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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

२—द्रष्टाकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्‌की असत्ता तथा ज्ञाताके कैवल्यकी ही मोक्षरूपताका प्रतिपादन

मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९५


रूपमें विस्तृत रूपसे शोभित होता है। वह विचार शरीर आदिमें दृश्यताभासको देखकर 'यही मेरा स्वरूप है' यों मोहवश धारणा करके स्थित है। उसको अपना रूप जहाँ, जैसे और जिस प्रकारका प्रतीत होता है, वह वैसा ही हो जाता है। वह सर्वात्मा जहाँ जिस प्रकार आविर्भूत होता है, वहाँ वैसे ही तत्काल स्थिर हो जाता है और उसे अपना ही स्वरूप मानकर सुशोभित होता है। सर्वात्मकताके कारण द्रष्टा में दृश्यत्वका आरोप होता है। वह दृश्यत्व द्रष्टाकी उपस्थिति में ही सम्भव है, अन्यथा दृश्यता भी वास्तविक नहीं है। अतः प्रत्यक्ष ही कारणरहित अद्वितीय ब्रह्मरूपसे सिद्ध हुआ स्थित है। वही सभी प्रमाणोंका निर्माता है, क्योंकि अनुमान आदि प्रमाण प्रत्यक्षपूर्वक होनेके कारण उसीके अंश हैं। स.शुद्धभाव राम! अपने कर्ममात्रको दैव—प्रारब्ध मानकर उसकी उपासना करनेवाला इन्द्रियजयी पुरुष उस दैव-शब्दार्थ अर्थात् प्रारब्धको दूर हटाकर अपने पुरुषार्थ-द्वारा उस परम पदको अपने भीतर ही प्राप्त करता है।

रघुनन्दन ! पहले संत-समागमरूपी युक्तिके द्वारा बलपूर्वक अपनी बुद्धिको बढ़ाना उचित है। तत्पश्चात् महापुरुषोंके लक्षणोंके अनुकरणसे अपनेमें महापुरुषता लानी चाहिये। इस जगत्में जो-जो पुरुष जिस-जिस गुणसे विशेषरूपसे सम्पन्न है, वह उसी गुणके द्वारा विशिष्ट समझा जाता है; अतः शीघ्र ही उस पुरुषसे वह गुण प्राप्त करके अपनी बुद्धिकी वृद्धि करनी चाहिये। जैसे कमलसे सरोवर और सरोवरसे कमल परस्पर उन्नति-लाभ करते हैं, उसी तरह ज्ञानसे शम आदि गुण और शम आदि गुणोंसे ज्ञान—ये परस्पर वृद्धिगत होते रहते हैं। सत्पुरुषोंके सदाचरणसे ज्ञानकी और ज्ञानसे सत्पुरुषोंके आचरणकी वृद्धि होती है। यों ज्ञान और सत्पुरुषोंके आचरण परस्पर एक-दूसरेके सहयोगसे बढ़ते रहते हैं। तात ! जबतक इस संसारमें ज्ञान और सदाचारका समानरूपसे अभ्यास नहीं किया जाता, तबतक पुरुषको इन दोनोंमेंसे एककी भी सिद्धि नहीं होती। रघुनन्दन ! जिस प्रकार मैंने सदाचारके क्रमका वर्णन किया है, उसी तरह अब आगे ज्ञानक्रमका भलीभाँति उपदेश करूँगा। यह सद्-शास्त्र कीर्तिकारक, आयुवर्धक और परम पुरुषार्थरूप फल प्रदान करनेवाला है; अतः बुद्धिमान् पुरुषको इस शास्त्रके ज्ञानसे सम्पन्न आप्त पुरुषसे इसका श्रवण करना चाहिये।

( सर्ग १७—२० )

॥ मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण सम्पूर्ण ॥

उत्पत्ति-प्रकरण

दृश्य जगत्के मिथ्यात्वका निरूपण, दृश्य ही बन्धन है और उसका निवारण होनेसे ही मोक्ष होता है, इसका प्रतिपादन तथा द्रष्टाके हृदयमें ही दृश्यकी स्थितिका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जिसमें मुमुक्षुओंके व्यवहारोंका ही प्रधानरूपसे वर्णन है, उस मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरणके बाद अब मैं इस उत्पत्ति-प्रकरणका वर्णन करता हूँ । जबतक दृश्य जगत्‌की सत्ता है, तभीतक यह जन्म-मृत्युरूप संसारका बन्धन है । दृश्य-का अभाव हो जानेसे बन्धन कदापि नहीं रह सकता । यह दृश्य जगत् जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह बता रहा हूँ । तुम क्रमशः ध्यान देकर सुनो । संसारमें जो उत्पन्न होता है, वही वृद्धि एवं क्षयको प्राप्त होता है । वही बँधता और मोक्षको प्राप्त होता है तथा वही स्वर्ग या नरकमें पड़ता है । अपने स्वरूपका बोध न होनेसे ही बन्धन है । इसलिये स्वरूपके बोधके लिये ही मैं आगेकी बात बता रहा हूँ ( इससे तुम्हें यह ज्ञात होगा कि यह दृश्य प्रपञ्च कभी हुआ ही नहीं ) । उत्पत्ति आदिका सम्बन्ध इस दृश्य जगत्‌से ही है ( आत्मासे नहीं ) । आत्मा तो दृश्यकी उत्पत्तिसे पहले जैसा रहा है, वैसा ही उसकी उत्पत्तिके बाद भी है ( वह सदा ही एकरस रहता है ) जैसे सुषुप्तिमें स्वप्नके संसारका अभाव हो जाता है, उसी तरह यह जो समस्त चराचर जगत् दिखायी देता है, इसका कल्पके अन्तमें विनाश ( अभाव ) हो जाता है । तत्पश्चात् निष्क्रिय गम्भीर ( अपरिच्छिन्न ), नाम-रूपसे रहित और अव्यक्त कोई अनिर्वचनीय सद् वस्तु ही शेष रह जाती है वह तेजस्तत्त्व नहीं है, क्योंकि उसके रूप नहीं होता । तथा वह तमोमय भी नहीं है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है। विद्वानोंने व्यवहार-निर्वाहके लिये उस सत्-स्वरूप परमात्माके ऋत, आत्मा, परब्रह्म तथा सत्य इत्यादि नाम रख छोड़े हैं ।

सोनेका बना हुआ कड़ा सोना ही है । उस सोनेसे 'कटक' शब्दका अर्थ ( कडा ) जैसे पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार 'जगत्' शब्दका जो अर्थ है वह परब्रह्मपर ही आधारित है, अतः उससे पृथक् नहीं है । जैसे कड़ेका स्वरूप सुवर्णके स्वभावके ही अन्तर्गत है, कड़ेके स्वभावके अन्तर्गत नहीं, उसी प्रकार यह दृश्यमान जगत् भी अपने परिच्छिन्न स्वभावको त्याग देनेपर ब्रह्मभावमें ही प्रतिष्ठित है, 'जगत्' शब्दके अर्थमें नहीं । ( तात्पर्य यह कि सोनेमें ही कड़ेकी कल्पना हुई है, कड़ेमें नहीं । इसी तरह ब्रह्ममें ही जगत्‌की कल्पना हुई है, जगत्‌में नहीं; अतः वह ब्रह्मसे भिन्न नहीं है । ) जैसे मरु-मरीचिकामें प्रतीत होनेवाली नदी अपने भीतर न होनेपर भी चञ्चल तरङ्गोंका विस्तार करती है और वे तरङ्गें सच्ची सी जान पड़ती हैं, उसी प्रकार मन ही इस जगत्रूपी इन्द्रजालकी सम्पत्ति-का विस्तार करता है और वह सम्पत्ति असत् होनेपर भी सत्य-सी प्रतीत होती है । जिसके कारण असत् वस्तु भी सत्-सी प्रतीत होती है, वह माया है । सर्वज्ञ विद्वानोंने उसके अविद्या, संसृति, बन्ध, माया, मोह, महत् और तम आदि अनेक नामोंकी कल्पना की है ।

प्रिय श्रीराम ! दृश्य-प्रपञ्चका अस्तित्व ही द्रष्टाका बन्धन कहा गया है । दृश्यके बलसे ही द्रष्टा बन्धनमें पड़ा है । दृश्यका निवारण हो जानेपर वह उस बन्धनसे मुक्त हो जाता है । 'त्वम्' ( तू ), 'अहम्' ( मैं ) और 'इदम्' ( यह ) इत्यादि रूपोंमें कल्पित जो मिथ्या जगत् है, उसीको दृश्य कहते हैं । जबतक वह दृश्य बना रहता है, तबतक मोक्ष नहीं होता । यदि यह दृश्यजगत् वास्तवमें है, तब तो किसीके लिये उसका