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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 379 of 415

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Page 379

सौंदर्य लहरी ३२९

का उन्हें प्रायः ज्ञान नहीं होता, जिनका ज्ञान मंत्र सिद्धि के लिये
अत्यावश्यक है। क्योंकि उनके बिना उपासना को प्राणविहीन
जानना चाहिये। जैसे बीज से जड और जड से भूमि के नीचे और
ऊपर वृक्ष का फैलाव होता है, यद्यपि दोनों समान रूप से वृक्ष के
अंग हैं परन्तु भूमि के नीचे का फैलाव उसकी जान होती है। इसी
प्रकार मंत्र के अंतरंग अवयवों को मंत्र का प्राण ममझना चाहिये।
हम ऊपर कह आये हैं कि पंचदशी के १५ अक्षरों का
१५ तिथियों से संबंध है और षोडशी का १६ वां अक्षर
चितिरूपा अमावस्या अर्थात् निर्विकल्प समाधि है। वहां यह
भी बताया गया है कि एकादशी दशमीविद्धा उपोप्या नहीं मानी
जाती, वरन् द्वादशी विद्धा होनी चाहिये, नहीं तो शुद्धा द्वादशी
ही उपोप्या माननी चाहिये। इसी क्रम से मंत्र के जप और न्यास
के समय ध्यान रखना जरूरी है। इसका अध्यात्मिक अर्थ यह है
कि मूलाधार से लेकर आज्ञाचक्र के ऊपर निरोधिका तक दशमी रहती
है, निरोधिका पर एकादशी आती है, उसके ऊपर नाद पर द्वादशी
का स्थान है। इसका अर्थ यह है कि नीचे के चक्रों का संबंध ५
कर्मेन्द्रियों से है और आज्ञा से अर्धेन्दु तक ५ ज्ञानेन्द्रियों के स्थान
हैं अर्थात् १० तिथियों एवं १० अक्षरों का संबंध दस इंद्रियों से
रहता है। मन एकादशी है। उसका योग जब तक इंद्रियों से रहता
है वह उपोप्या नहीं होती, अर्थात् वह बहिर्मुख रहती है। बुद्धि को
द्वादशी, चित्त को व्योदशी, अहंकार को चतुर्दशी और महत्तत्व को
पूर्णिमा समझना चाहिये। अमावस्या निर्विकल्प स्थिति है। अव्यक्त
संचित् और प्रारब्ध संस्कारों के आशय को कहते हैं, वह कामेश्वरी है,