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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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ॐ तिस्र पुरास्त्रिपथा विश्वचर्षेणा अत्राकथा अक्षराः संनिविष्टाः
अधिष्ठायैना अजग पुराणी महत्तरा महिमा देवतानाम् ॥१॥
अर्थ—तीन पुर जिसके तीन पथ हैं, विश्व का आकषर्ण
करके धारण किये हुए है, जहां अकथ अक्षर संनिविष्ट हैं.
उसकी अधिष्ठातृ देवता अजरा, पुराणी, देवताओं की सबसे
बडी महिमा युक्त त्रिपुरा हैं ।
श्रीचक्र के मध्यस्थ त्रिकोणाकृति सर्वसिद्धिप्रद आवरण
का यहां संकेत है । तीनों भुजाओं पर सोलह २ अक्षर जानने
चाहियं, अर्थात् ▽ की ऊपर की भुजा पर अ से अः तक १६
स्वर, दाहिनी ओर भुजा पर क से त तक और तीसरी भुजा पर
थ से म तक और शेष तीन ह क्ष और ळ तीनों अक्षरों को
उसी क्रम से तीनों कोणों पर जानना चाहिये । इस क्रम में
ळकार नीचे के कोण पर आता है । इसको अकथ अथवा गुरु
चक्र भी कहते हैं, इसका स्थान सहस्रार के मध्य ब्रह्मरंध्र में है ।
यह त्रिपुरा भगवती की पीठ है । सौन्दर्य लहरी श्लोक ८ में
कहा शिवाकार मंच यह ही है
नवयोनीर्नवचक्राणि दधिरे नवैवयोगा नवयोगिन्यश्च ।
नवानां चक्रा अधिनाथा स्योना नवभद्रा नवमुद्रा महीनाम् ॥२॥
उसमें ९ योनी, और ९ चक्रों को धारण किया हुआ है,
९ ही योग हैं और ९ योगिनियां हैं । वे चक्रों की अधिनाथा
हैं जिनकी किरणें ९ भद्रा और ९ मुद्रा हैं ।