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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 567 of 699

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Page 567

कां० ४, अ० १-२, ब्रा० ५-१, कं० १५-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ५४६
की स्तुति के पश्चात् ही वे आये थे ॥१५॥
वे बोले, 'हम अध्वर्यु हैं, हमीं यज्ञ में मुख्य हैं । हमारे इस पहले ग्रह को द्विदेवतों के लिए
दे दो ।' उन्होंने उस पहले ग्रह को द्विदेवतों को दे दिया । इसलिए यह दसवाँ ग्रह है और तीसरा
वषट्कार होता है । ये अश्विन कौन हैं ? द्यौ और पृथिवी । यही दो तो हैं जो सबको अश्नुवातां
या प्राप्त करते हैं । यह पुष्कर स्रज अर्थात् पुष्कर की माला वाले हैं, क्योंकि पृथिवी का पुष्कर
अग्नि है और द्यौ का सूर्य ॥१६॥
वह अश्विन ग्रह को इस मन्त्र से लेता है— “या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनूतावती ।
तया यज्ञं मिमिक्षतम्” (यजु० ७।११, ऋ० १।२२।३) — 'हे अश्विन, यह जो तुम्हारी मीठी
और प्रसन्न करनेवाली कशा या वाणी है उससे यज्ञ को मिलाओ ।' "उपयामगृहीतोऽस्यश्विभ्यां
त्वा” (यजु० ७।११) — 'तुझे आश्रय के लिए ग्रहण किया है। दोनों अश्विनों के लिए तुझको ।'
इस मन्त्रांश से उसको रख देता है— “एष ते योनिर्मध्वीभ्यां त्वा” (यजु० ७।११) — 'यह तेरी
योनि है, मधु-प्रियों के लिए तुझे ।' 'मधु' शब्द वाली ऋचा के साथ क्यों उठाता है और 'मधु-
प्रियों के लिए तुझे' ऐसा कहकर क्यों रख देता है ? ॥१७॥
दध्यङ् अथर्वा ने 'मधु-ब्राह्मण' को अश्विनों को बताया था । यह इनका प्रिय धाम है ।
उनके इसी प्रिय से वह उनके पास जाता है। इसलिए मधु शब्द वाली ऋचा से उठाता है और
'मधुप्रियों के लिए तुझको' यह कहकर रखता है ॥१८॥
ये पात्र चिकने होते हैं । इन्द्र और वायु के पात्र के बीच में मेखला होती है । यह
इसका दूसरा रूप है । इसलिए यह दो देवों का होता है। मित्र-वरुण का पात्र बकरी की आकृति
का होता है। यह इसका दूसरा रूप है। इसलिए यह दो देवताओं का है। आश्विनों का ग्रह होंठ
की आकृति का होता है। यह उसका दूसरा रूप है, इसलिए यह दो देवताओं का है। यह पात्र
अश्विनों का इसलिए होता है कि अश्विन यज्ञ का मुख (मुख्य) हैं और मुख में होंठ होते हैं ।
इसलिए आश्विन-ग्रह होंठ की आकृति का होता है ॥१९॥
शुक्रामन्थि ग्रहौ
अध्याय २–ब्राह्मण १
शुक्र और मन्थिन् ग्रह उसकी आँख हैं। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, वह शुक्र है। चूँकि
तपता है इसलिए इसका नाम सूर्य है । चन्द्रमा मन्थी है ॥१॥
उसमें सत्तू मिलाता है। यह जो मथता है इसलिए इसका नाम मन्थी है। ये दोनों सूर्य
और चाँद इन प्रजाओं की आंख हैं, क्योंकि यदि दोनों उदय न हों तो लोगों को अपने दोनों हाथ
भी न दीखें ॥२॥
इनमें एक खानेवाला है और एक खाद्य । शुक्र खानेवाला है और मन्थी खाद्य ॥३॥
एक इनमें से खानेवाले के अनुकूल है, दूसरा खाद्य के—शुक्र खानेवाले के, मन्थिन् खाद्य
के । ये ग्रह एक के लिए जाते हैं और दूसरे के लिए इनकी आहुति दी जाती है । शण्ड और मर्क
दो असुर राक्षस हैं । इनके लिए ग्रह लिये जाते हैं और देवों के लिए इनकी आहुति दी जाती है ।
यह इस प्रकार से—॥४॥