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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 573 of 699

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Page 573

कां० ४, अ० २, ब्रा० १, कं० १६-२६ शतपथब्राह्मण / ५५५
शुक्रः शुक्रशोचिषा" (यजु० ७।१३)-"शुक्र प्रकाशस्वरूप द्यौ और पृथिवी के साथ संयुक्त
होकर।" और प्रतिप्रस्थाता इस मन्त्र से, "संजग्मानो दिवा पृथिव्या मन्थी मन्थिशोचिषा"
(यजु० ७।१८)-"मन्थी मन्थी के समान दीप्तिवाले द्यौ और पृथिवी के साथ संयुक्त
होकर।" इस प्रकार ये इन ग्रहों को आँखों के ठहरने का स्थान बनाते हैं। इनको आँखों के
समान पास-पास जोड़कर रखते हैं। इसीलिए आँखें पास-पास हड्डियों द्वारा मिली होती
हैं ॥१९॥
अध्वर्यु अप्रोक्षित यूप-शकल को यह कहकर फेंक देता है, "निरस्तः षण्डः" (यजु०
७।१३)-"षण्ड भगा दिया गया।" प्रतिप्रस्थाता यह कहकर फेंकता है, "निरस्तो मर्कः"
(यजु० ७।१८)-"मर्क भगा दिया गया।" इस प्रकार आहुतियों के पहले इन दोनों राक्षसों को
भगा देते हैं ॥२०॥
अध्वर्यु प्रोक्षित यूप-शकल को यह कहकर आहवनीय अग्नि में छोड़ता है, "शुक्र-
स्याधिष्ठानमसि" (यजु० ७।१३)-"तू शुक्र का अधिष्ठान है।" इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता यह
कहकर "मन्थिनोऽधिष्ठानमसि" (यजु० ७।१८)-"मन्थि का अधिष्ठान है तू।" ये दोनों
को प्रकाश देनेवाले हैं। इससे वह आँखों को प्रकाश देता है। इसीलिए आँखों में प्रकाश
है॥२१॥
अब जाप करता है, "अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम"
(यजु० ७।१४) - "हे सोम देव, तेरे न नष्ट होनेवाले, वीर्यवान् धन के हम दाता होवें।" इस
कर्म का यह आशीर्वाद है। इस आशीर्वाद को देता है ॥२२॥
श्रौषट् कहकर कहता है-- 'प्रातःसवन के चमकीले, मीठे सोमोँ को इन्द्र के लिए प्रेरित
करो।' वषट्कार होने पर अध्वर्यु आहुति देता है। उसके पीछे चमसाध्वर्यु ॥२३॥
ये आगे खड़े होकर आहुति देते हैं। ये दोनों आहुतियाँ यज्ञ की आँखें हैं। इस प्रकार
आँखों को आगे रखता है। इसीलिए तो आँखें आगे होती हैं ॥२४॥
ये यूप के दोनों ओर खड़े होकर आहुति देते हैं। यूप नासिका के समान है। नासिका के
दोनों ओर आँखें होती हैं ॥२५॥
वषट्कार कहकर ये दोनों आहुतियाँ मन्त्र पढ़कर दी जाती हैं। इनमें यह विशेषता है कि
इनके पश्चात् पूरे सवन की आहुतियाँ दी जाती हैं। इनके पीछे पूरे सवन की आहुतियाँ इसलिए
दी जाती हैं कि ये आहुतियाँ प्रजापति की प्रत्यक्षतम आँखें हैं। सत्य चक्षु है, सत्य प्रजापति है।
इसलिए इनके पीछे पूरे सवन की आहुतियाँ दी जाती हैं ॥२६॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है, "सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो मित्रो
ऽअग्निः ॥ स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वाँस्तस्मा ऽ इन्द्राय सुतमाजुहोत स्वाहा" (यजु० ७।१४,
१५) - "सबके ग्रहण करने योग्य यह पहली संस्कृति है। वह पहला वरुण, मित्र और अग्नि है।
वह पहला चेतनावा बृहस्पति है। उस इन्द्र के लिए निचोड़े हुए सोम की आहुति दो" ॥२७॥
'सा प्रथमा, स प्रथमः' यह कहकर वह जो आहुति देता है वह सदा सींचे हुए वीर्य के
समान है। आँखें पहले होती हैं इसलिए वह 'सा प्रथमा, स प्रथमः' ऐसा कहकर आहुति देता
है ॥२८॥
अब वह आदेश देता है, 'होता का चमसा आवे, ब्राह्मण का, उद्गाता का, यजमान
का, सदस्यों के, होताओं के, अध्वर्युओं के। इन चमसों को शुद्ध सोमरस से भरो।' यह सब