सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

५८- श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जल और तेजस्-तत्त्वकी धारणासे प्राप्त हुए अनुभवका उल्लेख

५९० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ


ब्रह्मा और जगत्‌की एकताका स्थापन तथा द्वादश सूर्योंके उदयसे जगत्‌के प्रलयका रोमाञ्चकारी वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघवेन्द्र ! ये विराटरूपधारी विधाता समष्टि मनरूप होनेके कारण स्वयं ही मन हैं, अतः इनके लिये दूसरे मनकी आवश्यकता नहीं है। यही नहीं, ये विराट् पुरुष स्वयं ही इन्द्रियाँ हैं। अतः इन्हें दूसरी इन्द्रियोंके उपभोगकी आवश्यकता नहीं होती। इन्होंने ही तो अन्य सब शरीरोंमें इन्द्रियोंकी सृष्टि की है। इन्द्रियसमुदाय इनकी कल्पनामात्र ही है। इन्द्रिय और चित्तमे अवयवावयवी-भाव सम्बन्ध है। इन्द्रियाँ अवयव हैं और चित्त अवयवी--इन दोनोंका शरीर एक है, अतः इनमें थोडा-सा भी भेद नहीं है। पूर्णतः एकता है। संसारके जो कोई भी कार्य हैं, वे सब-के-सब उस विराट् पुरुषके ही हैं। क्योंकि ब्रह्माके संकल्प ही विभिन्न व्यष्टि वृत्तिसे अपनेमें भेदका आरोप करके जगद्-व्यवहारके रूपमें चल रहे हैं। उसीकी सत्तासे अनन्ताकार जगत्‌की सत्ता है और उसके संकल्पके उपसंहारसे ही जगत्‌का संहार है। वायु और उसकी चेष्टामें जैसी एकता है, वैसी ही एकता या एकसत्ता ब्रह्मा और जगत्‌की भी है। जगत्, ब्रह्मा और विराट्—ये तीनों पर्यायवाची शब्द हैं। जगत् और ब्रह्मा शुद्ध चेतनाकाशरूप परमात्माके संकल्पमात्र ही हैं।

रघुनन्दन ! मेरे सामने ब्रह्मलोक था। ब्रह्माजी ध्यानमग्न हो गये थे। मैंने धीरे-धीरे सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टि डाली। उस समय अपने सम्मुख देखा, मध्याह्न कालमें तपते हुए सूर्यके अतिरिक्त पश्चिम दिशामें भी एक दूसरा सूर्य प्रकट हुआ, जो स्पष्ट दिखायी देता था वह पश्चिम दिशाके मध्यभागमें दाह-सा उत्पन्न कर रहा था, मानो किसी पर्वतके ऊपर वहाँकी वनस्थलीमें दावानल प्रज्वलित हो उठा हो। आकाशमें अग्निलोक प्रकट हो गया हो अथवा महासागरमें बड़वाग्नि उद्दीप्त हो उठी हो। फिर तो क्रमशः नैर्ऋत्यकोण, दक्षिण दिशा, अग्निकोण, पूर्वदिशा, ईशान कोण, उत्तर दिशा, वायव्यकोण तथा पश्चिम दिशामें भी एक-एक सूर्य प्रकाशित हो उठा। उन सबको देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं विधाताकी प्रतिकूलतापर विचार करने लगा। इतनेमें ही भूतलसे भी शीघ्र ही एक सूर्य प्रकट हुआ, मानो समुद्रसे बड़वानल ऊपरको उठ गया हो। फिर दिशाओंके मध्यवर्ती आकाशमें ग्यारहवाँ सूर्य उदित हुआ। दिशाओके मध्यवर्ती सूर्यको ग्यारहवाँ कहा गया है, इससे सिद्ध होता है कि उसके ऊपर भी बारहवाँ सूर्य प्रकट हो चुका था। इस प्रकार एक भूतलपर, एक मध्य आकाशमें और एक उससे भी ऊपर—तीन सूर्य एकके ऊपर एकके क्रमसे दिखायी देते थे। इस तरह कुल मिलाकर बारह सूर्य प्रकट हुए थे। इनमें ग्यारहवाँ सूर्य भगवान् रुद्रका ही शरीर था और उसके भीतर तीन सूर्योंके रूपमें मानो तीन नेत्र प्रकट हो गये थे। वह अकेला ही बारह सूर्योंके बराबर देदीप्यमान था। वह बारह सूर्योंका समुदाय-सा जान पड़ता था, जो सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रचण्ड दाह उत्पन्न कर रहा था। जैसे दावानल सूखे वनको जला देता है, वैसे ही वह समस्त जगत्‌को दग्ध करने लगा। इन सूर्योंके उदय होनेसे समस्त ब्रह्माण्डमण्डलको सुखा देनेवाला ग्रीष्म ऋतुका भीषण दिन प्रकट हो गया था। कहीं भी उल्मुको (लुआठो) के समूह नहीं दिखायी देते थे। बिना अग्निके ही अग्निदाह हो रहा था (अर्थात् सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंसे ही सब कुछ स्वाहा हो रहा था, लौकिक अग्नि नहीं दिखायी देती थी)। कमलनयन श्रीराम ! बिना अग्निके ही होनेवाले उस अग्निदाहसे मेरे सारे अङ्ग दावानलसे झुलसे हुएकी भाँति व्यथित हो उठे। तब मैं उस प्रदेशको छोड़कर बहुत दूर चला आया।


१. पश्चिम दिशामें सूर्यके प्रकट होनेका जो पहले वर्णन आ गया है, उसका यहाँ अनुवादमात्र है। तात्पर्य यह कि अबतक आठों दिशाओं तथा मध्याह्नकालिक सूर्यको लेकर नौ सूर्य वसिष्ठजीके दृष्टिपथमें आ गये थे।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * ब्रह्म और जगत्की एकताका स्थापन * ५९१


राघवेन्द्र ! वहाँसे मैने दसो दिशाओंमें उदित हो तपते हुए बारह सूर्योंके समुदायको देखा, जिसके प्रचण्ड तेजसे सातों विशाल महासागर काढ़ेकी भाँति खौल रहे थे और उनसे महान् खन्-खन् शब्द प्रकट हो रहा था। समस्त लोकों और नगरोंके भीतरी भाग प्रचण्ड ज्वालाओ तथा अंगारोंसे भर गये थे। आगकी लपटें लाल रंगके गाढ़े कपड़ोंके समूहकी भाँति दिखायी देती थीं, जिन्होने सारे पर्वतोंको सिन्दूरी-रंगका बना दिया था। लोकपालो-के जलते हुए बड़े-बड़े घरोंमें ज्वालाव्याप्त दिशारूपी वस्त्र सुस्थिर विद्युत्की भाँति दीप्तिमान् दिखायी देते थे। नगरोंके समूह कटकट और चटचट शब्दके कोलाहलसे परिपूर्ण हो रहे थे। भूतलसे शिलाके समान घनीभूत दण्डाकार धूम प्रकट करके वे बारह सूर्य समस्त भुवनोंके निवासमण्डपको मानो सहस्रों काँचके खम्भोंसे सुशोभित कर रहे थे। प्राणियोंके निवासभूत नगरोंके धराशायी होने और फटनेसे भयानक चटचट शब्द हो रहे थे। तारे टूट-टूटकर गिर रहे थे। सभी स्थानोंमें अपने-अपने घरोंके भीतर तापसे जलते हुए जन-समुदाय इधर-उधर भाग रहे थे। चीखने-चिल्लानेके साथ मरे-पचे प्राणियोंके दग्ध शरीरोंसे सम्पूर्ण दिशाओंमें दुर्गन्ध फैल रही थी। समुद्रकी तपी हुई जलराशिमें राँधे जाते हुए जलचरोंके समुदाय छटपटा रहे थे। सम्पूर्ण दिशाओंमें फैली हुई आगसे गाँवों और नगरोंका सब कुछ स्वाहा हो गया था। वहाँ कोई रोनेवाला भी नहीं रह गया था। दिग्गजोंके शरीर दग्ध होकर फट गये थे। वे अपने दाँतोंसे दिगन्त पर्वतोंको उठाये हुए ही जल गये थे। पर्वतोंकी गुफाओंमें भरे हुए धूममण्डल उन सूर्योंके कुण्डलोसे जान पडते थे। धराशायी होते हुए पर्वतोंसे पिसकर कितने ही नगरोंके समुदाय चूर-चूर हो गये थे। गिरिराजोंपर निवास करनेवाले गजराजोंको वे सूर्यमण्डल पच-पचकी आवाजके साथ पका रहे थे। संतापसे तप्त होकर उछलते हुए प्राणियोंको देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो उनके निवासभूत समुद्रों और पर्वतोंको भी ज्वर आ गया हो। उन सूर्योंके तापसे हृदय फट जानेके कारण नि स्सार हुए त्रिदशर और उनकी अङ्गनाएँ नीचे गिर रही थीं। दुष्ट लोग जोर-जोरसे रोने-चिल्लानेके कारण थक गये थे और कुछ योगी लोग ब्रह्मरन्ध्रको फोड़कर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त हो अमर पद (मोक्ष) में प्रतिष्ठित हो चुके थे। स्वर्गलोकमें जलती हुई ज्वालाओद्गार भूतलसे लेकर पातालतकका भाग खूब तप रहा था। सूखते हुए समुद्रमे निरन्तर पकते हुए भयंकर जलचर उछलते और छटपटाते दिखायी देते थे। जलरूपी इन्धन न मिलनेसे मानो वडवानल उछलकर आकाशमें चला गया था और वहाँ सहस्रो रूप धारण करके मानो गगनाङ्गनाओको पकड़कर नृत्य कर रहा था। महाप्रलयकालका प्रचण्ड अनल ज्वालारूपी पलाश-पुष्पके समान लाल रंगवाले वस्त्रसे सुशोभित हो नटराजकी भाँति ताण्डव नृत्य-सा करनेके लिये उद्यत हुआ था। उन्मुक्त ही मानो उसके लिये पुष्पहार थे। वेगसे फटने हुए बाँस आदिके फट-फट शब्द मानो उसके पैरोंकी धमक थे। वह उद्भट भटकी भाँति वीरोचित शब्द करता हुआ कालरूपी भुजाओको ऊपर उठाये, धूमरूपी केश छिटकाये, जगतरूपी जीर्ण कुटीमें नृत्य कर रहा था। उस समय वनोंके समूह, ग्राम, नगर, मण्डल, द्वीप, दुर्ग, जंगल, स्थल, पृथ्वीके समस्त छिद्र, उसके ऊपरका महान् आकाश, दसों दिशाएँ, द्युलोक तथा उसके ऊपरका भाग-ये सब-के-सब जल रहे थे। गड्ढे, रहट, बाजार. हाट. अट्टालिका और नगरसमूहमे सुशोभित दिशाओंके तटप्रान्त, पर्वतोंके शिखर, सिद्धोंके समूह, पर्वत, मगर, सरोवर, तालाब, तलैया, नदी, देवता, असुर, मनुष्य, सर्प तथा पुरुष-समूह रुद्रदेवके नेत्रोंकी सनसनाती हुई ज्वालाओसे दग्ध हो रहे थे।

अनेक सूर्योंके उदय और अस्त आदिसे विन्ध्याचल भी व्यथित हो उठा था । आकाश अग्निरूपी कमलोसे सुशोभित सरोवरके समान दिखायी देता था ।