Skip to content
SarvaKosh
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 385 of 415

Read in context
Page 385

सौन्दर्य लहरी ३३५
छा० (७, २, २) इत्यादि। और वाक् को अग्नि का ही सूक्ष्म-रूप
कहा गया है (तेजोमयी वाक्) इस प्रकार कारण, सूक्ष्म और स्थूल
भेद से चितिशक्ति, वाणि और स्थूल अग्नि की एकरूपता मानकर
हवन में आहुति द्वारा मंत्र का जप पूर्वक चिन्मात्र की भावना करने
से एकही ब्रह्म की सगुणोपासना की जाती है ।
वैदिक उपासना के इस सिद्धान्त के आधार पर चिदग्निकुण्ड-
सम्भूता ब्रह्ममयी शक्ति को भगवती अरुणा महात्रिपुरसुन्दरी नाम
देकर तान्त्रिक रूप दिया गया है, जो योग की एक पद्धति है
और जिसका निर्माण दीर्घ अनुभूति की नींव पर किया गया है ।
श्रीमच्छंकर भगवत्पाद ने उसे उपासकों के लाभार्थ सौन्दर्य लहरी
का सुन्दर रूप देकर वैदिक कर्मकाण्ड से अनभिज्ञ कलिकाल के
जिज्ञासुओं पर परम अनुग्रह किया है ।
संक्षेप में सब साधन पद्धतियों का समावेश इन तीन मंत्रों में
किया जाता है:—(१) ' ॐ तत् सत् ' अर्थात् वह ॐ स्वरूप
ब्रह्म सत् स्वरूप है, (२) ' सच्चिदेकं ब्रह्म ' वह सत् चित्स्वरूप भी
है और सारे चेतन जगत् में एक ही चित्सत्ता है जिसे ब्रह्म कहते हैं.
(३) ' आनन्दं ब्रह्म ' उस ब्रह्म की अनुभूति ब्रह्मानन्द के आवेश
में होती है । निम्न कोटि के साधकों को सारे जगत् में ईश्वर की
सत्ता की व्यापकता की कल्पना करने का उपदेश प्रथम मंत्र द्वारा
किया गया है, दूसरे श्रेणि के साधकों को दूसरे मंत्र के द्वारा
अपनी चेतना में ब्रह्मभावना करने का उपदेश है, जिसका अभ्यास
महावाक्यों के मनन निदिध्यासन द्वारा किया जाता है और अपने
अन्तर में आत्मानन्द के आवेश की जागृति होने पर उसकी आश्रयीभूता
आत्मस्थिति द्वारा प्राप्त होने वाली ब्राह्मी स्थिति का साधन तीसरे
भाव की प्रत्यक्ष अनुभूति है । यह अन्तिम साधन पद्धति शक्ति