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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

६३- तत्त्वज्ञानी संतोंके शील-स्वभावका वर्णन तथा सत्सङ्गका महत्त्व

निर्वाण-प्रकरण उ०] * शिव और शक्तिके यथार्थ स्वरूपका विवेचन * ६०१


प्रचण्ड सूर्य आदिकी ज्योतियोंसे सुखायी जाती है; इसलिये उसे 'शुष्का' भी कहते हैं। दुष्टोपर स्वभावतः अत्यन्त क्रोध करनेके कारण वह 'चण्डिका' कही गयी है। उसकी अङ्गकान्ति उत्पल-नील कमलके समान है; इसलिये उसका नाम 'उत्पला' भी है। एकमात्र जयमें प्रतिष्ठित होनेके कारण उसे 'जया' कहा गया है। सिद्धियोंका आश्रय होनेसे वह 'सिद्धा' कही गयी है। चूँकि जया है, इसीलिये 'जयन्ती' भी है। विजयका आधारभूत होनेसे उसे 'विजया' कहा गया है। अत्यन्त पराक्रमके कारण वह 'अपराजिता' नामसे प्रसिद्ध है। उसका निग्रह करना किसीके लिये भी दुष्कर कार्य है, अतः उसका नाम 'दुर्गा' है। ओंकारकी सारभूता शक्ति होनेसे वह 'उमा' कही गयी है। अपने मन्त्रका गान या जप करनेवालोंके लिये त्राणकारक तथा परमपुरुषार्थरूप होनेके कारण उस देवीका नाम 'गायत्री' है। जगत्के प्रसवकी भूमि होनेसे उस जगज्जननीका नाम 'सावित्री' है। स्वर्ग और अपवर्गके साधनभूत कर्म उपासना एव ज्ञानमयी दृष्टियोंका प्रसार करनेके कारण उस देवीको 'सरस्वती' कहा गया है। पार्वतीरूपमें उस देवीके अङ्ग और शरीर अत्यन्त गौर हैं, इसलिये वह 'गौरी' कहलाती है। वह महादेवजीके आधे शरीरमें संयुक्त है (अतएव भगवान् शिवको 'अर्धनारीश्वर' कहते हैं)। सुप्त और जाग्रत् जितने भी त्रिभुवनके प्राणी हैं, उनके हृदयमें नित्य-निरन्तर अकारादि मात्राओंसे रहित शब्दब्रह्म (प्रणव) के नादका उच्चारण होता रहता है। वह नाद अर्धमात्रास्वरूप होनेसे 'इन्दुकला' कहलाता है। वह इन्दुकला ही 'उमा' है। शिव और शिवा (रुद्र और काली) दोनों ही आकाशरूप हैं। अतः उनका शरीर काला दिखायी देता है (इसीलिये उन्हें काल-भैरव और काली कहते हैं)।

स्पन्दन (स्फुरण) मात्र ही जिसका एक स्वरूप है, वह भगवती काली 'क्रियाशक्ति' है। वही 'दान दे', 'स्नान करे' और 'अग्निमें आहुति दे' इत्यादि विधि-वाक्योंद्वारा विहित दान, स्नान और यज्ञ आदि श्रेष्ठ शरीर धारण करती है। वास्तवमें वह अनादि, अनन्त चिति-शक्ति है और अपनी इच्छासे ही अपनेमें सम्पूर्ण वैदिक क्रियारूपसे प्रकाशित होती है। वह आकाश-रूपिणी है। वही स्पन्दन (स्फुरण) रूप धर्मवाली कान्तिमती दृश्य लक्ष्मीके रूपमें प्रकट होती है। उस काली देवीके जो नाना प्रकारके अभिनय और नृत्य हैं, वे ही ब्रह्माजीकी सृष्टिमें ये जन्म, जरा और मरणकी रीतियाँ हैं। वह नील कमलिनीके समान कान्तिवाली होनेके कारण 'काली' कहलाती है। वही 'क्रियाशक्ति' एवं 'ब्रह्माण्डकालिका'¹ कही गयी है। वह अपने ही अवयवभूत इस दृश्य लक्ष्मीको हृदयमें धारण करती है।

रघुनन्दन जैसे शून्यता आकाशका अङ्ग है, गतिशीलता वायुका अङ्ग है, चाँदनीमें खिलनेवाले कुमुद आदि पुष्प चाँदनीके अङ्ग हैं, उसी तरह क्रिया एवं दृश्य-जगत् चितिशक्तिके अङ्ग हैं। वास्तवमें उसका स्वरूप शिव, शान्त, आयासरहित, अविनाशी एवं निर्मल समझना चाहिये। उसमें थोड़ी-सी भी निश्चलता या चेष्टाशीलता नहीं है। इसलिये चितिशक्तिके खजानेमें मौजूद सारी सृष्टिपरम्पराएँ आत्माकी सत्यताके कारण ही सत्य प्रतीत होती हैं। वह भी उसीको, जो उनकी भावना करता है। दूसरेके लिये वे सब-की-सब असत्य ही हैं। भूत, भविष्यत् और वर्तमानके जितने भी संकल्प तथा स्वप्नके नगरसमूह हैं, वे सब सत्य ही हैं, अन्यथा वह परब्रह्म सर्वरूप है, यह कथन कैसे ठीक हो सकता है? अन्य देशोंमें स्थित जो पर्वत, ग्राम आदि हैं, वे वहाँ जानेसे दूसरेको भी उपलब्ध होते हैं, उसी तरह कोई योगसिद्ध पुरुष यदि परकायप्रवेश-सिद्धिके द्वारा स्वप्नद्रष्टाके हृदयमें जाकर उसका मनरूप होकर देखे तो वह उसके स्वप्नगत पदार्थोंको उपलब्ध कर सकता है। जैसे गाढ़ निद्रामें


१. ब्रह्माण्डरूपी बीजकोशोंका निर्माण करनेवाली।

६०२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सोये हुए पुरुषको उठाकर एक स्थानसे दूसरे स्थानपर रख दिया जाय तो भी उसके शरीरके लुढ़के होनेपर भी उसका स्वप्नगत नगर नहीं लुढ़कता है; वैसे ही नृत्य करती हुई कालरात्रिके शरीरके चालित होनेपर

भी उसके भीतर सोया हुआ जगत् न तो चालित होता और न लोटता है। जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्ब होता है, उसी तरह कालीके शरीरमें जगत्की स्थिति है।

(सर्ग ८४)


प्रकृतिरूपा कालरात्रिके परमतत्त्व शिवमें लीन होनेका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो तत्त्वज्ञ नहीं हैं, उनकी दृष्टिमें वह चितिशक्ति ही क्रिया-रूप है। वह अनामय (निर्विकार) है तथापि स्वभावसे ही नृत्य करती है। उस क्रिया-रूपा चिति-शक्तिके कुदाल और पिटारी आदि आभूषण हैं। जैसे वायुकी गति या चेष्टा वायुसे भिन्न नहीं है, वैसे ही शिवस्वरूप परमात्माकी इच्छा-स्वरूपा वह कालरात्रि उससे भिन्न नहीं है। जैसे वायुके भीतरकी चेष्टा वायुरूप ही है; अतएव उसे चेष्टा नहीं भी कह सकते हैं, वैसे ही शिवकी इच्छा शिवके स्वरूपसे भिन्न नहीं है, अतएव शिवरूप ही है। इसलिये वह अनिच्छा ही है। इस दृष्टिसे शिवमें इच्छाका अभाव है।

वह कालरात्रि जब उस महाकाशमें नृत्य कर रही थी, उस समय उसने प्रेमावेशवश स्वयं अपने आवरणकारी अंशको हटाकर निकटवर्ती शिवका वैसे ही स्पर्श कर लिया, जैसे समुद्रजलकी रेखा अपने नाशके लिये ही वडवानलका स्पर्श कर लेती है। परम कारणरूप शिवका स्पर्श होते ही वह कालरात्रि धीरे-धीरे क्षीण होकर अव्यक्त भावको प्राप्त होने लगी। पहले तो वह अपने विशाल आकारका परित्याग करके पर्वताकार बन गयी। फिर नगराकार होकर विचित्र कल्पना-रूप पल्लवसे सुशोभित वृक्षके समान सुन्दरी बन गयी। इसके बाद उस आकारको भी छोड़कर वह व्योमाकार हो शिवके ही स्वरूपमें वैसे ही प्रविष्ट हो गयी, जैसे नदी अपने वेगको शान्त करके महासागरमें मिल जाती है। तदनन्तर शिवासे रहित हो वे शिवस्वरूप परमात्मा एकाकी शिवरूपमें ही शेष रह गये। उस पूर्ववर्णित आकाशमें वे सर्वसंहारकारी रुद्र सारे उपद्रवोंकी शान्ति होनेपर अकेले शान्तभावसे स्थित हुए।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! शिवजीका स्पर्श प्राप्त होते ही वह परमेश्वरी शिवा क्यों शान्त हो गयी ? यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वह शिवा परमेश्वर शिवकी इच्छारूपा प्रकृति कही गयी है। वही जगन्मायाके नामसे विख्यात है। वह परमेश्वर शिवकी स्वाभाविक स्पन्द-शक्ति है। वे परमेश्वर प्रकृतिसे परे पुरुष कहे गये हैं। वायु भी उन्हींका स्वरूप है। वे शिवरूप-धारी शान्त परमात्मा शरत्कालके आकाशकी भाँति निर्मल एव परम शान्तिमान् हैं। स्पन्दन (स्फुरणा या चेष्टा) मात्र ही जिसका स्वरूप है, वह परमेश्वरकी इच्छारूपा चिति-शक्ति भ्रमरूपिणी प्रकृति है। वह तभीतक इस संसारमें भ्रमण करती है, जबतक कि नित्य-तृप्त, निर्विकार, अजर, अनादि, अनन्त एवं अद्वैत परमात्मा शिवका साक्षात्कार नहीं कर लेती। यह प्रकृति एकमात्र चैतन्यधर्मिणी है। अतः उसे चिति-शक्ति ही समझना चाहिये। यह चिति देवी जब शिवका स्पर्श करती है, तब पूर्णतः शिवस्वरूप ही हो जाती है। जैसे नदी समुद्रका स्पर्श करते ही अपने नाम और रूपको त्यागकर उसके भीतर समा जाती है, वैसे ही प्रकृति पुरुषका स्पर्श प्राप्त करते ही उसके भीतर एकताको प्राप्त हो अपनी प्रकृति-रूपताका परित्याग कर देती