सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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भगवती पुरके मध्य में धारण करती है । अर्थात् पुष्पवती विक-
सिता विश्वमाता की ‘ए’नामाख्या और जो शुक्ल पक्ष की १५
तिथियों युक्त है वह नित्या शिवाभिमुखसषोडशीक मध्य में स्वर-
युक्त है उसे पुरके मध्य में लिये हुए श्रीचक्र अथवा सहस्रारस्थ
अकथ चक्र को धारण करती है ।
इस श्रुति का संकेत अष्टम मंत्रोक्त विद्या की ओर और विशुद्ध
चक्र एवं श्रीचक्र के पूजन की विधि की ओर है । अर्थात्
कादिविद्या को सषोडशीक लेना चाहिये, जिसके १५ अक्षर
शुक्लपक्ष की तिथियों के सदृश विकसित हो रहे हैं । अविः से
रजस्वला स्त्री का अर्थ ग्रहण नहीं करना चाहिये । उसका अर्थ
शिवाभिमुख अर्थात् शिव की ओर मुख किये हुए मोक्ष मार्ग की
ओर ले जाने वाली होनी चाहिये । विशुद्ध चक्र जो सब स्वरों का
स्थान है उसमें उसका ध्यान करना चाहिये, जिसके दल सह-
स्रार की ओर विकसित हो रहे हैं ।
यद्वा मंडलाद्वा स्तनविम्बमेकं मुखं चाधस्त्रीणि गुहासदनानि ।
कामीकलां कामरू