Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 577 of 699

Read in context
Page 577

का० ४, अ० २, ब्रा० २, कं० ६-१३ शतपथब्राह्मण / ५५६
धारण किया था, इसके बाद अभी मुंह खोला गया। और चूंकि सबसे आगे वचन बोला, इसलिए
आग्रयण नाम हुआ ॥६॥
राक्षसों के डर से मौन साधन किया था। इसके पहले वह छः ग्रह लेता है। यह सातवाँ
है। वर्ष में छः ऋतुएं होती हैं। वर्ष सब है ॥७॥
सबके जीतने और भयरहित तथा हानिरहित होने पर पहले देवों ने वाणी बोली थी।
यह भी सबके जीतने पर और भयरहित तथा हानिरहित होने पर वाणी को बोलता है ॥८॥
इसको वह इस मन्त्र से ग्रहण करता है, "ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश-
स्थ। अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम् ॥ उपयामगृहीतोऽस्याग्रयणोऽसि
स्वाग्रयणः” (यजु० ७।१६,२०, ऋ० १।१३६।११) —“जो आप देव लोग, द्यौलोक में ११ हैं,
पृथिवी में ११ और जलों में (अन्तरिक्ष में) प्रकाशयुक्त ११ हैं। ये तेंतीसों देव मेरे यज्ञ को ग्रहण
करें। तू रक्षा के लिए लिया गया है तो आग्रयण है। अच्छा आग्रयण है।” इस प्रकार वाणी
जोरदार कर देता है कि एकार्थ होते हुए भी कुछ भेद कर देता है। यदि 'आग्रयणोऽसि, आग्र-
यणोऽसि' दो बार कहेगा तो एक ही बात को दुहराने का दोष आ जायगा, इसलिए पहले 'आग्र-
यणोऽसि' कहता है फिर 'स्वाग्रयणोऽसि' ॥६॥
“पाहि यज्ञं पाहि यज्ञपतिम्” (यजु० ७।२०) —अर्थात् “यज्ञ की रक्षा कर, यज्ञपति की
रक्षा कर।” यज्ञपति से यजमान का तात्पर्य है, क्योंकि यजमान ही यज्ञपति है। “विष्णुस्त्वा-
मिन्द्रियेण पातु विष्णुं त्वं पाहि” (यजु० ७।२०) —विष्णु नाम है यज्ञ का, अर्थात् “यज्ञ अपनी
शक्ति द्वारा तेरी रक्षा करे। तू यज्ञ की रक्षा कर।” “अभि सवनानि पाहि” (यजु० ७।२०) —
इससे तात्पर्य ग्रह का है क्योंकि यह (आग्रयण ग्रह) सभी सवनों में आता है ॥१०॥
(ग्रह को) छन्ने में लपेटकर हिंकार बोलता है। यह वाणी विना आश्रय के थक गई
थी। देवों ने उस थकी हुई वाणी में हिंकार के द्वारा प्राण स्थापित किये। प्राण हिंकार है। प्राण
ही हिंकार है। इसीलिए तो नाक बन्द करके हिंकार नहीं बोल सके। वह इस प्राण के द्वारा
फिर ताजा हो गई। जब थका आदमी प्राण को पाता है तो प्राण के कारण ताजा हो जाता है।
इसी प्रकार यह उस वाणी में हिंकार से प्राण को धारण कराता है। वह उस प्राण के द्वारा ताजा
होती है। हिंकार तीन बार करता है क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् (तीन लड़ी वाला) है ॥११॥
अब कहता है, "सोमः पवते” (यजु० २१) —“सोम पवित्र करता है।” असुर राक्षसों
से डरकर उन्होंने अब तक यह वाणी न बोली थी। जब सबको जीत लिया और भय-रहित तथा
हानि-रहित हो गये तब इस वाणी को स्पष्ट किया और कहा। इसलिए कहता है कि 'सोम पवित्र
करता है' ॥१२॥
“अस्मै ब्राह्मणोऽस्मै क्षत्राय” (यजु० ७।२१) —“इस ब्राह्मण के लिए, इस क्षत्रिय के
लिए।” क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए यह यज्ञ किया गया। “यजमानाय पवते” (यजु०