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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
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सौंदर्य लहरी ३२७
अर्थः—जब वह संवित् ज्ञानशक्ति विशेष गुणों से युक्त
होकर वर्णपदमंत्रविग्रहा अर्थात् पदों का रूप धारण करती है, तब
वह शब्द ब्रह्ममयी कुण्डलिनी व्यापिका (विभुः) रूप से शक्ति को
जन्म देती है, फिर शक्ति से ध्वनि (महानाद), ध्वनि से नाद, नाद
से निरोधिका, उससे अर्धेन्दु फिर बिन्दु, उससे परा, परा से पश्यन्ती
मध्यमा एवं वैखरी वाणी का जन्म होता है । वह तेजोमयी त्रिगुणा-
त्मिका कुण्डलिनी जो इच्छाज्ञानक्रिया स्वरूपा है क्रम से वर्णमाला
की सृष्टि करती है । वह विश्वात्मिका जब प्रबुद्ध होती है तब समस्त
मंत्रमय जगत् को जन्म देती है ।
नादरूपा की व्याख्या करते हुए श्रीभास्करराय कहते हैं कि
ह्रींकारादिषु विन्दोरुपर्यर्धचन्द्ररोधिनीनादनादान्तशक्ति
व्यापिकाः समनोन्मन्याख्याः सूक्ष्मसूक्ष्मतरसूक्ष्मतमरूपा अष्टौ-
वर्णा वर्तन्ते तेषुतृतीयो रूपो वर्णोनाद इत्युच्यते । नाद एव रूपं
यस्याः सा नादरूपा ।
ह्रीं आदि मंत्रों में विन्दु के ऊपर अर्धचंद्रिका, रोधिनी, नाद,
नादान्त (ध्वनि या महानाद), शक्ति व्यापिका समनी और उन्मनी
नाम वाले सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम ८ वर्ण होते हैं, उनमें
तीसरा वर्ण नाद कहलाता है । नाद है रूप जिसका वह नादरूपा ।
शक्ति के सूक्ष्मरूप को भी सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम भेद
से त्रिविध समझना चाहिये, उसका सूक्ष्म रूप पंचदशी विद्या है,
सूक्ष्मतर रूप कामकला बीजाक्षर और सूक्ष्मतम रूप कुण्डलिनी है ।
प्रथम के तीन विभाग हैं जिनको क्रमशः वाग्भवकूट, कामराजकूट

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३२८ सौन्दर्य लहरी
और शक्तिकूट कहते हैं। पूरे मंत्र को मूल पंचदशाक्षरी विद्या कहते
हैं। यह भगवती का सूक्ष्म शरीर है। जिसका स्वरूप श्लोक ३२,
३३ में दिया गया है और सूक्ष्मतर रूप कामकला का रूप श्लोक
१९ में देखें (आनंद लहरी), कुण्डलिनी का वर्णन देखें श्लोक(९,१०) ।
श्रीभास्करराय ने अपने वरिवस्या रहस्य में तीनों त्रिकूटायुक्त
पंचदशी मंत्र के गायत्र्यार्थ, भावार्थ, संप्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ,
रहस्यार्थ, महातत्वार्थ, नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ,
सामरस्यार्थ, समस्तार्थ, सगुणार्थ और महावाक्यार्थ इन १५ प्रकार से
अर्थ समझाकर भावनाकरने का उपदेश किया है। कहा भी है
‘यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी’।
पुरुषार्थानिच्छद्भिः पुरुषैरर्थाः परिज्ञेयाः ।
अर्थानादरभाजां नैवार्थः प्रत्युतानर्थः ॥
(वरिवस्यारहस्य ५६)
अर्थः—पुरुषार्थों की इच्छा रखने वाले पुरुषों को अर्थ
जानने चाहिये, अर्थ का आदर न करने वालों को अर्थसिद्धि भी
नहीं होती, प्रत्युत अनर्थ होता है
मंत्र की वर्ण संख्या, उनका उद्धार, उच्चारण का काल
और मात्रा, उच्चारण, उत्पत्ति स्थान, आकार स्वरूप और
अर्थयुक्तभावना ये विद्या के अंतरंग अवयव कहलाते हैं, और
ऋषि, छंद, देवता, विनियोग, बीजशक्ति कीलक, न्यास, ध्यान
नियम और पूजा अर्चनादि बहिरंग अवयव कहलाते हैं। प्रायः

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सौंदर्य लहरी ३२९

का उन्हें प्रायः ज्ञान नहीं होता, जिनका ज्ञान मंत्र सिद्धि के लिये
अत्यावश्यक है। क्योंकि उनके बिना उपासना को प्राणविहीन
जानना चाहिये। जैसे बीज से जड और जड से भूमि के नीचे और
ऊपर वृक्ष का फैलाव होता है, यद्यपि दोनों समान रूप से वृक्ष के
अंग हैं परन्तु भूमि के नीचे का फैलाव उसकी जान होती है। इसी
प्रकार मंत्र के अंतरंग अवयवों को मंत्र का प्राण ममझना चाहिये।
हम ऊपर कह आये हैं कि पंचदशी के १५ अक्षरों का
१५ तिथियों से संबंध है और षोडशी का १६ वां अक्षर
चितिरूपा अमावस्या अर्थात् निर्विकल्प समाधि है। वहां यह
भी बताया गया है कि एकादशी दशमीविद्धा उपोप्या नहीं मानी
जाती, वरन् द्वादशी विद्धा होनी चाहिये, नहीं तो शुद्धा द्वादशी
ही उपोप्या माननी चाहिये। इसी क्रम से मंत्र के जप और न्यास
के समय ध्यान रखना जरूरी है। इसका अध्यात्मिक अर्थ यह है
कि मूलाधार से लेकर आज्ञाचक्र के ऊपर निरोधिका तक दशमी रहती
है, निरोधिका पर एकादशी आती है, उसके ऊपर नाद पर द्वादशी
का स्थान है। इसका अर्थ यह है कि नीचे के चक्रों का संबंध ५
कर्मेन्द्रियों से है और आज्ञा से अर्धेन्दु तक ५ ज्ञानेन्द्रियों के स्थान
हैं अर्थात् १० तिथियों एवं १० अक्षरों का संबंध दस इंद्रियों से
रहता है। मन एकादशी है। उसका योग जब तक इंद्रियों से रहता
है वह उपोप्या नहीं होती, अर्थात् वह बहिर्मुख रहती है। बुद्धि को
द्वादशी, चित्त को व्योदशी, अहंकार को चतुर्दशी और महत्तत्व को
पूर्णिमा समझना चाहिये। अमावस्या निर्विकल्प स्थिति है। अव्यक्त
संचित् और प्रारब्ध संस्कारों के आशय को कहते हैं, वह कामेश्वरी है,

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३३० सौंदर्य लहरी
उसे चितिरूपाज्ञानाग्नि में शुद्ध कर लेना है, इसलिये उसकी यहां
गणना नहीं की गई ।
जैसा कि श्रुति में कहा है कि
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषःपरः ।
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परागतिः ॥ कठ (३, ११)
इसलिये
यच्छेद्वांङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥
कठ (३, १३)
अर्थात् महत्‌तत्व से सूक्ष्म अव्यक्त और अव्यक्त से सूक्ष्म परम
पुरुष है वह अंतिम सीमा है उससे परे कुछ भी नहीं और वह ही
परम गति का स्थान है, इसलिये बाणि आदि इंद्रियों को बुद्धिमान
मन में ले जाकर (रोकदे), मन को ज्ञानात्मा बुद्धि में ले जावे और
बुद्धि को महत् में और महत् को शांत आत्मा में ले जाय । इस
क्रम में अव्यक्त को छोड दिया गया है ।
यदि एकादशी रूपी मन दशमी से बिंधा रहता है, तो द्वादशी
रूपी बुद्धि को ही ग्रहण करना चाहिए, उस मन का त्याग कर
देना चाहिये ।
क्योंकि
दृश्यतेत्वग्रयाबुद्ध्या सूक्ष्मयासूक्ष्मदर्शिभिः । कठ (३, १२)

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सौंदर्य लहरी ३३१
किसी मंत्र की सिद्धि प्राप्त करने के लिये, उस मंत्र को सिद्ध
गुरु के मुख से ग्रहण करना चाहिये । गुरु की शक्ति मंत्र के साथ
शिष्य में प्रविष्ट होकर बीज का कार्य करती है, जो शिष्य के
अंतःकरण रूपी क्षेत्र में श्रद्धा की वर्षा से पोषण पाकर अंकुरित
होती है और दीर्घकालनिरंतरसत्कारासेवित् होने पर पूर्ण प्रकाश
पाती है। इसलिये गुरु, मंत्र, शक्ति, और शिव चारों की एकता
समझनी चाहिये । द्वैत की भावना में शक्ति और गुरु अथवा शिव
का प्रत्यक्ष भेद दृष्टिगोचर होता है और अद्वैत की सिद्धि के साथ
शक्ति की अपने अन्तरात्मा के साथ एकता अनुभव होने लगती है ।
इस प्रकार गुरु ईश्वर और आत्मा तीनों का एकीकरण अनुभव में
आता रहता है ।
कहा है
ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्ति भेद विभागिने ।
व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तयेनमः ॥
श्रीभगवत्पाद ने सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में शिवशक्ति की
अभिन्नता और दूसरे में सत् कारणवाद की पुष्टि करते हुए तीसरे
श्लोक में तीनों धर्म अर्थ काम की सिद्धि सहित अज्ञान तिमिर के
नाशार्थ उपासना द्वारा मोक्ष प्राप्ति की ओर लक्ष्य कराया है । ६टे
७वें श्लोकों में बहिर्ध्यान और ८वें में भगवती के अभ्यंतर चिति
शक्ति के चिदानंद लहरी स्वरूप को इंगित करके ९वें १०वें श्लोकों में
तांत्रिक योग पद्धति के अनुसार षट्चक्रवेध की ओर साधकों का
ध्यान आकर्षित किया है, क्योंकि बहिर् उपासना का पूर्ण फल कुंड-

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३३२ सौन्दर्य लहरी
लिनी के जागरणोपरांत् अन्तर्याग रूपी षड्‌चक्र बेध होकर परमतत्व
के अनुभव प्राप्त करने पर होता है ।
११ से १३ श्लोकों में बहिरुपासना के लिये ब्रह्माण्ड के
प्रतीक स्वरूप यंत्र का वर्णन और पश्चात् जगत् नियन्त्री का ध्यान
एवं अर्चन का फल कहा है, फिर १४ से २१ तक अभ्यन्तर साधन
के लिये षट्चक्रों का रहस्य और ध्यान बता कर मूलबीज मन्त्र
स्वरूप कामकला की ओर लक्ष्य कराया गया है । इस प्रकार
मन्त्रयोग द्वारा लय योग राजयोग के सोपान क्रम के पश्चात् भक्ति
उपासना से महावाक्योत्थ ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान की उपलब्धि २२ से ३०
श्लोक तक कही गई है । तत्पश्चात् श्रीविद्या की उत्कृष्टता ३१ वें
श्लोक में बता कर ३२, ३३ श्लोकों में पचदशी का उद्धार और
३४, ३५ में समष्टि व्यष्टि गत शक्ति एवं उसके परिणामों द्वारा
वाचारम्भण मात्र नामरूपात्मक व्यापारों में सूत्रात्मा शिव का अन्वय
व्यतिरेक ज्ञान से विवेचन किया गया है । और ३६ से ४१ तक
षट्चक्रों का विशेष विवरण दिया गया है । शेष ग्रन्थ में विराट्‌रूपा
भगवती के ध्यानार्थ और अन्तर्यागार्थ मानसिक उपचारों का सुन्दर
निरूपण किया गया है ।
भगवती का वर्ण अरुण अर्थात् लाल माना जाता है, इसलिये
उसका एक नाम अरुणा भी है । वेद और तन्त्र अग्नि को ही
शक्ति का रूप मानते हैं, चिदग्नि, ब्रह्माग्नि, ज्ञानाग्नि पदों के
प्रयोग इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं । अग्नि का भी वर्ण अरुण है ।
अग्नि जब शान्त हो जाती है, तब उसका अपने कारण स्वरूप ब्रह्म

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सौंदर्य लहरी ३३३
में विलिनीकरण होता है, इसी अभिप्राय से हवन में आहुतियां
देने से वे जिस जिस देवता को लक्ष्य करके दी जाती हैं, उसी
देव को पहुंचती हैं, क्योंकि ब्रह्म में सब ही देवों का समावेश है।
भगवान गीता में कहते हैं कि:—
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपिमामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ गीता (९,२३)
अहं हि सर्व यज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्तिते ॥
गीता (९,२४)
अर्थात् जो लोग श्रद्धा से युक्त होकर किसी भी अन्य देवता का
भजन करते हैं, वे मेरा ही भजन करते हैं। उनका वह भजन विधीपूर्वक
नहीं होता, क्योंकि वास्तव में सब यज्ञों का भोक्ता और प्रभु मैं ही हूं,
परन्तु वे मेरे तात्विक स्वरूप को नहीं जानते, इस लिये उनका
उपास्यभाव परमतत्व से च्युत होकर नीचे के स्तरों पर रह जाता है।
ऐतरेयब्राह्मण की श्रुति कहती है कि 'अग्निर्मुखं प्रथमो
देवतानाम्' (१,४)। अर्थात् अग्नि सब देवताओं में प्रथम
है, इसलिये सब का मुख है। शिव का प्रथम स्पन्द शक्ति के रूप में
प्रकट होता है इसलिये शक्ति ही सर्व प्रथम देवता है और वह स्वयं
अग्नि स्वरूप ही है। ललिता सहस्रनाम में भी भगवती को चिदग्निकुण्ड
सम्भूता कहा गया है अर्थात् चिद्ब्रह्म वह अग्निकुण्ड है जिसमें से
भगवती की उत्पत्ति होती है, इसीलिये महात्रिपुरसुन्दरी को चिति
शक्ति कहते हैं। चित् और चित् से उत्पन्न होनेवाली चितिशक्ति

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३३४ सौन्दर्य लहरी
एक ही हैं। ज्ञानाग्नि अज्ञान रूपी सब कर्माडम्बर को भस्मसात् कर
देती है, जैसे अग्नि सब इन्धन को भस्म कर देती है।
ज्ञानाग्निः सर्व कर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा।
( गीता ४,३७ )
अग्नि शान्त होजाने पर ईंधन की जो राख बचती है वह भी
इतनी पवित्रता लिये होती है कि किसी भी अपवित्र एवं गन्दे
पदार्थ पर डालने से उससे उत्पन्न होनेवाली घृणा को दूर कर
देती है, और अग्नि में जलकर चन्दन और विष्ठा एक समान
हो जाते हैं। इसलिये तान्त्रिक शक्ति उपासना को वैदिक अग्नि
उपासना की आश्रयीभूता याज्ञिक पद्धति का ही उपासनापर
साधनक्रम समझना चाहिये, जिस प्रकार उपनिषदों में भी अनेक
उपासनाओं का उल्लेख मिलता है। परन्तु उन सब उपासनाओं का
उपसंहार जैसे ब्रह्मात्मैक्य अनुभूति में किया गया है, वैसे ही यहां
पर भी समझना चाहिये। वेदों में 'अग्निमीळे पुरोहितम्' इत्यादि
ऋचाओं द्वारा लक्ष्य करके जिस देवता का यज्ञों में आह्वान किया
गया है, वह देवता सच्चिदानन्दरूपा ब्राह्मी शक्ति के सिवाय दूसरा
कौन हो सकता है ? यास्काचार्य ने अग्नि का अर्थ अग्रणी भी
किया है, इस अभिप्राय से भी स्थूल अग्नि द्वारा सर्वप्रथमकारणभूता
चिदग्नि की ही उपासना ग्रहणीय युक्त है। उपनिषदों में अग्नि को
ब्रह्म की एक कला कहा गया है जैसे
अग्निःकला सूर्यःकला चन्द्रःकला विद्युत्कलैष वै सौम्य
चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम। छ ० ( ४,७,३)
वाक् को भी ब्रह्म मानकर उपासना करने की विधि बताई गई है।
जैसे 'वाग्वै ब्रह्मेति' बृ० (४, १, २) 'वाचं ब्रह्मेति उपास्ति'

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सौन्दर्य लहरी ३३५
छा० (७, २, २) इत्यादि। और वाक् को अग्नि का ही सूक्ष्म-रूप
कहा गया है (तेजोमयी वाक्) इस प्रकार कारण, सूक्ष्म और स्थूल
भेद से चितिशक्ति, वाणि और स्थूल अग्नि की एकरूपता मानकर
हवन में आहुति द्वारा मंत्र का जप पूर्वक चिन्मात्र की भावना करने
से एकही ब्रह्म की सगुणोपासना की जाती है ।
वैदिक उपासना के इस सिद्धान्त के आधार पर चिदग्निकुण्ड-
सम्भूता ब्रह्ममयी शक्ति को भगवती अरुणा महात्रिपुरसुन्दरी नाम
देकर तान्त्रिक रूप दिया गया है, जो योग की एक पद्धति है
और जिसका निर्माण दीर्घ अनुभूति की नींव पर किया गया है ।
श्रीमच्छंकर भगवत्पाद ने उसे उपासकों के लाभार्थ सौन्दर्य लहरी
का सुन्दर रूप देकर वैदिक कर्मकाण्ड से अनभिज्ञ कलिकाल के
जिज्ञासुओं पर परम अनुग्रह किया है ।
संक्षेप में सब साधन पद्धतियों का समावेश इन तीन मंत्रों में
किया जाता है:—(१) ' ॐ तत् सत् ' अर्थात् वह ॐ स्वरूप
ब्रह्म सत् स्वरूप है, (२) ' सच्चिदेकं ब्रह्म ' वह सत् चित्स्वरूप भी
है और सारे चेतन जगत् में एक ही चित्सत्ता है जिसे ब्रह्म कहते हैं.
(३) ' आनन्दं ब्रह्म ' उस ब्रह्म की अनुभूति ब्रह्मानन्द के आवेश
में होती है । निम्न कोटि के साधकों को सारे जगत् में ईश्वर की
सत्ता की व्यापकता की कल्पना करने का उपदेश प्रथम मंत्र द्वारा
किया गया है, दूसरे श्रेणि के साधकों को दूसरे मंत्र के द्वारा
अपनी चेतना में ब्रह्मभावना करने का उपदेश है, जिसका अभ्यास
महावाक्यों के मनन निदिध्यासन द्वारा किया जाता है और अपने
अन्तर में आत्मानन्द के आवेश की जागृति होने पर उसकी आश्रयीभूता
आत्मस्थिति द्वारा प्राप्त होने वाली ब्राह्मी स्थिति का साधन तीसरे
भाव की प्रत्यक्ष अनुभूति है । यह अन्तिम साधन पद्धति शक्ति

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३३६ सौन्दर्य लहरी
उपासना का मुख्य विषय है और भगवत्पाद ने उस चिदानन्द के
सौन्दर्य का विशद् निरूपण सौन्दर्य लहरी के रहस्यपूर्ण पदों में किया
है । अन्त में सब साधनों का उपसंहार ‘तत् सत् सोऽहम्’ में होता है ।
प्रथम दो साधन कल्पना के विषय हैं जो प्रत्येक नरनारी की कल्पना
शक्ति पर निर्भर हैं, परन्तु अन्तिम साधन स्वात्मानुभूति का विषय
वस्तुतन्त्र होने के कारण गुरुकृपा की ही सर्वथा अपेक्षा रखता है ।
यह हम अनेक बार कह चुके हैं, कि गुरुजन शक्तिपात दीक्षा
द्वारा शिष्यों पर अनुग्रह किया करते हैं । शिष्य की कुण्डलिनी
शक्ति को जगा देने का ही नाम शक्तिपात है जैसा कि शक्तिरहस्य
के निम्नोधृत श्लोकों से स्पष्ट है,
व्यापिनी परमाशक्तिः पतितेत्युच्यते कथं ?
उर्ध्वादधोगतिःपातो मूर्तस्यासर्वगतस्य च ॥
सत्यं सा व्यापिनी नित्या सहजा शिववत् स्थिता ।
किन्त्वियं मलकर्मादिपाशबद्धेषु संवृता ॥
पक्वदोषेषु सुव्यक्ता पतितेत्युपचर्यते ।
अर्थः— वह परमाशक्ति सर्वव्यापिनी है, फिर वह पतिता
अर्थात् गिरती है ऐसा क्यों कहते हैं ? मूर्तिमान एक देशीय जो
सर्व व्यापी नहीं उसी की ऊपर से नीचे गिरने की गति को
पतन कह सकते हैं । सत्य, वह नित्य सर्वव्यापिनी है और
स्वभाव से शिववत् स्थित है किन्तु वह कर्मों के मल के पाश
से आवृत्त रहती है, जब दोषों के पक जाने पर वह
सुव्यक्त होती है, तब उसे शक्तिपात कहते हैं ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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परिशिष्ट (१)
ऋग्वेदीयं नासदासीय सूक्तम् ।
अष्टक ८, अ० ७, मं० १०, सू. १२९
परमेष्ठी प्रजापति : ऋषिः, त्रिष्टुभ् छन्दः परमात्मा देवता !
नासदासीन्नोसदासीत्तदानीं, नासीद्रजोनो व्योमा परोयत् ।
किमावरीवः कुहःकस्य शर्मन्नम्भः, किमासीद्गहनं गभीरम् ॥१६॥
अर्थ—तब न असत् था, न सत् था, रज नहीं था और
जो पराकाश हैं वह भी न था, क्या कोई आवरण था, (जैसे)
कुहरा या अंधकार ? किसकी प्रधानता थी, जल की ? क्या था ?
गहन गभीर था । (१६).
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि, न रात्र्या अह आसीत्प्रकेतः ।
आनीदवातं स्वधयातदेकं, तस्माद्धान्यन्न¹ परः किंचनाऽऽस ॥१७॥
न मृत्यु थी न अमृत था, रात्री और दिन के चिन्ह भी
नहीं थे, वह बिना वायु प्राण लेता था, वह अकेला अपनी
महिमा से पूर्ण था, और निश्चय उससे अन्य दूसरा कुछ
न था । (१७)
१ यह परं ब्रह्म ॐ का स्वरूप है ।

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२
²तम आसीत्तमसा गूळ्हमग्रेऽ प्रकेतमसलिलं सर्वमा इदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं ³यदासीत्, तपसस्तन्महिनाऽ⁴जायतैकम् ॥१८॥
पहिले तम हुआ, वह तम से छुपा हुआ था, (उसमें) यह
सब (जगत् नाम रूपात्मक प्रपंच) लिंग रहित था, वह जल
(सलिल) नहीं था ।
जो था वह तुच्छ (माया) से ढक गया, उसने तप किया,
तप की महिमा से एकँ (पुरुष) उत्पन्न हुआ । १८.
⁵कामस्तदग्रे समवर्तताधि, ⁶मनसो⁷रेतः प्रथमं यदासीत् ।
सतोबंधुमसति निरविन्दन्, हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषाः ॥१९॥
उसने पहिले संवर्तन (जगत् की सृष्टि) के लिये कामनाँ
को । (संसार के रूप में वर्तमान होने को संवर्तन कहते हैं) ।
प्रथम जो हुआ वह (उसके) मनँ की रेतँस् शक्ति हुई ।
उस असत् में सत्ँ ने अपना बंधु साथी पाया, यह बात
बुद्धिमान् सर्वज्ञ ऋषियों ने जिज्ञासा पूर्वक जानी । १९.
२ यह माया परा शक्ति ह्रीँ का रूप है, ३ यह सदाख्य तत्व श्रीँ
का स्वरूप है, ४ यह ईश्वर का ऐँ स्वरूप है, ५ यह भी ईश्वर
का क्लीँ रूप है, ६ सत् मन शुद्ध विद्या का रूप है, ७ असत्
रेतस् अशुद्ध विद्या का रूप है ।

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३
तिरश्चीनो विततोरश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरिस्विदासीत् ।
रेतोधा आसन् महिमान आसन् त्स्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥
॥२०॥
तिरछी फैलती हुई उनकी किरणें नीचे की ओर फैलीं या
ऊपर की ओर, वे शक्ति धारण किये हुए थीं, बडे विस्तार वाली
थीं, और अपने ही आधार पर दूर तक फैली हुई थीं । २०.
को अद्धावेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥२१॥
निश्चय यह किसने जाना ? किसने यहां कहा, कि कहां
से आई, कहां से यह सृष्टि हुई ? देवता तो इसके बनने के
पीछे के हैं । इसलिये किसने जाना कि कहां से हुई ? २१.
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव, यदि वा दधे यदि वा न ।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद ॥२२॥
यह सृष्टि जहां से हुई, उसको धारण किया हुआ है या
नहीं । यह बात इसका जो अध्यक्ष परमाकाश है अरे ! वह ही
जानता है, अथवा यदि नहीं जानता (तो दूसरा कौन जान
सकता है, इसलिये वह ही जानता है) । २२.
नोट:—बीज मंत्रों का उत्पत्ति क्रम जो यहां दिखाया गया
है, वह योग मार्ग का क्रम है, देखें योगशिखोपनिषद

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४
महामाया महालक्ष्मीर्महादेवी सरस्वती ।
आधार शक्ति रव्यक्ता यया विश्वंप्रवर्तते ॥ ( २-११,१२ )
दूसरा क्रम जो प्रवृत्ति मार्ग वालों को इष्ट हैं, उसके
अनुसार परा शक्ति को माया के ऊपर का स्तर मानकर 'ऐं'
बीज ग्रहण किया जाता हैं. सदाख्य स्पन्द में माया की स्थिति
बीज रूप से मानने से वहां ह्रीँ बीज माना जाता हैं; तपः पुञ्ज
ईश्वर को श्रीँ का स्थान और कामना युक्त ईश्वर को काम बीज
क्लीँ का स्थान माना जाता है । सत् और असत् दोनों शक्ति
सकार के रूप होने से सौः बीज के अन्तर्गत समाविष्ट हैं ।
और इस प्रकार दो मंत्रों का निर्माण हो जाता है ।
परिशिष्ट (२)
अथ ऋग्वेदीया त्रिपुरोपनिषत् ।
त्रिपुरोपनिषद्देद्यंपारमैश्वर्य्यवैभवम् ।
अखण्डानन्द साम्राज्यं रामचन्द्रपदं भजे ॥
ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठित-
माविरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेनाधी-
तेनाहोरात्रात् संदधामि । ऋतं वदिष्यामि, सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु, तद्वक्तारमवतु, अवतुमाम्, अवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

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२
ॐ तिस्र पुरास्त्रिपथा विश्वचर्षेणा अत्राकथा अक्षराः संनिविष्टाः
अधिष्ठायैना अजग पुराणी महत्तरा महिमा देवतानाम् ॥१॥
अर्थ—तीन पुर जिसके तीन पथ हैं, विश्व का आकषर्ण
करके धारण किये हुए है, जहां अकथ अक्षर संनिविष्ट हैं.
उसकी अधिष्ठातृ देवता अजरा, पुराणी, देवताओं की सबसे
बडी महिमा युक्त त्रिपुरा हैं ।
श्रीचक्र के मध्यस्थ त्रिकोणाकृति सर्वसिद्धिप्रद आवरण
का यहां संकेत है । तीनों भुजाओं पर सोलह २ अक्षर जानने
चाहियं, अर्थात् ▽ की ऊपर की भुजा पर अ से अः तक १६
स्वर, दाहिनी ओर भुजा पर क से त तक और तीसरी भुजा पर
थ से म तक और शेष तीन ह क्ष और ळ तीनों अक्षरों को
उसी क्रम से तीनों कोणों पर जानना चाहिये । इस क्रम में
ळकार नीचे के कोण पर आता है । इसको अकथ अथवा गुरु
चक्र भी कहते हैं, इसका स्थान सहस्रार के मध्य ब्रह्मरंध्र में है ।
यह त्रिपुरा भगवती की पीठ है । सौन्दर्य लहरी श्लोक ८ में
कहा शिवाकार मंच यह ही है
नवयोनीर्नवचक्राणि दधिरे नवैवयोगा नवयोगिन्यश्च ।
नवानां चक्रा अधिनाथा स्योना नवभद्रा नवमुद्रा महीनाम् ॥२॥
उसमें ९ योनी, और ९ चक्रों को धारण किया हुआ है,
९ ही योग हैं और ९ योगिनियां हैं । वे चक्रों की अधिनाथा
हैं जिनकी किरणें ९ भद्रा और ९ मुद्रा हैं ।

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६
सौन्दर्य लहरी के ११ वें श्लोकोक्त चार श्रीकंठ और
पांच शिव युवतियां ९ योनियां हैं। इनको वहां मूल प्रकृति
कहा गया है। ९ चक्र ९ आवरण हैं। प्रत्येक चक्र की
एक २ योगिनी है। उनके नाम प्रकट, गुप्त, गुप्ततर, संप्रदाय,
कुलोत्तीर्ण, निगर्भ, रहस्य, परा, और परपरातिरहस्य योगिनी हैं।
देखें श्लोक ११ सौंदर्य लहरी।
एका साऽसीत प्रथमा सा नवासीदासोनविंशदासोनत्रिंशत् ।
चत्वारिंशदथ तिस्रः समिधा उशतीरिव मातरो मा विशन्तु ॥३॥
अर्थ:—वह पहिले एक थी, फिर (अष्टार सहित) ९ हो
गई, (अन्तर्दशार सहित्) १९ हुई, (बहिर्दशार सहित) २९,
हुई, और (चतुर्दशार सहित ४३ हुई । ये सब प्रज्वलित
कान्ति युक्त समिधा सदृश तेजोमयी माताएं मेरे भीतर प्रवेश
करें । अर्थात मेरे शरीर में निवास करें ।
ऊर्ध्वज्वलज्ज्वलनं ज्योतिरग्रे तमो वै तिरश्चीनमजरं तद्रजोऽभूत् ।
आनन्दनं मोदनं ज्योतिरिन्दोरेता उ वै मण्डला मण्डयन्ति ॥४॥
अर्थ:—पहिले ऊर्ध्व ज्वाला युक्त प्रज्वलित ज्योति तमोगुण
हुई, बिना जीर्ण हुए अर्थात अनन्त वह जब तिरछी फैलीं, वह
रजोगुण हुआ, और आनन्द एवं मोद के देने वाली चन्द्रमा की

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७
ज्योति मत्व गुण, ये तीनों क्रमशः अग्नि, सूर्य और सोम के
मण्डल बनाती हैं ।
४३ त्रिकोणों को समिधाओं मे उपमित किया जाने से
यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि ये सब अग्नि और सूर्य मंडलों
के अन्तर्गत होने चाहिये क्योंकि चन्द्रमा को समिधा की आव-
श्यकता नहीं होती । इसलिये अष्ट दल और षोडश दल पद्म
चन्द्रमण्ड में होने चाहिये, चतुर्दशार और बहिर्दशार सूर्य मंडल
में, और अन्तर्दशार एवं अष्टार अग्नि मण्डल में । मध्य त्रिकोण
शक्ति का स्थान है और भूगृह तीनों पुर अर्थात भूर्भुवः स्वः
तीनों लोकों का प्रतीक है ।
अन्तर्दशार और बहिर्दशार के दस २ दलों को अग्नि की
दम २ कलायें, अष्टार के ८ दलों को अष्टवसु अथवा ८ दिशाओं
रुपी ८ समिधा और चतुर्दशार के १४ दलों को मप्ताह की दिन
रात्रियों रूपी १४ समिधाओं से उपमित किया जा सकता है ।
यास्तिस्रोरेखाः सदनानि भूस्त्रीस्त्रिविष्टपास्त्रिगुणास्त्रिप्रकाराः ।
एतन्त्रयं पूरकं पूरकाणां मंत्री प्रथते मदनो मदन्या ॥७॥
अर्थः—जो तीन रेखा हैं वे तीन सदन अर्थात लोक हैं,
तीन प्रकार तीन गुण हैं । इस तीन मण्डलों से बने श्रीचक्र
का कामेश्वरी मंत्र द्वारा मदन मंत्रीकरण करता है ।

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८
नोट:—मनुष्य देह ही श्रीचक्र है।
मदंतिका मानिनी मंगला च सुभागा च सा सुन्दरी सिद्धिमत्ता।
लज्जा मतिस्तुष्टिरिष्टा च पुष्टा लक्ष्मीरमा ललिता लालपंती ॥६॥
पंचदशी कादिविद्या के प्रत्येक अक्षर के अनुसार १५
शक्तियों के नाम ये हैं:---
अर्थ:—मदन्तिका, मानिनी, मंगला, सुभागा और वह
सुन्दरीत्रिपुरा; सिद्धिमत्ता, लज्जा, मति, तुष्टि, इष्टा, और पुष्टा;
लक्ष्मी, उमा, ललिता और लालपन्ती ।
इमां विज्ञाय सुधिया मदन्ती परिस्रुता तर्पयन्तः स्वपीठम्।
नाकस्य पृष्ठे महतोवसन्ति परंधाम त्रैपुरं चाविशंति ॥७॥
अर्थ:— इस विद्या को जानकर ( सुधारूपी ) मदिरा से
मदन्ती को, उसकी पीठ (श्रीचक्र) में तृप्त ( प्रसन्न ) करने वाले
महान पुरुष स्वर्ग के ऊपर वास करते हैं और त्रैपुर धाम में
प्रवेश करते हैं।
स्वपीठम् को निवसन्ति के साथ पढ़ने से इस प्रकार अर्थ
समझना चाहिये कि मदन्ती को तृप्त करने वाले महान् पुरुष
स्वर्ग के ऊपर उसकी पीठ में वास करते हैं, इत्यादि ।

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९
कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः
पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्येषा विश्वमातादिविद्या ॥८॥
अर्थः—कामः (ककार) योनिः (एकार) कामकला (ईकार)
वज्रपाणिःइन्द्र (लकार) गुहा (ह्रीं) हसा (हस) मातरिश्वा (ककार)
अभ्रं (इकार) इन्द्रः (लकार) पुनर्गुहा (ह्रीं), सकला (सकल)
मायया (ह्रीं) । यह प्रकाशवती विश्वमाता स्वरूपा आदि विद्या है ।
षष्ठं सप्तममथवह्निसारथिमस्या मूलत्रिकमादिशयन्तः ।
कथ्यं कविं कल्पकं काममीशं तुष्टुवांसो अमृतत्वं भजन्ते ॥९॥
अर्थ—ऊपर वाली विद्या के षष्ठं, सप्तम, और वह्निसारथि
अर्थात् मातरिश्वा का मूलत्रिकं (प्रथम तीन अक्षरों के स्थान पर
आदेश करने वाले साधक कथ्य (वाच्य पद) सर्वज्ञ कल्प के निर्माता
कामेश्वर को प्रसन्न करके मुक्त हो जाते हैं । (कल्पः शास्त्रे विधौ
न्याये संवर्ते ब्रह्मणो दिने) । यह लोपा मुद्रा मंत्र है ।
पुरं हन्त्रीमुखं विश्वमातूरवेरेखा स्वर-मध्यं तदेषा ।
वृहत्तिथि दर्शपंच च नित्या सषोडशीकं पुरमध्यंविभर्ति ॥१०॥
अर्थः—पुरं हन्त्रीमुखं (शिवाभिमुखं), विश्वमातुः (छंदे—
दीर्घ) विश्वमाता की, अवेः पुष्पवती की, एखा 'ए'नामाख्या, स्वर
मध्यं (स्वर हैं मध्य में) जिसके वह (विद्या), वृहत्तिथिदशपंच च
(शुक्ल पक्ष की १५ तिथियां) और षोडशीक बीज सहित नित्या

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१०
भगवती पुरके मध्य में धारण करती है । अर्थात् पुष्पवती विक-
सिता विश्वमाता की ‘ए’नामाख्या और जो शुक्ल पक्ष की १५
तिथियों युक्त है वह नित्या शिवाभिमुखसषोडशीक मध्य में स्वर-
युक्त है उसे पुरके मध्य में लिये हुए श्रीचक्र अथवा सहस्रारस्थ
अकथ चक्र को धारण करती है ।
इस श्रुति का संकेत अष्टम मंत्रोक्त विद्या की ओर और विशुद्ध
चक्र एवं श्रीचक्र के पूजन की विधि की ओर है । अर्थात्
कादिविद्या को सषोडशीक लेना चाहिये, जिसके १५ अक्षर
शुक्लपक्ष की तिथियों के सदृश विकसित हो रहे हैं । अविः से
रजस्वला स्त्री का अर्थ ग्रहण नहीं करना चाहिये । उसका अर्थ
शिवाभिमुख अर्थात् शिव की ओर मुख किये हुए मोक्ष मार्ग की
ओर ले जाने वाली होनी चाहिये । विशुद्ध चक्र जो सब स्वरों का
स्थान है उसमें उसका ध्यान करना चाहिये, जिसके दल सह-
स्रार की ओर विकसित हो रहे हैं ।
यद्वा मंडलाद्वा स्तनविम्बमेकं मुखं चाधस्त्रीणि गुहासदनानि ।
कामीकलां कामरू