सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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उपासना का मुख्य विषय है और भगवत्पाद ने उस चिदानन्द के
सौन्दर्य का विशद् निरूपण सौन्दर्य लहरी के रहस्यपूर्ण पदों में किया
है । अन्त में सब साधनों का उपसंहार ‘तत् सत् सोऽहम्’ में होता है ।
प्रथम दो साधन कल्पना के विषय हैं जो प्रत्येक नरनारी की कल्पना
शक्ति पर निर्भर हैं, परन्तु अन्तिम साधन स्वात्मानुभूति का विषय
वस्तुतन्त्र होने के कारण गुरुकृपा की ही सर्वथा अपेक्षा रखता है ।
यह हम अनेक बार कह चुके हैं, कि गुरुजन शक्तिपात दीक्षा
द्वारा शिष्यों पर अनुग्रह किया करते हैं । शिष्य की कुण्डलिनी
शक्ति को जगा देने का ही नाम शक्तिपात है जैसा कि शक्तिरहस्य
के निम्नोधृत श्लोकों से स्पष्ट है,
व्यापिनी परमाशक्तिः पतितेत्युच्यते कथं ?
उर्ध्वादधोगतिःपातो मूर्तस्यासर्वगतस्य च ॥
सत्यं सा व्यापिनी नित्या सहजा शिववत् स्थिता ।
किन्त्वियं मलकर्मादिपाशबद्धेषु संवृता ॥
पक्वदोषेषु सुव्यक्ता पतितेत्युपचर्यते ।
अर्थः— वह परमाशक्ति सर्वव्यापिनी है, फिर वह पतिता
अर्थात् गिरती है ऐसा क्यों कहते हैं ? मूर्तिमान एक देशीय जो
सर्व व्यापी नहीं उसी की ऊपर से नीचे गिरने की गति को
पतन कह सकते हैं । सत्य, वह नित्य सर्वव्यापिनी है और
स्वभाव से शिववत् स्थित है किन्तु वह कर्मों के मल के पाश
से आवृत्त रहती है, जब दोषों के पक जाने पर वह
सुव्यक्त होती है, तब उसे शक्तिपात कहते हैं ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥