॒तिभी रिहन्ति । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि म॒र्काय॑
त्वेति॑ ॥१०॥ तꣳ स॒क्तुभिः॑ श्रीणाति । तद्यत्स॒क्तुभिः॑ श्रीणा॒ति वरु॑णो ह॒ वै सो-
मस्य॒ राज्ञो॒ऽभीवा॒द्धि प्र॑तिपि॒पेष॒ तद॒श्वय॑त्ततो॒ऽश्वः॒ सम॑भवत्तद्य॒ङ्कूय॒यात्स॒मभ॑वत्त-
स्मादश्वो॒ नाम॒ तस्या॒श्रु प्रास्क॑न्दत्ततो॒ यवः॒ सम॑भवत्तस्मादाहु॒र्वारु॒ण्यो॒ यव॒ इति॑
तद्यद्दे॒वाःस्यात्र॑ चक्षुषो॒ऽमीयत॒ तेनै॒वैनमेतत्सम॑र्धयति कृ॒त्स्नं क॑रोति॒ तस्मात्स॒क्तु-
भिः॑ श्रीणाति ॥११॥ स॒ श्री॑णाति । मनो॒ न येषु॒ हव॑नेषु ति॒ग्मं विपः॒ शच्या॑
वनुथो द्र॒वता॑ । आ यः शर्या॑भिस्तुविनृ॒म्णोऽअ॒स्याश्रीणीता॒दिशं॒ गभ॑स्तावे॒ष ते॒

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का० ४, अ० २, ब्रा० १, क० ५-१२ शतपथब्राह्मण / ५५१
जब देवों ने असुर राक्षसों को मार भगा दिया तो वे इन दोनों को न भगा सके। देवता
जो कुछ करते, ये दोनों उनमें विघ्न डालते और फिर झट से भाग जाते ॥५॥
तब देवों ने कहा-‘क्या तुम कोई उपाय कर सकते हो कि इन दोनों को भगा सकें?’ वे
कहने लगे-‘इन दोनों के लिए दो ग्रह लें। वे इन दोनों को लेने के लिए आवेंगे। हम इनको
पकड़कर मार भगायेंगे।’ उन दोनों के लिए ग्रह लिये और जब वे आये तो उनको पकड़कर मार
भगाया। इसलिए षण्ड और मर्क के लिए ये दो ग्रह लिये जाते हैं और देवताओं के लिए इनकी
आहुति दी जाती है ॥६॥
याज्ञवल्क्य ने यह भी कहा है कि हम इनको देवताओं के लिए ही क्यों न न लें। यह तो
जीत का चिह्न है। परन्तु उन्होंने इतनी मीमांसा मात्र की है। व्यवहार में इसको कभी नहीं
लाये ॥७॥
कुछ लोग इस ऋचा को शुक्र की पुरोरुक् या स्तुति में लाते हैं, “अयं वेनश्चोदयत् पृश्नि-
गर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने” (यजु० ७।१६)—यहाँ ‘ज्योतिर्जरायुः’ (प्रकाश है जरायु
जिसका) कहा, इससे तात्पर्य यह है कि वह इसको तपनेवाले सूर्य के समान करता है ॥८॥
परन्तु शुक्र की पुरोरुक् या स्तुति इस मन्त्र से होनी चाहिए, “तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्व-
थेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषद॑ स्व॒र्विदम्” (यजु० ७।१२, ऋ० ५।४४।१)—“पुरानी रीति से,
पहली रीति से, सब रीति से, आजकल की रीति से बड़े, यज्ञधारी, स्वर्ग विद्या के जाननेवाले
यजमान को।” यह शुक्र खानेवाला है, और खानेवाला ही बड़ा है। इसलिए कहा कि ‘बड़े, यज्ञ-
धारी, स्वर्ग विद्या के जाननेवाले को’। “प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे।
उपयामगृहीतोऽसि षण्डाय त्वैष ते योनिर्वीरतां पाहि” (यजु० ७।१२)—“जो उपस्थित है,
बलवान् है, शत्रुओं को जीतनेवाला और शीघ्रगामी है, ऐसे यजमान को तू दुहता है उन यज्ञ-
क्रियाओं में जिनमें तू बढ़ता है। तुझे रक्षा के लिए ग्रहण किया गया है। षण्ड के लिए तुझे। यह
तेरी योनि है। तू वीरता की रक्षा कर।” यह पढ़कर वह रख देता है। यह खानेवाला है। खाने-
वाला वीर होता है। इसलिए कहा कि ‘यह तेरी योनि है, तू वीरता की रक्षा कर।’ दक्षिण के
कोने में इसको रखता है, क्योंकि इसी दिशा में सूर्य चलता है ॥६॥
अब इस मन्त्र से मन्थी को लेता है, “अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो
विमाने। इममपा॑७ संगमे सूर्यस्य, शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति। उपयामगृहीतोऽसि मर्काय
त्वा” (यजु० ७।१६)—“यह वेनः (चन्द्र) पृश्निगर्भा (द्यौलोक या सूर्य के सहारे स्थित) ज्योतिर्ज-
रायु (ज्योति से लिपटा हुआ), (विमाने) अन्तरिक्ष में (रजसः) जलों को (चोदयत्) प्रेरणा
करता है। विद्वान् लोग शिशु के समान इसकी सूर्य के जलों के साथ संगम के समय में बुद्धियुक्त
वाणियों से स्तुति करते हैं। रक्षार्थ लिया. गया है। मर्क के लिए तुझको” ॥१०॥
उसमें सत्तू मिलाता है। सत्तू इसलिए मिलाता है कि वरुण ने सोम राजा की आँख में
मारा और वह सूज गई (अश्वयत्)। उसमें से अश्व (घोड़ा) निकला। चूंकि यह सूजन में से
निकला इसलिए इसका ‘अश्व’ नाम पड़ा। उसका एक आँसू गिरा। उसमें से जौ उत्पन्न हुए।
इसलिए जौ (वरुण) वरुण का समझा जाता है। इस प्रकार आँख का जितना भाग उस समय
दुख गया था उसी की पूर्ति करता है। उसे चंगा करता है। इसलिए सत्तूओं को मिलाता है ॥११॥
वह इस मन्त्र से मिलाता है, “मनो न येषु हवनेषु तिग्मं विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता। आ
यः शर्याभिस्तु विन्दुमणो ऽ अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तौ” (यजु० ७।१७, ऋ० १।६१।३) “जिन

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योनि॒: प्र॒जाः पा॒हीति॑ सादयत्या॒व्यो ह्ये॑त॒मन्वा॒द्या ह्यी॒माः प्र॒जा विश॒स्तस्मा॑दाहै॒ष
ते योनि॒: प्र॒जाः पा॒हीति॑ ॥ १२॥ द्वौ प्रोक्षि॑तौ यूपशकलौ भवतः । द्वावप्रोक्षितौ
प्रोक्षि॑तं चै॒वाध्व॒र्युराद॒त्तेऽप्रोक्षि॑तं चै॒वमे॒व प्र॑तिप्रस्था॒ता प्रोक्षि॑तं चै॒वाद॒त्तेऽप्रोक्षि॑तं
च शुक्रमै॒वाध्व॒र्युराद॒त्ते म॒न्थिनं॑ प्रतिप्रस्था॒ता ॥ १३॥ सोऽध्व॒र्युः। अप्रॊक्षितेन यूप-
शकलेनापमार्ष्ट्यपमृष्टः शण्ड इत्येवमेव प्रतिप्रस्थातापमृष्टो मर्क इति तदाददा-
नावेवासुररक्षसेऽपघ्नतो देवास्त्वा शुक्रपाः प्रणयन्त्वित्येवाध्वर्युर्निष्क्रामति देवा-
स्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्त्विति प्रतिप्रस्थाता तदेतौ देवताभ्य एव प्रणयतः ॥ १४॥
तौ जघनेनाहवनीयमरत्नी संधत्तः । तावुत्तरवेदी सादयतो दक्षिणायामेव श्रो-
णावध्वर्युः सादयत्युत्तरायां प्रतिप्रस्थाताननुसृजन्तावेवानाधृष्टासीति तद्रक्षोभिरेवै-
तदुत्तरवेदिमनाधृष्टां कुरुतो विपर्येष्यन्तौ वाऽएतावग्निं भवतोऽत्येष्यन्तौ तस्मा
ऽएवैतन्निह्नुवाते तथो हैनौ विपरीयन्तावग्निर्न हिनस्ति ॥ १५॥ सोऽध्वर्युः पर्यै-
ति । सुवीरो वीरान्प्रजनयन्यरीहीत्येता ह्येतमन्वक्ता हि वीरस्तस्मादाह सुवीरो
वीरान्प्रजनयन्यरीहीत्यभि रायस्पोषेण यजमानमिति तद्यजमानायाशिषमाशास्ते
यदाहाभि रायस्पोषेण यजमानमिति ॥ १६॥ अथ प्रतिप्रस्थाता पर्यैति । सुप्रजाः
प्रजाः प्रजनयन्यरीहीत्याव्यो ह्येतमन्वाद्या ह्यीमाः प्रजा विशस्तस्मादाह सुप्रजाः
प्रजाः प्रजनयन्यरीहीत्यभि रायस्पोषेण यजमानमिति तद्यजमानायाशिषमाशास्ते
यदाहाभि रायस्पोषेण यजमानमिति ॥ १७॥ तावपिधाय निष्क्रामतः । तिर ऽ
वैनावितत्कुरुतस्तस्मादिमौ सूर्याचन्द्रमसौ प्राञ्चौ यन्तौ न कश्चन पश्यति तौ पु-
रस्तात्परीत्यापोर्णुतः पुरस्तात्तिष्ठन्तौ जुहुत आविरेवैनावितत्कुरुतस्तस्मादिमौ सू-
र्याचन्द्रमसौ प्रत्यञ्चौ यन्तौ सर्व एव पश्यति तस्मात्पराचेतः सिच्यमानं न कश्चन
पश्यति तदु पश्चात्प्रजायमान सर्व एव पश्यति ॥ १८॥ तौ जघनेन यूपमरत्नी
संधत्तः । यद्य॒ग्नि॒र्नाद्रि॑येत यद्यु॑ऽअ॒ग्नि॒रुद्रि॑येतोपा॒य्ये॑नैव यूप॑मर॒त्नी संद॑ध्याताꣳ संज्ञ-

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का० ४, अ० २, ब्रा० १, कं० १२-१६ शतपथब्राह्मण / ५५३
हवनों में विचार के समान तेज तुम दोनों अध्वर्यु कर्म के द्वारा जाते हो। जिस बहुत धनवाले
अध्वर्यु ने अंगुलियों से हाथ में लिये हुए (मन्थि में) सत्तू मिलाये हैं।" इस मन्त्र से रख देता है,
“एष ते योनिः प्रजाः पाहि” (यजु० ७।१७) - "यह तेरी योनि है। प्रजा को पाल।" यह ग्रह
खाद्य है। यह प्रजा भी खाद्य है। इसलिए कहा कि यह योनि है, तू प्रजा को पाल ॥१२॥
यूप के दो टुकड़े प्रोक्षित (जल छिड़के) होते हैं और दो अप्रोक्षित (बिना जल के
छिड़के)। अध्वर्यु एक प्रोक्षित और एक अप्रोक्षित लेता है। इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता भी एक
प्रोक्षित और अप्रोक्षित लेता है। अध्वर्यु शुक्र को लेता है और प्रतिप्रस्थाता मन्थि को ॥१३॥
अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दोनों राक्षसों को इस प्रकार निकालते हैं कि अध्वर्यु अप्रोक्षित
यूप-शकल से उस ग्रह को मांजता है और कहता है 'अपमृष्टः शंडः' (शंड भगा दिया गया) और
इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता कहता है 'अर्क भगा दिया गया'। अध्वर्यु यह कहकर बाहर जाता है,
“देवास्त्वा शुक्रपाः प्रणयन्तु"- "शुक्र पीनेवाले देव तुझे ले जावें।" प्रतिप्रस्थाता यह कहकर बाहर
जाता है, “देवास्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्तु"- "मन्थि पीनेवाले देव तुझे ले जावें।" इस प्रकार ये
दोनों देवताओं के निमित्त हवियों को ले जाते हैं ॥१४॥
वे दोनों आहवनीय के पीछे उत्तर वेदी पर (दाहिनी हाथ की) कुहनी मिलाकर उन
ग्रहों को रखते हैं। दक्षिण श्रोणी में अध्वर्यु रखता है और उत्तर में प्रतिप्रस्थाता बिना छोड़े
हुए, यह कहकर, “अनाधृष्टाऽसि" (यजु० ७।१७) - "तू आक्रमण से सुरक्षित है।" इस प्रकार
ये दोनों वेदी को राक्षसों से सुरक्षित करते हैं। ये अग्नि की परिक्रमा करनेवाले हैं। इसलिये
इनको प्रसन्न करता है। इस प्रकार जब वे परिक्रमा करते हैं तो अग्नि इनको नहीं
सताती ॥१५॥
अध्वर्यु इस मंत्र से परिक्रमा करता है, "सुवीरो वीरान् प्रजनयन्" (यजु० ७।१३)—
"वीर वीरों को उत्पन्न करता हुआ।" यह हवि खानेवाले की स्थानी है और खाने वाला वीर
है। इसलिए कहा कि वीरों को उत्पन्न करता हुआ। "परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्” (यजु०
७।१३)-"यजमान को धन से युक्त कर।" यह जो कहा कि यजमान को धन से युक्त कर,
इससे यजमान को आशीर्वाद देता है ॥१६॥
प्रतिप्रस्थाता इस मन्त्र से परिक्रमा करता है, "सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन्” (यजु०
७।१८) - "अच्छी प्रजावाले, प्रजाओं को उत्पन्न करते हुए।" यह हवि खाद्य का स्थानी है, और
ये प्रजा के लोग खाद्य हैं। इसलिए कहा कि प्रजा को उत्पन्न करते हुए। "परीह्यभि रायस्पोषेण
यजमानम्" (यजु० ७।१८)- "यजमान को धन से युक्त कर।" यह जो कहा कि यजमान को
धन से युक्त कर, इससे यजमान को आशीर्वाद देता है ॥१७॥
वे दोनों ग्रहों को (हाथ से) ढककर ले जाते हैं। वह इनको छिपा लेता है। इसीलिए
जब सूर्य और चन्द्र आगे की ओर चले जाते हैं तो छिप जाते हैं। (यूप के) सामने जाकर वे
(ग्रहों को) खोल देते हैं और सम्मुख खड़े होकर आहुति देते हैं। इससे वे उनको 'दृष्ट' बनाते
हैं। इसीलिए जब सूर्य और चन्द्र पीछे लौटते हैं तो उसको सब कोई देखता है। इसीलिए जब
वीर्य सींचा जाता है तो कोई नहीं दिखता, परन्तु जब उत्पत्ति होती है तो सब देखते हैं ॥१८॥
वे यूप के पीछे अपनी कुहनियां रखते हैं कि कहीं आग भड़क न उठे। लेकिन अगर आग
भड़क उठे तो यूप के सामने कुहनी कर लें— अध्वर्यु इस मन्त्र से, "संजग्मानो दिवा पृथिव्या

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५५४ शतपथ ब्राह्मण
ग्म॒ानो दि॒वा पृ॑थि॒व्या शु॒क्रः शु॒क्रशो॑चिषे॒त्येवा॑ध्व॒र्युः सं॒ग्मानो॑ दि॒वा पृ॑थि॒व्या म-
न्थी म॑न्थि॒शोचि॑षेति प्रतिप्रस्थाता॒ चक्षु॑षोरे॒वैत॒दाऽऽर॑मणे कुरुतश्चक्षुषी॒ऽएवैत-
त्संधत्त॒स्तस्मा॑दि॒मे॒ऽअभितो॒ऽस्थिनी॒ चक्षु॑षी स॒ꣳहि॑ते ॥१९॥ सोऽध्व॒र्युः । अ॒प्रोक्षि॑तं
यूपशकलं॒ निर॑स्यति॒ निर॑स्तः॒ शण्ड॒ इत्ये॒वमे॒व प्रतिप्रस्थाता॒ निर॑स्तो॒ मर्क॒ इति॑
तत्पु॒राहु॑तिभ्यो॒ऽसुर॑रक्ष॒से॒ऽअप॑हतः ॥ २०॥ अथा॑ध्व॒र्युः । प्रोक्षि॑तं यूपशकल॒माहव॑-
नी॒ये प्रास्य॑ति शु॒क्रस्या॑धिष्ठानमसी॒त्येव॑मे॒व प्रतिप्रस्थाता॒ मन्थि॒नो॒ऽधिष्ठानमसीति॑
चक्षु॑षोरे॒वैते॒ समि॑धौ चक्षुषी॒ऽएवैतत्स॑मिन्धे॒ तस्मा॑दि॒मे समि॑द्धे चक्षु॑षी ॥२१॥ त-
त्र॒ जपति॑ । अ॒हिन्र॑स्य ते देव सोम सुवीर्य॑स्य रायस्पोष॑स्य ददि॒तारः स्यामेत्या॒शी-
रे॒वैषा॑तस्य॒ कर्म॑ण आ॒शिष॑मे॒वैतदाशा॑स्ते ॥ २२॥ अथा॑श्रा॒व्याह॑ । प्रातः-प्रातः स-
व॒स्य शु॒क्रव॑तो मधुश्चुत॒ इन्द्रा॑य सोमा॒न्प्रस्थि॑तान्प्रे॒ष्येति॒ वष॑ट्कृते॒ऽध्व॒र्युर्जु॑होति त-
दनु॑ प्रतिप्रस्थाता॒ तद॑नु चमसाध्व॒र्यवः॑ ॥ २३॥ तौ वै पु॒रस्ता॑त्ति॒ष्ठन्तौ॑ जुहुतः । च-
क्षुषी॒ वा॒ऽए॒तौ तत्पु॒रस्ता॑दे॒वैतच्चक्षु॑षी धत्त॒स्तस्मा॑दि॒मे पु॒रस्ता॑च्चक्षु॑षी ॥ २४॥ अ॒-
भितो॒ यूपं॒ तिष्ठ॑न्तौ जुहुतः । य॒था वै ना॑सि॒कैवं यूप॒स्तस्मा॑दि॒मे॒ऽअभितो॒ नासि॑कां
चक्षु॑षी ॥ २५॥ तौ वै॒ वष॑ट्कृतौ सन्तौ म॒लेन॑ हूयेते । ए॒तेनो॒ हैतौ तद्य॑द॒क्षुवा॑ते
य॑दे॒नौ सर्वꣳ॒ सव॑नम॒नुहूयेते॒ यद्धैवैतौ॒ सर्वꣳ॒ सव॑नम॒नुहूयेते॒ऽए॒तौ वै प्र॒जाप॑तेः
प्रत्य॑क्षतमां॒ चक्षु॑षी ह्ये॒तौ स॒त्यं वै चक्षुः॑ स॒त्यꣳ हि प्र॒जाप॑ति॒स्तस्मा॑दे॒नौ सर्वꣳ॒
सव॑नम॒नुहूयेते ॥ २६॥ स जु॑होति । सा प्र॑थ॒मा सं॑स्कृ॒तिर्विश्व॑वारा॒ स प्र॑थ॒मो व-
रु॑णो मि॒त्रोऽअ॒ग्निः । स प्र॑थ॒मो बृह॒स्पति॑श्चिकि॒त्वाꣳस्तस्मा॒ऽइन्द्रा॑य सु॒तमाजु॑होत
स्वाहेति॑ ॥ २७॥ स यज्जुहो॑ति । सा प्र॑थ॒मा स प्र॑थम॒ इति॑ शश्व॒द्व वै रेत॑सः सि-
क्तस्य॒ चक्षु॑षी॒ऽएव प्रथ॑मे॒ सम्भव॑तस्त॒स्माज्जुहो॑ति सा प्र॑थ॒मा स प्र॑थम॒ इति॑ ॥ २८॥
अथ॒ सम्प्रेष्य॑ति । प्रेतु॒ होतु॑श्चम॒सः प्र ब्रह्म॑णः॒ प्रोद्गातॄणां॒ प्र यज॑मानस्य॒ प्रय॑न्तु
सद॒स्यानाꣳ॑ होत्रा॒णां च॑मसाध्वर्यव॒ उपाव॑र्तध्वꣳ शु॒क्रस्याभ्यु॑न्नयध्व॒मिति॒ सम्प्रेष॑ ऽए॒वैष

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कां० ४, अ० २, ब्रा० १, कं० १६-२६ शतपथब्राह्मण / ५५५
शुक्रः शुक्रशोचिषा" (यजु० ७।१३)-"शुक्र प्रकाशस्वरूप द्यौ और पृथिवी के साथ संयुक्त
होकर।" और प्रतिप्रस्थाता इस मन्त्र से, "संजग्मानो दिवा पृथिव्या मन्थी मन्थिशोचिषा"
(यजु० ७।१८)-"मन्थी मन्थी के समान दीप्तिवाले द्यौ और पृथिवी के साथ संयुक्त
होकर।" इस प्रकार ये इन ग्रहों को आँखों के ठहरने का स्थान बनाते हैं। इनको आँखों के
समान पास-पास जोड़कर रखते हैं। इसीलिए आँखें पास-पास हड्डियों द्वारा मिली होती
हैं ॥१९॥
अध्वर्यु अप्रोक्षित यूप-शकल को यह कहकर फेंक देता है, "निरस्तः षण्डः" (यजु०
७।१३)-"षण्ड भगा दिया गया।" प्रतिप्रस्थाता यह कहकर फेंकता है, "निरस्तो मर्कः"
(यजु० ७।१८)-"मर्क भगा दिया गया।" इस प्रकार आहुतियों के पहले इन दोनों राक्षसों को
भगा देते हैं ॥२०॥
अध्वर्यु प्रोक्षित यूप-शकल को यह कहकर आहवनीय अग्नि में छोड़ता है, "शुक्र-
स्याधिष्ठानमसि" (यजु० ७।१३)-"तू शुक्र का अधिष्ठान है।" इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता यह
कहकर "मन्थिनोऽधिष्ठानमसि" (यजु० ७।१८)-"मन्थि का अधिष्ठान है तू।" ये दोनों
को प्रकाश देनेवाले हैं। इससे वह आँखों को प्रकाश देता है। इसीलिए आँखों में प्रकाश
है॥२१॥
अब जाप करता है, "अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम"
(यजु० ७।१४) - "हे सोम देव, तेरे न नष्ट होनेवाले, वीर्यवान् धन के हम दाता होवें।" इस
कर्म का यह आशीर्वाद है। इस आशीर्वाद को देता है ॥२२॥
श्रौषट् कहकर कहता है-- 'प्रातःसवन के चमकीले, मीठे सोमोँ को इन्द्र के लिए प्रेरित
करो।' वषट्कार होने पर अध्वर्यु आहुति देता है। उसके पीछे चमसाध्वर्यु ॥२३॥
ये आगे खड़े होकर आहुति देते हैं। ये दोनों आहुतियाँ यज्ञ की आँखें हैं। इस प्रकार
आँखों को आगे रखता है। इसीलिए तो आँखें आगे होती हैं ॥२४॥
ये यूप के दोनों ओर खड़े होकर आहुति देते हैं। यूप नासिका के समान है। नासिका के
दोनों ओर आँखें होती हैं ॥२५॥
वषट्कार कहकर ये दोनों आहुतियाँ मन्त्र पढ़कर दी जाती हैं। इनमें यह विशेषता है कि
इनके पश्चात् पूरे सवन की आहुतियाँ दी जाती हैं। इनके पीछे पूरे सवन की आहुतियाँ इसलिए
दी जाती हैं कि ये आहुतियाँ प्रजापति की प्रत्यक्षतम आँखें हैं। सत्य चक्षु है, सत्य प्रजापति है।
इसलिए इनके पीछे पूरे सवन की आहुतियाँ दी जाती हैं ॥२६॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है, "सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो मित्रो
ऽअग्निः ॥ स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वाँस्तस्मा ऽ इन्द्राय सुतमाजुहोत स्वाहा" (यजु० ७।१४,
१५) - "सबके ग्रहण करने योग्य यह पहली संस्कृति है। वह पहला वरुण, मित्र और अग्नि है।
वह पहला चेतनावा बृहस्पति है। उस इन्द्र के लिए निचोड़े हुए सोम की आहुति दो" ॥२७॥
'सा प्रथमा, स प्रथमः' यह कहकर वह जो आहुति देता है वह सदा सींचे हुए वीर्य के
समान है। आँखें पहले होती हैं इसलिए वह 'सा प्रथमा, स प्रथमः' ऐसा कहकर आहुति देता
है ॥२८॥
अब वह आदेश देता है, 'होता का चमसा आवे, ब्राह्मण का, उद्गाता का, यजमान
का, सदस्यों के, होताओं के, अध्वर्युओं के। इन चमसों को शुद्ध सोमरस से भरो।' यह सब

अध्याय-२, ब्राह्मण-२

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५५६ शतपथ ब्राह्मण
पर्येत्य प्रतिप्रस्थातार्धयोः पात्रे सꣳस्रवमवनयत्यच्छ॑ण्वैतद॒ाद्यं बलिं॑ हारयति
त॒मध्व॑र्यु॒र्होतृ॑चमसे॒ऽवनयति भक्षा॑य वषट्कर्तुर्हि भक्षः॑ प्रा॒णो वै वषट्का॒रः सो॒ऽस्मा-
दे॒तद्वषट्कुर्वतः परा॒डिवाभूत्प्रा॒णो वै भ॒क्षस्तत्प्रा॒णं पुनरा॒त्मन्ध॑त्ते ॥ २९॥ अथ॑
य॒देते प्रतीची॒ पात्रे न हर॑न्ति । हर॒न्त्यन्या॒न्यक्षांश्च॒नूषी ह्येते सꣳस्रव॑मेव॒ होतृ॑-
चमसे॒ऽवनयति ॥३०॥ अथ॑ हो॒त्राणां॑ चम॒सान॒भ्युन्न॑यन्ति । हुतोच्छिष्टा वा॒ऽएते
सꣳस्रवा भवन्ति नालमाहु॑त्ये तान्निवे॑तत्पुनरा॒प्याय॑यन्ति तथालमाहु॑त्ये भवन्ति
तस्मा॒द्धोत्राणां॑ चम॒सान॒भ्युन्न॑यन्ति ॥३१॥ अथ॑ हो॒त्राः संया॑जयन्ति । होत्रा॑ ह॒ वै॒
युक्ता दे॒वेभ्यो य॒ज्ञं वह॑न्ति ता॒ एवैतत्सं॑तर्पयन्ति तृप्ताः॑ प्रीता॒ दे॒वेभ्यो य॒ज्ञं वहा॒-
निति तस्मा॒द्धोत्राः॑ संया॑जयन्ति ॥ ३२॥ स प्रथ॒मायां वा हो॒त्रायाम् । इ॒ष्टाया॑मुत्त॒-
मायां वानुमन्त्रयते तृप्य॑न्तु होत्रा॒ मधो॒ याः स्वि॑ष्टा याः सु॒प्रीताः॑ सु॒हुता यत्स्वा-
हेति॑ हो॒त्राणामे॒वैषा तृप्ति॑रे॒त्य प्रत्यङ्ङुपवि॑शत्य॒याड्ग्नीदित्य॒ग्नीध्रा॒त्र य॒ज्ञतामुत्त॒-
मः सं॒यज॑ति तस्मा॒दाहा॒याड्ग्नीदिति॑ ॥ ३३॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [२. १.] ॥ प्रथमः प्रपा-
ठकः ॥ कण्डिकासंख्या १३६ ॥ ॥
आ॒त्मा ह वा॒ऽआग्रयणः॑ । सो॒ऽस्यैष सर्व॑मेव॒ सर्व॒ꣳ ह्ययमात्मा तस्मा॒दन॑-
या गृ॒ह्लात्यस्यै॒ हि स्थाली भव॑ति स्थाल्या ह्ये॑नं गृह्णाति॒ सर्वं वा॒ऽइयꣳ सर्व॑मेष
ग्र॒हस्तस्मा॒दन॑या गृह्णाति ॥ १॥ पूर्णं गृ॒ह्लाति । सर्वं वै पूर्ण॒ꣳ सर्व॑मेष ग्र॒हस्त-
स्मात्पूर्णं गृह्णाति ॥२॥ विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यो॑ गृह्णाति । सर्वं वै विश्वे॑ दे॒वाः सर्व॑मे-
ष ग्र॒हस्तस्माद्विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यो गृह्णाति ॥ ३॥ सर्वे॑षु सव॒नेषु॑ गृह्णाति । सर्वं वै
सव॒नानि सर्व॑मेष ग्र॒हस्तस्मा॒त्सर्वे॑षु सव॒नेषु गृह्णाति ॥४॥ स यदि॒ रात्रोप॑द॒स्येत् ।
तमत एव तन्वीरंस्ततः प्रभावयेयुरात्मा वाऽआग्रयण आत्मा॑नं वा॒ऽइमानि स-
र्वा॒ण्यङ्गानि प्रभवन्त्येतस्मा॒त्तत्तो हारियोज॒नं ग्र॒हं गृह्णाति॒ तदा॒त्मन्ये॒वास्यां प्रति-
ष्ठायामन्त॒तो य॒ज्ञः प्रति॑तिष्ठति ॥५॥ अथ॒ यस्मा॑दाग्रय॒णो नाम॑ । यां वा॒ऽअमूं प्रा-

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कां० ४, अ० २, ब्रा० १-२, क० २६-३३ व १-६ शतपथब्राह्मण / ५५७
मिला-जुला आदेश है। प्रतिप्रस्थाता घूमकर अध्वर्युओं के पात्र में बचा-खुचा सोम डाल देता है।
मानो खानेवाले के लिए खाद्यपदार्थ में से बलि दिलवाता है। अध्वर्यु उसको होता के चमसे में
डाल देता है पीने के लिए। वषट्कार पढ़नेवाले का यह भक्ष्य है। वषट्कार-प्राण है। यह प्राण
वषट् करने के समय निकल-सा गया। प्राण भक्ष है, अर्थात् प्राण को फिर उसमें धारण करता
है ॥२६॥
इन पात्रों को वे पीछे क्यों नहीं ले जाते और दूसरे ग्रहों को क्यों पीछे ले जाते हैं ? इस-
लिए कि ये दोनों आँखें हैं। वह बचे-खुचे को होता के चमसे में डाल देता है ॥३०॥
अब होताओं के चमसों को भरते हैं। ये बचे-खुचे भाग जो आहुतियों के अवशिष्ट हैं
आहुतियों के लिए काफी नहीं हैं। इनको भर देता है तो ये आहुतियों के लिए काफी हो जाते हैं,
इसलिए वह होताओं के चमसों को भर देता है ॥३१॥
अब होता लोग मिलकर ही देवों के लिए यज्ञ को ले जाते हैं। इन सबको वह एक साथ
सन्तुष्ट करता है कि तृप्त होकर वे देवों के लिए यज्ञ को ले जावें। इसलिए होता लोग एक-साथ
आहुति देते हैं ॥३२॥
पहले या पिछले होता की आहुति हो चुकने पर उनसे वह कहता है, "तृम्पन्तु होत्रा
मध्वो याः स्विष्टा याः सुप्रीताः सुहुता यत्स्वाहा" (यजु० ७।१५)—"मीठे सोम को पीनेवाले,
भलीभांति प्रसन्न होनेवाले होता लोग सन्तुष्ट होवें।" यह होताओं की सन्तुष्टि है। अब वह
आता है और पश्चिमाभिमुख बैठ जाता है। "याऽग्नीत्" (यजु० ७।१५)—"अग्नीध्र ने आहुति
दी।" अग्नीध्र सबसे पीछे आहुति देता है। इसलिए कहा, 'याड् अग्नीत्' अर्थात् अग्नीध्र ने
आहुति दी ॥३३॥
आग्रयणग्रहः
अध्याय २—ब्राह्मण २
आग्रयण ग्रह इसका आत्मा है। इस प्रकार यह उसका सर्वस्व है। आत्मा सर्वस्व होता
है। इसलिए वह इस (पृथिवी) के द्वारा लेता है। स्थाली इसी (मिट्टी) की होती है। स्थाली में ही
इस आहुति को निकालता है। यह पृथिवी सब-कुछ है, इसलिए यह ग्रह सब-कुछ है। इसलिए
वह इसको इस पृथिवी के द्वारा लेता है ॥१॥
वह इसको पूरा भरकर लेता है। पूर्ण का अर्थ है सब। यह ग्रह 'सब' है। इसलिए पूरा
भरता है ॥२॥
विश्वेदेवों के लिए लेता है। 'विश्वेदेवा' सब हैं। यह ग्रह भी सब है। इसलिए सब देवों
के लिए ग्रहण करता है ॥३॥
सब सवनों में लेता है। सवन 'सब' हैं। यह ग्रह भी 'सब' है। इसलिए सब सवनों में
लेता है ॥४॥
यदि सोम राजा चुक जावे, तो उसे इसी ग्रह में से भर देते हैं। इसी में से निकालते हैं।
यह आग्रायण ग्रह आत्मा (शरीर) है। आत्मा (शरीर) से ही वे सब अंग निकलते हैं। इस-
लिए अन्त में हारियोजन ग्रह को लेते हैं। इस प्रकार अन्त में यज्ञ इसी प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित हो
जाता है ॥५॥
इसका आग्रयण नाम यों पड़ा। यह जो पत्थर (सोम निचोड़ने का) को लेते समय मौन

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वाणामादानो वाचं प्र॒हृत्य॒त्र वै स॒ग्निऽव॑दत्त॒द्यत्स॒ात्राग्ने॒ऽवद॒त्तस्मा॑दाग्रयणो नाम
॥ ६॥ रक्षोभ्यो वै तां भीषा वाचमयछन्। षडाऽऋत॒वः प्राचो ग्रहान्गृह्णात्यैष
सप्तमः षडाऽऋत॒वः संवत्सरस्य सर्वं वै संवत्स॒रः ॥ ७॥ तां देवाः। सर्वस्मि-
न्विजितेऽभयेऽनाष्ट्रेऽत्राये वाचमव॑दंस्तथोऽए॒वैष एताꣳ सर्वस्मिन्विजितेऽभयेऽना-
ष्ट्रेऽत्रये वाचं वदति ॥ ८॥ अथातो गृह्णात्येव। ये दे॒वासो॑ दि॒व्येका॑दश स्थ पृ-
थिव्याम॒ध्येका॑दश स्थ। अप्सुक्षितो महि॒नैका॑दश स्थ ते दे॒वासो॑ य॒ज्ञमि॒मं जु॑षध्वम्
। उपयामगृहीतोऽस्याग्रयणोऽसि स्वाग्रयण इति वाचमेवैत॒द्यतातयाम्नीं करोति
तस्मादनया समानꣳ सद्विपर्यासं वदत्यनामितायै जामि न कुर्याद्यदाग्रयणो॒ऽस्याग्र॒-
यणो॒ऽसीति॑ गृह्णीयात्तस्मादाग्रय॒णोऽसि॑ स्वाग्रय॒ण इति॑ ॥ ९॥ पाहि॒ यज्ञं॑ पाहि॒
यज्ञप॑तिमिति। वाचमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ गोपाय॒ यज्ञ॒मिति॒ पाहि॒ यज्ञप॑तिमिति वा-
चमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ गोपाय॒ यज॑मानमिति॒ यज॑मानो हि॒ यज्ञप॑तिर्विष्णु॑स्त्वामिन्द्रियेण
पातु॒ विष्णुं॒ त्वं पा॒हीति॑ वाचमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ यज्ञो वै विष्णु॑र्य॒ज्ञस्त्वां वी॒र्ये॑ण गो-
पाया॒त्विति॒ विष्णुं॒ त्वं पा॒हीति॑ वाचमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ यज्ञं॒ त्वं गो॑पायेत्य॒भि सव॑नां-
नि पा॒हीति॒ तदे॒तं गृ॑ह्णाह॒ सर्वा॑णि ह्ये॒ष सव॑नानि॒ प्रति॑ ॥ १०॥ अथ दशापवि-
त्रमुपगृह्य हिङ्करोति। सा हैषा वागनुद्यमाना तताम तस्यां देवा वाचि तान्ता-
याꣳ हिङ्कारेणैव प्राणमदधुः प्राणो वै हिङ्कारः प्राणो हि वै हिङ्कारस्तस्मादपि-
गृह्य नासिके न हिङ्कर्तुꣳ शक्नोति सैतेन प्राणेन संजानीते यदा वै तान्तः प्राणं
लभतेऽथ स संजानीते तथोऽए॒वैष एतद्वाचि तान्तायांꣳ हिङ्कारेणैव प्राणं दधा-
ति सैतेन प्राणेन संजानीते त्रिष्कृत्वो हिङ्करोति त्रिवृद्धि यज्ञः ॥ ११॥ अथाह
सोमः॑ पवत॒ऽइति॑। स यामेवामूं भीषामसुररक्षसेभ्यो न निरब्रूवंस्तामेवैतत्सर्व-
स्मिन्विजितेऽभयेऽनाष्ट्रेऽत्र निराह तामाविष्करोति तस्मादाह सोमः॑ पवत॒ऽइति॑
॥ १२॥ अस्मै॒ ब्रह्म॑णेऽस्मै॒ क्ष॒त्रायेति॑। तद्ब्रह्म॑णे च क्ष॒त्राय॑ चाहास्मै॒ सुन्व॒ते

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का० ४, अ० २, ब्रा० २, कं० ६-१३ शतपथब्राह्मण / ५५६
धारण किया था, इसके बाद अभी मुंह खोला गया। और चूंकि सबसे आगे वचन बोला, इसलिए
आग्रयण नाम हुआ ॥६॥
राक्षसों के डर से मौन साधन किया था। इसके पहले वह छः ग्रह लेता है। यह सातवाँ
है। वर्ष में छः ऋतुएं होती हैं। वर्ष सब है ॥७॥
सबके जीतने और भयरहित तथा हानिरहित होने पर पहले देवों ने वाणी बोली थी।
यह भी सबके जीतने पर और भयरहित तथा हानिरहित होने पर वाणी को बोलता है ॥८॥
इसको वह इस मन्त्र से ग्रहण करता है, "ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश-
स्थ। अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम् ॥ उपयामगृहीतोऽस्याग्रयणोऽसि
स्वाग्रयणः” (यजु० ७।१६,२०, ऋ० १।१३६।११) —“जो आप देव लोग, द्यौलोक में ११ हैं,
पृथिवी में ११ और जलों में (अन्तरिक्ष में) प्रकाशयुक्त ११ हैं। ये तेंतीसों देव मेरे यज्ञ को ग्रहण
करें। तू रक्षा के लिए लिया गया है तो आग्रयण है। अच्छा आग्रयण है।” इस प्रकार वाणी
जोरदार कर देता है कि एकार्थ होते हुए भी कुछ भेद कर देता है। यदि 'आग्रयणोऽसि, आग्र-
यणोऽसि' दो बार कहेगा तो एक ही बात को दुहराने का दोष आ जायगा, इसलिए पहले 'आग्र-
यणोऽसि' कहता है फिर 'स्वाग्रयणोऽसि' ॥६॥
“पाहि यज्ञं पाहि यज्ञपतिम्” (यजु० ७।२०) —अर्थात् “यज्ञ की रक्षा कर, यज्ञपति की
रक्षा कर।” यज्ञपति से यजमान का तात्पर्य है, क्योंकि यजमान ही यज्ञपति है। “विष्णुस्त्वा-
मिन्द्रियेण पातु विष्णुं त्वं पाहि” (यजु० ७।२०) —विष्णु नाम है यज्ञ का, अर्थात् “यज्ञ अपनी
शक्ति द्वारा तेरी रक्षा करे। तू यज्ञ की रक्षा कर।” “अभि सवनानि पाहि” (यजु० ७।२०) —
इससे तात्पर्य ग्रह का है क्योंकि यह (आग्रयण ग्रह) सभी सवनों में आता है ॥१०॥
(ग्रह को) छन्ने में लपेटकर हिंकार बोलता है। यह वाणी विना आश्रय के थक गई
थी। देवों ने उस थकी हुई वाणी में हिंकार के द्वारा प्राण स्थापित किये। प्राण हिंकार है। प्राण
ही हिंकार है। इसीलिए तो नाक बन्द करके हिंकार नहीं बोल सके। वह इस प्राण के द्वारा
फिर ताजा हो गई। जब थका आदमी प्राण को पाता है तो प्राण के कारण ताजा हो जाता है।
इसी प्रकार यह उस वाणी में हिंकार से प्राण को धारण कराता है। वह उस प्राण के द्वारा ताजा
होती है। हिंकार तीन बार करता है क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् (तीन लड़ी वाला) है ॥११॥
अब कहता है, "सोमः पवते” (यजु० २१) —“सोम पवित्र करता है।” असुर राक्षसों
से डरकर उन्होंने अब तक यह वाणी न बोली थी। जब सबको जीत लिया और भय-रहित तथा
हानि-रहित हो गये तब इस वाणी को स्पष्ट किया और कहा। इसलिए कहता है कि 'सोम पवित्र
करता है' ॥१२॥
“अस्मै ब्राह्मणोऽस्मै क्षत्राय” (यजु० ७।२१) —“इस ब्राह्मण के लिए, इस क्षत्रिय के
लिए।” क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए यह यज्ञ किया गया। “यजमानाय पवते” (यजु०

अध्याय-२, ब्राह्मण-३

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५६० शतपथ ब्राह्मण
य॒जमा॑नाय पवत॒ऽइति॑ तद्यज॑मानायाह॒ ॥ १३ ॥ तदा॑हुः । ए॒ताव॑दे॒वोक्त्वा साद॑येदे-
तावद्धाऽइ॒दꣳ सर्वं याव॒द्ब्रह्म क्षत्रं विडिन्द्रा॒ग्नी वाऽइ॒दꣳ सर्वं तस्मा॑दे॒ताव॑दे॒वो-
क्त्वा साद॑येदि॒ति ॥ १४ ॥ तदु ब्रूयादे॒व भूयः॑ । इष॒ऽऊर्जे पवत॒ऽइति॑ वृ॒ष्ट्यै तदा॑ह
यदा॒ह्वेष॒ऽत्यूर्गुऽइति॑ यो वृ॒ष्टाद्र॒सो जाय॑ते॒ तस्मै॒ तदा॒ह्वौषधीभ्यः॑ पवत
ऽइति॑ तद॒ह्वयौष॑धीभ्यश्चाह॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॑ पवत॒ऽइति॑ तदा॒भ्यां द्यावा॑पृथि-
वीभ्या॑माह॒ ययो॑रि॒दꣳ सर्व॒मधि॑ सु॒भूता॑य पवत॒ऽइति॑ साध॒वे पवत॒ऽइत्ये॒वैतदा॑ह
॥ १५ ॥ तदु॒ हैक॒ऽआहुः । ब्रह्मवर्च॒साय॑ पवत॒ऽइति॑ तदु तथा न ब्रूयाद्यदद्या॒श्रा-
ह्वास्मै॒ ब्रह्म॑ण॒ऽइति॒ तदे॑व॒ ब्रह्म॑वर्च॒साया॑ह॒ विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य ए॒ष ते॒ योनि॒र्वि-
श्वेभ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॒ इति॑ सादयति॒ विश्वे॑भ्यो ह्ये॑नं दे॒वेभ्यो॑ गृह्णा॑ति॒ तं वै मध्ये॑ साद-
यत्या॒त्मा ह्य॒स्यैष मध्य॒ऽइव॒ ह्ययमा॒त्मा द॒क्षिणोक्थ्य॑स्थाली भवत्युत्त॒रादि॑त्यस्था-
ली ॥ १६ ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [२. २.] ॥ ॥
अ॒यं ह॒ वाऽअ॒स्यैषो॑ऽनिरुक्त आ॒त्मा यदु॒क्थ्यः॑ । सो॒ऽस्यैष आ॒त्मैवा॒त्मा ह्य॑-
यम॑निरुक्तः प्रा॒णः सो॒ऽस्यैष आयु॑रेव तस्मा॑दन॒या गृ॑ह्णात्य॒स्यै हि स्थाली भव॑ति
स्थाल्या ह्ये॑नं गृह्णा॒त्यज॑रा॒ ह्ये॑यम॒मृता॒ऽज॑र॒ꣳ ह्य॒मृत॒मायु॒स्तस्मा॑दन॒या गृ॑ह्णाति ॥ १ ॥
तं वै पूर्णं गृ॑ह्णाति । सर्वं वै तयत्पूर्णꣳ॒ सर्वं तद्यदायु॒स्तस्मात्पूर्णं गृ॑ह्णाति ॥ २ ॥
॥ शतम् २४०० ॥ ॥ तस्यासावेव॑ ध्रुव आयुः॑ । आ॒त्मैवा॒स्यैतेन॒ सꣳहि॑तः प॒र्वाणि॑
संत॑तानि तद्धाऽअ॒गृही॑त ए॒वैतस्माद॑च्छावाकायोत्त॒मो ग्रहो भ॑वति ॥ ३ ॥ अथ॑ रा-
ज्ञानमुपाव॑हरति । तृती॑यं वसतीवरीणा॒मव॑नयति॒ तत्पूर्वꣳ॒ समै॑ति प्रथ॒ममह्नोत्त॑-
रस्य॒ सव॑नस्य करोत्युत्त॑मं पूर्व॑स्य स यदुत्त॑रस्य॒ सव॑नस्य॒ तत्पूर्वꣳ॑ करोति॒ यत्पूर्व॑स्य
तदुत्त॑मं तद्य॑तिष॒जति॒ तस्मा॑दि॒मानि॒ पर्वा॑णि व्यतिषक्तानीद॒मित्य॑म॒तिक्रान्तमि॒दमि॑-
त्यम् ॥ ४ ॥ ए॒वमेव माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने । अगृ॑हीत ए॒वैतस्माद॑च्छावाकायोत्त॒मो ग्र॒-
हो भ॑वत्यथ तृती॑यं वसतीवरीणा॒मव॑नयति॒ तत्पूर्वꣳ॒ समै॑ति प्रथ॒ममह्नोत्त॑रस्य

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कां० ४, अ० २, ब्रा० २-३, कं० १३-१६ व १-५ शतपथब्राह्मण / ५६१
७।२१)- "यजमान के लिए पवित्र करता है।" यह यजमान के लिए कहा ॥१३॥
इस पर कुछ लोग कहते हैं कि इतना ही कहकर ग्रह को रख दे, जितना ब्राह्मण, क्षत्रिय,
और वैश्य है। वह सब इतना ही तो है। इन्द्र और अग्नि यह सब है। इसलिए इतना ही कहकर
रख दे ॥१४॥
परन्तु इतना और कहना चाहिए "इष ऽ ऊर्जे पवते।" 'इषे' कहा वृष्टि के लिए। 'ऊर्जे'
कहा रस के लिए, क्योंकि वृष्टि से रस उत्पन्न होता है। "अद्भ्य ऽ ओषधीभ्यः पवते" (यजु०
७।२१)- यह जलों और ओषधियों के लिए कहा। "द्यावापृथिवीभ्यां पवते" (यजु०७।२१)-
यह द्यौ और पृथिवी के लिए कहा जिसके आश्रित सभी हैं। "सुभूताय पवते" (यजु० ७।२१)-
अर्थात् 'साधु या भलाई के लिए' ॥१५॥
कुछ कहते हैं कि 'ब्रह्मवर्चसाय पवते', परन्तु ऐसा न कहना चाहिए। क्योंकि ऊपर
'अस्मै ब्रह्मणे' कहा जा चुका है। इसका अर्थ 'ब्रह्मवर्चस्' है। "विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते
योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः" (यजु० ७।२१) - "तुझको विश्वेदेवों के लिए। यह तेरी योनि है।
तुझको विश्वेदेवों के लिए।" उस ग्रह को रख देता है कि इसको विश्वेदेवों के लिए भरा था।
उसको मध्य में रखता है, क्योंकि यह इसका आत्मा है। आत्मा मध्य में है। दाहिनी ओर उक्थ्य
थाली को रखते हैं, बाईं ओर आदित्य थाली को ॥१६॥
उक्थ्यग्रहः
अध्याय २--ब्राह्मण ३
यह जो उक्थ्य ग्रह है वह इसका अनिरुक्त (अस्पष्ट) आत्मा है। यह उसका आत्मा है।
यह इसका जो अनिरुक्त प्राण है वह इसका आत्मा है। यह इसकी आयु है। इसलिए वह इसको
इस (पृथिवी) के द्वारा ग्रहण करता है। इसी की थाली होती है (अर्थात् थाली मिट्टी की ही तो
बनती है) और थाली में ही इसको निकालता है। यह पृथिवी अजर-अमर है। अजर-अमर ही
आयु है। इसलिए इस पृथिवी के द्वारा इसको ग्रहण करता है ॥१॥
उसको पूरा-पूरा भरता है। यह जो आयु है वह 'सब' है। इसलिए पूरा-पूरा भरता
है ॥२॥
ध्रुव ग्रह उसकी आयु है। इसी से उसका आत्मा सुगठित रहता है। पर्व अर्थात् जोड़
इसी के द्वारा संगठित रहते हैं। अभी अच्छावाक (ऋत्विज विशेष) के लिए पिछला ग्रह भरा
नहीं जा चुका ॥३॥
तभी सोम राजा को (गाड़ी से) उतारता है और वसतीवरियों का तीसरा भाग
(आधवनीय स्थाली में) छोड़ता है, इस प्रकार पर्व जुड़ता है अर्थात् इस उक्थ्य ग्रह को पिछले
सवन का पहला और पहले सवन का पिछला ग्रह बना देता है (इस प्रकार दोनों सवन जुड़ गये),
जो पिछले सवन का है उसे पहले करता है, जो पहले का है उसे पीछे। इस प्रकार वह एक का
दूसरे में जोड़ मिला देता है, इसीलिए तो शरीर के जोड़ एक-दूसरे में मिले हुए हैं (व्यतिषक्तानि-
interlocked), यह इस प्रकार; यह इस प्रकार (हाथ के इशारे से बताकर) ॥४॥
इसी प्रकार दोपहर के सवन में, चूंकि अभी इसमें से अच्छावाक के लिए पिछला ग्रह
भरा नहीं जाता। इसलिए वसतीवरियों का तीसरा भाग (आधवनीय में) छोड़ता है। इस
प्रकार जोड़ मिल जाता है। पहले को वह पिछले सवन का बनाता है और पिछले को पहले सवन

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५६२ शतपथ ब्राह्मण
सवन॑स्य करोत्युत्त॒मं पूर्व॑स्य स षडुत्त॑रस्य सव॑नस्य तत्पूर्वं॑ करोति यत्पूर्व॑स्य त्-
दुत्त॑मं तद्यति॒षज॑ति तस्मा॑दि॒मानि॒ पर्वा॑णि व्यति॑षक्तानीद॒मित्य॑मतिष्ठानमिद॒मित्यं
तय॒दस्यै॒तेनात्मा॑ सꣳहि॒तस्तेनास्यै॒ष आयु॑: ॥ ५॥ सैषा काम॑दु॒धैवेन्द्र॑स्योडार्ः ।
त्रिभ्य ए॒वैनं॑ प्रातःसव॒नऽउ॒क्थ्ये᳕भ्यो॒ विगृ॑ह्णाति त्रिभ्यो॒ माध्य॑न्दिने॒ सव॑ने॒ तत्षट् कृ॒-
त्वा षड्वाऽऋ॒तव॑ ऋ॒तवो॒ वाऽइ॒मा सर्वान्कामान्यचयन्ते॒तेनो॒ हैषा काम॑दु॒धैवेन्द्र॑-
स्योडार्ः ॥ ६॥ तं वाऽअ॑पुरोरु॒कं गृह्णाति । उ॒क्थꣳ हि पु॒रोरुग्दि॒धि पु॒रोरुग्द्यु॒-
ग्युक्थꣳ साम॒ प्रस्तो॑ऽथ॒ यदन्यद॒ङ्गप॑ति॒ तद्यजु॒स्ता हैता ऋच्य॒र्थ ए॒वाग्र॒ऽऋग्भ्य॑ आ-
सुरथैधी यजु॒र्थीऽभ्य॑र्थः साम॑भ्यः ॥ ७॥ ते देवा अब्रुवन् । हन्ते॒मा य॒जुःषु॑ दधाम
तथै॒यं ब॒हुल॑तरेव वि॒द्या भ॑वि॒ष्यतीति॒ ता य॒जुःषदधु॒स्तत॑ ए॒षा ब॒हुल॑तरेव वि॒-
द्याभ॑वत् ॥ ८॥ तं यद॑पुरोरु॒कं गृह्णाति । उ॒क्थꣳ हि पु॒रोरुग्द॑धि पु॒रोरुग्ध्यु॑क्थꣳ
स यद्वै॑वैनमु॒क्थ्ये᳕भ्यो॒ विगृ॑ह्णाति॒ तेनो॑ हास्यै॒ष पु॒रोरु॒ग्द्वान्भव॑ति॒ तस्मा॑दपुरोरु॒कं
गृह्णा॑ति ॥ ९॥ अथा॑तो गृह्णा॒त्येव॑ । उप॒यामगृ॑हीतोऽसीन्द्राय त्वा बृह॒द्वते॒ वय॑-
स्वत्स॒ऽइतीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ तस्मा॑दाहे॒न्द्राय॒ त्वेति॑ बृह॒द्वते॒ वय॑स्वत॒ऽइति॑
वी॒र्य॑वत॒ऽइत्ये॒वैतदा॑ह॒ यदा॑ह बृह॒द्वते॒ वय॑स्वत॒ऽइत्यु॒क्थ्यायं॑ गृह्णामीत्यु॒क्थ्ये᳕भ्यो
ह्ये॑नं॒ गृह्णा॑ति॒ यत्त॒ऽइन्द्र॒ बृह॒द्वय॒ इति॒ यत्त॒ऽइन्द्र॒ वी॒र्य॑मित्ये॒वैतदा॑ह॒ तस्मै॑ त्वा
विष्ण॑वे॒ वेति॑ य॒ज्ञस्य॒ ह्येन॑मा॒युषे॒ गृह्णा॑ति॒ तस्मा॑दाह॒ तस्मै॑ वा विष्ण॑वे॒ वेत्ये॒ष ते॑
योनि॑रु॒क्थ्ये᳕भ्यस्वेति॑ सादयत्यु॒क्थ्ये᳕भ्यो॒ ह्येनं॒ गृह्णा॑ति ॥ १०॥ तं विगृ॑ह्णाति । दे॒वे-
भ्यस्त्वा॑ दे॒वाव्यं॑ य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णामीति॑ प्रशास॒नꣳ स कु॑र्या॒द्य ए॒वं कु॑र्या॒द्यथा॑दे॒वतं॑
त्वे॑व वि॑गृह्णीयात् ॥ ११॥ मित्रावरु॑णाभ्यां त्वा । दे॒वाव्यं॑ य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णामीत्ये॒व
मै॒त्राव॒रुणा॑य मैत्रावरु॒णीषु॑ हि तस्मै॑ स्तुवते मैत्रावरु॒णीरनु॑शꣳसति मैत्रावरु॒ण्या
यज॑ति ॥ १२॥ इन्द्रा॑य त्वा । दे॒वाव्यं॑ य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णामीत्ये॒व ब्राह्म॑णाच्छꣳसिन
ऽऐ॒न्द्रीषु॑ हि तस्मै॑ स्तुवत॒ऽऐन्द्रीरनु॑शꣳस॒त्यैन्द्या यज॑ति ॥ १३॥ इन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ त्वा ।

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का० ४, अ० २, ब्रा० ३, कं० ५-१३ शतपथब्राह्मण / ५६३
का। जो पिछले सवन का है उसे पहले करता है, जो पहले का है उसे पीछे। इस प्रकार दोनों को
मिला देता है। इसीलिए ये शरीर के जोड़ भी मिले हुए हैं। यह इस प्रकार और यह इस प्रकार
(हाथ के इशारे से बताकर) चूंकि इस ग्रह से उसका आत्मा सुघटित है, इसलिए यह इसकी
आयु हैं ॥५॥
यह (उक्थ्य ग्रह) इन्द्र का विशेष भाग या कामधेनु हैं। प्रातःसवन में तीन उक्थ्यों के
लिए (विशेष मन्त्रों के लिए) इसके तीन भाग करता है; दोपहर के सवन में तीन को; ये छः
हुए। छः ही ऋतुएँ हैं। ये ऋतुएँ ही पृथिवी पर सब कामनाओं को पकाती हैं। इसलिए यह
कामधेनु या इन्द्र का विशेष भाग है ॥६॥
इसको पुरोरुक् के बिना ही लेता है। उक्थ्य पुरोरुक् है। पुरोरुक् ऋक् है। उक्थ्य ऋक्
है। साम ग्रह है। यह जो जपा जाता है वह यजुः है। ये पुरोरुक् ऋचाएं पहले ऋक् से अलग
थीं, यजुः से अलग थीं, साम से अलग थीं ॥७॥
वे देव बोले, 'इनको यजुओं में मिला दें, इस प्रकार यह बहुत बड़ी विद्या हो जायगी।'
तब उन्होंने इनको यजुओं में मिला दिया और यह बहुत बड़ी विद्या हो गई ॥८॥
इसको बिना पुरोरुक् के क्यों लेता है? उक्थ्य पुरोरुक् है। ऋक् पुरोरुक् है, ऋक् उक्थ्य
है। चूंकि इसको उक्थ्यों में से लेता है, इसलिए यह पुरोरुक्वाला हो जाता है। इसलिए इसको
बिना पुरोरुक् के लेता है ॥९॥
इसको इस मन्त्र से लेता है, "उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा बृहद्वते वयस्वते" (यजु०
७।२२)—"तुझको आश्रय के लिए लिया गया है, बड़े और आयुवाले इन्द्र के लिए।" इन्द्र यज्ञ
का देवता है, इसलिए कहा कि बड़े और आयुवाले इन्द्र के लिए। 'बड़े और आयुवाले' का
अर्थ हैं वीर्यवाले, पराक्रमवाले। "उक्थाव्यं गृह्णामि" (यजु० ७।२२)—"उक्थ्यों से इसे लेता
हूँ।" "यत्त ऽ इन्द्र बृहद्वयः" (यजु० ७।२२) अर्थात् "हे इन्द्र, जो तेरा पराक्रम है।" "तस्मै त्वा
विष्णवे त्वां" (यजु० ७।२२)—यज्ञ की आयु के लिए इसको ग्रहण करता है, इसलिए कहा,
"उसके लिए तुझको, विष्णु के लिए तुझको।" "एष ते योनिरुक्थेभ्यस्त्वा" (यजु० ७।२२)—
"यह तेरी योनि है, उक्थ्यों के लिए तुझे।" ऐसा कहकर उसको रख देता है, उक्थों के लिए उसे
लेता है ॥१०॥
इस मन्त्रांश से बाँटता है, "देवेभ्यस्त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि" (यजु० ७।२२)
—"तुझे देवों के लिए तथा यज्ञ की आयु के लिए लेता हूँ।" जो इस प्रकार करेगा वह शासन
करनेवाला होगा। अब उसे प्रत्येक देवता के लिए बाँट देना चाहिए ॥११॥
"मित्रावरुणाभ्यां त्वा देवाव्यां यज्ञस्यायुषे गृह्णामि" (यजु० ७।२३)—यह मित्रा-
वरुण के लिए, क्योंकि मित्रावरुणी मन्त्रों में (उद्गाता लोग) उसी की स्तुति करते हैं और मैत्रा-
वरुणी शस्त्र को होता पढ़ता है, और मैत्रावरुण के लिए ही आहुति दी जाती है ॥१२॥
"इन्द्राय त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि" (यजु० ७।२३)—"देव के अर्पण तुझको
इन्द्र के लिए, यज्ञ की आयु के लिए लेता हूँ।" यह भाग ब्राह्मणाच्छंसी के लिए होता है। इन्द्र-
सम्बन्धी मन्त्रों के साथ इसके लिए स्तुति की जाती है। शस्ता भी ऐसे ही मन्त्रों से पढ़ा जाता
है जिनमें इन्द्र शब्द आया हो और इन्द्रवाले मन्त्र से ही आहुति दी जाती है ॥१३॥

अध्याय-२, ब्राह्मण-४

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५६४ शतपथ ब्राह्मण

दे॒वाव्यं॑ य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णामीत्ये॒वाहैन्द्रा॒ग्नीषु॒ हि तस्मै॑ स्तुवत॒ऽऐन्द्रा॒ग्नीर॑-
नुश॑ꣳसत्यैन्द्रा॒ग्न्या य॑जतीन्द्रा॒य त्वेत्ये॑व माध्यन्दि॒ने सव॑न॒ऽऐन्द्रꣳ॑ हि माध्यन्दि॒नꣳ
सव॑नम् ॥ १४॥ तदु॑ ह च॒रका॑ध्वर्यवो विगृह्णन्ति । उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽसि दे॒वेभ्य॑स्त्वा
दे॒वाव्य॑मु॒क्थेभ्य॑ उक्था॒व्यं॑ मित्रावरु॑णाभ्यां जुष्टं॑ गृह्णाम्ये॒ष ते॒ योनि॑र्मित्रावरु॑णाभ्यां
त्वेति॑ सादयति पुन॒र्हविर॑सीति स्था॒लीम॑भिमृशति ॥ १५ ॥ उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽसि ।
दे॒वेभ्य॑स्त्वा दे॒वाव्य॑मु॒क्थेभ्य॑ उक्था॒व्य॑मिन्द्रा॑य जुष्टं॑ गृह्णाम्ये॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वेति॑
सादयति पुन॒र्हविर॑सीति स्था॒लीम॑भिमृशति ॥ १६ ॥ उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽसि । दे॒वे-
भ्य॑स्त्वा दे॒वाव्य॑मु॒क्थेभ्य॑ उक्था॒व्य॑मिन्द्रा॒ग्निभ्यां जुष्टं॑ गृह्णाम्ये॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॒ग्निभ्यां॑
त्वेति॑ सादयति॒ नात्र॑ पुन॒र्हविर॑सीति स्था॒लीम॑भिमृशतीन्द्रा॑य त्वेन्द्रा॑य त्वेत्येव मा-
ध्यन्दि॒ने सव॑न॒ऽऐन्द्रꣳ॑ हि माध्यन्दि॒नꣳ सव॑नं॒ द्विरु॑ पुन॒र्हविर॑सीति स्था॒लीम॑भि-
मृशति तूष्णीं तृती॒यं निद॑धाति ॥ १७ ॥ तं वै नोपया॒मेन॑ गृह्णीयात् । न योनौ॑
सादयेद्ये॒ ह्यैवैष उ॑पया॒मेन॑ गृही॒तो भ॑वत्ये॒ये योनौ॑ सन्नो॒ऽजामि॑तायै॒ जामि॒ ह
कुर्या॒द्यदेन॑म॒न्त्रायोपया॒मेन॑ गृह्णीया॒द्यद्योनौ॑ साद॒येद्य॑त् पुन॒र्हविर॑सीति स्था॒लीम॑-
भिमृ॒शति॒ पुन॑र्ह्य॑स्यै॒ ग्रहं॑ ग्रहीष्य॒न्भव॑ति न तदा॒द्रियेत तूष्णी॑मेव निद॑ध्यात् ॥ १८॥
ब्राह्मणम् ॥ २ [२. ३.] ॥ ॥
अ॒यꣳ ह॒ वाऽअ॒स्यैष प्राणः॑ । योऽय॑म् पु॒रस्ता॑त्स वै वैश्वान॒र ए॒वाथ॒ योऽयं॑ प-
श्चात्स ध्रु॒वस्तौ॑ ह स्मैतौ द्वावे॒वाग्रे॒ ग्रहा॑ गृह्णन्ति ध्रुववैश्वानरा॒विति॒ तयो॑र॒न्यथे-
त॒र्ह्यन्यत॒र ए॒व गृ॒ह्यते ध्रुव ए॒व स यदि॑ तं चर॒केभ्यो वा यतो॒ वानु॑ब्रूवीत य॒ज्ञ-
मानस्य॒ तं चम॒सेऽव॑नयेद्यथै॒तमे॑व होतृचमसे ॥ १ ॥ यद्वाऽअ॒स्यार्वाची॑नं॒ नाभेः॑ ।
तद॑स्यैष आ॒त्मनः॑ सोऽस्यैष आ॒युरे॒व तस्मा॑दन॒या गृ॑ह्लात्यस्यै॒ हि स्थाली भव॑ति
स्था॒ल्या ह्ये॑नं गृह्णा॒त्यज॑रा॒ ह्य॑य॒ममृ॑ता॒ऽजरꣳ॒ ह्य॒मृत॒मायु॒स्तस्मा॑दन॒या गृ॑ह्लाति ॥ २ ॥
तं वै पूर्णं गृ॑ह्लाति । सर्वं॒ वै तद्यत्पूर्णꣳ॒ सर्वं॒ तद्यदायु॒स्तस्मा॒त्पूर्णं॑ गृह्णाति ॥ ३ ॥

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कां० ४, अ० २, ब्रा० ३-४, कं० १४-१८ व १-३ शतपथब्राह्मण / ५६५
“इन्द्राग्निभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि” (यजु० ७।२३) — “यह भाग आच्छा-
वाक का है। इसकी स्तुति के मन्त्रों में इन्द्र-अग्नि आता है, इन्द्र-अग्निवाले मन्त्र ही शस्त्र में
पढ़े जाते हैं और इन्द्र-अग्नि के मन्त्रों से ही आहुति दी जाती है। 'इन्द्राय त्वा' से दोपहर के
सवन को करता है, क्योंकि दोपहर का सवन इन्द्र का होता है ॥१४॥
चरकाध्वर्यु इसको इस प्रकार बाँटते हैं, “उपयामगृहीतोऽसि देवेभ्यस्त्वा देवाव्यमुक्थेभ्य
उक्थाव्यं मित्रावरुणाभ्यां जुष्टं गृह्णामि”— “तू आश्रय के लिए है। तुझ देव के अर्पण को देवों
के लिए जिनको स्तुति प्रिय है, मित्र-वरुण के लिए लेता हूँ।” अब वह इस मन्त्र से ग्रह को रखता
है, “एष ते योनिर्मित्रावरुणाभ्यां त्वा।” यह कहकर थाली को छूता है, 'हविरसि'— 'तू हवि
है' ॥१५॥
इस मन्त्र से रखता है, “उपयामगृहीतोऽसि देवेभ्यस्त्वा देवाव्यमुक्थेभ्य उक्थाव्य-
मिन्द्राग्निभ्यां जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा।” यह कहकर थाली को छूता है। “पुनर्हवि-
रसि।” — “तू फिर हवि है” ॥१६॥
उपयामगृहीतोऽसि। देवेभ्यस्त्वा देवाव्यमुक्थेभ्य उक्थाव्यमिन्द्राग्निभ्यां जुष्टं गृह्णाम्येष
ते योनिरिन्द्राग्निभ्यां त्वा।' इससे रखता है। परन्तु 'पुनर्हविरसि' कहकर इस बार थाली को
नहीं छूता। 'इन्द्राय' 'इन्द्राय त्वा' कहकर दोपहर के सवन को करता है क्योंकि दोपहर का सवन
'इन्द्र' का है। 'तू हवि है' ऐसा कहकर थाली को दो बार छूता है, तीसरी बार चुपके से रख देता
है ॥१७॥
इसको 'उपयाम······इति' कहकर न ले और न 'योनि' में रक्खे। यह तो पहले ही
'उपयाम····' से ली जा चुकी है और पहले ही 'योनि' में रक्खी जा चुकी है। यदि अब भी
'उपयाम······' से लेगा और 'योनि' में रक्खेगा तो एक ही चीज को दुहराने का दोषी होगा।
'पुनर्हविरसि' कहकर थाली को छूने से इस ग्रह को दोबारा ग्रहण करना पड़ेगा। इसलिए इसको
न करे। चुपके से रख दे ॥१८॥
ध्रुवग्रहः
अध्याय २—ब्राह्मण ४
यह जो आगे का प्राण है वह वैश्वानर ग्रह है, और यह जो पीछे का प्राण है वह ध्रुव
है। पहले ये दोनों ग्रह लिये जाया करते थे— ध्रुव भी और वैश्वानर भी। इनमें से एक अब भी
निकाला जाता है अर्थात् ध्रुव। उस अर्थात् वैश्वानर ग्रह को यदि चरकों की रीति के अनुसार
लिया जाय तो उसको यजमान के चमसे में डालना चाहिए, 'ध्रुव' को होता के चमसे में ॥१॥
यह जो नाभि से नीचे का स्थान है उसी का आत्मा, उसी की आयु यह ध्रुव ग्रह है।
इसलिए उसको इसे भूमि द्वारा ही लेता है क्योंकि थाली इसी की मिट्टी की होती है। थाली में
ही इसे लेना है। यह अजर-अमर है। आयु भी अजर-अमर है। इसलिए इसके द्वारा लेता
है ॥२॥
उसको पूरा-पूरा भरता है। 'सब' पूर्ण है। यह जो आयु है वह पूर्ण है। इसलिए पूरा-
पूरा भरता है ॥३॥

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५६६ शतपथ ब्राह्मण
वैश्वान॒राय॑ गृह्णाति । संवत्सरो वै वैश्वान॒रः सं॑वत्सर॒ आयुर॒स्तस्मा॑द्वैश्वान॒राय॑ गृ॒-
ह्णाति ॥४॥ स प्रातःस॒वने॑ गृही॒तः । ऐ॒तस्मा॒त्काला॒ऽपशे॑ते॒ तदे॑नग्ं सर्वा॑णि स॒-
वनान्य॒तिन॑यति ॥५॥ तं न स्तूय॑माने॒ऽवन॑येत् । न ह संवत्सरं॒ यज॑मानोऽति॒-
जीवे॒द्यत्स्तूय॑माने॒ऽवन॑येत् ॥६॥ तग्ं शस्य॑माने॒ऽवन॑यति । तदेनं द्वाद॒शग्ं स्तोत्र॑-
म॒तिन॑यति॒ तथा प॑र॒स्पर॒मायुः॒ सम॑श्नुते॒ तथो॑ ह॒ यज॑मानो॒ ज्योग्जी॑वति॒ तस्मा॑द्ब्राह्म॒-
णोऽग्निष्टोम॑सत्स्यादित॑स्य॒ होमा॒न्न सर्व्वे॑न॒ प्रस्त्रा॑वयेत॒ तथा॒ सर्व्व॒मायुः॒ सम॑श्नुत
ऽआयुर्वाऽअ॒स्यैष तथा॒ सर्व्व॒मायुरे॑ति ॥७॥ यद्वाऽअ॒स्यार्वाची॑नं॒ नाभेः । तद॒स्यैष
आ॒त्मनः॒ स यत्पुरैतस्य॒ होमा॒त्सर्पे॑द्वा॒ प्र वा॑ स्त्रावये॑त ध्रुवग्ं ह्यव॑मेहे॒त्तद्ध्रुवम॑व-
मे॒हानीति॒ तस्मा॑द्ब्राह्म॒णोऽग्निष्टोम॑सद्भवति॒ तद्धै तद्यज॑मान एव॒ यज॑मानस्य॒ ह्येष त॒-
दा॒त्मनः॑ ॥८॥ स वाऽअ॒ग्निष्टोम॑सद्भवति । यशो॒ वै सोम॒स्तस्मा॒द्यन्न॒ सोमे॑ ल॒भते॒
यन्न नोभा॑वे॒वाग॑हतो॒ यश॒ ह्यवैतद्द्बु॑माग॒च्छन्ति॒ तद्वाऽए॒तद्यशो॒ ब्राह्म॑णाः स॒म्प्रसृ॑-
प्या॒त्मन्ध॑त्ते॒ यद्ब्रह्म॑यन्ति॒ स ह॒ यश॑ ह्व॒ भव॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वान्ब्रह्म॑यति ॥ ९ ॥ ते
वाऽए॒ते । सर्प॑न्त ए॒वाग्निष्टोम॑सञ्चेत॒द्यशः॒ संनि॑धाय सर्पन्ति ते पराचो॒ यश॑सो भ-
वन्ति॒ तदे॑ष॒ परि॑गृह्यै॒व पुन॑रा॒त्मन्यशो॑ धत्ते॒ तेषाग्ं ह्येष ए॒व य॒शस्व॑ितमो भूत्वा
प्रैति॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निष्टोम॑सद्भवति ॥ १० ॥ दे॒वाश्च॒ वाऽअसु॑राश्च । उ॒भये॑ प्राजा-
प॒त्याः प॑स्पृ॒धिरु॒ऽए॒तस्मि॒न्यज्ञे प्र॒जाप॑तौ पि॒तरि॑ संवत्स॒रेऽस्माक॑म॒यं भ॑विष्य॒त्यस्मा-
क॒मयं भ॑विष्य॒तीति॑ ॥ ११ ॥ ततो॑ दे॒वाः । अर्च॑न्तः श्राम्य॑न्त॒श्चेरु॒स्तऽए॒तद॑ग्निष्टोमस॒द्यं
ददृशु॒स्तग्ं ए॒तेना॒ग्निष्टोम॑स॒द्येन॒ सर्वं॑ य॒ज्ञग्ं सम॑वृञ्जन्ता॒न्तराय॒न्नसु॑रान्य॒ज्ञात्तथो॒ऽए॒वैष
ए॒तेना॒ग्निष्टोम॑स॒द्येन॒ सर्वं॑ य॒ज्ञग्ं संवृङ्क्ते॒ऽन्तरे॑ति स॒पत्नान्य॒ज्ञात्तस्मा॑द्ब्राह्म॒णोऽग्नि॑ष्टोमस॒द्-
वति ॥१२॥ तं गृही॒त्वोत्त॑रे ह॒विर्द्धाने॑ सादयति प्रा॒णा वै ग्रहा॒ नेत्प्रा॒णान्मोह॑-
यानी॒त्युप॑की॒र्णे वाऽइ॒तरान्ग्र॒हान्सा॑दय॒त्ये॑तं॒ व्यु॑क्ष्य॒ न तृणं॑ च॒नान्त॒र्धाय॑ ॥ १३ ॥
यद्वाऽअ॒स्योर्द्धं नाभेः॑ । तद॒स्यैत॒ऽआ॒त्मन उ॒परी॑व॒ वै तद्यदूर्द्धं नाभे॒रुपरि॑वी॒त्यथ॒ऽप-

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का० ४, अ० २, ब्रा० ४, कं० ४-१४ शतपथब्राह्मण / ५६७
वैश्वानर के लिए लेता है। संवत्सर वैश्वानर है। संवत्सर आयु है, इसलिए वैश्वानर के
लिए लेता है ॥४॥
इसको प्रातःसवन के लिए लिया गया था। इसके बाद यह वैसे ही रखा रहा। इस
प्रकार वह इसको सब सवनों में होकर ले जाता है ॥५॥
स्तुति के समय इसको (होता के चमसे में) न डाले, क्योंकि यदि स्तुति के बीच में डाल
देगा तो यजमान साल-भर न जियेगा ॥६॥
जिस समय शस्त्र पढ़ा जाता है उस समय इसको लेता है। इस प्रकार वह इसको बारह
स्तोत्रों से ऊपर कर देता है। इस प्रकार उसका जीवन परस्पर (बिना सिलसिला टूटे) रहता है।
यजमान दीर्घायु होता है। इसलिए ब्राह्मण अग्निष्टोम में बराबर बैठा रहे। होम से हट न जाय।
न पेशाब करे। इस प्रकार पूर्ण आयु को प्राप्त करे। यह जो आहुति है वह इसकी आयु है। इस
प्रकार सब आयु को प्राप्त करता है ॥७॥
यह जो इसकी नाभि के नीचे है उसके आत्मा का उतना भाग यह (ध्रुव ग्रह) है।
इसलिए यदि हटकर जायगा या पेशाब करेगा तो जो चीज ध्रुव (दृढ़) है उसको विचल कर
देगा। वह ध्रुव को विचल नहीं करता, इसलिए अग्निष्टोम में बराबर बैठा रहता है। यह आदेश
यजमान के लिए है क्योंकि यह यजमान का ही आत्मा है ॥८॥
वह अग्निष्टोम सद् इसलिए भी होता है कि सोम यश है; इसलिए जो इसका लाभ
करता है और जो इसका लाभ नहीं करता, दोनों ही इस यश को देखने आते हैं। ब्राह्मण लोग
जब (इस सोम को) पीते हैं तो वे अपने आत्मा में इस यश को धारण करते हैं। जो इस रहस्य
को समझकर इसका पान करता है वह अवश्य ही यशस्वी हो जाता है ॥६॥
ये (ब्राह्मण लोग) अग्निष्टोम से हटते हुए इस यश को उस (यजमान) में रखकर
हटते हैं और इस प्रकार यश से विमुख हो जाते हैं। और यह यजमान चारों ओर से घेरकर ही
यश को अपने में धारण करता है, इसलिए वह मनुष्य उन सबमें यशस्वी होकर मरता है जो इस
रहस्य को जानकर अग्निष्टोम में बराबर बैठा रहता है ॥१०॥
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान इस पिता प्रजापति संवत्सररूपी यज्ञ में इस
बात पर लड़ पड़े कि 'यह हमारा होगा'-'यह हमारा होगा' ॥११॥
इस पर देव तो अर्चना और श्रम करते रहे। उन्होंने इस अग्निष्टोम को देखा
(निकाला)। इस अग्निष्टोम के द्वारा उन्होंने पूरे यज्ञ पर स्वत्व कर लिया और असुरों को यज्ञ
से बाहर कर दिया। इस प्रकार यह यजमान भी अग्निष्टोम के द्वारा इस सम्पूर्ण यज्ञ पर स्वत्व
कर लेता है, यज्ञ से अपने शत्रुओं को बाहर कर देता है। इसलिए वह अग्निष्टोम में बराबर बैठा
रहता है ॥१२॥
इस ग्रह को लेकर वह उत्तरी हविर्धान में रख देता है। ग्रह प्राण है। ऐसा न हो कि
प्राण विचलित हो जायें। अन्य ग्रहों को उपकीर्ण (ऊँचे उठे हुए भाग में) रखता है। लेकिन
इसको धूल हटाकर इस प्रकार रखता है कि एक तिनका भी बीच में न रहने पावे ॥१३॥
यह जो नाभि से ऊपर का भाग है वही शरीर का ऊपरी भाग कहलाता है। ये जो अन्य

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५६८ शतपथ ब्राह्मण

की॒र्णं तस्मा॑दुपकी॒र्णे सा॒दय॑त्य॒थैतं व्यु॑ह्य॒ न तृणं॑ च॒नान्त॑र्धाय ॥ १४॥ यद्वाऽअ॒स्या-
वाची॑नं॒ नाभेः॑ । तद॒स्यैष आ॒त्मनोऽध॑-इव॒ वै तद्यद॑वाचीनं॒ नाभे॒रध॑-इवैत॒द्य-
द्धु॒ह्य न तृणं॑ च॒नान्त॑र्धाय॒ तस्मा॑दे॒तं व्यु॑ह्य॒ न तृणं॑ च॒नान्त॑र्धाय सादयति ॥ १५॥
ए॒ष वै प्र॒जाप॑तिः । य ए॒ष य॒ज्ञस्ता॒यते॒ यस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः प्र॒जाता ए॒तन्न्वे॑वा॒प्ये-
तर्ह्यनु॑ प्र॒जाय॑न्ते॒ स या॒नुप॑की॒र्णे सा॒दय॑ति॒ तस्मा॑द्यास्ता॒ननु॑ प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ ता अ॒-
न्येना॒त्मनोऽस्यां॑ प्रति॒तिष्ठ॑न्ति॒ या वै श॒फैः प्रति॒तिष्ठ॑न्ति॒ ता अ॒न्येना॒त्मनोऽस्यां॑
प्रति॒तिष्ठ॑न्त्यथ॒ यदे॒तं व्यु॑ह्य॒ न तृणं॑ च॒नान्त॑र्धाय सा॒दय॑ति॒ तस्मा॑द्या ए॒तमनु॑ प्र॒जाः
प्र॒जाय॑न्ते॒ ता आ॒त्मनै॒वास्यां॑ प्रति॒तिष्ठ॑न्ति मनु॒ष्या॑श्च श्वाप॒दाश्च॑ ॥ १६॥ तद्वाऽए॒तद्
। अस्या॒ ए॒वान्य॒ऽतरं करोति॒ यदुप॑किर॒ति स या॒नुप॑की॒र्णे सा॒दय॑ति॒ तस्मा॑द्यास्ता-
ऽननु॑ प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते॒ ता अ॒न्येनै॑वा॒त्मनोऽस्यां॑ प्रति॒तिष्ठ॑न्ति श॒फैः ॥ १७॥ तद्वाऽए॒-
तत् । आ॒हव॒नीये॑ जु॒होति॑ पुरो॒डाशं॑ धा॒नाः कर॒म्भं द॒ध्यामि॑क्षामिति॒ तद्यथा॒ मुख॒
ऽआसि॑ञ्चेदे॒वं तद्यैष ए॒करू॑प उ॒पशे॑तऽन्ना॒य इ॑वैव॒ तस्मा॒द्यदने॑न॒ मुखे॑न नाना॒न्न॒-
पमशन॑मश्ना॒त्यथैते॑न प्रा॒णेनै॑करू॒पमे॑व प्र॒स्राव॑यतेऽप॒ इवै॒वाथ॒ यस्माद्ध्रुवो नाम॑
॥ १८॥ दे॒वा ह॒ वै य॒ज्ञं त॑न्वानाः । तेऽसु॑ररक्ष॒सेभ्य॒ आस॒ङ्गाद्बि॑भयां चकृ॒स्तान्द-
क्षिणतोऽसु॑ररक्ष॒सान्यत्य॑जिघांसंस्तान्दक्षिणा॒न्यहानु॒न्नम॑धुर्य्येतद्दक्षि॒णं ह॒विर्द्धा॑नं-
मुद॑ञ्चधुर्य्येतमे॒व न शे॒कुर॒द्धर्तुं तदु॑त्त॒रमे॒व ह॒विर्द्धानं॒ दक्षि॑णं ह॒विर्द्धानमद॑ऽवृत्त-
द्यदे॒तं न शे॒कुर॒द्धर्तुं तस्माद्ध्रुवो नाम॑ ॥ १९॥ तं वै गो॒पाय॑न्ति । शि॒रो वाऽए॒ष
ए॒तस्यै॒ गाय॒त्र्यै य॒ज्ञो वै गाय॒त्री द्वाद॑श स्तो॒त्राणि॒ द्वाद॑श श॒स्त्राणि॒ तच्च॑तुर्विं॒श-
तिस्त॒श्चतु॑र्विंशत्यक्षरा॒ वै गाय॒त्री तस्या॑ऽए॒ष शिरः॑ श्रीर्वै शिरः॑ श्रीर्हि॒ वै शिर॒स्त-
स्माद्योऽर्द्ध॑स्य॒ श्रेष्ठो॒ भव॑त्यसाव॒मुष्यार्द्ध॑स्य॒ शिर॒ इत्या॑हुः॒ श्रेष्ठो॒ ह व्ये॑त॒ यदे॒ष
व्यये॑त यज॑मानो॒ वै श्रेष्ठो॒ नेद्यज॑मानो व्ययाता॒ऽइति॒ तस्मा॑द्वै गो॒पाय॑न्ति ॥ २०॥
व॒त्सो वाऽए॒षः । ए॒तस्यै गाय॒त्र्यै य॒ज्ञो वै गाय॒त्री द्वाद॑श स्तो॒त्राणि॒ द्वाद॑श श॒स्त्रा-