सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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एक ही हैं। ज्ञानाग्नि अज्ञान रूपी सब कर्माडम्बर को भस्मसात् कर
देती है, जैसे अग्नि सब इन्धन को भस्म कर देती है।
ज्ञानाग्निः सर्व कर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा।
( गीता ४,३७ )
अग्नि शान्त होजाने पर ईंधन की जो राख बचती है वह भी
इतनी पवित्रता लिये होती है कि किसी भी अपवित्र एवं गन्दे
पदार्थ पर डालने से उससे उत्पन्न होनेवाली घृणा को दूर कर
देती है, और अग्नि में जलकर चन्दन और विष्ठा एक समान
हो जाते हैं। इसलिये तान्त्रिक शक्ति उपासना को वैदिक अग्नि
उपासना की आश्रयीभूता याज्ञिक पद्धति का ही उपासनापर
साधनक्रम समझना चाहिये, जिस प्रकार उपनिषदों में भी अनेक
उपासनाओं का उल्लेख मिलता है। परन्तु उन सब उपासनाओं का
उपसंहार जैसे ब्रह्मात्मैक्य अनुभूति में किया गया है, वैसे ही यहां
पर भी समझना चाहिये। वेदों में 'अग्निमीळे पुरोहितम्' इत्यादि
ऋचाओं द्वारा लक्ष्य करके जिस देवता का यज्ञों में आह्वान किया
गया है, वह देवता सच्चिदानन्दरूपा ब्राह्मी शक्ति के सिवाय दूसरा
कौन हो सकता है ? यास्काचार्य ने अग्नि का अर्थ अग्रणी भी
किया है, इस अभिप्राय से भी स्थूल अग्नि द्वारा सर्वप्रथमकारणभूता
चिदग्नि की ही उपासना ग्रहणीय युक्त है। उपनिषदों में अग्नि को
ब्रह्म की एक कला कहा गया है जैसे
अग्निःकला सूर्यःकला चन्द्रःकला विद्युत्कलैष वै सौम्य
चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम। छ ० ( ४,७,३)
वाक् को भी ब्रह्म मानकर उपासना करने की विधि बताई गई है।
जैसे 'वाग्वै ब्रह्मेति' बृ० (४, १, २) 'वाचं ब्रह्मेति उपास्ति'