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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 380

३३० सौंदर्य लहरी
उसे चितिरूपाज्ञानाग्नि में शुद्ध कर लेना है, इसलिये उसकी यहां
गणना नहीं की गई ।
जैसा कि श्रुति में कहा है कि
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषःपरः ।
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परागतिः ॥ कठ (३, ११)
इसलिये
यच्छेद्वांङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥
कठ (३, १३)
अर्थात् महत्‌तत्व से सूक्ष्म अव्यक्त और अव्यक्त से सूक्ष्म परम
पुरुष है वह अंतिम सीमा है उससे परे कुछ भी नहीं और वह ही
परम गति का स्थान है, इसलिये बाणि आदि इंद्रियों को बुद्धिमान
मन में ले जाकर (रोकदे), मन को ज्ञानात्मा बुद्धि में ले जावे और
बुद्धि को महत् में और महत् को शांत आत्मा में ले जाय । इस
क्रम में अव्यक्त को छोड दिया गया है ।
यदि एकादशी रूपी मन दशमी से बिंधा रहता है, तो द्वादशी
रूपी बुद्धि को ही ग्रहण करना चाहिए, उस मन का त्याग कर
देना चाहिये ।
क्योंकि
दृश्यतेत्वग्रयाबुद्ध्या सूक्ष्मयासूक्ष्मदर्शिभिः । कठ (३, १२)